Sunday, April 28, 2013

दामुल (1985)

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दामुल: समाज का विकृत रुप
भारतीय समाज में शोषण की परम्परा सदियों से रही है जिसमें एक वर्ग विशेष अपने से कमजोर वर्ग पर अमानवीय ढंग से आर्थिक,मानसिक एवं दैहिक शोषण करता है जो कि आजतक विकसित हुए कथित सभ्य समाज में भी बदस्तुर जारी है।इन सामाजिक असमानताओं पर सौ सालो के भारतीय फ़िल्म इतिहास में कई फ़िल्म बन चुकी है और कई फ़िल्म आज भी बन रही है लेकिन ये फ़िल्में उसी तरह स्वीकृत होती है जैसे कोई प्रसिध्द पेंटर किसी रोते हुए आदिवासी की अर्धनग्न तस्वीर बना आर्ट गैलेरी में नुमाईश करता है और फ़िर बुध्दिजीवी वर्ग उस पर कई एंगल से उसकी बारिकियो पर चर्चा कर ड्राइंग रुम में सजाने के लिए भेज देता है। इसी के चलते व्यवसायिक सिनेमा के साथ समानांतर सिनेमा का उदय हुआ जिसे कुछ गिने चुने लोग एक सामाजिक समस्या से ज्यादा उसकी कलात्मकता पर ज्यादा तरजीह देते है और राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार देकर अगले फ़िल्म महोत्सव का इंतेजार करते है।जिस पीडा और सच्चाई से फ़िल्म निर्देशक फ़िल्म बनाता है उस पर ना तो समाज और ना ही सरकारें गंभीरता से लेती है बस पुरस्कार देकर इतिश्री कर लेती है और  बेचारे "दामुल"- जो मरते दम तक बंधुआ दासत्व में जीने को मजबुर किए जाते है उनकी अंतहीन कहानी चलती रहती है।
ऐसे ही निर्माता निर्देशक प्रकाश झा है जो लगातार अपनी फ़िल्मों के माध्यम से सामाजिक विकृतियों को अपने ही समाज के सामने लाते रहे है और समानांतर सिनेमा को व्यवसायिक सिनेमा से जोडने का श्रेय भी उन्हे ही जाता है कि उन्होने मनोरंजन के साथ उन सामाजिक दायित्वों का भी निर्वहन किया और दर्शको को सिनेमा हाल तक आने के लिए प्रेरित भी किया।
उनकी शुरुआती फ़िल्मों में से "दामुल" आज भी मन को झकझोर देती है।
बिहार के गया जिले का एक गांव जहां मुख्य रुप से ब्राम्हण और राजपुत अपने वर्चस्व की लडाई में दलितों का पुरजोर शोषण करते है और बंधुआ मजदुर के रुप में उन्हे अपने निज स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करते है।