Monday, June 3, 2013

व्यंग्य-सुब्बाराव कट ( व्यंग्य)

सुब्बाराव कट
बहुत खुशनुमा दिन था रविवार का- बहुत सारे पेडिंग काम कुछ खर्चे वाले तो कुछ सिर पर ओढे हुए ,शेष समय आराम के लिए तय था। इसके पहले कि पत्नि के कुछ और आदेश हो अपनी टु-व्हीलर की ओर लपका पर कहते है ना एक से बचा तो दुसरे पर अटका,पुरानी गाडी का सेल्फ़ स्टार्टर आचार व्यवहार में बिल्कुल पत्नि के माफ़िक ही है दस बार ..कर्र..कर्र...ना करे तो आगे ही नही बढ्ती...खैर पहुंचा केश-कर्तनालय,बहुत ही अप्रत्याशित स्वागत आ...आइए..आइए...भाई सा. बस दो कटिंग के बाद आपका नंबर लगाता हूं ...और सर कैसे है.....चाय बगैरह लेंगे....बहुत दिनो बाद आए...मैं भौंचक कि अचानक इतना सम्मान भाव तो पहले कभी नहीं था वरन पहले तो हिकारत का भाव भी उसके चेहरे पर आता था कि अरे भाई सा. आपके सपाट सिर पर बाल काटने में बहुत बोरिंग होती है कोई क्रियेटिविटी ही नहीं और मिलते है सिर्फ़ २० रु..। पर आज इतना प्रेम उमड घुमड कर बरस रहा था मैने सोचा चलो आज दिन अच्छा है .....मेरे गंजे सिर को भी गर्वोक्ति हुई कि चलो आज बाल वालो के बीच अपना सिर उपर उठ गया.... अब जैसे ही सर उपर उठाया तो सामने दिवार पर न्युज पेपर की कटिंग लगी थी और नीचे हाथ से लिखा था सुब्बाराव कट १५० रु.। संशय भाव से मैने पुछा भाई सा. ये क्या है,वो होंठ दबा कर हंसा बोला सर पेपर नहीं पडा क्या ...मैने कहा क्यो क्या तुमने उसमें रेट लिस्ट छपवाई है....वो बोला ऐसा ही समझ लिजिए अब आपकी कटिंग के १५० रु. लगेंगे,मैं बोला क्याssss....२० रू से १५० रु.........क्या मतलब...वो बोला मतलब ये कि सुब्बाराव जी भी अपने बाल कटाने के १५० रु. देते है ...मैने कहा कौन सुब्बाराव वो फ़िर हंसा ..अरे सर रिजर्व बैंक के गवर्नर...मैने कहा -अरे भाई..लेकिन उन्होने तो मजाक में कहा था,सर लेकिन उनके मजाक में कितना दम है..हम तो अब तक घाटे में ही काम कर रहे थे...हमारी युनियन ने भी अब आप जैसे "सरो" के रेट तय कर दिये है.ऐसा लगा जैसे मेरे चंद्राकार सिर के सारे बाल शर्मिंदगी से अपनी क्यारियों से बगले झांक रहे है और सामने बैठे बाल वाले भी समाचार पत्र के पीछे चेहरा छुपा कर हंसने का जतन कर रहे थे।मैं मन ही मन भुनभुनाया इन लोगो को तो पैसे की कमी है नहीं पहले तो गरीबो को ३२ रु में घर चलाने को कहत्ते है और ऐसा भी क्या मजाक कि आप किसी के गंजे सिर से खिलवाड करे.... अब क्या गंजा होना भी अभिशाप है.अब ज्यादा किरकिरी ना हो इसलिए धीरे से उसके कान में फ़ुसफ़ुसा कर पुछा भाई सा.घुट-मुंडी के कितने लोगे..वो आंखे तरेरकर बोला ३५ रु...तो ड्न कर दो।जैसे ही घुट-मुंडा सिर लेकर  कालोनी में घुसा चार-पांच लोगो की संशकित जिज्ञासा को शांत किया फ़िर घर में घुसा पत्नि चिल्लाई ये सफ़ाचट कहां से कराकर आ रहे हो शर्त हार कर आए हो क्या.....अब शर्त क्या जिंदगी ही हार की कगार पर खडी है....इन्फ़्लेशन और रिवर्स रेपो दर आम आदमी की हिफ़ाजत तो नहीं हां पुरी तरह हजामत पर जरुर आमादा है....वाकई जब सिर पर बाल ही ना बचे तो जिंदगी खुशनुमा कैसे हो सकती है......
-योगेन्द्र व्यास

Tuesday, May 21, 2013

डूबी-डूबी आँखों में सपनों के साए:खुशबु

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शरतचंद्र चटोपाध्याय शायद इसीलिए फ़िल्मकारों के पसंदीदा रहे है कि उनके उपन्यासों को पढने वाला प्यार से उपजी दर्द की तीव्रता को भी मखमली एहसास से ओढ लेता है।उनकी लेखनी ऐसी मानो कलम को प्यार की दवात में डुबो-डुबो कर कागज पर उकेरा गया हो..
और गुलजार साहब इन शब्दो पर मानो बरक लगा कर कह देते है..डूबी-डूबी आँखों में सपनों के साए,रात भर अपने हैं दिन में पराए कैसे नैनों में निंदिया समाए...
गुलजार सन १९७५ में आंधी,मौसम के साथ एक फ़िल्म खुशबु लेकर आए जिसमें एक नारी के आत्म-सम्मान को उन्होने अपने ही कोमल अंदाज में बहुत ही सम्मान जनक तरीके से प्रस्तुत किया।शरत चंद्र के उपन्यास पंडितमसाई पर आधारित ये फ़िल्म जिसमें एक गांव में दो बच्चे कुसुम और बृंदाबन साथ खेलते बडे होते है,दोनो के परिवार वाले उनकी शादी तय करते है,चुंकि साथ-साथ रहते है तो दोनो में असीम स्नेह हो जाता है।छुटपन में कुसुम अपने हाथ पर बृंदाबन का नाम भी गुदवाती है बृंदाबन को पढाई के लिए शहर भेज दिया जाता है।उम्र वक्त के साथ भागती है और जवान हो जाती है लेकिन दोनो के परिवार में कुछ ऐसा विवाद जन्म लेता है कि बृंदाबन के पिता कुसुम(हेमा मालिनी) को स्वीकार करने से मना कर देते है और बृंदाबन(जितेन्द्र) को शहर भेज देते है।आहत कुसुम गुदे हाथ पर बृंदाबन का नाम जला देती है लेकिन हाथ पर नाम मिटा देने से दिल पर लिखा नाम मिटाना कुसुम के लिए बहुत नामुमकिन था और वो शादी ना करने का फ़ैसला कर लेती है।विभिन्न घटनाक्रमो से कहानी गुजरती है बृंदाबन डाक्टर बनता है और परिस्थिति वश वो लाखी(शर्मिला टैगोर)से शादी कर लेता है लेकिन एक बच्चा होने के बाद लाखी गुजर जाती है। बृंदाबन अपने बच्चे चरण के साथ गांव आकर बस जाता है।गांव में प्लेग की महामारी फ़ैल जाती है बृंदाबन रात दिन गांव के लोगो की जान बचाने की भरसक कोशिश करता है काफ़ी लोग गांव छोड कर चले जाते है और कई लोगो की जान चली जाती है।कई कलाकार ऐसे होते है जो छोटे से रोल से बहुत गहरा प्रभाव छोड जाते है और कुसुम की सहेली मन्नो के किरदार में फ़रीदा जलाल ने अपनी भुमिका से अत्यधिक प्रभावित किया वही असरानी ने कुसुम के भाई के रुप में अपनी प्रतिभा के एक नए पहलु से परिचित कराया।कुसुम और बृंदाबन का फ़िर आमना सामना होता है,कुसुम के पुलकित मन के आवेग की स्थिति ऐसी कि स्वाभिमान से भरे घडे में भावॊं की बुंदो को बिना छलकाएं संतुलित भाव से सामना करना और ऐसा करना कितना कठिन होता होगा जब मन सागर की भांति हिलोरे ले रहा हो लेकिन किनारो को पता भी ना चले।बृंदाबन को अपनी मां से अतित के घटनाक्रमो का पता चलता है और उसके दिल में कुसुम के प्रति प्रेम के भावो का संचरण होने लगता है।हेमा मालिनी ने अपने संतुलित अभिनय से कुसुम को पुरी तरह जिया है और अपने आत्मसम्मान को बहुत ही संयमित भाव से स्थापित भी किया है।बृंदाबन और कुसुम का मिलाप होता है या नहीं ये तो फ़िल्म देखने पर ही पता लग सकता है।लेकिन
इस फ़िल्म से पंचम और गुलजार की एकरुपता का पता चलता है।फ़िल्म में कुल चार गाने है और इन चार गानो में पंचम ने गुलजार के शब्दॊं को ऐसा खुबसुरत गुंथा है कि जब ये गाने हवाओं में गुंजते है ऐसा लगता है ये कानों में नहीं पुरे शरीर से टकरा रहे हो और पोरो में घुस कर भीना-भीना अहसास देकर लम्बे समय के लिए छोड देते है।पंचम ने ओ माझी रे...गाने को एक अलग ही तकनीक से संवारा है जिसमें उन्होने बंगाली लोक संगीत को एक नए प्रयोग के साथ ढाला जिसमें उन्होने आधी पानी से भरी बोतल में फ़ुंक के जरिये एक नया साउंड तैयार किया ज्यादातर सुनने वालो को ये एक दम क्लिक नहीं होता है लेकिन अगर आप ध्यान से सुनेगें तो आपको इंटरल्युड में तबले पर वाटर इफ़ेक्ट के तुरंत एक हुक आता है जो "पुक" की ध्वनि देता है और ये कमाल सिर्फ़ पंचम ही कर सकते है।ऐसा ही एक और कमाल आशाजी ने "घर जाएगी तर जाएगी" गाने में किया अंतरे में आशा जी के उछलते फ़ुदकते सुरों उतार चढाव को सुनना वाकई किसी रोमांच से कम नहीं-तेरे वास्ते, लाखों रास्ते, तू जहाँ भी चले, मेरे लिये बस तेरी ही राहें, तू जो साथ ले......
विभिन्न खुशबुओं से सारोबर फ़िल्म को फ़िल्म सिनेमा के इतिहास में एक क्लासिक फ़िल्म के तौर रखा जा सकता है।

विशेष:इस फ़िल्म में ट्रेजिक सीन पर आशीष खान ने सरोद पर बेक ग्राउंड स्कोर बहुत ही उम्दा ढंग से प्रस्तुत किया है।
फ़िल्म:खुशबु(8 मई 1975)
निर्माता:प्रसन कपुर
निर्देशक एवं गीतकार:गुलजार
लेखक:शरतचंद्र चटोपाध्याय
संगीतकार: आर.डी.बर्मन
गीत:
१.दो नैनो में आंसु भरे है....लता मंगेशकर
२.बेचारा दिल क्या करे-आशा भोंसले
३.घर जाएगी तर जाएगी-आशा भोंसले
४. ओ मांझी रे...किशोर कुमार
-yogendra vyas

