भयावह सच्चाईयों को उधेडती है-अमु (hit here for Link)
अमु
"जल कर खाक हुआ मकान और उसके बीच सहमी हुयी चार वर्षीया "अमु", उसका दो वर्षीय छोटा भाई अर्जुन उसे "अमु" कह कर बुलाता था, आंसु की धार उसके गालों पर सुख चुकी थी,शाम हो चली थी-सन्नाटे में उठते धुएं के बीच कुत्ते के भौकने की आवाज कपां देने वाली थी। कहते है ना कि-जिंदगी में कब उजली सुबह थोड़ी देर में काली स्याह हो जाए पता नहीं।सुबह की ही बात है,कच्ची ईंटो के घर में रहने वाला अति सामान्य सिक्ख परिवार अपने दो बच्चो के साथ सुबह के खाने की तैयारी कर ही रहा था कि बाहर कुछ साम्प्रदायिक बवंडर के आने की आहट हुयी,पिता अपने बच्चों को उनकी मां की सुरक्षा में छोड़ ये देखने गया कि आखिर बात क्या है,पिता को दंगाईयो ने मार दिया,मां बदहवास सी सहायता के लिए गुहार लगाने दौड़ी,पीछे-पीछे अबोध अमु भी,पुलिस,मंत्री-नेता किसी ने उसकी चित्कार ना देखी ना सुनी जबकि वो भीड़ उकसाने की कार्यवाही में व्यस्त थे,पथराई आंखे लिए मां जब घर लौटी तो जले घर में वो अपने बेटे और पति को खो चुकी थी...बची थी तो सिर्फ़ "अमु"।
सन 1984 के सिक्ख दंगो की पृष्ट भूमी पर सोनाली बोस द्वारा निर्देशित फ़िल्म "अमु"(2005) जो कि मुल भाषा अंग्रेजी में बनी है जिसका प्रिमियर बर्लिन और टोरंटो फ़िल्म फ़ेस्टीवल किया गया।निर्देशिका इसे भारतीय टेलीविजन पर भी रिलिज करना चाहती थी लेकिन सेंसर द्वारा ए-सर्टिफ़िकेट के साथ दस मिनट के कट के सुझाव दिए गए इसलिए ये फ़िल्म सन 2008 मे डीवीडी के माध्यम से अमीर खान द्वारा रिलिज की गयी।
बहरहाल, फ़िल्म की शुरुआत के कथानक में एक 21 वर्षीया अमेरिकन भारतीय लड़की काजु(कोंकणा सेन शर्मा) जो कि भारत (दिल्ली) अपने रिश्तेदार के यहां मिलने आती है,उसे यहां कि हर बात चौंकाती है,जिसे हम असल भारत कहते है लोगो का रहन सहन,गंदी बस्तियां यहां के लोग।दिल्ली में घुमाने के लिए उसे एक साथी मिल जाता है कबीर(अंकुर खन्ना) जो यह समझता है कि बाहर से आए लोग सिर्फ़ एक शौक और कौतुभ के चलते इंडिया को अपने कैमरे में कैद करने के लिए आते है.लेकिन काजु इन सबके बीच अपने अतीत को खोज रही होती है।इन सबके बीच काजु की मां केया(वृंदा करात) भी अमेरिका से भारत आ जाती है।कम्युनिस्ट पार्टी एवं सामाजिक कार्यकर्ता वृंदा करात को अभिनय करते देखना बडा विस्मित करता है। काजु को चुंकि ये बात पता है कि उसे उसकी मां केया ने बचपन में दिल्ली की एक संस्था से गोद लिया था और वो एक बस्ती में पैदा हुयी थी इसके अलावा उसे और कुछ पता नहीं कि उसके मां बाप कौन थे? कहां रहते थे?दिल्ली आकर काजु को अपने अतित को जानने की तीव्रता बढ जाती है।वो बार बार अपनी मां केया व परिवार के अन्य सदस्यों से जानने की कोशिश करती है लेकिन सभी किन्ही वजहों से उसे टाल जाते है।लेकिन हार कर केया को बताना पडता है कि उसकी असल मां ने ही ये राज ना खोलने को कहा था। केया बताती है किस तरह उसे एक बच्ची और उसकी मां रिलिफ़ केम्प में मिली,किस तरह उसकी मां न्याय के दर-दर भटकी और हद तो तब हो गयी जब दोषी मंत्री ही रिलिफ़ केम्प मे कंबल बांटने आता है और केया की मां वो कंबल उसी मंत्री के मुंह पर फ़ेंक देती है अन्याय से हताश होकर वो मां आत्महत्या कर लेती है और बच्ची केया को सौप जाती है वो बच्ची ही अमु है।
निर्देशिका सोनाली बसु के अनुसार 1984 के दंगो पर अब तक कोई फ़िल्म नहीं बनी और इसी विषय पर उन्होने किताब भी अमु नाम से ही लिखी है।हांलाकि पटकथा के तौर पर फ़िल्म में इतनी कसावट तो नहीं है लेकिन कुछ भयावह सच्चाईयों को जरुर उधेड़ती है मसलन काजु एक विधवा कालोनी में पहुंच जाती है जहां दंगा ग्रस्त महिलाए रहती है,यहां पर एक बहुत तंज बात महिला द्वारा कही गयी कि "इंदिरा गांधी के हत्यारों को तो फ़ांसी पर चढा कर न्याय कर लिया लेकिन हमें न्याय कब मिलेगा"।
अंत में गोधरा कांड की न्युज फ़्लेश के साथ समाप्त होती है.ये फ़िल्म कोई समाधान नहीं देती लेकिन घटनाओं को बिना किसी पुर्वाग्रह के जस का तस कहने का साहस रखती है.ये समझना मुश्किल है कि क्या सांप्रदायिक बवंडर के आगे शासन और प्रशासनिक शक्तियां नतमस्तक हो जाती है?
