Friday, May 28, 2010

एक मुर्गॆ की अंर्तआत्मा की आवाज...

एक मुर्गॆ की अंर्तआत्मा की आवाज...
भोर होने की आहट सी होने लगी थी-सारी रात खुले में चारपाई पर वैचारिक चैतना के बीज रह-रह कर फ़ूटते रहे, विचार ना सो रहे थे ना जाग रहे थे- इसी तन्द्रामय अवस्था में...पास ही से कुछ मुलायम दबे -हल्के पद्चापो की आवाज सुनाई दी,साथ ही कुछ दार्शनिक अंदाज में विचारों की तरंगो ने मस्तिष्क को छुआ क्योकि मैं भी विचारो के दल-द्ल में पनपा बडा था इसलिए इन संकेतो को समझना आसान रहा.फ़िर भी थोडी कोशिश से आंखॊ को खोल कर देखने की कोशिश की-पास ही एक मुर्गा चहल कदमी कर रहा था-उसकी चाल में बहुत ही गंभीरता झलक रही थी.उसके सिर की कलगी भी इसका आदर कर उसी भाव से पांवो का अनुसरण कर रही थी.यह दश्य वैसा ही था जैसे कोई दार्शनिक गहन विचार में दोनो हाथॊ को पिछे बांधे चहलकदमी कर रहा हो.विचारो की तरंगो का फ़िर प्रक्षेपण हुआ.ये विचार अत्यंत विचलित मन की अवस्था को प्रकट कर रहे थे,ये विचार कुछ-कुछ ऐसे महसुस हो रहे थे जैसे शायद मंगल पांडे के जहन में उस वक्त उठे हो,कुछ मसक रहा था अंदर ही अंदर.प्रश्न उठा-मै क्यो हूं, किसलिए हूं,मेरा वजूद क्या है,क्या मै हर काल-समय की अवस्था में ढल गया हूं, मेरा अस्तित्व व मेरा विकास क्रम क्या है,क्या मैं अनुवांशिक तौर पर तैयार हो गया हूं दासता में जीने व कटने के लिए,क्या छुरी ही मेरी नियति है.
अब तक मेरा ध्यान पुरी तरह उस सजीव प्राण की ओर केन्द्रित हो चुका था.
फ़िर विचारों की दिशा बद्ली-अतीत में मुझसे कहां गलती हुई जिन लोगो के साथ संपर्क हुआ उन्होने काफ़ी हष्ट पुष्ट किया लडाया और मेरी पुष्टता का स्वाद ले कर चखते रहे और मैं गर्व मह्सुस करता रहा.मुझे अपने विशिष्ट होने का गरूर हो चला था क्योकि जगाने का काम भी मेरा ही था.पीढीयो दर पीढी मै कटता चला गया लेकिन आभास ही नही हुआ क्योकि अस्तित्व तो आज भी बरकरार था.कभी हूणो -शको ने काटा तो कभी सिकंदर ने, कभी मुगलो ने तो कभी अंग्रेजो ने.अतित में इसका बोध ही नहीं हुआ इसका यह कारण भी हो सकता है कि विरासत में ये लोग कुछ न कुछ छोड ही गये इसलिए आभास ही न हुआ हो....
...........उस सजीव प्राण के विचारो का सतत...प्रवाह जारी था.
......लेकिन आज अचानक यह बोध क्यो जाग गया-आज छुरी चलती है तो आभास होता है अस्तित्व पर प्रहार मालूम होता है,बहुत घबराह्ट होती है कटने में क्योकि जो छुरी है वह भी मेरी है और हाथ भी अपना अपना सा मालुम होता हैं.सुबह की बाग में घर्राह्ट सी महसूस होती है.बहुत डर लगता है जगाऊ या नहीं क्योकि फ़िर हाथ बढेगें,,फ़िर वैमनस्य का तांड्व शुरु होगा,फ़िर छ्ला जाएगा,फ़िर पिजडें में हैवानियत का द्रश्य होगा, फ़िर करुण क्रन्दन होगा,फ़िर हमें परोसा जाएगा राजनीति व धार्मिकता में......सोचता हुं ये सुबह ही ना हो ...यदि हो तो क्रान्तिकारी सुबह हो- जिसमें जाग्रति हो ,प्रश्न हो,जिम्मेदारी हो,दबंगता हो,एतराज हो..कटने के लिए मैं आज भी तैयार हूं-लेकिन हाथ व छुरीयां अपनो के नही. मैं अपना नैसर्गिक स्वभाव नहीं छोड सकता हूं-आज फ़िर जगा रहा हूं अपनी आवाज के साथ कि- "उठो -जागो"
मेरी तंद्रा में गहरी तंद्रा टूटी मेरा बुध्दिजीवी मस्तिष्क इन विचारों के आगे नत-मस्तक हो गया.ग्लानि मह्सूस हो रही थी स्वयं पर व बुध्दिजीवी वर्ग पर जो केवल सोचता है.अब समझ आ गया कि दबे गले से बिगुल नहीं बजता शंखनाद के लिए पुरी शक्ति झोंकना पड्ती हैं.
एक मुर्गा तो अपनी बाग को सार्थक कर रहा है और हम......?
-योगेन्द्र व्यास (e-mail-yvyas2010@gmail.com)

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