Saturday, May 4, 2013

इस रविवार रुपहला सफ़र : कालापत्थर-मजदुरों के पसीने से पिघला काला सोना

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इस रविवार रुपहला सफ़र :
कालापत्थर-मजदुरों के पसीने से पिघला काला सोना
कालापत्थर गरीब मजदुरों के पसीने से पिघल कर बाहर आता है,ये पत्थर बरसॊ से दफ़न अपनी आजदी का जश्न मनाता है,मगर उसे नहीं पता कि अब उसे दलालो की काली करतुत उसे बदनाम कर देने वाली है,उसे नही पता कि उसे सफ़ेद कगजो में ढोय़ा जाने वाला है,उसे नहीं पता कि उसे सफ़ेदपोश कुर्तो के पीछे छिपा दिया जाने वाला है,उसे नहीं पता कि वो गरीबों की सिगडी में जलेगा,कारखानो की भट्टी में जलेगा या सियासती तिजोरी में दफ़न होगा।जब भी सफ़ेद पोश लोगो की आत्मा को खुरचा जाएगा ये कालिख के रुप में साफ़ नजर आएगा और गरीब मजदुरो की आत्मा को खुरचेगें तो ये अंदर से धधकते लावे के रुप में ही बाहर आएगा। 
कोयले की खदानो में जीवन और मौत का एक ऐसा खेल जहां जिंदगियां अंधेरे में संघर्ष करती नजर आएगी और मुंह चिढाते उजाले में बाहर दलाल कालिख लगे हाथ धोते नजर आएंगे।
27 दिसंबर'75 बिहार चसनाला की वो कोयला खदान जहां 572 मजदुर खदान में पानी भर जाने की वजह से बुरी तरह फ़ंस गए थे।  कालापत्थर फ़िल्म उसी असल घटना से प्रेरित है। विजय(अमिताभ बच्चन) एक ऐसा इंसान है जो अपने आप से भाग रहा है और उजाले से दुर कोयला खदान के अंदर अंधेरे में अपने अतित से लड रहा है।वो मर्चेंट नेवी में जहाज का केप्टन रहा है लेकिन एक रात जहाज तुफ़ान में घिर जाने से तीन सौ यात्रियों से भरे जहाज को मंझदार में छॊड कर अपने साथियों के साथ भाग जाता है।उसका कोर्ट मार्शल कर दिया जाता है।ग्लानि उसकी आत्मा पर बदनुमा दाग छोड देती है।इसी के चलते खामोशी से अपने दिल में धधकती आत्म ग्लानि की ज्वाला को रात दिन महसुस करता है और दिन रात मजदुरॊ की जिंदगी कॊ हर संभव बचाने की कोशिश करता है।वही खदान की डाक्टर सुधा(राखी गुलजार) उस खामोश धधकते लावे को अपने प्यार के मरहम से शांत करने की कोशिश करती है।इसी कडी में खदान मालिक धनराज(प्रेम चोपडा) जो कि मजदुरो की जान की कीमत पर जोखिम भरी ट्नेल से भी कोयला निकाल कर मुनाफ़ा कमाना चाहता है जहां उसे और ज्यादा खोदने पर खदान के अंदर पानी भरने का खतरा है लेकिन खदान इंजिनियर रवि (शशिकपुर) इस जोखिम को टालने की कोशिश करता है लेकिन लालच के आगे सच्चाई हारने लगती है और वो अनहोनी हो ही जाती है जिसमें खदान के कई सौ मजदुर खदान के अंदर बाढ से फ़ंस जाते है।यह सीन देखते समय उस भयावहता का एहसास होने लगता है कि मजदुर अपने व परिवार का पेट भरने के लिए के लिए बिना सुरक्षा कवच के किन-किन परिस्थितियो में काम करते है देख कर कलेजा मुंह को आता है। एक और पात्र मंगल (शत्रुध्नसिन्हा) जो कि जेल से भागा हुआ उम्र कैदी है जो वही कोयला खदान में आकर दादागीरी से मजदुरी करने लगता,विजय और मंगल की कई जगहो पर ठन जाती है और यही ठना-ठनी उसी समय से अमिताभ और शत्रुध्नसिन्हा में जारी है।लेकिन कहानी में विजय मंगल की जान बचा लेता है और खदान की दुर्घटना में वो भी मजदुरो की जान बचाने विजय के साथ खदान में उतर जाता है और मजदुरॊ की जान बचाते हुए जान दे देता है।विजय और रवि अधिकतर मजदुरो की जान बचाने में कामयाब होते है।हालांकि बाक्स आफ़िस पर ये फ़िल्म कोई कमाल नहीं कर सकी लेकिन यश चोपडा ने बहुत ही मेहनत के साथ खदान  दुर्घटना का फ़िल्मांकन किया जो अंत तक देखने वालो की सांसे रोके रखता है।राजेश रोशन का संगीत और सलील चौधरी का बेक ग्राउंड स्कोर जरुर कुछ रौनक पैदा करता है लेकिन विषय वस्तु के नाते गाने दृश्यो में फ़िट नही हो सके लेकिन इन गानो का आडियो सुने तो कुछ गाने कमाल करते है मसलन कोरस गाना धुम मचे धुम और  एक रास्ता है जिंदगी...जहां साहिर सा.ने  अपने शब्दॊ को बिल्कुल भी जाया नहीं किया है बल्कि जिया है। इस फ़िल्म को इसलिए भी याद किया जाना चाहिए कि यश चोपडा सिर्फ़ रोमांस ही नहीं बल्कि यथार्थ परक फ़िल्म बनाने में भी माहिर थे।
खदानो के उपर शतरंज की बिसाते बिछी हुयी है जिसमें सभी गोटियां बिकी हुयी है।बस नुकसान उन बेचारी मजदुरॊ की औरतो का है जो चुडिया तो खरीदती है लेकिन पहनने के लिए कम तोडने के लिए ज्यादा।
विशेष:सलीम-जावेद की पटकथाओं से जन्मे एग्री य़ंग मेन अमिताभ का किरदार इस फ़िल्म में ज्यादा उभरा लगता है जहां वे संवाद कम और आंखो के जरिये ज्यादा बात कहते है।
फ़िल्म:
काला पत्थर(24 अगस्त 1979 )
निर्माता-निर्देशक-यश चोपडा
लेखक -सलीम-जावेद
संगीत-राजेश रोशन
गीत-साहिर लुधियानवी
गीत:
1. एक रास्ता है जिंदगी-किशोर कुमार,लता मंगेशकर   
2. बाहों में तेरी -मो.रफ़ी,लता मंगेशकर   
3. मेरी दुरों से आई बारात-लता मंगेशकर   
4. जगिया जगिया-महेन्द्र कपुर,एस.के. मोहन,पामेला चोपडा   
5. धुम मचे धुम-मो.रफ़ी,लता मंगेशकर,महेन्द्र कपुर,एस.के. मोहन   
6. मुझे प्यार का तोहफ़ा देकर-मो.रफ़ी,उषा मंगेशकर   
yogendra vyas
9425061538

Sunday, April 28, 2013

दामुल (1985)

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दामुल: समाज का विकृत रुप
भारतीय समाज में शोषण की परम्परा सदियों से रही है जिसमें एक वर्ग विशेष अपने से कमजोर वर्ग पर अमानवीय ढंग से आर्थिक,मानसिक एवं दैहिक शोषण करता है जो कि आजतक विकसित हुए कथित सभ्य समाज में भी बदस्तुर जारी है।इन सामाजिक असमानताओं पर सौ सालो के भारतीय फ़िल्म इतिहास में कई फ़िल्म बन चुकी है और कई फ़िल्म आज भी बन रही है लेकिन ये फ़िल्में उसी तरह स्वीकृत होती है जैसे कोई प्रसिध्द पेंटर किसी रोते हुए आदिवासी की अर्धनग्न तस्वीर बना आर्ट गैलेरी में नुमाईश करता है और फ़िर बुध्दिजीवी वर्ग उस पर कई एंगल से उसकी बारिकियो पर चर्चा कर ड्राइंग रुम में सजाने के लिए भेज देता है। इसी के चलते व्यवसायिक सिनेमा के साथ समानांतर सिनेमा का उदय हुआ जिसे कुछ गिने चुने लोग एक सामाजिक समस्या से ज्यादा उसकी कलात्मकता पर ज्यादा तरजीह देते है और राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार देकर अगले फ़िल्म महोत्सव का इंतेजार करते है।जिस पीडा और सच्चाई से फ़िल्म निर्देशक फ़िल्म बनाता है उस पर ना तो समाज और ना ही सरकारें गंभीरता से लेती है बस पुरस्कार देकर इतिश्री कर लेती है और  बेचारे "दामुल"- जो मरते दम तक बंधुआ दासत्व में जीने को मजबुर किए जाते है उनकी अंतहीन कहानी चलती रहती है।
ऐसे ही निर्माता निर्देशक प्रकाश झा है जो लगातार अपनी फ़िल्मों के माध्यम से सामाजिक विकृतियों को अपने ही समाज के सामने लाते रहे है और समानांतर सिनेमा को व्यवसायिक सिनेमा से जोडने का श्रेय भी उन्हे ही जाता है कि उन्होने मनोरंजन के साथ उन सामाजिक दायित्वों का भी निर्वहन किया और दर्शको को सिनेमा हाल तक आने के लिए प्रेरित भी किया।
उनकी शुरुआती फ़िल्मों में से "दामुल" आज भी मन को झकझोर देती है।
बिहार के गया जिले का एक गांव जहां मुख्य रुप से ब्राम्हण और राजपुत अपने वर्चस्व की लडाई में दलितों का पुरजोर शोषण करते है और बंधुआ मजदुर के रुप में उन्हे अपने निज स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करते है।संजीवन(अन्नुकपुर) जो कि दलित वर्ग से है और विभिन्न घटना क्रमों में उसे अपने पिता का कर्ज चुकाने के लिए उसके खेत से उसकी खडी फ़सल छीन ली जाती है,संजीवन गांव के मुखिया माधो(मनोहर सिंग) के पास सहायता मांगने जाता है लेकिन वो उसे मदद के नाम पर गांव के पशु चोरी करने के लिए मजबुर करता है और वो पशु अपने एजेंट के पास जमा करवाता है फ़िर उस व्यक्ति से फ़िरौती मांगी जाती है यदि वो फ़िरौती दे देता है तो पशु वापिस मिल जाते है और नहीं तो पंचायत में फ़ैसला होता है कि इस पशु को बेचकर जो पैसा आए वो बांट लिया जाए और पंचायत का खर्चा भी फ़रियादी ही भरता है।अब चोरी करवाने वाला ही पंच होतो न्याय की उम्मीद ही बेकार है।गांव में एक विधवा है महात्माईन(दिप्ती नवल) जिसका कि माधो मदद के नाम पर पुरजोर  दैहिक शोषण करता है और उसकी खेती की सारी जमीन भी हडप लेता है।इधर चालबाज राजपुत मुखिया गांव के मजदुरो को काम दिलवाने के लिए पंजाब भेजने की कोशीश करता है लेकिन रास्ते में माधो का भाई उन गोलियां चला देता और उसमें काफ़ी मजदुर मारे जाते है।रातो रात माधो और राजपुत मुखिया एक हो जाते है और पुलिस के आगे मुंह ना खोलने के लिए गरीबॊ को धमकाते है।संजीवन सच बोलने की कोशिश करता है लेकिन उसे महात्माईन के बालात्कार और हत्या के मामले में झुठा फ़ंसा कर जेल भिजवां दिया जाता है और फ़िर अदालत उसे  फ़ांसी की सजा सुना देती है।जैसे जैसे ये फ़िल्म देखते जाते है मन बहुत कसेला और द्रवित होता जाता है।लगता है इस धरा पर इतना नारकीय जीवन भी हो सकता है।फ़िल्म में यदि कलाकार खुद पात्र की आत्मा ओढ ले तो लगता है कि अभिनय का चरम क्या होता है इसके लिए अन्नुकपुर और सरीला मजुमदार बधाई व धन्यवाद के पात्र है । आज भी इस तरह के जुल्म अबोध और मेहनत कशो पर जारी है। समाज की वास्तविकता को समझने के लिए इस तरह की फ़िल्मो का अदालतो में संग्यान लिया जाना चाहिए कि आदालते ये भी समझ सके कि सबुतो और गवाहो को किस तरह से तोडा मरोडा जाता है और अत्याचारों की इंतेहा क्या होती है,एक बेगुनाह जिसने जीवन की अबोहवा तक महसुस नहीं की उसको फ़ांसी या जेल में सडने के लिए डाल दिया जाता है।
ये हमारे सिस्टम की विडंबना ही कहिए कि इसे सिर्फ़ एक फ़िल्म मानकर भुला दिया जाता है जबकि फ़िल्में समाज का ही प्रतिबिंब होती है।
मजदुर के शरीर से टपकी पसीने की बुंद अगर देश को खुशहाल बनाती है, तो वही- उसकी आंखो से निकले खुन के आंसु उस देश के अंधकार मय भविष्य की घोषणा भी करते है।
विशेष: इस फ़िल्म में विशेष यही है यदि जीवन में फ़िल्मी मनोरंजन जरुरी है तो जीवन में समाज की जमीनी हकीकत को  समझना भी उतना ही जरुरी है।

फ़िल्म: दामुल (1985)
निर्माता एवं निर्देशक: प्रकाश झा
लेखक: शैवाल(कालसुत्र कथा)
संगीत:रघुनाथ सेठ
सिनेमेटोग्राफ़ी:राजेन कोठारी
अवार्ड:
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड-बेस्ट फ़िल्म क्रिटिक अवार्ड -प्रकाश झा
नेशनल फ़िल्म अवार्ड1985:गोल्डन लोटस अवार्ड बेस्ट फ़िल्म

