कुछ रिश्ते शब्दों से....
Sunday, July 1, 2018
Monday, June 18, 2018
धड़कन पल पल बढ़ती जाए-
साजों की धड़कन का पता अगर करना है तो पंचम की धुन का स्टेथोस्कोप कान में लगाना ही पड़ेगा, किसी भी गाने का प्रिल्यूड उसकी नब्ज होता है जो पूरे गाने की
खूबसूरती को बयां करता है।
पूरे 1 मिनट 8 सेकंड तक प्रिल्यूड धड़कता है उसमे ये समझना मुश्किल होता है कि ये गाना कहाँ से टेक आफ होगा । इंसानी मन मे पल रही साजिश को पंचम के इन्स्ट्रुमेंट जस के
तस आपके कानो मे फुसफुसाहट के साथ घोल के रख देते है। हेड फोन पर प्रिल्यूड सुनते
सुनते कुछ ऐसा लगता है मानो साजिशों के टेम्पल रन गुजर रहे हो ,जैसे ही गिटार की
स्ट्रिंग का हुक मिलता है- हौले से आशा जी बेस लाईन को ऐसे उठाती है मानो मन की
बेचैनी का पैराशूट खोल दिया हो धीरे धीरे बस बहे चले जा रहे हो.... और कोमल धड़कन को बढ़ाते हुए आशा जी ............कह उठती है- हे हे हे हे हे हे हे हे और जो आठवी बार वाला “हे” पर आशा जी ने कुछ तौला आने वज़न बढ़ा दिया इसको कहते है “आशा पंच” जो पंचम के साथ पूरे 7 मिनट 10 सेकंड तक हमारे कानो में धड़कता है..........धड़कन पल पल बढ़ती जाए।
प्रसिद्ध म्यूजिशीयन और परकशन के जानकार श्री अकुल भाई रावल(
अहमदाबाद) का ये वीडियो देखा और उनसे विस्तृत चर्चा हुई, इस गाने के रिद्दम सेक्शन स्ट्रिंग सेक्शन का कमाल अचंभित कर गया
और अकुल भाई ने बहुत ही खुबसूरती से इस वीडियो के माध्यम से ये बताने का प्रयास
किया है कि एक गाने मे पंचम अपने परकशन और रिदम इन्स्ट्रुमेंट के जरिये क्या कमाल
करते थे ।
पुरे गाने मे अफ्रीकन कलिम्बा, रेसों रेसों, मार्कस, मोटिव की-बोर्ड , बेस गिटार ड्रम , मादल , बेक ग्राउंड में वायलिन का कलरव,सस्पेंस को उभारने के लिए मटके का उपयोग एक अलहदा अनुभूति देता है
।
जैसा अकुल भाई ने बताया की पंचम अपने गानो मे एक लूप क्रिएट करते
थे यदि ध्यान से सुनेंगे तो आपको स्पष्ट महसूस होगा की बांसुरी सा एक लूप आशा जी
की बेस लाइन “धड़कन पल पल बढ़ती जाए” के साथ चलता है। एक के बाद एक इन्स्ट्रुमेंट एक दूसरे को टेकओवर करते चलते है मटके की इको टिक टिक के साथ 5.40 सेकंड पर वायलिन का झूण्ड एकदम फ्रंट मे आता है जैसे पंछीयो का एक
पूरा झुण्ड आसमान मे कुलांचे मार रहा हो और फिर सुदूर जाता महसूस होता है और ठीक
बाद गिटार स्टिंग और ट्रंपेट गले मे हाथ डाले ड्रमस्टिक के साथ आहिस्ता से आशा की
अल्हड़ गायकी के साथ ब्लेन्ड कर जाते है और .........फिर गाना मेनस्ट्रीम में आ