संजीवन(अन्नुकपुर) जो कि दलित वर्ग से है और विभिन्न घटना क्रमों में उसे अपने पिता का कर्ज चुकाने के लिए उसके खेत से उसकी खडी फ़सल छीन ली जाती है,संजीवन गांव के मुखिया माधो(मनोहर सिंग) के पास सहायता मांगने जाता है लेकिन वो उसे मदद के नाम पर गांव के पशु चोरी करने के लिए मजबुर करता है और वो पशु अपने एजेंट के पास जमा करवाता है फ़िर उस व्यक्ति से फ़िरौती मांगी जाती है यदि वो फ़िरौती दे देता है तो पशु वापिस मिल जाते है और नहीं तो पंचायत में फ़ैसला होता है कि इस पशु को बेचकर जो पैसा आए वो बांट लिया जाए और पंचायत का खर्चा भी फ़रियादी ही भरता है।अब चोरी करवाने वाला ही पंच होतो न्याय की उम्मीद ही बेकार है।गांव में एक विधवा है महात्माईन(दिप्ती नवल) जिसका कि माधो मदद के नाम पर पुरजोर  दैहिक शोषण करता है और उसकी खेती की सारी जमीन भी हडप लेता है।इधर चालबाज राजपुत मुखिया गांव के मजदुरो को काम दिलवाने के लिए पंजाब भेजने की कोशीश करता है लेकिन रास्ते में माधो का भाई उन गोलियां चला देता और उसमें काफ़ी मजदुर मारे जाते है।रातो रात माधो और राजपुत मुखिया एक हो जाते है और पुलिस के आगे मुंह ना खोलने के लिए गरीबॊ को धमकाते है।संजीवन सच बोलने की कोशिश करता है लेकिन उसे महात्माईन के बालात्कार और हत्या के मामले में झुठा फ़ंसा कर जेल भिजवां दिया जाता है और फ़िर अदालत उसे  फ़ांसी की सजा सुना देती है।जैसे जैसे ये फ़िल्म देखते जाते है मन बहुत कसेला और द्रवित होता जाता है।लगता है इस धरा पर इतना नारकीय जीवन भी हो सकता है।फ़िल्म में यदि कलाकार खुद पात्र की आत्मा ओढ ले तो लगता है कि अभिनय का चरम क्या होता है इसके लिए अन्नुकपुर और सरीला मजुमदार बधाई व धन्यवाद के पात्र है । आज भी इस तरह के जुल्म अबोध और मेहनत कशो पर जारी है। समाज की वास्तविकता को समझने के लिए इस तरह की फ़िल्मो का अदालतो में संग्यान लिया जाना चाहिए कि आदालते ये भी समझ सके कि सबुतो और गवाहो को किस तरह से तोडा मरोडा जाता है और अत्याचारों की इंतेहा क्या होती है,एक बेगुनाह जिसने जीवन की अबोहवा तक महसुस नहीं की उसको फ़ांसी या जेल में सडने के लिए डाल दिया जाता है।
ये हमारे सिस्टम की विडंबना ही कहिए कि इसे सिर्फ़ एक फ़िल्म मानकर भुला दिया जाता है जबकि फ़िल्में समाज का ही प्रतिबिंब होती है।
मजदुर के शरीर से टपकी पसीने की बुंद अगर देश को खुशहाल बनाती है, तो वही- उसकी आंखो से निकले खुन के आंसु उस देश के अंधकार मय भविष्य की घोषणा भी करते है।
विशेष: इस फ़िल्म में विशेष यही है यदि जीवन में फ़िल्मी मनोरंजन जरुरी है तो जीवन में समाज की जमीनी हकीकत को  समझना भी उतना ही जरुरी है।