-योगेन्द्र व्यास


Saturday, April 20, 2013

हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे-चित्रलेखा

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संसार में मनुष्य ही एक ऐसा बुध्दिजीवी प्राणी है जो अपने मन और शरीर दोनो से सतत संघर्षशील रहता है।जबकि पशु प्रकृति द्वारा प्रद्त्त समस्त नैमतो को जस का तस स्वीकार करता है।वो ना भोगी है ना योगी है ना विलासी है ना तपस्वी,ना पापी है ना पुण्यात्मा जो है वो ही है कभी ईश्वर को पाने की कोशिश नहीं करता।लेकिन मनुष्य अपनी बुध्दि और विवेक के जाल में उलझा वो भटका हुआ प्राणी है जो इस भ्रम में है कि वो जप-तप,त्याग से बाहरी एवं आंतरिक वासनाओं पर काबु पा लेगा और ईश्वर के सामने एक अच्छे विद्यार्थी होने का स्वांग भर लेगा......ऐसे में ईश्वर के पास सिर्फ़ मुस्कराने के अलावा और क्या चारा होगा।
भारतीय फ़िल्म इतिहास के सौ वर्ष पुरे होने जा रहे है और चित्रलेखा फ़िल्म का जिक्र ना हो तो शायद उस विषय के प्रति न्याय नहीं होगा जिसे निर्देशक केदार शर्मा ने सन १९४१ एवं १९६४ में चलचित्र पर उतारने का साहस किया। भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास चित्रलेखा पर फ़िल्म बनाना वाकई चुनौती पुर्ण कार्य था और कुछ हद तक वे सफ़ल भी हुए।ये फ़िल्म पाप-पुण्य,योगी-भोगी,ब्रम्हचर्य-वासना,प्रेम-समर्पण,त्याग-चेष्टा जैसे मुद्दो पर द्वंद पैदा करती आगे बढती जाती है।
चंद्रगुप्त मौर्य का दरबार लगा है जिसमें स्वयं राजा एवं सामंत बीजगुप्त(प्रदीप कुमार) राज नर्तकी का नृत्य देखने उपस्थित है।यदि राज दरबार में नृत्य प्रस्तुति होना है तो उसका संगीत भी उतना भावप्रवण और नृत्य भंगिमाए उच्चकोटी की होना तय है।काहे तरसाए जियरा.....राग कलावती में आशा भोंसले और ऊषामंगेशकर के गले की मुरकियों की कारीगरी और नृत्यांगनाओं के पैर की थिरकन सितार,तबले और पखावज कमाल का माहौल रचती है और ये ही लगता है काश की ये जियरा युंही तरसता रहे।राज नर्तकी चित्रलेखा(मीना कुमारी) पर सम्मोहित बीज गुप्त उसके प्रेमापाश में बंध जाते है और एक क्षत्रिय अपना राजधर्म एवं अपनी होने वाली पत्नि यशोधरा को भुलकर राज नर्तकी के साथ आमोद-प्रमोद में लीन हो जाता है।राजगुरु योगी कुमारगिरी अपने एक शिष्य श्वेतांक(मेहमुद) को सांसारिक जीवन के पापो का अध्ययन करने भेजते है लेकिन जिन आकर्षण से वो भागता है वो उन्हे उतने ही मजबुती से जकडते जाते है और वो उन्ही सांसारिक अवस्थाओं में खुद को पाता है।वहीं दुसरी और योगी ब्रम्हचारी कुमारगिरि चित्रलेखा को बीजगुप्त से पीछा छुडाने के लिए कडे शब्दॊं के साथ अपमान जनक भाषा में उसे पाप की जिंदगी से दुर जाने के लिए कहते है और ईश्वर की शरण में जाने के लिए कहते है यहां इन दोनो की बहस संवादो के रुप में सुनने लायक है-जिस तपस्या को धर्म समझ कर आप ईश्वर को खुश कर रहे है, तो मै अपने धर्म का पालन करने के लिए अपनी कला से दुनिया को खुश कर रही हुं यदि आप ये कहे कि मैं झुठ कह रही हो तो आप ज्ञानी  नहीं और यदि आप मानते है कि मैं सच हुं तो मेरा दोष नहीं।लता जी आवाज में उम्दा गाना संसार से भागे फ़िरते हो.....ये पाप हैं क्या, ये पुण्य हैं क्या, रीतों पर धर्म की मुहरे हैं हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे।चित्रलेखा अपना प्रेम,ऐशो-आराम सब कुछ त्याग कर कुमारगिरी की शरण में चली जाती है लेकिन ये क्या स्त्री को अंधकार,मोह,माया और वासना मानने वाले कुमारगिरी खुद ही चित्रलेखा के मोहपाश में ध्वस्त होगए,सारी योग-तप-तपस्या वासना के धधकते लावे के उपर बैठ कर बरसो बरस की और अब एक याचक की भांति चित्रलेखा से गिढगिढा रहे है,यही इस फ़िल्म का मजबुत भाग है जिसे जरुर देखना चाहिए,ये देखना चाहिए कि एक तपस्वी अपनी सांसारिक वासनाओं को पुरजोर दबाकर ये समझता है कि उसने अपनी इच्छाओं पर विजय पा ली है तो ये उसकी गंभीर भुल है योगी की अवस्स्था तो ये है कि वासनाओं की उपस्स्थिति में मन की अवस्था विचलित ना हो यानि जब हम घर का कचरा बाहर फ़ेंक रहे होते है तो ये एक सहज प्रक्रिया के तहत करते है ये  भाव नहीं रहता कि हम कचरा फ़ेंक रहे है और फ़िर उस पर चिंतन नहीं करते कि हमने वो कुढा फ़ेंक दिया है।जो फ़ेक दिया सो फ़ेंक दिया जो चिंतन करने लायक नहीं था।लेकिन आज के योगियों की स्थिति कुछ ऐसी ही है कि त्यागी रात दिन त्याग के बारे में सोचता रहता है और भीतर कचरा इकठ्ठा करता चला जाता है मन जब भी ईश्वर को याद करेगा पहले कचरे का ख्याल ही आएगा।इसीलिए  एक योगी के भोगी बनने की संभावनाएं सदा मौजुद रहती है जबकि एक भोगी को योगी बनने में ज्यादा समय नहीं लगता।इसिलिए चित्रलेखा मुनिराज से ज्यादा उपलब्ध मालुम पडती है जब वो कहती है कि स्त्री अगर अंधकार है तो आंखे चौंधियां क्यो जाती है। इस फ़िल्म को भोगी और योगी दोनो के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए.इस फ़िल्म में संगीतकार रोशन का बेजोड संगीत और साहिर सा. के उम्दा गीत ना होते तो ये फ़िल्म बेजान होकर रह जाती है.साहिर साहब ने अपनी तन्हा जिंदगी के लम्हो को इन गीतो में पीरो दिया लगता है और रोशन साहब ने संगीत की उन उंचाईयों को छुआ है जहां सुनने वाले बस नीचे उतरना ही नहीं चाहेंगे.मन रे तु काहे ना धीर धरे...............
विशेष: यदि साहिर सा.के गीतो के साथ रोशन साहब संगीत सुन लिया तो समझिए एक दिन की इबादत मुकम्मल हुयी। 
फ़िल्म:चित्रलेखा(1964 )
निर्माता:ए.के.नडियादवला
निर्देशक:केदार शर्मा
लेखक एवं संवाद:केदार शर्मा
मु्ल उपन्यास:भगवतीचरण वर्मा
संगीत: रोशन
गीतकार: साहिर लुधियानवी
गीत:
1. ऐ री जाने ना दुंगी-लतामंगेशकर(राग कमोद)   
2  छा गया बादल नील गगन पर-मो.रफ़ी,आशा भॊंसले   
3  काहे तरसाये जियरा-आशा भॊंसले,उषा मंगेशकर(राग कलावती)
4  मन रे तु काहे ना धीर धरे-मो.रफ़ी((राग कल्यान,यमन)       
5  संसार से भागे फ़िरते हो-लतामंगेशकर(राग कल्यान,यमन)   
6  सखी रे मेरा मन उलझे-लतामंगेशकर   
7  मारा गया ब्रम्हचारी-मन्ना डे   

Sunday, April 7, 2013

देखी जमाने की यारी बिछडे सभी बारी बारी...

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रुपहला सफ़र: इस रविवार:कागज के फ़ूल
फ़िल्मी दुनिया में एक बात सबसे खराब ये है कि कुछ सफ़ल फ़िल्मकारो ने अपनी व्यवसायिक बेलेंस शीट में कुछ व्यक्तिगत एवं भावानात्मक रिश्तो को भी शामिल कर दिया परिणाम ये हुआ कि ना तो वे सफ़ल व्यवसायिक बन पाए ना ही निजी जिंदगी को संवार पाए भले ही वे योग्य एवं दक्ष फ़िल्मकार रहे हो।जब दौलत और शोहरत का नशा उतरता है तो शराब का नशा इन्हे  जिंदगी से दुर ले जाने का मन बना लेता है।  
"कागज के फ़ुल" फ़िल्म का जब भी जिक्र होगा सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही व्यक्ति का जिक्र होगा और वो है भारतीय फ़िल्म इतिहास के स्वर्णिम दौर के कलात्मक हस्ताक्षर वसंतकुमार शिवशंकर पादुकोण-"गुरुदत्त".सन 1944 से 1964 तक के फ़िल्मी सफ़र में गुरुदत्त ने इस तरह काम किया कि उन्हे अपनी अंर्तदृष्टि से सिनेमा रचने का हुनर मंद माना जाने लगा और उनके तकनिक सिनेमा को "गुरुदत्त का सिनेमा" पुकारा जाने लगा।बतौर निर्देशक उन्होने अपनी कलात्मक खुशबु बाजी,जाल,बाज,आर पार,मि.एण्ड मिसेस ५५,सैलाब,प्यासा तक फ़ैलायी लेकिन "कागज के फ़ुल" पर आकर समाप्त हो गई। फ़िल्मी पंडित फ़िल्म "कागज के फ़ुल" को गुरुदत्त की आत्मकथात्मक कृति मानते है। लेकिन दर्शको ने उस समय इस फ़िल्म को नकार दिया और बाक्स आफ़िस पर ये फ़िल्म ध्वस्त हो गई। फ़िल्म जगत में कई निर्देशको ने फ़िल्में अपने निजी गम,तन्हाई,प्रेम और अपने अंदर चल रहे तुफ़ान को एक चित्रकार की माफ़िक उसे अपने ही ब्रश से सफ़ेद सिनेमाई पर्दे पर उकेरने की कोशिश की लेकिन बहुत कम लोग सफ़ल हो सके कारण कि उन्होने अपनी नितांत एकाकी चित्रकारी को बेचने की कोशिश की जबकि खरीदार दर्शक तो खुद अपनी जमीनी हकीकत से मायुस तीन घंटे पर्दे पर सुखद स्वप्न में मनोरंजन तलाश रहा होता है।
फ़िल्म की शुरुआत कैमेरे का वाईड एंगल स्टुडियो को फ़ोकस करता है साथ ही एक बुजुर्ग स्टुडियों की सिढियां चढता हुआ बेक ग्राउंड में एस.डी.बर्मन की धुन वक्त ने किया क्या हसी सितम...चलता है,तब समझ आने लगता है कि फ़िल्म फ़्लेश बेक में जाने वाली है।सुरेश सिन्हा(गुरुदत्त)एक सफ़ल फ़िल्म डायरेक्टर है दौलत शौहरत कदम चुमती है लेकिन उतना ही असफ़ल अपनी निजी जिंदगी में है।सुरेश की पत्नि एक अमीर परिवार से है लेकिन उसे फ़िल्मी दुनिया के लोगो से नफ़रत है और सुरेश को अपनी बेटी पम्मी(बेबी नाज) से भी अलग कर देती है।बारिश की एक रात सुरेश की मुलाकात शांति(वहिदा रहमान) से होती है जहां वो उसे अपना रेन कोट बारिश से बचने के लिए दे देता है और ये ही रेन कोट सुरेश की जिंदगी में तुफ़ान की दस्तक ले कर आता है।शांति रेन कोट लौटाने स्टुडियों पहुंचती है और अचानक कैमरे के सामने आ जाती है।सुरेश को एक मासुम चेहरे की तलाश में फ़िल्म की नायिका मिल जाती है।शांति को लेकर सुरेश फ़िल्म बनाता है फ़िल्म सुपर हिट हो जाती है और शांति सुपर स्टार।फ़िल्मी पत्रिकाओं में सुरेश और शांति के संबधो के बारे में गासिप खबरे छपती है और स्कुल में पम्मी के दोस्त मजाक बनाते है।पम्मी शांति से मिलकर झगडा करती है और शांति फ़िल्म दुनिया और शहर छॊड कर जाने का फ़ैसला कर लेती है।निजी जिंदगी में अदालत भी बच्ची को सुरेश से अलग कर देती है।सुरेश की फ़िल्मे फ़्लाप होती जाती है दिलो दिमाग में शांति उथल पुथल मचा रही होती है प्यार का एक आसरा वो भी चला जाता है।धीरे धीरे सब कुछ बिक जाता है शराब सहारा बनकर खुद्दारी का आवरण ओढ लेती है देखी जमाने की यारी,बिछडे सभी बारी-बारी।ये फ़िल्म उदासी और मायुसी का ऐसा महौल रचती है कि एस.डी.बर्मन के मस्ती वाले गाने भी उससे उबार नही पाते।शांति लौट आती है इस आस में कि सुरेश की जिंदगी फ़िर से लाईट कैमरा एक्शन बोल सके लेकिन सुरेश की खुद्दारी और बेक ड्राप में ये कोरस गाना "रात भर मेहमा है बहारे यहां, रात गर ढल गयी फ़िर ये खुशियां कहा"आखिरी सीन में सुरेश(गुरुदत्त)खाली स्टुडियों में दाखिल होता है और अपने फ़िल्मी सुनहरे पलो को याद करता है और डायरेक्टर की कुर्सी पर अपनी अंतिम सांस लेता है। कुल मिलाकर ये फ़िल्म पुरे समय,उदासी,मायुसी,निराशा के तंग गलियारो से गुजरती जाती है और अंत भी खुद से हार का संदेश देती है।हालांकि तकनीकी रुप से देखा जाए तो ये काफ़ी उम्दा फ़िल्म कही जा सकती है।गुरुदत्त ने मेहबुब खान से मेहबुब स्टुडियों में एक दिवार में तोड्फ़ोड करवायी थी ताकि नेचुरल और स्पाट लाईट का बेहतरीन इफ़ेक्ट ले सके और वी.के. मुर्ती ने अपने कैमरे से ये सीन वाहिदा जी पर फ़िल्माया गया जो देखने लायक है।एक बात घोर आश्चर्य में डालती है और इस पर विचार भी होना चाहिए कि यदि ये गुरुदत्त की आत्मकथात्मक कृति है तो फ़िर गुरुदत्त जैसे व्यक्ति को इस कहानी का दुखद अंत असल जिंदगी में तो समझ आ ही जाना चाहिए था।कहते है  वहिदा जी के प्रेम में डुब गए थे गुरुदत्त और गीता दत्त(पत्नि)से इसी वजह से अलगाव हुआ जो 10 अक्टूबर 1964 तक जारी रहा जब उन्होने नशे की हालत में नींद की गोलियां ज्यादा खा ली थी और सिर्फ़ ३९ वर्ष की उम्र में पेक अप कह गए।कैफ़ी आजमी के शब्दों में"रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई,तुम जैसे गए वैसे भी जाता नहीं कोई"।
विशेष:कागज के फ़ुल को पहली सिनेमा स्कोप फ़िल्म होने का फ़क्र हासिल है।अस्सी के दशक में इस फ़िल्म को विश्व सिनेमा सुची में एक नायाब फ़िल्म की श्रेणी में रखा गया।फ़िल्म के अंत में बजी धुन को पंचम ने 1942 ए लव-स्टॊरी में कुछ ना कहो गाने में उपयोग किया।
फ़िल्म:कागज के फ़ुल (1959)
निर्माता एवं निर्देशक: गुरुदत्त
लेखक एवं संवाद: अबरार अल्वी
गीत: कैफ़ी आजमी
संगीत:एस.डी. बर्मन
सिनेमेटोग्राफ़ी-वी.के. मुर्ती
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड:
बेस्ट सिनेमेटोग्राफ़ी-वी.के. मुर्ती
बेस्ट आर्ट डायरेक्शन-एम.आर.आचरेकर
गीत:
1.देखी जमाने की यारी-मो.रफ़ी
2.वक्त ने किया क्या हसीन सितम-गीता दत्त  
3 सन सन वो चली हवा-मो.रफ़ी,आशा भॊंसले
4.हम तुम जिसे कहता है-मो.रफ़ी
5.एक दो तीन चार-गीता दत्त
6. उल्टे सीधे दांव लगाए-मो.रफ़ी,आशा भॊंसले