जाता है।
ऐसा तिलिस्म पूरे 7 मिनट 10 सेकंड तक चलता है और जब तक चलता है
सुनने वाला उरी तरह जकड़ मे रहता है और बार बार सुनने को मन करता है।
पंचम के संगीत की एक और खासियत है कि जिस तरह एक नदी रास्ते से
गुजरते हुए मिनरल जुटाते हुए अविरल भाव से बहती है उसी तरह पंचम का संगीत विभिन्न
वाद्यों की सुगंधी को समेटते हुए चलता है और वो ताकत देता है कि एक स्फूर्त माहौल आसपास बन जाता है।
या यूं कहे कि -
“पंचम की खोह से रिसता मधुर संगीत बहुत दूर तक जाकर अपनी शीतलता से
सुनने वालो को तृप्त करता है।“
पंचम के संगीत कि खासियत है कि वो पूरे गाने को जस का तस निगलने
नहीं देते , पंचम के गानो का लुफ़्त वही उठा सकता
है जिसके कानो को चबाने कि आदत और अदब हो यानि शब्दो और धुनों का कतरा कतरा
इतनी महीन चाशनी मे डुबोया होता है कि जितनी बार सुनो हर बार कुछ नया स्वाद,
फिल्म अर्जुन (1985) का ये गाना जिसे
लिखा है जावेद अख़्तर साहब ने -बस सुने और
अपनी धड़कन को जरा बढ़ने भी दे .........
टिप : गाने का वीडियो देखने से बेहतर है आडियो ही हेड फोन पर सुना
जाए या कार मे शीशे चढ़ा कर थोड़ा लाउड सुना जाए तो इन्स्ट्रुमेंट इफैक्ट को राइट से
लेफ्ट दौड़ते हुए महसूस करेंगे। तो बारिश का मौसम है तो निकल पढिए एक ड्राईव पर ही।
-योगी योगेंद्र
Friday, June 2, 2017
सीधे होने कि फाँस (व्यंग्य)
सीधा होना बड़ी जिम्मेदारी और जोखिम भरा होता है । कुछ लोग तो शक्ल से सीधे
दिखते है, तो कुछ सीधे होने
का नाटक करते है, तो कुछ बेचारे जनम
से सीधे घोषित कर दिए जाते है जैसे कि मैं ।
सीधा होना एक ऐसी त्रासदी है जो ज़िंदगी भर आपका पीछा नहीं छोड़ती। ये एक ऐसा
अभिशाप है जो आपकी उद्दंडता को बाहर नहीं आने देता। अब बचपन से सुनता आया की अरे
ये तो चार भाइयो मे सबसे सीधा है। और वही से शुरू हो गई थी अपने सीधेपन की शुरुआत। जैसे किसी बच्चे को बचपन से ही संत बनाने का उपक्रम चालू कर देते है उसी तरह
एक बच्चे को सीधा बनाने का क्रम चालू हो जाता है। अब आप बताओ कि यदि मैं बचपन में
ज्यादा रोया नहीं तो इसका मतलब ये कि मैं बहुत सीधा हूँ । मां भी बड़े चाव से सबके
सामने कहती अरे पता है ये हमारा तो गुड्डु सबसे सीधा है अरे पैदा हुआ तब भी
ज्यादा नहीं रोया। अरे ये हमारा सबसे सीधा
बच्चा है, बिलकुल भी जिद नहीं
करता, अरे ये तो बेचारा सब खा लेता है
। अब आप ही बताओ ये क्या बात हुई । इस चक्कर में कई बार मन को मारना पढ़ा । अब