फ़िल्म: दामुल (1985)
निर्माता एवं निर्देशक: प्रकाश झा
लेखक: शैवाल(कालसुत्र कथा)
संगीत:रघुनाथ सेठ
सिनेमेटोग्राफ़ी:राजेन कोठारी
अवार्ड:
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड-बेस्ट फ़िल्म क्रिटिक अवार्ड -प्रकाश झा
नेशनल फ़िल्म अवार्ड1985:गोल्डन लोटस अवार्ड बेस्ट फ़िल्म

-योगेन्द्र व्यास


Saturday, April 20, 2013

हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे-चित्रलेखा

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संसार में मनुष्य ही एक ऐसा बुध्दिजीवी प्राणी है जो अपने मन और शरीर दोनो से सतत संघर्षशील रहता है।जबकि पशु प्रकृति द्वारा प्रद्त्त समस्त नैमतो को जस का तस स्वीकार करता है।वो ना भोगी है ना योगी है ना विलासी है ना तपस्वी,ना पापी है ना पुण्यात्मा जो है वो ही है कभी ईश्वर को पाने की कोशिश नहीं करता।लेकिन मनुष्य अपनी बुध्दि और विवेक के जाल में उलझा वो भटका हुआ प्राणी है जो इस भ्रम में है कि वो जप-तप,त्याग से बाहरी एवं आंतरिक वासनाओं पर काबु पा लेगा और ईश्वर के सामने एक अच्छे विद्यार्थी होने का स्वांग भर लेगा......ऐसे में ईश्वर के पास सिर्फ़ मुस्कराने के अलावा और क्या चारा होगा।
भारतीय फ़िल्म इतिहास के सौ वर्ष पुरे होने जा रहे है और चित्रलेखा फ़िल्म का जिक्र ना हो तो शायद उस विषय के प्रति न्याय नहीं होगा जिसे निर्देशक केदार शर्मा ने सन १९४१ एवं १९६४ में चलचित्र पर उतारने का साहस किया। भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास चित्रलेखा पर फ़िल्म बनाना वाकई चुनौती पुर्ण कार्य था और कुछ हद तक वे सफ़ल भी हुए।ये फ़िल्म पाप-पुण्य,योगी-भोगी,ब्रम्हचर्य-वासना,प्रेम-समर्पण,त्याग-चेष्टा जैसे मुद्दो पर द्वंद पैदा करती आगे बढती जाती है।
चंद्रगुप्त मौर्य का दरबार लगा है जिसमें स्वयं राजा एवं सामंत बीजगुप्त(प्रदीप कुमार) राज नर्तकी का नृत्य देखने उपस्थित है।यदि राज दरबार में नृत्य प्रस्तुति होना है तो उसका संगीत भी उतना भावप्रवण और नृत्य भंगिमाए उच्चकोटी की होना तय है।काहे तरसाए जियरा.....राग कलावती में आशा भोंसले और ऊषामंगेशकर के गले की मुरकियों की कारीगरी और नृत्यांगनाओं के पैर की थिरकन सितार,तबले और पखावज कमाल का माहौल रचती है और ये ही लगता है काश की ये जियरा युंही तरसता रहे।राज नर्तकी चित्रलेखा(मीना कुमारी) पर सम्मोहित बीज गुप्त उसके प्रेमापाश में बंध जाते है और एक क्षत्रिय अपना राजधर्म एवं अपनी होने वाली पत्नि यशोधरा को भुलकर राज नर्तकी के साथ आमोद-प्रमोद में लीन हो जाता है।राजगुरु योगी कुमारगिरी अपने एक शिष्य श्वेतांक(मेहमुद) को सांसारिक जीवन के पापो का अध्ययन करने भेजते है लेकिन जिन आकर्षण से वो भागता है वो उन्हे उतने ही मजबुती से जकडते जाते है और वो उन्ही सांसारिक अवस्थाओं में खुद को पाता है।वहीं दुसरी और योगी ब्रम्हचारी कुमारगिरि चित्रलेखा को बीजगुप्त से पीछा छुडाने के लिए कडे शब्दॊं के साथ अपमान जनक भाषा में उसे पाप की जिंदगी से दुर जाने के लिए कहते है और ईश्वर की शरण में जाने के लिए कहते है यहां इन दोनो की बहस संवादो के रुप में सुनने लायक है-जिस तपस्या को धर्म समझ कर आप ईश्वर को खुश कर रहे है, तो मै अपने धर्म का पालन करने के लिए अपनी कला से दुनिया को खुश कर रही हुं यदि आप ये कहे कि मैं झुठ कह रही हो तो आप ज्ञानी  नहीं और यदि आप मानते है कि मैं सच हुं तो मेरा दोष नहीं।