फ़िल्म: अमु
वर्ष: 2005
निर्माता:बेडाबार्टा पेन
निर्देशक: सोनाली बोस
लेखक: सोनाली बोस
संगीत: नंदलाल नायक
भाषा: अंग्रेजी/हिन्दी डब
अवार्ड:
2005: नेशनल फ़िल्म अवार्ड-बेस्ट फ़िचर फ़िल्म(इंग्लिश)
2005: एफ़.आई.पी.आर.ई.एस.सी.आई. क्रिटीक आवार्ड
2005: गोलापुडी श्रीनिवास नेशनल आवार्ड -बेस्ट डेब्यु डायरेक्टर
2005: टिन एज चाईस अवार्ड,टोरिनो इटली(सिने डोन फ़िल्म फ़ेस्टीवल)
2005: ज्युरीअवार्ड,टोरिनो इटली(सिने डोन फ़िल्म फ़ेस्टीवल)
2006: स्टार स्क्रिन अवार्ड-बेस्ट इंग्लिश फ़िल्म
-योगेन्द्र व्यास
अमु
"जल कर खाक हुआ मकान और उसके बीच सहमी हुयी चार वर्षीया "अमु", उसका दो वर्षीय छोटा भाई अर्जुन उसे "अमु" कह कर बुलाता था, आंसु की धार उसके गालों पर सुख चुकी थी,शाम हो चली थी-सन्नाटे में उठते धुएं के बीच कुत्ते के भौकने की आवाज कपां देने वाली थी। कहते है ना कि-जिंदगी में कब उजली सुबह थोड़ी देर में काली स्याह हो जाए पता नहीं।सुबह की ही बात है,कच्ची ईंटो के घर में रहने वाला अति सामान्य सिक्ख परिवार अपने दो बच्चो के साथ सुबह के खाने की तैयारी कर ही रहा था कि बाहर कुछ साम्प्रदायिक बवंडर के आने की आहट हुयी,पिता अपने बच्चों को उनकी मां की सुरक्षा में छोड़ ये देखने गया कि आखिर बात क्या है,पिता को दंगाईयो ने मार दिया,मां बदहवास सी सहायता के लिए गुहार लगाने दौड़ी,पीछे-पीछे अबोध अमु भी,पुलिस,मंत्री-नेता किसी ने उसकी चित्कार ना देखी ना सुनी जबकि वो भीड़ उकसाने की कार्यवाही में व्यस्त थे,पथराई आंखे लिए मां जब घर लौटी तो जले घर में वो अपने बेटे और पति को खो चुकी थी...बची थी तो सिर्फ़ "अमु"।
सन 1984 के सिक्ख दंगो की पृष्ट भूमी पर सोनाली बोस द्वारा निर्देशित फ़िल्म "अमु"(2005) जो कि मुल भाषा अंग्रेजी में बनी है जिसका प्रिमियर बर्लिन और टोरंटो फ़िल्म फ़ेस्टीवल किया गया।निर्देशिका इसे भारतीय टेलीविजन पर भी रिलिज करना चाहती थी लेकिन सेंसर द्वारा ए-सर्टिफ़िकेट के साथ दस मिनट के कट के सुझाव दिए गए इसलिए ये फ़िल्म सन 2008 मे डीवीडी के माध्यम से अमीर खान द्वारा रिलिज की गयी।
बहरहाल, फ़िल्म की शुरुआत के कथानक में एक 21 वर्षीया अमेरिकन भारतीय लड़की काजु(कोंकणा सेन शर्मा) जो कि भारत (दिल्ली) अपने रिश्तेदार के यहां मिलने आती है,उसे यहां कि हर बात चौंकाती है,जिसे हम असल भारत कहते है लोगो का रहन सहन,गंदी बस्तियां यहां के लोग।दिल्ली में घुमाने के लिए उसे एक साथी मिल जाता है कबीर(अंकुर खन्ना) जो यह समझता है कि बाहर से आए लोग सिर्फ़ एक शौक और कौतुभ के चलते इंडिया को अपने कैमरे में कैद करने के लिए आते है.लेकिन काजु इन सबके बीच अपने अतीत को खोज रही होती है।