एक रुका हुआ फ़ैसला.... (Hit here for Link)
एक रुका हुआ फ़ैसला........
कल्पना करे कि अदालत की ओर से आपको एक ऐसे 12 लोगो के ज्युरी दल में शामिल किया जाता है जिसमें आपको एक ऐसे नवयुवक मुल्जिम के बारे में फ़ैसला देना है जिस पर अपने पिता के खुन का इल्जाम है।फ़ैसला एक मत से होना चाहिए,यदि आपका फ़ैसला "कुसुरवार" का आता है तो उस लडके को सजा-ए-मौत मिलना तय है । कोर्ट में जिरह के दौरान वकील दो गवाह और परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर युवक को दोषी साबित कर देता है लेकिन कोर्ट एक मौका ज्युरी मेंबर को देती है।
बासु चटर्जी द्वारा निर्देशित फ़िल्म "एक रुका हुआ फ़ैसला" जिसमें बारह ज्युरी मेंबर को एक बंद कमरे में हत्या के आरोपी युवक का फ़ैसला करने को कहा जाता है तथा ताकिद की जाती है कि कोई भी ज्युरी मेंबर फ़ैसला होने तक कमरे के बाहर नहीं जा सकता और ना ही उन्हे फ़ोन करने की इजाजत है,और यही से शुरु होता है एक बंद कमरे में 1 घंटे 17 मिनट का वो फ़िल्मांकन जहां से खुद कैमेरा भी बाहर नहीं जाता,देखने वाला खुद अपने को ज्युरी का एक हिस्सा मानने लगता है।
ज्युरी में अलग-अलग व्यवसाय ,सोच, उम्र और तबके लोग है...और लगता है अरे! ये तो अपने ही चेहरे है.ज्युरी के लोग ये मानकर ही अंदर आते है कि युवक अपने पिता की हत्या का दोषी है और पांच मिनट में ये फ़ैसला सर्वसम्मति से हो जाएगा और कोर्ट को जाकर सुचना दे आएंगे कि युवक "कसुरवार" है....इसी उहापोह में वोटिंग की जाती है कि सब एक मत से कसुरवार की वोटिंग कर दे ...लेकिन इनमें से ८ नबंर के ज्युरी के.के. रैना युवक को "बेकसुर"कह कर अपना मत 11 के मुकाबले 1 से यह कह कर खारिज कर देते है कि "मुझे भी मालुम नहीं कि युवक दोषी है या नहीं लेकिन हमें कम से कम बातचीत कर उन तथ्यों पर फ़िर से गौर करना चाहिए कि जिस आधार पर उसे दोषी ठहराया गया है क्योकि- ये किसी की जिंदगी और मौत का सवाल है। लेकिन क्या जुरी नं 8 के साथ और लोग आ पाते है या नहीं ये जनने के लिए आपको 1 घंटे 17 मिनट देना होगा। लेकिन हां यही से उजागर होते है समाज के वो सारे चेहरे जो शायद जो हमें इन बारह लोगो में नजर आते है। कुछ अपने पुर्वाग्रहों से ग्रसित चेहरे,कुछ निहायत ही उज्जड, सफ़ेदपोश बदतमीज,गैर-जिम्मेदार,कुछ ऐसे जिनकी अपनी कोई निजी राय नहीं ,कुछ दुसरो की राय को अपनी राय बना कर चलने वाले,कुछ वो लोग जो सोचने समझने की क्षमता तो रखते है लेकिन बोलने से डरते है,कुछ लोग जो ड्ट कर अकेले खडे होते है और अपनी योग्यता के बल पर लोगो को एकजुट करने का प्रयास करते है।
इस फ़िल्म को देखने के बाद दिमाग की वो सारी परते भी उघडती जाती है कि क्या न्याय का सिद्धांत वाकई काम करता है,कमेटी में शामिल लोग क्या वाकई अपने निज पुर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं होते, क्या समाज जिन्हे हम चुनकर भेजते है वो क्या वाकई बुध्दिमतता व निष्पक्षता से अपना कार्य करते होंगे,क्या वाकई ईमानदार लोगो की आवाज को सुना जाता होगा,क्या वाकई क्षेत्रियता,जातियता,तबकावाद निर्णयों को प्रभावित करते है.लेकिन ये फ़िल्म अंदर ही अंदर ये भी संदेश दे जाती है कि यदि हम सुक्ष्मता और निष्पक्षता से तथ्यों पर सामुहिक विचार करे तो शायद हम एक बेहतर न्याय व्यवस्था को कायम कर एक उन्नत समाज का निर्माण कर सकेंगे.....
चुंकि इस फ़िल्म में नाच गाना मनोरंजन नहीं है इसलिए इसे पुरुस्कार ना मिलना भी प्रश्न तो खडा करता ही है।
ये फ़िल्म उन सभी कलाकारो को भी सेल्युट है विशेष कर पंकज कपुर,अन्नुकपुर जिन्होने अपने दमदार अभिनय से हर उस दर्शक को एक कमरे में अपने साथ उन बारह ज्युरी में शामिल कर लेते है और अंत में दर्शक खुद को जिम्मेदार ज्युरी के रुप महसुस कर ये जान लेता है कि जीवन में उसके फ़ैसलों की कसौटी कैसी होगी....
विशेष : ये फ़िल्म- "12 एग्री मेन(1957)" का रिमेक है जिसे सिडनी ल्युमेट ने निर्देशित किया था.
फ़िल्म: एक रुका हुआ फ़ैसला
वर्ष: २३ जुलाई १९८५
निर्माता: बासु चटर्जी
निर्देशक:बासु चटर्जी
डायलाग: रंजीत कपुर
संगीत: सपन चक्रवर्ती
-योगेन्द्र व्यास
एक रुका हुआ फ़ैसला........