लता जी आवाज में उम्दा गाना संसार से भागे फ़िरते हो.....ये पाप हैं क्या, ये पुण्य हैं क्या, रीतों पर धर्म की मुहरे हैं हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे।चित्रलेखा अपना प्रेम,ऐशो-आराम सब कुछ त्याग कर कुमारगिरी की शरण में चली जाती है लेकिन ये क्या स्त्री को अंधकार,मोह,माया और वासना मानने वाले कुमारगिरी खुद ही चित्रलेखा के मोहपाश में ध्वस्त होगए,सारी योग-तप-तपस्या वासना के धधकते लावे के उपर बैठ कर बरसो बरस की और अब एक याचक की भांति चित्रलेखा से गिढगिढा रहे है,यही इस फ़िल्म का मजबुत भाग है जिसे जरुर देखना चाहिए,ये देखना चाहिए कि एक तपस्वी अपनी सांसारिक वासनाओं को पुरजोर दबाकर ये समझता है कि उसने अपनी इच्छाओं पर विजय पा ली है तो ये उसकी गंभीर भुल है योगी की अवस्स्था तो ये है कि वासनाओं की उपस्स्थिति में मन की अवस्था विचलित ना हो यानि जब हम घर का कचरा बाहर फ़ेंक रहे होते है तो ये एक सहज प्रक्रिया के तहत करते है ये  भाव नहीं रहता कि हम कचरा फ़ेंक रहे है और फ़िर उस पर चिंतन नहीं करते कि हमने वो कुढा फ़ेंक दिया है।जो फ़ेक दिया सो फ़ेंक दिया जो चिंतन करने लायक नहीं था।लेकिन आज के योगियों की स्थिति कुछ ऐसी ही है कि त्यागी रात दिन त्याग के बारे में सोचता रहता है और भीतर कचरा इकठ्ठा करता चला जाता है मन जब भी ईश्वर को याद करेगा पहले कचरे का ख्याल ही आएगा।इसीलिए  एक योगी के भोगी बनने की संभावनाएं सदा मौजुद रहती है जबकि एक भोगी को योगी बनने में ज्यादा समय नहीं लगता।इसिलिए चित्रलेखा मुनिराज से ज्यादा उपलब्ध मालुम पडती है जब वो कहती है कि स्त्री अगर अंधकार है तो आंखे चौंधियां क्यो जाती है। इस फ़िल्म को भोगी और योगी दोनो के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए.इस फ़िल्म में संगीतकार रोशन का बेजोड संगीत और साहिर सा. के उम्दा गीत ना होते तो ये फ़िल्म बेजान होकर रह जाती है.साहिर साहब ने अपनी तन्हा जिंदगी के लम्हो को इन गीतो में पीरो दिया लगता है और रोशन साहब ने संगीत की उन उंचाईयों को छुआ है जहां सुनने वाले बस नीचे उतरना ही नहीं चाहेंगे.मन रे तु काहे ना धीर धरे...............
विशेष: यदि साहिर सा.के गीतो के साथ रोशन साहब संगीत सुन लिया तो समझिए एक दिन की इबादत मुकम्मल हुयी। 
फ़िल्म:चित्रलेखा(1964 )
निर्माता:ए.के.नडियादवला
निर्देशक:केदार शर्मा
लेखक एवं संवाद:केदार शर्मा
मु्ल उपन्यास:भगवतीचरण वर्मा
संगीत: रोशन
गीतकार: साहिर लुधियानवी
गीत:
1. ऐ री जाने ना दुंगी-लतामंगेशकर(राग कमोद)   
2  छा गया बादल नील गगन पर-मो.रफ़ी,आशा भॊंसले   
3  काहे तरसाये जियरा-आशा भॊंसले,उषा मंगेशकर(राग कलावती)
4  मन रे तु काहे ना धीर धरे-मो.रफ़ी((राग कल्यान,यमन)       
5  संसार से भागे फ़िरते हो-लतामंगेशकर(राग कल्यान,यमन)   
6  सखी रे मेरा मन उलझे-लतामंगेशकर   
7  मारा गया ब्रम्हचारी-मन्ना डे   