Saturday, March 30, 2013

होली

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प्रतिकात्मक दृष्टीकोण से देखा जाए तो होली उन सब बुराईयों को तिलांजली है जो कि अग्नि में जल कर भस्म हो जाती है लेकिन आज कल इसके बिल्कुल उलट- लकडी तो जल जाती है लेकिन मन की कलुषता,अराजकता, ईर्ष्या-द्वेष,अनैतिकता,वहशीपन,कुटिलता,घोर लालच, बिना जले साफ़ तौर पर बाहर रह जाते है या युं कहे कि भक्त प्रह्लाद तो जल जाते है लेकिन होलीका साफ़ बचकर बाहर आ जाती है। आज इंसान -रंग की जगह खुन से खेल रहा है और खुद का खुन पानी होता जा रहा है।
ये कहानी उस कालेज की है जहां छात्र अपनी उच्छृंखलता को अपना हक समझते है,कालेज के चेयरमेन उसे व्यवसाय का अड्डा, कालेज का प्रिंसीपल चेयरमेन की चाटुकारी में शान समझता है, कुछ शिक्षक टाइम पास का साधन और कालेज के कर्मचारी हडताल को अपना हथियार।ऐसे में शिक्षा की फ़ेक्ट्री में से किस तरह का उत्पाद बाहर आएगा ये आसानी से समझा जा सकता है।
"होली"फ़िल्म मराठी नाटककार महेश एलकुंचवर के नाटक पर आधारित है जिसे कि ख्यात डायरेक्टर केतन मेहता ने ये भारतीय फ़िल्म एण्ड टेलिविजन संस्थान के छात्रो के साथ एक वर्कशाप के रुप में निर्माण किया था।फ़िल्म की खासियत ये है कि कालेज केम्पस और होस्टल के हालात को कैमेरा जस का तस बस घुमाता जाता है और ये याद दिलाता जाता है कि अरे हां ये छात्र तो हम ही है और ये कालेज,ये होस्टल भी तो हमारा है-जिसकी भद्दी दिवारे,भद्दे स्लोगन पटी पडी है,सिगरेट के धुंए में धुंधलाता भविष्य,बियर की बोतलो में लडखडाती जिंदगी।क्लास में शिक्षक है छात्र नहीं,महिला शिक्षिका की क्लास में बेहुदे कमेंट,आते-जाते लडकियों पर छिंटा-कसी,सीधे-सादे जुनियर छात्रो की रेगिंग और भी कई ऐसी हरकते हां शायद कुछ मीठी यादे भी.....।
छात्रो के मन में कडवाहट तब घुल जाती है जब होली के दिन छात्रो को छुट्टी नहीं मिलती और उस दिन कालेज के चेयरमेन (श्रीराम लागु) के आने की सुचना दी जाती है।छात्रो के यदि कोई नजदीक टीचर है तो वो है मि.सिंग(नासिरउद्दीन शाह)जो उन्हे समझता है।इसी बीच कालेज के क्लास टु कर्मचारी हडताल पर चले जाते है और इस वजह से परीक्षा स्थगित हो जाती है।इससे छात्रो का गुस्सा और भडक जाता है।मि.सिंग(नासिर) प्रिंसीपल(ओम पुरी) को आगाह करते है लेकिन वो इसे नजर अंदाज करते है।प्रिंसीपल का भतीजा जो कि इसी कालेज में पढता है उसका एक छात्र से झगडा हो जाता है और इसी वजह से दुसरे छात्र को कालेज से निकाल दिया जाता है और ये घटना आग में घी की तरह काम करती है।छात्रो का असंतोष बढ जाता है।फ़िल्म संस्थान पुणे में एक गिरे हुए पेड को केतन मेहता ने सांकेतिक रुप से "सिस्टम" के धराशायी होने को प्रतिकात्मक रुप से प्रस्तुत किया। कालेज के चेयर मेन आर्ट्स के विषयो को समाप्त कर व्यवसायिक पाठ्यक्रम शुरु करने का आदेश सुनाते है।चेयरमेन के संबोधन में छात्र जमकर हंगामा मचाते है और टमाटर और अंडे फ़ेंक कर चेयरमेन को वहां से भगा देते है।कालेज प्रिंसीपल एक छात्र को फ़ुसला कर उन सभी छात्रो के नाम उगलवा लेते है जिन्होने हंगामा मचाया था।लेकिन वो उन लोगो के नाम भी ले लेता है जो उस समय वहां नहीं थे।उन सभी छात्रो को कालेज से निकालने का फ़रमान जारी होता है।लेकिन जिसने प्रिंसीपल को नाम लिखवाए थे उन्हे उसका पता चल जाता है और होस्टल में सभी छात्र मिलकर उसे बहुत ही बुरी तरह प्रताडित करते है और वो छात्र शर्मिंदगी में आत्म-हत्या कर लेता है।अंतत: पुलिस आती है "होली" के दिन सभी छात्रो की गिरफ़्तारी होती है लोग रंग गुलाल खेलते है और ये छात्र पुलिस गाडी में सुनी आंखो से लोगो को होली खेलते बस देखते है।
आइए आपको बता दे कि ये कालेज से निकाले गए छात्र कौन-कौन है-तो ये है अमीर खान,आशुतोष गवारीकर,नीरज वोरा,राज जुत्शी,अमोल गुप्ते,मनोज पहावा,बेंजामिन गिलानी,यतिन्द्र करयेकर,राहुर रानाडे इत्यादि।लेकिन ये सभी छात्र फ़िल्म में से तो निकाले गए लेकिन आज फ़िल्म जगत में उतने ही सफ़ल कलाकार के तौर पर आपको काम करते दिखाई देंगे।इस फ़िल्म में कोई हीरो नहीं,जहांगीर चौधरी का कैमेरा कभी अमीर खान या अन्य कोई कलाकार पर फ़ोकस नहीं होता बस फ़ोकस में कालेज और स्क्रीप्ट।हालांकि फ़िल्म अपने अंदाज में शिक्षा व्यवस्थाओं पर कई तंज कर जाती है कि "शिक्षा संस्थान वो फ़ेक्ट्रीयां है जहां गुलाम नौकरी करने के लिए बनाए जाते है"फ़िल्म मनोरंजन के लिए देखना होतो ना देखे निराशा हाथ लगेगी इसीलिए इस बार कहानी को विस्तार से कह दिया है।लेकिन ऐसी फ़िल्मो पर भी चर्चा होनी चाहिए जो कभी चर्चाओं में नही रही ।
विशेष:इस फ़िल्म को नेशनल अवार्ड बेस्ट सिनेमेटोग्राफ़ी हेतु जहांगीर चौधरी को दिया गया था
फ़िल्म: होली (1984)
निर्माता: प्रदीप उप्पर
निर्देशक: केतन मेहता
लेखक: महेश एलकुंचवर
संगीत: रजत ढोलकिया
सिनेमेटोग्राफ़ी-जहांगीर चौधरी

Saturday, March 23, 2013

ये रातें नई पुरानी- जूली


उम्र सोलह की हो या अठ्ठारह की जब यौवन का समंदर हीलौरे लेता है तो तृप्त होने किनारे की ओर तेजी से भागता है।मगर कुछ किनारे छलावे साबित होते है और कुछ लहरो को तृप्त कर हौले से सहारा देकर फ़िर से उन्मुक्तता के समंदर में छोड देते है।ये तटस्थता ना सिर्फ़ सुरक्षा देती है बल्कि लहरो का आत्मविश्वास मजबुत करती है।ये किनारा एक अच्छा दोस्त,एक अच्छा प्रेमी,एक अच्छे पति-पत्नि और एक अच्छा समाज भी हो सकता है।

प्रेम तृप्ति भी है और प्यास भी, सुंदरता उसी में है कि तृप्त भी हो जाए और प्यास भी बनी रहे लेकिन ये तभी संभव है जब होश पुर्वक उम्र में प्रवेश किया जाए और प्रकृति की अनुपम कृति शरीर का सम्मानपुर्वक वैभव बरकरार रखा जाए।

"जुली" वो यौवन है जो अपनी उम्र की करवटो को महसुस करती है और "शशी" वो डरपोक भौंरा है करवट ले रहे फ़ुल में सलवटे डाल कर भाग जाना चाहता है।फ़िल्म जुली सत्तर के दशक की सबसे चर्चित फ़िल्मों से एक है जिसमें एक एग्लो इंडियन लडकी जुली(लक्ष्मी) जो कि बंगाली ब्राम्हण परिवार के लडके शशी भट्टाचार्य(विक्रम) से प्यार करने लगती है।जुली का पिता ओमप्रकाश जो अपने परिवार को बहुत प्यार करता है उस परिवार में जुली के अलावा एक छोटी बेटी और दो बेटॆ है।जुली की मां नादिरा सख्त मिजाज है और पति ओमप्रकाश की रोज पीने की आदत से परेशान भी है।लेकिन ये परिवार लडते झगडते हर हाल में खुश रहना जानता है और इन्हे खुशी मनाते देखते हुए अपनी भी इच्छा हो जाती है कि यार चलो परिवार के साथ मिल कर "माय हार्ट इज बिटिंग गाना गाया जाए."शायद यही खुशी आज परिवारो में कही पीछे छुट गयी है कि हम खुशी के पलो को साथ में जीने में भी संकोच करते है।दुरियां इतनी हो जाती है कि अपने ही बच्चों की आवाज हम तक नहीं पहुंच पाती और जब तक पहुंचती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

थोडी बात राजेश रोशन की करे जो अपने संगीत के जरिये रोमांस का एक बहुत ही उम्दा परफ़्युम छिडक देते है और वाद्ययंत्रो से मादकता का वो महौल पैदा करते है जिसमें बाहर आना सचमुच अच्छा नहीं लगता "भुल गया सब कुछ याद नहीं अब कुछ.....किशोर और लता जी की आवाज में जो नशा है शायद कोई मदिरा में नहीं। सेक्साफ़ोन और गिटार के बेहतरीन नोट्स पुरे रोमांटिक माहौल पर पहरा देते नजर आते है।लेकिन जैसा कि मैने उपर कहा कि ऐसे माहौल से बाहर आने का मन नहीं करता लेकिन इस गाने के तुरंत बाद यदि आप इसी फ़िल्म का गाना "साचा नाम तेरा" सुनेगे तो आपको "मादकता से समाधी" वाली बात बिल्कुल सटिक लगेगी बस एक प्रयोग करके देख लीजिए।आशाजी और उषा जी की आवाज का सम्मोहन जाल बस माहौल बदल जाएगा।बेक ग्राउंड स्कोर बेहतरीन है। इसी में से एक धुन पर राजेश जी ने एक गाना आगे चलकर फ़िल्म काश में बनाया था "ओ यारा तु प्यारो से है प्यारा"।

जुली प्रेगनेंट हो जाती है,शशी शहर भाग जाता है,जुली की मां उसे शहर से बाहर नौकरी करने के बहाने भेज देती है।बच्चा जन्म ले लेता है, जिसे जद्दो जहद के बीच नादिरा अनाथ आश्रम में भेजती है।एक मां अपने बच्चे के बिना कैसे रहे और एक मां अपनी बेटी का दुख कैसे सहन करे इसी के चलते नादिरा पुरे परिवार के साथ इंग्लैण्ड जाने का फ़ैसला करती है लेकिन शशी के पिता उत्पल दत्त को ये बात पता चलती है वो एक समझदार इंसान के रुप में दोनो परिवारो को जात पांत से परे होकर मिला देते है।जुली के चेहरे पर फ़िर मुस्कान लौट आती है उसे अपना प्यार और बच्चा दोनो मिल जाते है।लेकिन असल जिंदगी में ऐसी कहानियों का अंत बहुत ही गमगीन और दुर्दांत तरीके से होता है।

लता जी द्वारा फ़िल्म में गाया एक गाना बहुत असरदार है ये राते नई पुरानी...सबके दिल है जागे जागे..सबकी आंखे खोई खोई,खामोशी करती है बातें।

अगरबत्ती अगर भगवान के लिए जलती है तो कोशिश हो कि इसकी खुशबु उस तक पहुंचा दे।
विशेष:जुली फ़िल्म मलयालम फ़िल्म चत्ताकारी से प्रेरित है,इसमें श्री देवी ने बाल कलाकार की भुमिका निभाई थी और प्रिति  सागर ने पहला अंग्रेजी गाना हिन्दी फ़िल्म के लिए गाया।

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फ़िल्म:
जुली- (अप्रेल 18, 1975)
निर्माता:बी.नागारेड्डी-चक्रपानी
निर्देशक : के.एस.सेथुमाधवन
लेखक(संवाद)-इंदर राज आनंद
संगीत:राजेश रोशन
अवार्ड:
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड /बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन अवार्ड-
बेस्ट एक्ट्रेस- -लक्ष्मी
बेस्ट म्युजिक डायरेक्टर-राजेश रोशन
बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस-नादिरा
बेस्ट गीतकार-आनंद बक्क्षी(बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन अवार्ड)
गीत:
1. दिल क्या करे..किशोर कुमार(गीत-हरीन्द्रनाथ चटॊपाध्याय)
2. ये राते नई पुरानी-लता मंगेशकर(गीत -आनंद बक्क्षी)
3. भुल गया सब कुछ-किशोर कुमार,लता मंगेशकर(गीत-हरीन्द्रनाथ चटॊपाध्याय)
4. माय हर्ट इज बिटिंग-प्रिति सागर (गीत-हरीन्द्रनाथ चटॊपाध्याय)
5. सांचा नाम तेरा-आशा भॊंसले,उषा मंगेशकर    (गीत -आनंद बक्क्षी)