इन सबके बीच काजु की मां केया(वृंदा करात) भी अमेरिका से भारत आ जाती है।कम्युनिस्ट पार्टी एवं सामाजिक कार्यकर्ता वृंदा करात को अभिनय करते देखना बडा विस्मित करता है। काजु को चुंकि ये बात पता है कि उसे उसकी मां केया ने बचपन में दिल्ली की एक संस्था से गोद लिया था और वो एक बस्ती में पैदा हुयी थी इसके अलावा उसे और कुछ पता नहीं कि उसके मां बाप कौन थे? कहां रहते थे?दिल्ली आकर काजु को अपने अतित को जानने की तीव्रता बढ जाती है।वो बार बार अपनी मां केया व परिवार के अन्य सदस्यों से जानने की कोशिश करती है लेकिन सभी किन्ही वजहों से उसे टाल जाते है।लेकिन हार कर केया को बताना पडता है कि उसकी असल मां ने ही ये राज ना खोलने को कहा था। केया बताती है किस तरह उसे एक बच्ची और उसकी मां रिलिफ़ केम्प में मिली,किस तरह उसकी मां न्याय के दर-दर भटकी और हद तो तब हो गयी जब दोषी मंत्री ही रिलिफ़ केम्प मे कंबल बांटने आता है और केया की मां वो कंबल उसी मंत्री के मुंह पर फ़ेंक देती है अन्याय से हताश होकर वो मां आत्महत्या कर लेती है और बच्ची केया को सौप जाती है वो बच्ची ही अमु है।
निर्देशिका सोनाली बसु के अनुसार 1984 के दंगो पर अब तक कोई फ़िल्म नहीं बनी और इसी विषय पर उन्होने किताब भी अमु नाम से ही लिखी है।हांलाकि पटकथा के तौर पर फ़िल्म में इतनी कसावट तो नहीं है लेकिन कुछ भयावह सच्चाईयों को जरुर उधेड़ती है मसलन काजु एक विधवा कालोनी में पहुंच जाती है जहां दंगा ग्रस्त महिलाए रहती है,यहां पर एक बहुत तंज बात महिला द्वारा कही गयी कि "इंदिरा गांधी के हत्यारों को तो फ़ांसी पर चढा कर न्याय कर लिया लेकिन हमें न्याय कब मिलेगा"।
अंत में गोधरा कांड की न्युज फ़्लेश के साथ समाप्त होती है.ये फ़िल्म कोई समाधान नहीं देती लेकिन घटनाओं को बिना किसी पुर्वाग्रह के जस का तस कहने का साहस रखती है.ये समझना मुश्किल है कि क्या सांप्रदायिक बवंडर के आगे शासन और प्रशासनिक शक्तियां नतमस्तक हो जाती है?
फ़िल्म: अमु
वर्ष: 2005
निर्माता:बेडाबार्टा पेन
निर्देशक: सोनाली बोस
लेखक: सोनाली बोस
संगीत: नंदलाल नायक
भाषा: अंग्रेजी/हिन्दी डब
अवार्ड:
2005: नेशनल फ़िल्म अवार्ड-बेस्ट फ़िचर फ़िल्म(इंग्लिश)
2005: एफ़.आई.पी.आर.ई.एस.सी.आई. क्रिटीक आवार्ड
2005: गोलापुडी श्रीनिवास नेशनल आवार्ड -बेस्ट डेब्यु डायरेक्टर
2005: टिन एज चाईस अवार्ड,टोरिनो इटली(सिने डोन फ़िल्म फ़ेस्टीवल)
2005: ज्युरीअवार्ड,टोरिनो इटली(सिने डोन फ़िल्म फ़ेस्टीवल)
2006: स्टार स्क्रिन अवार्ड-बेस्ट इंग्लिश फ़िल्म
-योगेन्द्र व्यास
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