बालमन में जिस चीज कि इच्छा थी वो सीधेपन ने छिन ली। ये सुनते-सुनते थोड़ा समझने लायक हुआ तो लगा कि
अपन सीधे है इसलिए रोना नही है, जिद नहीं करना है, शरारत नहीं करना है क्योकि अपन तो सीधे है । जब भी कोई बोलता कि अरे आपका
बच्चा तो बहुत सीधा है तो शर्माने का उपक्रम कर अपनी इस पैदायशी प्रतिभा पर गर्व होने लगा ।
कई बार शरारत करने का मन किया फिर अंदर से आवाज आई अरे तू तो सीधा है। इस तरह
दोस्तो और भाइयो मै नामकरण कुछ यूं भी हुआ कि अरे ये तो गेल्या है। तो इस तरह धीरे धीरे सीधे पन का रंग चढ़ता गया ।
फिर भी मन इसी उधेड़ बुन मे रहता कि आखिर सीधा रहने के प्रोटोकाल क्या है -तो ये जाना कि इसके कई प्राररूप है जैसे -कई
लोग सीधे को गमना, बेवकूफ या ऐसा
व्यक्ति जिसके भाव शून्य हो वो सीधा होता है ।
अब साहब हालात ये थे कि मुहल्ले कि सारी मम्मियाँ अपनी बेटीयो को मेरे साथ ये
सोच कर भेज देती कि अरे ये तो सीधा है अब आप सोचिए सीधेपन का कितना बोझ की आपको
शुगर नहीं है फिर भी मिठाई नहीं छु सकते ।
कहावत है सीधे को तेज ही मिलती है शादी के पहले लड़की वालो ने तो भाँप ही लिया की लड़का सीधा है ठीक ठाक कमा लेता है। लड़का सीधा है अपने कब्जे मे रहेगा लड़की सुखी
रहेगी ।सीधा होना तो जैसे अघोषित भीष्म प्रतिज्ञा हो गई।
तो साहब सीधेपन मे शादी हो गई और सीधेपन मे बच्चे भी हो गए।
अब कोई चेहरा देखकर सीधा कहता है तो कोई व्यवहार देख कर। जिस बीबी ने सीधा
देखर शादी की अब कहती है थोड़ा चंट बनो चंट,
कोई भी तुम्हें बेवकूफ बना जाता है। बच्चे बोलते है पापा आप बहुत सीधे हो आप
चौकीदार को डांटो वो 15 दिन बाद ड्यूटी पर आया है । अब मै उनको क्या बताता कि
तुम्हारी मम्मी ने डांटा था तो आ नहीं रहा था अब मैंने समझाया तो आज आ गया।
जब जाब के लिए इंटरव्यू दिया तो बॉस बोला कि हमें आप जैसे सरल और ईमानदार लोग
चाहिए और आपको देखकर लगता है कि आप इस जाब के लायक है। अब वही बॉस प्रमोशन नहीं करता कि-अरे तुम
बहुत सीधे हो हमे थोड़े चालू लोग चाहिए अब
बताओ क्या करे।
लेकिन ठीक है साहब सीधेपन के संस्कार मे
ये फायदा हुआ कि खामोशी के आलम मे व्यावहारिकता की समझ आ गई,लोगो
को समझने और पढ़ने का अनुभव आ गया । सही और गलत का
फैसला लेने की समझ आ गई । ये समझ आ
गया कि वाचालता से खामोशी अच्छी । सीधेपन में ज्यादा दोस्त ना बने लेकिन दुश्मन
भी कोई नहीं बना। अब सीधे पन की फाँस नहीं
चुभती क्योकि अब मन सीधा है, शांत है । चूँकि मन
सीधा है तो अब सीधे पन अपना आनंद है।
ऐ री पवन......