Sunday, March 10, 2013

जागो सोने वालो.....सुनो मेरी कहानी: भुत बंगला

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सौ वर्ष के भारतीय फ़िल्म ब्रम्हाण्ड की सैर करे तो हजारों वर्ष भी कम पड जाएंगे- अनगिनत सफ़लताएं-असफ़लताएं,किस्मत-बदकिस्मती,बुलंदियां-बदहाली,खुशी-अवसाद,सुरीलापन-बेसुरापन,बेशुमार कालजयी हुनरमंद कलाकारो की एक पुरी आकाश गंगा,जीवित एवं अजीवित किवदंतियां।सतत चलायमान ये फ़िल्मी दुनिया सफ़ेद पर्दे पर अपना रुपहला सफ़र तय करती रहेगी जब तक कि कोई सुरज अपनी किरणॊ को समेट ना लें।
तो चलिए आज की सैर भुत बंगले पर कर आते है।इसी फ़िल्मी ब्रम्हाण्ड के एक सितारे मेहमुद जिन्होने विषम परिस्थितियों में कई असफ़लताओं को एक साथ जिया,बहके कदमो को संभाला और एक और असफ़ल फ़िल्म अपने भाई उस्मान अली के साथ मिल कर बनाई।बात असफ़लता की नहीं हिम्मत की है जब साठ के द्शक में फ़िल्मे एक से बढ कर एक टिकिट खिडकियों पर अपने रिकार्ड तोड रही थी ऐसे में भुत बंगला जैसी फ़िल्म बनाना वाकई साहस का काम ही कहा जाएगा। एक तो मर्डर मिस्ट्री उपर से फ़िल्म को सेंसर बोर्ड से ए-सर्टिफ़िकेट मिलना पुरी फ़िल्म पर ग्रहण ही कहा जा सकता है।फ़िल्म में कुछ खिंचाव था तो मेहमुद और पंचम की कामेडी।इस फ़िल्म में पंचम ने पहली और आखिरी बार फ़िल्म में अभिनय किया लेकिन जो भी किया अद-"भुत" ही था।फ़िल्म में नुकसान ना हो इसलिए मेहमुद कि बहन मीनु मुमताज ने अपना पहला बच्चा तक कोख में आते ही उसे जन्म ना देने का निर्णय लिया।ऐसे में जब फ़िल्म कुछ कमाल ना कर पाए तो क्या स्थिति पैदा होती होगी, लेकिन ये फ़िल्मी दुनिया दिल और दिमाग दोनो की मजबुती मांगती है।इस फ़िल्म में किशोर कुमार और पंचम ने पहली बार साथ काम किया और वो गाना बनाया जो आज भी गुनगुनाया जाता है.."जागो सोने वालो सुनो मेरी कहानी." मन्ना डे से "आओ ट्विस्ट करे" जैसा गाना गवा लिया ये गाना बिनाका गीत माला की दुसरी पायदान पर खुब बजा और लता जी से बेहद एक सुंदर गीत "ओ मेरे प्यार आजा"जो कि बेहद करीने से तैयार किया लगता है।
लेकिन उस समय मिडिया छब्बीस वर्षीय पंचम से बहुत सख्ती से पेश आया उसने छोटॆ नवाब और भुतबंगला की जम कर खिंचाई की। लेकिन जब आज इन गानो के नोट्स और आर्केस्ट्राइजेशन को सुनते है तो उनकी थाप बाद के दशको में सुनाई देती है।क्या ही अजीब बात है जिस भुतबंगला मर्डर मिस्ट्री ने पंचम के संगीत को नकारा वही "तीसरी मंजिल" की मर्डर मिस्ट्री ने पंचम को सातवे आसमान पर पहुंचा दिया।
अरे!फ़िल्म की कहानी पर तो बात ही नहीं की...चलिए संक्षेप में कहानी युं है कि अमीर सेठ कुंदनलाल का बंगले कत्ल हो जाता है और उसकी बीबी और बच्चा डर कर कही चले जाते है।पचास साल बाद उसी बंगले में कुंदनलाल के तीन भतीजे श्यामलाल(नासीर हुसैन),रामलाल(नाना पलसीकर) और रामु रहते है।रामलाल की बेटी रेखा(तनुजा) जिस दिन लंदन से आने वाली होती है उसी दिन रामलाल की कार एक्सीडेंट में मौत हो जाती है और उसी रात को रामु का भी कत्ल हो जाता है।ऐसे में मोहन(मेहमुद) जो कि युथ क्लब का सदस्य है और उनकी पुरी टीम है रेखा की मदद करती है।मोहन और रेखा की मोहब्बत और कौन रेखा को भी मारना चाहता है,पिछले कत्लो का कातिल कौन हो सकता है?ये जानना हो तो फ़िल्म तो देखनी पडेगी ना।क्या पंचम और मेहमुद को गाते और खाते भुत बंगले में नहीं देखिएगा क्या?
विशेष: भुत बंगला से मेहमुद ने पहली बार निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा।इस फ़िल्म में दुबले पतले अमीन सयानी को अपनी मोहक आवाज के साथ देखना सुखद है।
फ़िल्म: भुत बंगला(1965)
निर्माता: उस्मान अली
निर्देशक: मेहमुद
गीत: महरुह सुल्तानपुरी
संगीत: आर.डी.बर्मन
लेखक एवं संवाद: अख्तर-उल-इमान
गीत:
1.ओ मेरे प्यार आजा -लता मंगेशकर
2.जागो सोने वालो-किशोर कुमार
3.प्यार करता जा-मन्ना डे
4.आओ ट्विस्ट करे-मन्ना डे
5.भुत-बंगला-मेहमुद,आर.डी.बर्मन,सुरेश


Saturday, March 2, 2013

आओ थोडे से सपने सजाएं-थोडा सा रुमानी हो जाएं.........

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दो घाटो के बीच एक पतली सी धारा है,घाट नहीं चलते धारा चलती है,पतली सी धारा जो समंदर से मिलती है और समंदर हो जाती है और घाट घाट रह जाते है जो कही आते है ना जाते है।ये है जीवन का दृष्टीकोण कि हमारी सोच सकारात्मक धारा की तरह है या जड घाटो की तरह स्थिर।विराट को अपना लेना और उसे अपने में समा लेना जीवन के प्रति खिलंद्ड पन की निशानी है।उदासी,संकोच,कुंठा,अवसाद और निराशा इस जीवन की जरुरत नहीं है।जरुरत है तो बस थोडा सा रुमानी होने की।
अमोल पालेकर कृत ये फ़िल्म अपने ही अंदर पल रही दमित इच्छाओं को जगाने कामयाब होती है और सपनो और आशाओं को जगाकर उन्मुक्ततता की बारिश में भीगने छोड देती है।
बिन्नी (अनिता कंवर) जो कि एक बहुत ही साधारण सी लडकी है जिस पर उम्र की बैल चढती जाती है अपने रहन सहन पहनावे की वजह से समाज की नजरों में उसकी एक नीरस लडकी की छबि बन जाती है।बिन्नी के दो भाई एक छोटा जो कि अपने परिवार को बहुत प्यार करता है लेकिन आत्मविश्वास से एक टुटा हुआ है जिसे ये एहसास है कि जीवन में वो कभी कुछ कर ही नहीं सकता।बिन्नी का बडा भाई जिसे बौध्दिक सनक का अतिरेक है और जिसे कोई भी चीज आसानी से गले नहीं उतरती।बिन्नी के पिता जिन्हे बस बिन्नी की चिंता है कोई बिन्नी का हाथ थाम ले।बहुत ही उमस का महौल है वातावरण में रत्ती भर भी हवा नहीं,उदास लोग उदास प्रकृति,इनकी चिंता बारिश कब होगी,कब ठंडक होगी....ऐसे में धृष्ट्द्युम्न पद्मनाभ प्रजापति निलकंठ धुमकेतु बारिशंकर(नाना पाटेकर) इनके घर में दस्तक देते है जो एक पोटली लेकर सिर्फ़ पांच हजार में बारिश करवाने का वादा करता है।एक केन्द्रिय पात्र के रुप में नाना पाटेकर बहुत ज्यादा प्रभावित करते है और सिध्द करते है एक कलाकार कला की असिमित गहराईयों में कितने अंदर तक जा सकता है।एक ऐसा सेल्स-मेन बनकर आना जो कि आपको अडतालिस घंटो में बारिश करवाने का दावा करे तो मानना चाहिए कि वो कितना आत्मविश्वास से लबरेज होगा।वो कहता है ये दुनिया समझदारी की वजह से इतनी नासमझ हो गयी है कि कोई पागल ही इस दुनिया को बचा सकता है।ये फ़िल्म मैनेजमेंट की कक्षाओं आज भी पढाई जाती है।पुरी फ़िल्म में संवाद आदायगी पद्य रुपेण है जो कि एक अनोखा प्रयोग अमोल पालेकर ने किया और उसे अपनी अदाकरी से नानापाटेकर और अनिता कंवर ने पुरी फ़िल्म को कविता में ढाल दिया।तो बात हो रही थी बारिश की बारिशंकर किस प्रकार से अपनी बातो से बिन्नी और उसके भाई के अंदर सोये आत्मविश्वास को जगाता है,वो उदासी छांटता है,मन में बसी हिन भावना को तार-तार करता है,मन के अंदर बसी कुंठा को बाहर का रास्ता दिखाता है,बिन्नी का मन कुलांचे मारने लगता है,उमस में उमंग का यौवन दौड पडता है मुस्कान और मुस्काराहट चेहरो पर लौट आती है....तब पानी की बुंदे आसमान से ट्पकने लगती है,बारिश होती है,बारिशंकर की दृढता और अदम्य इच्छा शक्ति बारिश के रुप में बहुत कुछ कह जाती है......कमलेश पांडे की लेखनी को नानापाटेकर के मुख से सुनना बहुत सुखद लगता है विशेष कर "पानी" की कविता-कि-"पानी तो पानी है पानी जिन्दगानी है इसलिए जब रूह की नदी सूखी हो और मन का हिरण प्यासा हो दिमाग में लगी हो आग और प्यार की घागर खाली हो तब मैं….हमेशा ये बारिश नाम का गीला पानी लेने की राय देता हूं मेरी मानिए तो ये बारिश खरीदिये सस्ती सुन्दर टिकाऊ बारिश सिर्फ 5 हज़ार रुपये में....."
वैसे तो ये फ़िल्म सभी को देखना चाहिए लेकिन विशेषकर उन्हे जो किसी कुंठा में जी रहे हो या आत्मविश्वास कुछ कमजोर पडने लगा हो तो बस एक काम करना है-"थोडा सा रुमानी हो जाना है"

विशेष: ये फ़िल्म रिचर्ड नेश द्वारा लिखित अमेरिकन नाटक "द रेन मेकर" से प्रेरित है"इसकी शुटिंग मध्यप्रदेश के हिल स्टेशन "पचमढी" में की गई थी।
फ़िल्म:थोडा सा रुमानी हो जाए
वर्ष:1990
निर्माता-निर्देशक :अमोल पालेकर
संगीत: भास्कर चंदावरकर
गीतकार एवं डायलाग- कमलेश पांडे,चित्रा पालेकर

गीत:
छाया गांगुली-१.चांदी रात भर २.धर-धर बरसे ३.जब कभी हम मिलते ४. पापा ओ पापा ५. नन्ही सी सिल्लु६. थोडा सा रुमानी हो जाए ७. तारो ने कहा ८. ये लडका
विनोद राठौड- ९.थोडा सा रुमानी हो जाए १०.समंदर को बांधने ११.अनवर-प्यार प्यार प्यार-१२.कोरस-आज तो बिजलियां-


Saturday, February 23, 2013

रुपहला सफ़र -36 चौरंगी लेन-एकाकी जीवन का केनवास

36 चौरंगी लेन-एकाकी जीवन का केनवास
समाज में रहकर एकाकी जीवन व्यतित करने पर मजबुर होना ये किसी अभिशाप से कम नहीं तब ये और भयावह लगता है जब उम्र ढलान पर खडी हो।अतीत उन बडती झुर्रियो में तेजी से समाने लगता है।यह एक तरह से एक व्यक्ति की एकाकी पन से लडाई ही कही जाएगी जिसमें निरंकुश भंक सा माहौल,एकाकी जिंदगी में कोई ताजी आवाजे ना हो तो वे आवाजे स्थान ले लेती है जो किसी और को ना सुनाई देती हो ,कमरे में सजी वस्तुओं तक में उदासी पसरी पडी हो उस स्थिति की कल्पना कर के ही मन उचाट हो उठता है। क्या इस दुनिया में ऐसे भी लोग है जिन्हे भावनाओं की थाप की दरकार है।ऐसे में कुछ कदम उस ओर भी उठ जाए तो ढलती शामें भी मुस्करा सकती है।
"36 चौरंगी लेन" कोलकाता की गलियों का वो पता है जहां पर वायोलेट स्टोनहेम(जेनिफ़र केंडल) रहती है।वायोलेट स्टोनहेम एक मध्यमवर्गीय एंग्लो-इंडियन स्कुल टीचर है जिसके जीवन में दो कमरो का पुराना सा फ़्लेट,एक बिल्ली,एक बीमार भाई एडी स्टोनहेम(ज्योफ़री केंडल) जो हेल्प-एज होम में है और एक लेटर बाक्स जिसमें कभी-कभी कोई चिठ्ठी उसकी भतीजी रोजमेरी(सोनी राजदान) की आ जाती है जो थोडी मुस्कराहट की वजह बन जाती है और साथ में अतित की यादे बस।स्वतंत्रता के बाद भारत में कुछ एंग्लो-इंडियन परिवार बचे थे उनमें से कुछ बाहर जाकर बस गए और कुछ यही भारत में रह गए।ये फ़िल्म उन्ही में से एक एकाकी महिला की कहानी है जिसका अतित ही उसका परिवार है।वायोलेट हर रोज फ़ुल लेकर अपने परिजनो की कब्र पर चढाती है जहां वो अपनो के होने का एहसास करती है (उनमें से एक कब्र उस व्यक्ति की भी है जो शादी के पहले ही चल बसा) और फ़िर अपने स्कुल में जाती है जहां से वापिस थके और बोझिल कदमो से अपने घर आती है। निर्देशक अपर्णा सेन की तारीफ़ करना होगी कि उन्होने वायोलेट स्टोनहेम के किरदार के लिए जेनिफ़र केंडल को एक कृति के रुप में पेश किया है,फ़्रेम दर फ़्रेम जीवन की शांतता,उचाट मन,चेहरे और आंखो से बुझी सी जिंदगी ओढे -संवेदनशीलता को जिस तरह उकेरा है इसे एक फ़िल्मकार की गहन अंर्तद्र्ष्टी ही कहा जाएगा।अशोक मेहता की सिनेमेटॊग्राफ़ी इसे और अधिक जीवंत बनाती है जो वाकई वो महौल रचती है जिसमें ऐसा लगता है कि क्यो ना हम कुछ रंग डाल दे स्टोनहेम की जिंदगी में।
लेकिन दो किरदार और जुडते है वायोलेट स्टोनहेम की जिंदगी में नंदिता राय( देबाश्री राय ) जो वायोलेट स्टेनहोम की पुर्व छात्रा रही है और समरेश(ध्रितीमन चटर्जी) जो कि नंदिता का बाय फ़्रेड है ।इनके अचानक आने से वायोलेट स्टेनहोम जिंदगी में बहार सी आ जाती है उसका निश्चल स्नेह,पवित्र मन से दोनो का स्वागत करता है।एक नीरस घर को खुशियों की चाबी मिल जाती है।अचानक एकाकी जिंदगी से बाहर आने की खुशी स्टोनहेम के चेहरे पर देखी जा सकती है।बातो ही बातॊ में ये दोनो स्टोनहेम को इस बात के लिए राजी कर लेते है कि समरेश को नावेल लिखने के लिए एक निजता की जरुरत है और स्टेनहोम उन्हे अपना फ़्लेट दिन में उपयोग करने के लिए दे देती है।लेकिन ये दोनो फ़्लेट का उपयोग रोमांस के लिए करते है और काफ़ी अंतरंग दृश्य अपर्णा सेन ने डाले है जो अपर्णा सेन की फ़िल्मो का टेग है।दोनो की शादी हो जाती है।जब भावुकता एकाकीपन के अतिरेक से बाहर आती है तो वो अतिसंवेदनशील भी हो जाती है।स्टोनहेम समरेश को अपना पुराना ग्रामोफ़ोन और उसके रिकार्ड भी दे देती है। संवेदनशीलता तब छली जाती है जब स्टोनहेम उन्हे क्रिसमस साथ में मनाने का न्यौता देती है लेकिन वे लोग शहर से बाहर होने का बहाना बनाकर टाल देते है।स्टेनहोम सरप्राइज के तौर पर खुद केक बनाकर उनके घर देने आती है तो देखती है पुरे शबाब में पार्टी चल रही है.... टुट जाती है कपडे में लिपटा हुआ केक लेकर वापिस लौट जाती है....एकाकीपन फ़िर चादर ओढ लेता है।पुरी फ़िल्म में जेनिफ़र केंडल की अदाकारी देखने लायक है। उस समय के फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड में रेखा ने उमराव जान फ़िल्म के लिए अवार्ड लेते समय ये स्वीकारोक्ति की थी ये अवार्ड की हकदार सिर्फ़ जेनिफ़र केंडल है।फ़िल्म के निर्माता शशिकपुर जिन्हे इस फ़िल्म के शो भी अपने पैसे से करने पडे थे कुल मिलाकर ये फ़िल्म व्यवसायिक तौर पर पुरी तरह असफ़ल रही थी लेकिन अंर्तराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में इसे काफ़ी सराहना मिली एवं अवार्ड भी प्राप्त हुए।भले ही ये फ़िल्म अंगरेजी में है लेकिन एक संवेदनशील इंसान को ये फ़िल्म भाषाओ के चंगुल से बाहर खींच कर एकाकी लोगो की जिंदगी में खुशिया बिखेरने के लिए जरुर धकेलती है।
विशेष:इस फ़िल्म में जेनिफ़र केंडल के पिता ज्योफ़री केंडल ने उनके भाई एडी स्टेनहोम की भुमिका निभाई थी।

