बहुत ही विस्मय कारी घटना है कि इंन्दौर के सिक्ख मोहल्ले से निकली नवजात किलकारी आलाप ,तान और मुरकियों में बदल जाएगी और सात सुरो को अपनी आवाज की प्रत्यंचा पर चढा कर सुरों के एक से बढ कर एक सुरीले बाणॊ से इन हवाओं पर एक कवच सा खींच देगी.मेरे ख्याल में लताजी के जन्म को स्वरों का अवतार कहें तो ज्यादा तसल्ली महसुस होगी. राग-रागिनियो में डुबे एक एक शब्द गीत बनकर बडे ही अनुशासित भाव से लता आकण्ठ में गोते लगाने के लिए बडे ही अधीर देखे व महसुस किए जा सकते है......और हां गीत के मुखडे तो गर्वोक्ति भाव से अंतरे को ये बताते है कि देखो लता के गले में हमने कितनी बार जगह पाई है......कई बार ऐसा लिखना भी गर्वोक्ति का अनुभव देता है कि ऐसी जिवित किवदंती लताजी के रुप में हमारे बीच मौजुद है और जो संपदा उन्होने हमारे लिए छोडी है उस उपकार को चुका पाना हमारे बस में नहीं......लता जी की आवाज सिर्फ़ कानों तक नहीं वरन अवचेतन मन की गहरायों में परकाया की तरह प्रवेश करती है और आपको एक ध्यानस्थ बना कर हौले से बाहर निकल आती है.....यही तो है "सत्यम शिवम सुंदरम" का भाव.क्या ही ये बिल्कुल संभव हो कि शिवालय-देवालय की तरह कहीं "लतालय" आकार ले जहां उनके गीत अखण्ड रुप से किसी पिरामिड के अंदर इस कायनात के कायम रहने तक बजते रहे....तो चलिए अब आप क्या कर रहे है मैने तो........
लता जी के सुरॊ के अंतराल पर अपने दोनो घुटने मोड कर सवारी कर ली है बस अब उनके आलाप,तान,मुरकियो पर तैर रहा हुं.......बडा ही विस्मयकारी संसार है यहां कहीं कोई सितार की स्ट्रिंग पास से गुजरती है तो कहीं एकार्डियन गुदगुदी कर जाता है...तबले की तिहाई ,ढोलक की थाप चौंका देती है....बीच में हवाई गिटार का पीस ढकेल देता है....वही से वायलिन का कारवां तेजी से लता जी की आवाज के पास छोड आता है....ये सारे वाद्य उत्सवी नाद में रंगे है कि कैसे-कैसे लताजी का "स्वर-जन्म" मनाया जाए....अब ऐसे में कौन उतरे इन सुरो की सवारी से.....बस उनिंदा सा हूं.......
-योगेन्द्र व्यास
yvyas2010@gmail.com
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