ऐ री पवन...... लता जी के अपर नोट से लोअर नोट पर सुगम आवाजाही इस गाने की खुबसुरती बयां करने के लिए काफी है।
किसी सामान्य गायक के लिए ये गाना निभाना थोड़ा कठिन है और उस पर पंचम की संगीत पच्चीकारी ,तबले का सिंपल ठेका जिसमे कांगो का बेस मिक्स और मादल की उसी सुर में टुंग की ध्वनि। इस गाने का कुल जमा रिदम सेक्शन है।
वायलिन का पुरे समय मीठा बेक ग्राउंड गाने के भराव को पूर्ण करता है।इंटरल्यूड में सन्तूर के साथ गिटार की स्ट्रिंग का मिक्सिंग है वो मुझे खासियत लगती है जो अमूमन साधारणतया सुनने में पता नहीं लगती। और शब्दों की गुथावन में गुलज़ारियत सी महक आती है।
लेकिन गाना आनंद बख्शी साहब ने ऐसे लिखा मानो पवन कोई बावरी संगी सखी सहेली है जिसे दुःख दर्द बांटने और बतियाने का कोई बहाना मिल गया हो।लेकिन एक बात और गौर करने लायक है कि हिंदी शब्दावली में पवन पुर्लिंग शब्द है लेकिन बख्शी साहब ने उसे स्त्रीलिंग में ढाल दिया और एक खुबसूरत गीत रच दिया।। कुछ कमाल खोजो तो मिल ही जाते है।ट्रेन के सफर में कुछ टाइम मिला तो कुछ लिख पा लिया।
https://www.youtube.com/watch?v=Cu2zpXIBWKI
किसी सामान्य गायक के लिए ये गाना निभाना थोड़ा कठिन है और उस पर पंचम की संगीत पच्चीकारी ,तबले का सिंपल ठेका जिसमे कांगो का बेस मिक्स और मादल की उसी सुर में टुंग की ध्वनि। इस गाने का कुल जमा रिदम सेक्शन है।
वायलिन का पुरे समय मीठा बेक ग्राउंड गाने के भराव को पूर्ण करता है।इंटरल्यूड में सन्तूर के साथ गिटार की स्ट्रिंग का मिक्सिंग है वो मुझे खासियत लगती है जो अमूमन साधारणतया सुनने में पता नहीं लगती। और शब्दों की गुथावन में गुलज़ारियत सी महक आती है।
लेकिन गाना आनंद बख्शी साहब ने ऐसे लिखा मानो पवन कोई बावरी संगी सखी सहेली है जिसे दुःख दर्द बांटने और बतियाने का कोई बहाना मिल गया हो।लेकिन एक बात और गौर करने लायक है कि हिंदी शब्दावली में पवन पुर्लिंग शब्द है लेकिन बख्शी साहब ने उसे स्त्रीलिंग में ढाल दिया और एक खुबसूरत गीत रच दिया।। कुछ कमाल खोजो तो मिल ही जाते है।ट्रेन के सफर में कुछ टाइम मिला तो कुछ लिख पा लिया।
https://www.youtube.com/watch?v=Cu2zpXIBWKI
Wednesday, April 26, 2017
कभी होs sती नहीं जिसकी हार......
मंदिर का चरणामृत फिर भी हम बहुत थोड़ा लेते है ,लेकिन किशोर कर्णामृत ऐसा है कि प्यास दर प्यास बढ़ाता जाता हैं। इन्दीवर के बेहद खुबसुरत बोलो को किशोर दा ने बहुत ही शिद्दत के साथ परवाज़ दी हैं ,किशोर दा इस गाने के साथ इतना आत्म बल दे जाते हैं कि मन बस झुम उठता हैं .शुरू में 26 सेकण्ड का गिटार का प्रील्युड और मुखडे की ढ्लान पर वायलिन एक पुरा हुजुम ऐसा बजता हैं मानो आकाश में पंछियों का एक पुरा झुंड एक साथ अपने पंखों से हवाओ को चिरते हुए उन्मुक्त उड़ान भरता हुआ कभी ऊपर तो कभी नीचे चलता हैं और गिटार का क्लोजिन्ग स्ट्रिंग ऐसा कि मानो सारे पंछियों ने के साथ अपने पंख समेट लिए हो.
गिटार, सेक्साफ़ोन और बान्सुरी के मोहक नोट्स और रिदम सेक्शन बहुत ही अदब के साथ पुरे गाने में हेड फोन के दोनों छोर से कानो में रिसता रहता है किशोर दा हमारी साँस के पोर पोर में अपनी आवाज के अमृत घोल को पिला पिला के इस एहसास को पक्का कर देते हैं कि "कभी होती नहीं जिसकी हार वो है प्यार " .