फ़िल्म:36 चौरंगी लेन(२९ अगस्त १९८१)
निर्माता: शशिकपुर
निर्देशक एवं लेखक : अपर्णा सेन
संगीत:वनराज भाटिया
सिनेमेटोग्राफ़ी-अशोक मेहता
अवार्ड:
नेशनल फ़िल्म अवार्ड-
सिल्वर लोटस आवार्ड-बेस्ट फ़िल्म(अंगरेजी)
गोल्डन लोटस आवार्ड-बेस्ट डायरेक्टर-अपर्णा सेन
सिल्वर लोटस आवार्ड-बेस्ट सिनेमेटो ग्राफ़ी- अशोक मेहता
ब्रिटिश फ़िल्म अवार्ड-बेस्ट एक्ट्रेस -जेनिफ़र केंडल
गोल्डन एज अवार्ड-बेस्ट फ़िचर फ़िल्म-अपर्णा सेन


Saturday, February 16, 2013

रुपहला सफ़र इस रविवार :नरम नरम रात में-गरम गरम चांद पर

नरम नरम रात में-गरम गरम चांद पर
इस संसार में इंसान ही एक ऐसा प्राणी है जो हंस सकता है और जिस पर हंसा जा सकता है।आज के कलुषित भरे वातावरण में जहां कुटिल हंसी का बोलबाला है वहां स्वस्थ्य हास्य सहज उपलब्ध हो जाए तो क्या बात है। ऋषिकेश मुखर्जी फ़िल्मो में हास्य प्रस्तुतिकरण के मामले में अव्वल कहे जा सकते है।गोलमाल(1979) की सफ़लता के बाद उसी तर्ज पर उन्होने नरम-गरम(1981) नाम की हास्य प्रधान फ़िल्म का निर्माण किया जिसमें उन्होने ये सिध्द किया कि एक फ़िल्मकार को अपने दर्शको को गुदगुदाने के लिए कोई बहुत बडे तामझाम की जरुरत नहीं जैसा कि आजकल की कथित हास्यप्रधान फ़िल्मो में होता है-"सहज रुप से अंर्तमन से हास्य बोध हो वो ही असल हास्य है।"
भवानी शंकर(उत्पल द्त्त)जो कि कंजुस अमीर विधुर है लेकिन साथ ही अति अंधविश्वासी भी है जब एक किरदार में इतने गुण है और अगर वो उत्पल द्त्त है तो निश्चित तौर समझिए कि हास्य का पुरा पुरा इंतजाम है ।भवानी शंकर एकदम खुर्राट किस्म का इंसान है जो अपनी सास(दीना पाठक) के अलावा किसी से नहीं डरता। एक किरदार है रामप्रसाद(अमोल पालेकर) जो कि भावानी शंकर के यहां मामुली नौकरी करता है पर काम बडॆ-बडे करता है।सिर्फ़ शर्ट-पैजामे में पुरी फ़िल्म के किरदार को जी जाना और सहज रुप से हंसी का पात्र बन जाना ये ही आमोल पालेकर की खासियत रही है।ये ही काम आज अच्छे से अच्छे हास्य कलाकार अपने चेहरे,आंखो शरीर को पुरा तोडमरोड ना ले तब तक दर्शको की हंसी नहीं निकाल पाते।कुसुम(स्वरुप सम्पत) एक गरीब विष्णु प्रसाद(ए.के.हंगल) की बेटी है और रामप्रसाद से प्यार करती है।लेकिन रामप्रसाद की इतनी तनख्वाह नहीं है कि वो कुसुम से शादी कर सके।गरीब विष्णु प्रसाद के घर को गांव का महाजन कुर्क कर लेता है और वो कुसुम को लेकर रामप्रसाद के पास भावानी शंकर के मकान में रहने आ जाता है।सुंदर कुसुम को देखकर भवानी शंकर का भ्रष्ट मैनेजर विष्णु प्रसाद के समक्ष कुसुम से शादी का प्रस्ताव रखता है अब यही से शुरु होता है असल ड्रामा,राम प्रसाद किस तरह से झुठ बोलकर ये शादी रुकवाता है और फ़िर एक किरदार के रुप से भवानी शंकर का भाई काली शंकर(शत्रुध्न सिन्हा) का प्रवेश होता है वो भी कुसुम से शादी करना चाहता है फ़िर भवानी शंकर खुद ये शादी करना चाहता है इन सब के बीच रामप्रसाद कैसे इन परिस्थितियो से निबटता है ये वाकई देखने लायक है।पुरी फ़िल्म में हंसी का सिलसिला जो शुरु होता है वो "द एन्ड" में जाकर ही खत्म होता है।एक बहुत ही सकुन भरी फ़िल्म आपको तनाव से दुर रखने का पुरा ख्याल रखती है।पुरी फ़िल्म फ़ुहडता से परे एक नितांत सात्विक और मौलिक हास्य के रुप में सामाजिक संदेश भी दे जाती है कि अंधविश्वास के जाल में इंसान का बडा नुकसान होने की पुर्ण संभावना रहती है।शत्रुध्न सिन्हा पहली बार एक हास्य फ़िल्म में एक उम्दा प्रस्तुती के साथ दाखिल हुए है रामलीला वाला दृश्य काफ़ी गुदगुदाता है, वही ओमप्रकाश ने पंडित के किरदार में अपनी छोटी सी भुमिका से हास्य की फ़ुहार छोडी है वो तारीफ़े काबिल है।
फ़िल्म का संगीत पंचम ने दिया है टाइटल गीत "नरम नरम रात में गरम गरम चांद पर" उम्दा बन पडा है, धुन गोलमाल से उठाई गयी है लेकिन कहीं कुछ कसर रह गई लगती है जहां गुलजार,ऋषिकेश मुखर्जी,पंचम जैसी तिकडी हो वहां लगता है संगीत के मामले में चावल कुछ अधपका सा रह गया लगता है।ऋषि दा ने एक मासुम से झुठ को हास्य का जामा पहना कर कई हिट फ़िल्म दी है मसलन चुपके-चुपके,गोलमाल,झुठ बोले कव्वा काटे इत्यादि।फ़ुरसत ना हो तो निकालकर थोडा "नरम-गरम" ठहाके हो जाए.....
फ़िल्म: नरम-गरम(1981)
निर्माता: सुभाष गुप्ता,उदय नारायण सिंह
निर्देशक:ऋषिकेश मुखर्जी
लेखकीय योगदान:शानु मुखर्जी,मनोज बसु,डी.एन.मुखर्जी,अशोक रावत,
संवाद:राही मासुम रजा
गीत:गुलजार
संगीत:आर.डी.बर्मन
गीत:
1     मेरे अंगना आए-आशा भोंसले
2     हमें रास्तो की जरुरत नहीं-आशा भोंसले
3     मेरे चेहरे में छुपा-आशा भोंसले
4     एक बात सुनी है -सुषमा श्रेष्ठ,शत्रुध्न सिन्हा
5     नरम नरम रात में -सपन चक्रवर्ती,आर.डी.बर्मन
विशेष: इस फ़िल्म में एक गाना"हमें रास्तो की जरुरत नहीं"जो कि उस समय तो हिट नही हुआ लेकिन पंचम ने इसी गाने की हुबहु धुन फ़िल्म सागर(1985) में "सागर किनारे..." में उपायोग की और देखिए उस गाने का तिलस्म आज भी कायम है।


Sunday, February 10, 2013

बिना गानो की फ़िल्म 1960 में:कानुन

http://www.epaperdainikdabangdunia.com/Details.aspx?id=5737&boxid=181938250
समाज में धर्म एक जीवन शैली है जिसमें सामुहिक तौर रहने के तौर तरीके-मसलन सदाचार,नैतिकता,ईमानदारी,सहिष्णुता एवं दुसरो के हित की रक्षा इत्यादि की सीख दी जाती है।जब मनुष्य़ इन दायरो के बाहर जाता है तो कानुन उसकी समीक्षा कर दोषी को दंडित करता है।आज धर्म के पांडालो में भी उतनी भीड है जितनी की अदालतॊ में।अब ऐसे में चुनैतिया दोनो ही जगह बराबर की है।ऐसे में गुनाहगार और बेगुनाह के द्वंद को मथना वाकई एक विचारणीय मुद्दा है क्योकि कानुन को जो दिखाया जाता है वही देखता है ऐसे में अगर गवाही सच्ची है तो इंसाफ़ सच्चा और यदि गवाही झुठी तो इंसाफ़ भी झुठा। ऐसे में बेगुनाही साबित करना अति कठिन होता है और जब गुनाहगार कानुन की गलियों का फ़ायदा उठा कर बच निकलता है तो वो आने वाले मुकदमो की नजीर बन जाता है।कई मर्तबा कानुन भय पैदा करता है इसीलिए लोग ये संज्ञा  देने लगे है कि कानुन के पचडे में ना पडा जाए तो ही बेहतर है,ऐसा इसलिए कि कोर्ट कचहरी के अनुभव बहुत अच्छे नहीं कहे जा सकते।कानुन ने पचडे की शक्ल इसीलिए ली कि कानुन के पंडितो ने इसे एक चक्रव्युह के रुप में इजाद कर लिया और जो इस चक्रव्युह में फ़ंसा उसे अपनी जिंदगी को दाव पर लगाना पढा।
बी.आर. चोपडा ने फ़िल्म "कानुन" में उन तथ्यो को रखने की कोशीश की जिसमें किस तरह व्यक्ति हत्या के आरोप में गुनाही और बेगुनाही की जद्दोजहद के बीच झुलता है। उसे उन साक्ष्य और गवाहों के आधार पर दोषी साबित करने की कोशिश की जाती है जो कि परिस्थिति जन्य पैदा हुए है।ऐसे में अदालत के सामने इंसाफ़ एक चुनैती है कि फ़ैसला कानुन की किताबो से करें या इंसानियत के आधार पर करें।
फ़िल्म के आरंभ में कालिदास (जीवन) एक गणपत नाम के व्यक्ति की हत्या के अरोप में जज बद्रीप्रसाद(अशोक कुमार) की आदालत में पेश होता है वो ये दलील देता है इसी गणपत नाम के व्यक्ति की हत्या के आरोप में वो बेगुनाह होते हुए भी दस साल जेल में सजा काट चुका है इसलिए देश का कोई भी कानुन उसे सजा नहीं दे सकता।क्या एक आदमी का खुन दो बार किया जा सकता है।अगर गणपत खुन दस साल पहले हुआ तो मुझे आज यहां अदालत में क्यो लाया गया है और यदि गणपत का खुन आज हुआ है तो दस साल पहले मुझे किस बात की सजा दी गयी।जो वाकई चौकाने वाला तथ्य है ऐसे में अगर फ़ैसला गलत हो तो उसे वापिस लिया जा सकता है लेकिन अगर ऐसे में किसी को फ़ांसी होगयी तो उस दशा में कानुन क्या करेगा? आज इस तरह के कई घटना क्रम आए दिन होते है जिसमें  बेगुनाह को एक आरोपी तरह खडा कर दिया जाता है।मसलन यदि कोई एक्सीडेंट हो गया है और आरोपी की गाडी का नंबर नहीं होने की दशा में इंश्योरेंस क्लेम के लिए कोई नंबर छांट कर लिखवा दिया जाता है और उस बेगुनाह व्यक्ति को आरोपी बना कर खडा कर दिया जाता है जो एक्सीडेंट उसने किया ही नहीं।ऐसे में अदालत के सामने झुठ का पुलिंदा सच के रुप दिखाया जाता है।बहरहाल फ़िल्म में आगे के घटना क्रम में एक बार फ़िर ऐसे हालात बनते है कि कैलाश खन्ना(राजेन्द्र कुमार) जो कि एक सरकारी वकील है और जज बद्रीनाथ का होने वाला दामाद भी।वो जज बद्रीनाथ को शहर के साहुकार धनीराम(ओमप्रकाश) का खुन करते हुए देख लेता है।बद्रीप्रसाद का बेटा विजय(मेहमुद) जो कि आवारा किस्म की फ़ितरत रखता है और धनीराम से काफ़ी कर्ज ले लेता है उसी सिलसिले में विजय की बहन मीना (नंदा) कैलाश को धनीराम से बात करने के के लिए कहती है और उसी समय उसका खुन हो जाता है।इसी खुन के आरोप में एक चोर कालिया(नाना पलसीकर) पकडा जाता है जो महज चोरी करने के इरादे से धनीराम के घर में घुसता है।बस यही से शुरु होता है अदालती ड्रामा मीना समझती है कि कैलाश आरोपी है इसलिए चुप रहती है ,कैलाश चुप रहता है तो कालिया गुनाहगार साबित होता है।आखिरकार कैलाश जज बद्रीप्रसाद पर आरोप लगाता है तो मीना कालिया को गुनाह कबुल करने के लिए राजी कर लेती है।अब फ़िल्म देखनी ही चाहिए कि आखिर सच्चाई क्या है।अशोक कुमार नाना पलसीकर अभिनय तारिफ़े काबिल है।सलील चौधरी का बेक ग्राऊंड म्युजिक काफ़ी हुनर मंद और सधा हुआ लगता है।
बी.आ.चोपडा की तारीफ़ करना होगी उन्होने सन साठ के दशक में एक ऐसी फ़िल्म बनाने जोखिम लिया जिसमें एक भी गाना नहीं जबकि उस समय के दौर में एक फ़िल्म में आठ से दस गानो की भरमार रहती थी। ये फ़िल्म अंत में वही विषय उठती है कि मृत्युदंड दिया जाना चाहिए या नहीं। हालात की मजबुरी किस तरह गवाहों को सच को झुठ और झुठ को सच बनाने में मजबुर कर देते है।क्योकि जान के बदले जान इंसाफ़ नहीं इंतेकाम ही कहलाएगा।
फ़िल्म :कानुन(१९६०)
निर्माता: बी.आर.चोपडा,स्वरुप सिंग
निर्देशक:बी.आर.चोपडा
लेखक: अख्तर-उल-इमान,सी.जे. परवी
संगीत: सलील चौधरी
अवार्ड:
नेशनल फ़िल्म अवार्ड-बेस्ट फ़ीचर फ़िल्म(सर्टिफ़िकेट आफ़ मेरिट)
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड-
बेस्ट डायरेक्टर-बी.आर. चोपडा
बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर-नाना पलसीकर