कल्पना करे कि अदालत की ओर से आपको एक ऐसे 12 लोगो के ज्युरी दल में शामिल किया जाता है जिसमें आपको एक ऐसे नवयुवक मुल्जिम के बारे में फ़ैसला देना है जिस पर अपने पिता के खुन का इल्जाम है।फ़ैसला एक मत से होना चाहिए,यदि आपका फ़ैसला "कुसुरवार" का आता है तो उस लडके को सजा-ए-मौत मिलना तय है । कोर्ट में जिरह के दौरान वकील दो गवाह और परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर युवक को दोषी साबित कर देता है लेकिन कोर्ट एक मौका ज्युरी मेंबर को देती है।
बासु चटर्जी द्वारा निर्देशित फ़िल्म "एक रुका हुआ फ़ैसला" जिसमें बारह ज्युरी मेंबर को एक बंद कमरे में हत्या के आरोपी युवक का फ़ैसला करने को कहा जाता है तथा ताकिद की जाती है कि कोई भी ज्युरी मेंबर फ़ैसला होने तक कमरे के बाहर नहीं जा सकता और ना ही उन्हे फ़ोन करने की इजाजत है,और यही से शुरु होता है एक बंद कमरे में 1 घंटे 17 मिनट का वो फ़िल्मांकन जहां से खुद कैमेरा भी बाहर नहीं जाता,देखने वाला खुद अपने को ज्युरी का एक हिस्सा मानने लगता है।
ज्युरी में अलग-अलग व्यवसाय ,सोच, उम्र और तबके लोग है...और लगता है अरे! ये तो अपने ही चेहरे है.ज्युरी के लोग ये मानकर ही अंदर आते है कि युवक अपने पिता की हत्या का दोषी है और पांच मिनट में ये फ़ैसला सर्वसम्मति से हो जाएगा और कोर्ट को जाकर सुचना दे आएंगे कि युवक "कसुरवार" है....इसी उहापोह में वोटिंग की जाती है कि सब एक मत से कसुरवार की वोटिंग कर दे ...लेकिन इनमें से ८ नबंर के ज्युरी के.के. रैना युवक को "बेकसुर"कह कर अपना मत 11 के मुकाबले 1 से यह कह कर खारिज कर देते है कि "मुझे भी मालुम नहीं कि युवक दोषी है या नहीं लेकिन हमें कम से कम बातचीत कर उन तथ्यों पर फ़िर से गौर करना चाहिए कि जिस आधार पर उसे दोषी ठहराया गया है क्योकि- ये किसी की जिंदगी और मौत का सवाल है। लेकिन क्या जुरी नं 8 के साथ और लोग आ पाते है या नहीं ये जनने के लिए आपको 1 घंटे 17 मिनट देना होगा। लेकिन हां यही से उजागर होते है समाज के वो सारे चेहरे जो शायद जो हमें इन बारह लोगो में नजर आते है। कुछ अपने पुर्वाग्रहों से ग्रसित चेहरे,कुछ निहायत ही उज्जड, सफ़ेदपोश बदतमीज,गैर-जिम्मेदार,कुछ ऐसे जिनकी अपनी कोई निजी राय नहीं ,कुछ दुसरो की राय को अपनी राय बना कर चलने वाले,कुछ वो लोग जो सोचने समझने की क्षमता तो रखते है लेकिन बोलने से डरते है,कुछ लोग जो ड्ट कर अकेले खडे होते है और अपनी योग्यता के बल पर लोगो को एकजुट करने का प्रयास करते है।
इस फ़िल्म को देखने के बाद दिमाग की वो सारी परते भी उघडती जाती है कि क्या न्याय का सिद्धांत वाकई काम करता है,कमेटी में शामिल लोग क्या वाकई अपने निज पुर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं होते, क्या समाज जिन्हे हम चुनकर भेजते है वो क्या वाकई बुध्दिमतता व निष्पक्षता से अपना कार्य करते होंगे,क्या वाकई ईमानदार लोगो की आवाज को सुना जाता होगा,क्या वाकई क्षेत्रियता,जातियता,तबकावाद निर्णयों को प्रभावित करते है.लेकिन ये फ़िल्म अंदर ही अंदर ये भी संदेश दे जाती है कि यदि हम सुक्ष्मता और निष्पक्षता से तथ्यों पर सामुहिक विचार करे तो शायद हम एक बेहतर न्याय व्यवस्था को कायम कर एक उन्नत समाज का निर्माण कर सकेंगे.....
चुंकि इस फ़िल्म में नाच गाना मनोरंजन नहीं है इसलिए इसे पुरुस्कार ना मिलना भी प्रश्न तो खडा करता ही है।
ये फ़िल्म उन सभी कलाकारो को भी सेल्युट है विशेष कर पंकज कपुर,अन्नुकपुर जिन्होने अपने दमदार अभिनय से हर उस दर्शक को एक कमरे में अपने साथ उन बारह ज्युरी में शामिल कर लेते है और अंत में दर्शक खुद को जिम्मेदार ज्युरी के रुप महसुस कर ये जान लेता है कि जीवन में उसके फ़ैसलों की कसौटी कैसी होगी....
विशेष : ये फ़िल्म- "12 एग्री मेन(1957)" का रिमेक है जिसे सिडनी ल्युमेट ने निर्देशित किया था.
फ़िल्म: एक रुका हुआ फ़ैसला
वर्ष: २३ जुलाई १९८५
निर्माता: बासु चटर्जी
निर्देशक:बासु चटर्जी
डायलाग: रंजीत कपुर
संगीत: सपन चक्रवर्ती
-योगेन्द्र व्यास
No comments:
Post a Comment