बाबला का संगीत थोडा हैरत में डालता हैं उन्होंने गिटार का इस्तेमाल बहुत ही उम्दा तरीके से किया हैं . 1981 की फ़िल्म खराखोटा जिसे राजकिरण और सारिका पिक्चराईज किया गया. ये गाना आशा की आवाज में एक अलग ही एहसास देता हैं. ये ही गाना फ़िल्म मीठा जहर 1985 में इस्तेमाल किया गया.
हमारे किशोर प्रेमी परम मित्र श्री नवीन खंडेलवाल ने ये गाना सुझाया और उनसे बात करते हुए ये ही हमारे मन से निकला कि -
''ये गाना किशोर दा के जिगर की मीठी डली हैं कानो में रख लिजिए या जुबा पर रख लिजिए....''
-'योगी' योगेंद्र
https://youtu.be/971BpgvAw1Y- किशोर वर्ज़न
https://youtu.be/dGcEtrQhTLw - आशा वर्ज़न
सुरो का स्पंदन-पंचम
पंचम सुरो का वो स्पंदन है ,वो पच्चीकारी है जो हर पल कहीं ना कहीं धड़कता है, कही ना कही दृश्य होता है।हांफ़ती पस्त होती जिन्दगी में वो कभी किशोरियत के रंगो से रंग भरता है तो कभी आशा की गुनगुनी किरणों से , और तो और कभी लताओं पर झुलती मंद हवाओं में गुलज़ारियत की सी खुशबु बिखेर देता है । पंचम सुर और साजो से ज़िंदगी के नूर बिखेरता चला गया जो जो इसकी जद मे आया वो माला माल होता चला गया ।
एक पूर्ण समावेशी संगीतकार सुरो कि बिछात का एक ऐसा तिलिस्म पैदा कर गया कि हर उम्र के मन की कपोलो से पंचम सुर फुट कर होठों पे आ टिकता है- चाहे “घर आजा घिर आए बदरा “ हो या “रैना बीती जाए “ या “ तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा “ हो या “जीवन के हर मोड़ पर मिल जाएंगे हम सफर “ या “जब भी कोई कंगना बोले पायल छनक जाए” या “पिया तू अब तो आजा या “ओ मांझी रे “ या “सातो बार बोले बंसी”।अनगिनत फेहरिस्त है पंचम के संगीत की - जिसमे जितना गहरे उतरो कुछ ना कुछ अचंभित करने वाला सूत्र हाथ लगता है। जब भी कार सड़क के किसी मोड से गुजरती है , स्टियरिंग टर्न करते समय ये ही लाइने याद आती है “ एक राह मुड़ गई तो और जुड़ गई ,मै मुड़ा तो साथ साथ राह मुड़ गई”........ ऐसा लगता है "स्टियरिंग कंट्रोल गिटार की स्ट्रिंग, एकार्डियन और रिदम ने सम्हाल लिया हो" और हम बस राह पे बहते जा रहे है।
किशोर दा ,पंचम और इन्स्ट्रुमेंट का रिश्ता वैसा ही है जैसे दिल दिमाग और श्वास का । जब दादा गाते है तो पंचम उनकीआवाज की गहराई का रास्ता दर रास्ता बनाते चलते है और उस वक्त रिदम एक चित्र बनाते दादा के साथ चलती है । ये अनोखा संगम ही संगीत की चारधाम यात्रा का सुख देता है । जब पंचम के नोटेशन्स पर इन्स्ट्रुमेंट बजते है तो विस्मयकारी बात ये है की साज स्वयं को आत्म मुग्धता की स्थिति में पाते है। हाँ ये संगीत का निजी सुख है जो बांटने से और बढ़ता है अपना अनुभव तो यही कहता है। -योगी योगेंद्र
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बहुत ही विस्मय कारी घटना है कि इंन्दौर के सिक्ख मोहल्ले से निकली नवजात किलकारी आलाप ,तान और मुरकियों में बदल जाएगी और सात सुरो को अप...