Saturday, February 2, 2013

कहानी:जो न कही गयी न सुनी गई-सिर्फ़ देखी गई

रुपहला सफ़र :एक झकझॊर देने वाली दास्तां -1971
१९७१ का बाग्लादेश युध्द पाकिस्तान के साथ लडा गया जिसकी टीस आज भी उन ५४ परिवारों के जहन में मौजुद है जिसमें किसी का पति,बेटा,भाई आज तक लौट कर नहीं आया,जिन्हे युध्द बंदी के तौर पर पाकिस्तान ने नहीं लौटाया। जिन्हे आखिरी बार १९८८ में देखा गया ऐसा बताया जाता है। वही युध्द समाप्ति पर भारत ने ९० हजार सैनिको को उदारता पुर्वक लौटा दिया था।जबकि एक संधी के तहत युद्ध बंदी सैनिको को लौटाना एक अनिवार्य प्रक्रिया है।
इसी संदर्भ पर आधारित फ़िल्म १९७१ उन बेहतरीन फ़िल्मो में शुमार है जो कि भारत में अब तक बनी फ़िल्मों में श्रेष्टतम प्र्स्तुती कही जा सकती है लेकिन ना जाने क्यो इस फ़िल्म पर बहुत ज्यादा चर्चा नहीं की गय़ी।अमृत सागर और पियुष मिश्रा की ये अति ईमानदार कोशिश एवं उन युध्द बंदियों के प्रति अश्रुपुरित आदरांजली है जिसमें उन्होने संपुर्ण फ़िल्म को सच्चाई से रख कर अतिरंजना से बचाया।
सन १९७७ चकलाला केंप पाकिस्तान जहां पर देशभर की जेलों से हिन्दुस्तानी युध्द बंदी सैनिको को लाकर एक अनजान जगह पर रखा जाता है जिसमें १९६५ की जंग और १९७१ की जंग के सैनिक है।इनमें से कई सैनिक ऐसे है जिनकी मानसिक स्थिति ऐसी है कि उन्हे अपना देश तो क्या खुद का नाम पता तक नहीं पता।इन्ही में से ६ सैनिक दुस्साहस और जोखिम से भरा निर्णय लेते है कि वे इस केम्प से भाग कर अपने देश हिन्दुस्तान जाएंगे।लेकिन फ़िल्म देखते समय हमें यही लगता है कि ये छ: नहीं सात है क्योकि देखने वाला खुद सातवां बनकर उनके साथ जुड जाता है और ये ही स्क्रीन प्ले लिखने वाले का कमाल है कि हम अपनेआप को किरदार के साथ जॊड ले और अंत तक उसी मनस्थिति में रहे जब तक फ़िल्म अंत ना हो जाए। इसकेलिए पियुष मिश्रा और अमृत सागर को सलाम करने को जी चाहता है।
मेजर सुरज सिंह-राजपुताना बटालियन(मनोज बाजपेयी) से है जिन्हे उडी सेक्टर से पकडा जाता है और जो पहले तीन बार पाकिस्तान से भागने की कोशिश कर चुके है।के.जैकब(रवि किशन),फ़्ला.लेटि.गुर्टु(दीपक डोबरियाल),जवान एहमद(चितरंजन दास),फ़्ला.लेटि. राम (मानव कौल),केप्टन कबीर(कुमुद मिश्रा) ये सभी मिल कर केम्प से भागने का प्लान उस समय करते है जब इन्हे पाकिस्तान की कुटिल चाल का पता लगता है कि इंटरनेशनल रेडाक्रास और पाकिस्तान मानव अधिकार आयोग की आंखो में धुल झोंकने के लिए सारे युध्द बंदियो को गोपनीय रुप से सारी जेलो से निकाल कर एक जगह इकठ्ठा किया जाता है और ये आश्वासन दिया जाता है कि उन्हे जल्द ही पाकिस्तान सरकार रिहा करेगी और धोखे से रेड्क्रास और मानवाधिकार आयोग को सरकार और सेना ने नुमाइंदे अश्वस्त कर देते है देश की किसी भी जेल में युध्द बंदी नहीं है।
किस तरह से ये छ: सैनिक अपने कौशल का इस्तेमाल कर केम्प से भाग निकलते है अपने वतन हिन्दुस्तान की ओर सिर्फ़ ये सोच कर कि  यहां तिल-तिल कर मरने से तो अच्छा है एक कोशिश अपने वतन जाने की की जाए।ये फ़िल्म देखते वक्त बार बार ये ही वेदना मन में उठती है कि सरकारो के अगर ईमानदार प्रयास होते तो आज इन युध्द बंदियो के परिवारो के चेहरे पर मुस्काने होती।मन द्रवित हो उठता है जब किरदार ये कहता है"हिन्दुस्तान ने हमें क्यो भुला दिया और पाकिस्तान हमें क्यो भुला देना चाहता है"।मनोज बाजपेयी के अब तक का श्रेष्ठतम अभिनय में कहा जा सकता है।रविकिशन,दीपक डोबरियाल मानव कौल ने अपने अभिनय की वो छाप छोडी है कि अंत में हम अपने आप को सुन्न सा पाते है और आंखो में अश्रुधारा।इस फ़िल्म की समीक्षा लिखते हुए मन बहुत उदास है आज कोई मनोरंजन नहीं,किस हाल में होंगे हमारे युध्द बंदी वीर सैनिक ,हमारे हुक्मरानो को अब तो ये बात समझ आनी चाहिए कि हमें कटे सिरों के बदले उन जिंदा सिरो को लाने का प्रण करना चाहिए जो अपनी मातृ भूमी को चुमने के लिए तडप रहे है। इन छ: अदम्य साहसी सैनिको की कहानी उस वास्तविकता के नजदीक है जिसे हर हिन्दुस्तानी और हुक्मरानों को अवश्य देखना चाहिए ताकि उस दर्द के एहसास को कम से कम २ घंटे के लिए तो महसुस कर सके।
क्या ये छ: सैनिक हिन्दुस्तान पहुंच पाते है ये लिखने की ताकत नहीं है आप खुद देखिए......."
फ़िल्म:१९७१ वर्ष: 9 March 2007
निर्माता: अमृत सागर,मोती सागर
निर्देशक: अमृत सागर
लेखक: पीयुष मिश्रा,अमृत सागर
संगीत: आकाश सागर
सिनेमेटोग्राफ़ी-चितरंजन दास
अवार्ड:नेशनल फ़िल्म अवार्ड -बेस्ट फ़िल्म
गीत:
१.भांगडा पौना-कैलाश खैर (गीत-देव कोहली)
२.साजना-हर्ष दीप कौर(गीत-देव कोहली)
३.काल के अंतिम पलो तक-कोरस एरिक पिल्लई(गीत-गोपालदास निरज)
४.सह लेंगे हम-शिबानी कश्यप(गीत-जहीर अनवर)
विशेष:फ़िल्म के निर्देशक अमृत सागर -रामानंद सागर के पुत्र है।

Saturday, January 19, 2013

रुपहला सफ़र-इस रविवार-मौसम जाड़ो की नर्म धुप और आंगन में लॆट कर......मौसम

जाड़ो की नर्म धुप और आंगन में लॆट कर......मौसम

गुलजार के मुलायम शब्द वादियों में कभी जाड़ो  की नर्म धुप सा अहसास तो कभी गर्मीयों की रातो की पुरवाईयों सा अहसास देते है।ऐसा लगता है कि वादी में गुंजती खामोशी कुछ कहना चाहती है अतित का वो लम्हा पकडना चाहती है जिसकी आंखों में भीगे-भीगे से छुपे लम्हे सिसकियां भर रहे है।तभी तो भुपेन्दर के सुर तन्हाईतो पर उतरकर घाटी में गुंज पैदा कर देते है और गाते है- "दिल ढुंढता है फ़िर वही फ़ुरसत के रात दिन"।
गुलजार फ़िल्म को एक कविता की तरह प्रस्तुत करते है जिसमें हम भरपुर लय,ताल,थिरकन,कंपन,भावनाओं का सैलाब,खामोशी,निजता और खुशीयों का अदभुत तालमेल पाते है।अतीत की गलतियों को वर्तमान में स्वीकारने का साहस हो तो असल कहानियां पैदा होती है। गुलजार के निर्देशन की खासियत है कि वे फ़ैन्सी किरदार नहीं गढते,वे अपने किरदारो को भावनात्मक रुप से इतनी मजबुती देते है कि शर्मिला टैगोर कब चंदा और कजली में ढल जाती है पता ही नहीं चलता।
डॉ.अमरनाथ गिल(संजीव कुमार) बरसॊ बाद फ़िर दार्जिंलिंग लौटता है और लौटता क्या है बल्कि अतीत में लौटता है जहां वो एक मेडिकल स्टुडेंट के रुप में पढने आया था लेकिन रास्ते की ठोकर उसे वैद्य थापा(ओम शिवपुरी) के पास पहुंचा देती है,जहां उसकी मोच तो ठीक हो जाती है लेकिन एक छ्डी उसे वैद्य की बेटी चंदा(शर्मिला टैगोर) के नजदीक ले आती है।फ़्लेश बेक का इस्तेमाल कमाल का है वर्तमान से अतित कि सैर कर लौटना और हर बार उस लम्हे में उसकी पुरी गहराई के साथ उतरकर कुछ मोती चुन लाना और कहना कि "लगता है सांसो में टुटा है कांच कोई चुभती है सिने में भीनी सी आंच कोई"।लेकिन चंदा अब कहां है उसे तो अमरनाथ ये वादा कर गए थे कि जल्द ही लौट आऊंगा डाक्टर बन कर।लेकिन इंतेजार की सडक इतनी लम्बी होगी कि आंखे हांफ़ने लगे और दिल फ़ट कर दौड लगा दे उन राहो पर....लेकिन भंक सी जिंदगी और एक बेटी का साथ।डा. अमरनाथ आत्मग्लानि से भर जाते है जब उन्हे ये पता लगता है कि चंदा पागल हो कर मर गई और जवान बेटी कजरी को नियती ने कोठे पर पहुंचा दिया।अपनी बेटी ढुंढ्ते हुए कोठे पर पहुंचते है शक्ल हुबहु चंदा जैसी लेकिन जबान पर गाली और बेहुदगी अपनी जिंदगी पर लानत और अपने डाक्टर पिता से नफ़रत।अमरनाथ अपनी बेटी कजरी को अपने साथ कीमत देकर ले आता है जबकि कजरी उसे अपना ग्राहक समझ रही होती है,ये कश्मकश देखने लायक है ।अमरनाथ जब उसे शराफ़त की नसीहते दे रहे होते है तो बहुत ही अच्छा संवाद कजरी कहती है "इज्जत और आदमी के साथ ’अपनी’ बडी बेइज्जती होती है"।संजीव कुमार और शर्मिला टैगोर के सशक्त अभिनय को दर्शको की आंखे बस पीती जाती है लेकिन अंतिम दृश्य में आंखे झरझर कर सलाम करती है। सुबह ना आई कई बार निंद से जागे के एक रात की ये जिंदगी गुजार चले....मौसम है तो बदलेंगे भी और इसी तरह  जिंदगी में हालात भी बदलते है।फ़िल्म में मदन मोहन के संगीत का स्पंदन पुरे समय छाया रहता है दुखद बात ये रही कि इस फ़िल्म के रिलिज होने के पहले मदनमोहन खामोश हो गए और सुरीला पन हमारे लिए छोड गए। इस वर्ष "कभी-कभी" फ़िल्म भी रिलिज हुयी लेकिन कहते है ना कि चांद जब पुरे शबाब पर था तो एक"मौसम"नामक सितारा भी पुरी तेजी से चमक फ़ेंक रहा था।तो देखे एक बार मौसम.......
विशेष:ये फ़िल्म ऐ.जे. क्रोनिन के उपन्यास "द जुडास ट्री"से प्रेरित है।इस फ़िल्म का बेक ग्राउंड संगीत "सलील चौधरी" ने तैयार किया।ये गुलजार-मदनमोहन की पहली और आखिरी फ़िल्म रही।

