साजों की धड़कन का पता अगर करना है तो पंचम की धुन का स्टेथोस्कोप कान में लगाना ही पड़ेगा, किसी भी गाने का प्रिल्यूड उसकी नब्ज होता है जो पूरे गाने की
खूबसूरती को बयां करता है।
पूरे 1 मिनट 8 सेकंड तक प्रिल्यूड धड़कता है उसमे ये समझना मुश्किल होता है कि ये गाना कहाँ से टेक आफ होगा । इंसानी मन मे पल रही साजिश को पंचम के इन्स्ट्रुमेंट जस के
तस आपके कानो मे फुसफुसाहट के साथ घोल के रख देते है। हेड फोन पर प्रिल्यूड सुनते
सुनते कुछ ऐसा लगता है मानो साजिशों के टेम्पल रन गुजर रहे हो ,जैसे ही गिटार की
स्ट्रिंग का हुक मिलता है- हौले से आशा जी बेस लाईन को ऐसे उठाती है मानो मन की
बेचैनी का पैराशूट खोल दिया हो धीरे धीरे बस बहे चले जा रहे हो.... और कोमल धड़कन को बढ़ाते हुए आशा जी ............कह उठती है- हे हे हे हे हे हे हे हे और जो आठवी बार वाला “हे” पर आशा जी ने कुछ तौला आने वज़न बढ़ा दिया इसको कहते है “आशा पंच” जो पंचम के साथ पूरे 7 मिनट 10 सेकंड तक हमारे कानो में धड़कता है..........धड़कन पल पल बढ़ती जाए।
प्रसिद्ध म्यूजिशीयन और परकशन के जानकार श्री अकुल भाई रावल(
अहमदाबाद) का ये वीडियो देखा और उनसे विस्तृत चर्चा हुई, इस गाने के रिद्दम सेक्शन स्ट्रिंग सेक्शन का कमाल अचंभित कर गया
और अकुल भाई ने बहुत ही खुबसूरती से इस वीडियो के माध्यम से ये बताने का प्रयास
किया है कि एक गाने मे पंचम अपने परकशन और रिदम इन्स्ट्रुमेंट के जरिये क्या कमाल
करते थे ।
पुरे गाने मे अफ्रीकन कलिम्बा, रेसों रेसों, मार्कस, मोटिव की-बोर्ड , बेस गिटार ड्रम , मादल , बेक ग्राउंड में वायलिन का कलरव,सस्पेंस को उभारने के लिए मटके का उपयोग एक अलहदा अनुभूति देता है
।
जैसा अकुल भाई ने बताया की पंचम अपने गानो मे एक लूप क्रिएट करते
थे यदि ध्यान से सुनेंगे तो आपको स्पष्ट महसूस होगा की बांसुरी सा एक लूप आशा जी
की बेस लाइन “धड़कन पल पल बढ़ती जाए” के साथ चलता है। एक के बाद एक इन्स्ट्रुमेंट एक दूसरे को टेकओवर करते चलते है मटके की इको टिक टिक के साथ 5.40 सेकंड पर वायलिन का झूण्ड एकदम फ्रंट मे आता है जैसे पंछीयो का एक
पूरा झुण्ड आसमान मे कुलांचे मार रहा हो और फिर सुदूर जाता महसूस होता है और ठीक
बाद गिटार स्टिंग और ट्रंपेट गले मे हाथ डाले ड्रमस्टिक के साथ आहिस्ता से आशा की
अल्हड़ गायकी के साथ ब्लेन्ड कर जाते है और .........फिर गाना मेनस्ट्रीम में आ
जाता है।
ऐसा तिलिस्म पूरे 7 मिनट 10 सेकंड तक चलता है और जब तक चलता है
सुनने वाला उरी तरह जकड़ मे रहता है और बार बार सुनने को मन करता है।
पंचम के संगीत की एक और खासियत है कि जिस तरह एक नदी रास्ते से
गुजरते हुए मिनरल जुटाते हुए अविरल भाव से बहती है उसी तरह पंचम का संगीत विभिन्न
वाद्यों की सुगंधी को समेटते हुए चलता है और वो ताकत देता है कि एक स्फूर्त माहौल आसपास बन जाता है।
या यूं कहे कि -
“पंचम की खोह से रिसता मधुर संगीत बहुत दूर तक जाकर अपनी शीतलता से
सुनने वालो को तृप्त करता है।“
पंचम के संगीत कि खासियत है कि वो पूरे गाने को जस का तस निगलने
नहीं देते , पंचम के गानो का लुफ़्त वही उठा सकता
है जिसके कानो को चबाने कि आदत और अदब हो यानि शब्दो और धुनों का कतरा कतरा
इतनी महीन चाशनी मे डुबोया होता है कि जितनी बार सुनो हर बार कुछ नया स्वाद,
फिल्म अर्जुन (1985) का ये गाना जिसे
लिखा है जावेद अख़्तर साहब ने -बस सुने और
अपनी धड़कन को जरा बढ़ने भी दे .........
टिप : गाने का वीडियो देखने से बेहतर है आडियो ही हेड फोन पर सुना
जाए या कार मे शीशे चढ़ा कर थोड़ा लाउड सुना जाए तो इन्स्ट्रुमेंट इफैक्ट को राइट से
लेफ्ट दौड़ते हुए महसूस करेंगे। तो बारिश का मौसम है तो निकल पढिए एक ड्राईव पर ही।
-योगी योगेंद्र
No comments:
Post a Comment