फ़िल्म:मौसम(29 दिसंबर 1975)
निर्माता-पी.मल्लिकार्जुन राव
निर्देशक: गुलजार
लेखक: कमलेश्वर
पटकथा: भुषण बनमाली,गुलजार
गीत:गुलजार
संगीत:मदन मोहन
गीत
1. दिल ढुंढता है- भुपेन्द्र
2. छ्डी रे छडी-मो.रफ़ी,लता मंगेशकर
3. दिल ढुंढता है- भुपेन्द्र,लता मंगेशकर
4.मेरे इश्क मैं-आशा भोंसले
5. रुके रुके से कदम-लता मंगेशकर
अवार्ड
*नेशनल अवार्ड्स
 बेस्ट एक्ट्रेस-शर्मिला टैगोर
  सेकण्ड बेस्ट फ़ीचर फ़िल्म-मौसम
*फ़िल्म फ़ेयरअवार्ड्स -
 बेस्ट फ़िल्म-मौसम
 बेस्ट डायरेक्टर -गुलजार

Sunday, January 13, 2013

बीती बातों पे धुल उडाता चला........:झुमरु

http://www.epaperdainikdabangdunia.com/Details.aspx?id=4930&boxid=17237468
कुछ लोगो को याद करने का कोई दिन मुकर्रर नहीं होता दिल में जब उदासी हो या मन कुछ अच्छा ना हो तो "रशोकि रमाकु"को याद फ़रमा लीजिए...दार्जिलिंग की वादियों में गुंजती युडलिंग उदास दिल को भरपुर तसल्ली देगी और चेहरे पर मुस्कान डिसकाउंट में मिलेगी।
झुमरु किरदार और किशोर कुमार के व्यक्तित्व में एक ही समानता है फ़क्कडपन और ये स्वभाव बिरले ही लोगो को नसीब होता है तभी तो किशोर कुमार लिखते है "प्यार सीने में है हर किसी के लिए,मुझको प्यारा हर इंसान दिल वालो पे हुं कुरबान जिंदगी है मेरी जिंदगी के लिए"...फ़क्कड बन के घुमरु....."
मधुबाला और किशोर कुमार प्रेम पुर्ण संबंधो की एक भरी पुरी रील है फ़िल्म "झुमरु"।
कहानी एक बंजारे झुमरु(किशोर कुमार) और अंजना(मधुबाला) की है जिनका प्यार उंच नीच की सरहदो को पार करता है। अंजना संपन्न परिवार की बेटी है और शहर से गांव अपने पिता के पास कई सालो बाद अती है।वो अपने पिता को काफ़ी बदला महसुस करती है जिनका कि गांव वालों के प्रति रवैया काफ़ी सख्त और क्रुरता भरा है।हालांकि फ़िल्म की प्रस्तुती इतनी प्रभावशाली नहीं है लेकिन किशोर-मधुबाला की रोमांटिक जोडी ,किशोर दा की निर्माता,अदाकार,संगीतकार और गीतकार के रुप में उपस्थिति इस फ़िल्म में जान डाल देती है।जब किशोर दा गाते है ठंडी हवा ये चांदनी सुहानी ए मेरे दिल सुना कोई कहानी .......बरबस ठंड के वो दिन याद आ जाते है जब रेडियों सिलोन पर ये गाना ट्युन कर सुनने की कोशिश करते थे। असल में एक और जिंदगी ट्युन हो रही थी जब मधुबाला और किशोर कुमार की नजदीकिया बढ रही थी तब ही मधुबाला गंभीर दिल की बीमारी की चपेट में आ गई दोनो के घर वाले इस अंर्तजातिय विवाह के लिए तैयार नहीं थे,आखिरकार दोनो विवाह संस्कार में बंधे और ये साथ 1969 तक रहा और मधुबाला ने अलविदा कहा।बहरहाल जब अंजना के पिता को झुमरु से प्रेम संबंधो का पता चलता है तो वो उसकी शादी अपने मैनेजर रमेश(अनुप कुमार) से करने की घोषणा कर देते है।किशोर दा की गंभीरता को नजदीक से महसुस करना हो तो ये  गाना सुनिये"कोई हमदम ना रहा कोई सहारा ना रहा.."कमाल की बात तो ये है कि उनके बडे भाई अशोक कुमार ने उन्हे ये गाना गाने के लिए मना किया था कि ये गाना उंचे सुर में है और तुम्हारे बस की बात नहीं,लेकिन आखिर थे तो वे किशोर कुमार। उन्होने ने राग झिंझोटी में ये गाना गाया और ऐसा गाया कि आज भी गुनगुनाया जाता है।लेकिन इस गाने के पीछे की कहानी ये है कि मुलत:ये गाना भारतीय फ़िल्म की पहली महिला संगीतकार सरस्वती देवी(खोर्शीद मिनोचर होमजी) ने बाम्बे टाकिज की फ़िल्म जीवन नैया(1934) के लिए बनाया था जिसे अशोक कुमार ने अपनी आवाज में गाया था उस समय किशोर कुमार महज ६ वर्ष के रहे होंगे।लेकिन इतने सालो बाद कही ये गाना अवचेतन में रहा और उन्होने इसका मुखडा जस का तस उठाकर अपनी अदा में इसे गाया।लेकिन फ़िल्म इंडस्ट्रीज में ये अक्सर होता है इसका क्रेडिट सरस्वती देवी को कभी नहीं मिला। लेकिन झुमरु फ़िल्म खुब चली और गाने भी,जैसा कि फ़िल्म में होता है कि अंजना को पता चलता है कि झुमरु की मां उसकी असल मां है तो फ़िर झुमरु कौन है.....अब ये तो फ़िल्म देखने पर ही पता चलेगा ना....।

विशेष:किशोर कुमार ने गाने में "युडलिंग" का प्रयोग कर सीधे सपाट गानो के दौर में एक नई उर्जा भर दी लेकिन आज तक उनके गले की  हरकत को कोई पकड नहीं पाया।
फ़िल्म- झुमरु 1961
निर्माता-अनुप शर्मा
निर्देशक:शंकर मुखर्जी
गीत: मजरुह सुल्तानपुरी,किशोर कुमार
संगीत:किशोर कुमार
गीत:
ठंडी हवा ये चांदनी सुहानी-किशोर कुमार
मैं हुं झुम झुम झुमरु...-किशोर कुमार(गीत-किशोर कुमार)
कोई हमदम ना रहा कोई सहारा ना रहा-किशोर कुमार
मतवाले हम मतवाले तुम-किशोर कुमार
बाबु आना सुनाते जाना-किशोर कुमार,आशा भॊंसले
हे झुमे रे झुमे रे दिल मेरा-किशोर कुमार,आशा भॊंसले
आजा तु आजा....किशोर कुमार,उषा मंगेशकर
ऐ भोला भाला मन मेरा-किशोर कुमार,आशा भॊंसले
ऐ बाबा लु बाबा लु-किशोर कुमार,आशा भॊंसले
टिंबक टु काठमांडु-किशोर कुमार(गीत-किशोर कुमार)
रुक रुक थाम थाम धीरे चल -आशा भोंसले(गीत-किशोर कुमार)
-योगेन्द्र व्यास

Sunday, January 6, 2013

दामिनी को आदरांजली, रुपहला सफ़र:फ़िर वही रात है...:घर

http://www.epaperdainikdabangdunia.com/Details.aspx?id=4700&boxid=175330812
नित्शे ने सही कहा था कि दुनिया के सारे धर्मो ने सेक्स को जहरीला करार देकर खत्म करने की कोशिश कि,यद्यपि वे उसे खत्म तो नहीं कर सके बल्कि वो और जहरीला होकर समाज में फ़ैल गया। प्रकृति ने स्त्री-पुरुष को समान अधिकार देकर इस पृथ्वी पर विकसित किया बल्कि स्त्री को अधिक उर्जावान,धैर्यवान,आकर्षक देहयष्टि और प्रजनन शक्ति के साथ असीमित खुबियां प्रद्त्त की जबकि पुरुष को बलशाली और स्त्री का संरक्षक बनाया ताकि ये सृष्टि एक अदभुत तालमेल के साथ गतिमान हो सके।लेकिन बलशाली पुरुष ने शारीरिक प्रीत जैसे पवित्र कर्म को ना जाने किस भय से अपने बल का पहला प्रयोग स्त्री पर कर अपने वीर्यवान होने की हुंकार भर ली और ये कालांतर में शारीरिक दुष्क्रृत्य और सामुहिक दुष्कृत्य तक की हद तक आ पहुंचा।
एक सुर्ख गुलाब अपना चरम यौवन अपनी डाल पर अपने माली के संरक्षण पा कर आनंदित होता है और यदि उसे कोई तोड कर मसल दे तो उसका क्रंदन उसकी कुचली हुई पंखुडिया बयां करती है। एक "घर" जहां एक नवयुगल जोडा अपनी शादी के बाद एक हसीन जिंदगी के सपने बुनता है लेकिन अनहोनी कभी पांजेब बजा कर सतर्क नहीं करती और आ धमकती है।विकास(विनोद मेहरा) और आरती(रेखा) अपनी नई-नई शादी के बाद खुशनुमा लम्हों को यादगार बना कर संजो लेना चाहते है और आंखो में आंखे डाल कर गाते है "आपकी आंखो में कुछ महके हुए से राज है" इन युगल प्रेमियो के रोमांटिक पलो को शब्द दिए गुलजार ने और संगीत से सजाया पंचम ने और लता और किशोर की आवाज ने इन पलों को वो निजता दी है कि जो युगल उसे सुनता है उसे नितांत एकात्मकता का एहसास होता है। इस गाने के पहले अंतरे में "लब हिले तो मोगरे के फ़ुल खिलते है कहीं"गुलजार के अनुसार किशोर दा को "जब हिले तो मोगरे...." गाना था लेकिन बार-बार टेक में किशोर दा ने "लब" ही बोला तो उसे जस का तस ही रिकार्ड किया गया फ़िर जो भी बना अदभुत बना। एक रात विकास और आरती लेट नाईट फ़िल्म देखकर लौट रहे होते है  लेकिन ये रास्ते कितने लम्बे व भारी पडने वाले है ये देखकर ही सिरहन दौड जाती है।सुनसान सडक पर उनका सामना चार विकृत मानसिकता वाले पुरुषो से होता है वे विकास को बुरी तरह घायल कर देते है और आरती के साथ सामुहिक दुष्कृत्य कर अतिबुरी अवस्था में फ़ेंक देते है।जो आरती एक आजाद पंछी की तरह उडान भरते हुए ये गाती थी कि "आज कल पांव जमी पर नहीं पडते मेरे"ऐसा लगता है उसे अचानक धडाम से फ़डफ़डाते पंखो के साथ जमी पे पटक दिया हो। उसका आत्मविश्वास तहस नहस हो जाता है आत्मा छलनी-छलनी हो जाती है।भयाक्रांत आरती बार बार उस भयानक हादसे को याद कर मनोवैग्यानिक रुप से टुट जाती है।ये रेखा के अभिनय की ताकत है कि-देखने वाले को भी वो दर्द और पीडा का एहसास होने लगता है जो वास्तव में किसी पीडिता को होता है।विकास आरती को उस हादसे से बाहर निकालने में पुरजोर मदद करता है लेकिन हमारा समाज सहानुभुति दिखाने में भी अपने तेवर में चटखारे लेना नहीं चुकता।जहां मिडिया इस खबर को रोचक बना कर पेश करता है,वहीं नेता चुनाव में इस मुद्दे को भुनाने से नहीं चुकता।ये फ़िल्म मुम्बई में घटित सत्य घटना पर आधारित है और इसे फ़िल्माते समय बनावटी पन परे बहुत ही बहुत ही सपाट तरीके से प्रस्तुत किया गया है।इन सबके बीच इन युगल जोडो का मन ये ही गाता है"तेरे बिना जिया जाये ना"।कई बार हम अनावश्यक सहानुभुति को दर्द की दवा समझ कर बांटने लगते है जबकि ऐसे हादसो के बाद समाज को पिडिता के साथ बिल्कुल सामान्य सा व्यवहार किया जाना चाहिए सब कुछ पहले जैसा अन्यथा वो जीवन भर इस हादसे उबर नहीं पाएगी।हांलाकि अब हम वो समय खो चुके है कि व्यक्तित्व विकास और उसके परिवर्तन की दिशा में कोई कार्य करें व्यवहारिक रुप से 125 करोड जनसंख्या के लिए ये संभव भी नहीं है अभी तो समय सिर्फ़ कडी सजा के निर्णय का है क्योकि अनैतिक कार्य के लिए कोई नैतिक निर्णय इस काल में संभव नहीं है।
ये फ़िल्म समाज को एक बार फ़िर चिंतन करने का मौका देती है, नहीं देखी हो तो देखिएगा...।ये फ़ुल फ़िर से खिल जाए बुझे चेहरे पर मुस्कान लौट आए और क्या चाहिए.....।

विशेष:फ़िल्म के निर्देशक मानिक चटर्जी की सडक दुर्घटना के कारण इस फ़िल्म को गुलजार ने पुरा किया।पंचम ने "तेरे बिना जिया जाए ना" गाने में अलग सुरो के मंडल वाद्य का बहुत खुबसुरती से प्रयोग किया जो कि एकास्टिक्स गिटार के साथ सुनने में बहुत ही मधुर आभास देता है।

फ़िल्म- घर (9 फ़रवरी 1978)
निर्माता-एन.एन, सिप्पी
निर्देशक: मानिक चटर्जी
लेखक: दिनेश ठाकुर
गीत: गुलजार
संगीत:आर.डी. बर्मन
अवार्ड:
फ़िल्म फ़ेयर बेस्ट स्टोरी-दिनेश ठाकुर
गीत:
1.आज कल पांव जमी पर -लता मंगेशकर
2. आप की आंखो में कुछ-किशोर कुमार,लता मंगेशकर   
3. बोतल से इक बात चली है-मो. रफ़ी,आशा भोंसले  
4. फ़िर वही रात है-किशोर कुमार  
5. तेरे बिना जिया जाए ना-लता मंगेशकर   
-योगेन्द्र व्यास


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