Sunday, April 7, 2013

देखी जमाने की यारी बिछडे सभी बारी बारी...

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रुपहला सफ़र: इस रविवार:कागज के फ़ूल
फ़िल्मी दुनिया में एक बात सबसे खराब ये है कि कुछ सफ़ल फ़िल्मकारो ने अपनी व्यवसायिक बेलेंस शीट में कुछ व्यक्तिगत एवं भावानात्मक रिश्तो को भी शामिल कर दिया परिणाम ये हुआ कि ना तो वे सफ़ल व्यवसायिक बन पाए ना ही निजी जिंदगी को संवार पाए भले ही वे योग्य एवं दक्ष फ़िल्मकार रहे हो।जब दौलत और शोहरत का नशा उतरता है तो शराब का नशा इन्हे  जिंदगी से दुर ले जाने का मन बना लेता है।  
"कागज के फ़ुल" फ़िल्म का जब भी जिक्र होगा सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही व्यक्ति का जिक्र होगा और वो है भारतीय फ़िल्म इतिहास के स्वर्णिम दौर के कलात्मक हस्ताक्षर वसंतकुमार शिवशंकर पादुकोण-"गुरुदत्त".सन 1944 से 1964 तक के फ़िल्मी सफ़र में गुरुदत्त ने इस तरह काम किया कि उन्हे अपनी अंर्तदृष्टि से सिनेमा रचने का हुनर मंद माना जाने लगा और उनके तकनिक सिनेमा को "गुरुदत्त का सिनेमा" पुकारा जाने लगा।बतौर निर्देशक उन्होने अपनी कलात्मक खुशबु बाजी,जाल,बाज,आर पार,मि.एण्ड मिसेस ५५,सैलाब,प्यासा तक फ़ैलायी लेकिन "कागज के फ़ुल" पर आकर समाप्त हो गई। फ़िल्मी पंडित फ़िल्म "कागज के फ़ुल" को गुरुदत्त की आत्मकथात्मक कृति मानते है। लेकिन दर्शको ने उस समय इस फ़िल्म को नकार दिया और बाक्स आफ़िस पर ये फ़िल्म ध्वस्त हो गई। फ़िल्म जगत में कई निर्देशको ने फ़िल्में अपने निजी गम,तन्हाई,प्रेम और अपने अंदर चल रहे तुफ़ान को एक चित्रकार की माफ़िक उसे अपने ही ब्रश से सफ़ेद सिनेमाई पर्दे पर उकेरने की कोशिश की लेकिन बहुत कम लोग सफ़ल हो सके कारण कि उन्होने अपनी नितांत एकाकी चित्रकारी को बेचने की कोशिश की जबकि खरीदार दर्शक तो खुद अपनी जमीनी हकीकत से मायुस तीन घंटे पर्दे पर सुखद स्वप्न में मनोरंजन तलाश रहा होता है।
फ़िल्म की शुरुआत कैमेरे का वाईड एंगल स्टुडियो को फ़ोकस करता है साथ ही एक बुजुर्ग स्टुडियों की सिढियां चढता हुआ बेक ग्राउंड में एस.डी.बर्मन की धुन वक्त ने किया क्या हसी सितम...चलता है,तब समझ आने लगता है कि फ़िल्म फ़्लेश बेक में जाने वाली है।सुरेश सिन्हा(गुरुदत्त)एक सफ़ल फ़िल्म डायरेक्टर है दौलत शौहरत कदम चुमती है लेकिन उतना ही असफ़ल अपनी निजी जिंदगी में है।सुरेश की पत्नि एक अमीर परिवार से है लेकिन उसे फ़िल्मी दुनिया के लोगो से नफ़रत है और सुरेश को अपनी बेटी पम्मी(बेबी नाज) से भी अलग कर देती है।बारिश की एक रात सुरेश की मुलाकात शांति(वहिदा रहमान) से होती है जहां वो उसे अपना रेन कोट बारिश से बचने के लिए दे देता है और ये ही रेन कोट सुरेश की जिंदगी में तुफ़ान की दस्तक ले कर आता है।शांति रेन कोट लौटाने स्टुडियों पहुंचती है और अचानक कैमरे के सामने आ जाती है।सुरेश को एक मासुम चेहरे की तलाश में फ़िल्म की नायिका मिल जाती है।शांति को लेकर सुरेश फ़िल्म बनाता है फ़िल्म सुपर हिट हो जाती है और शांति सुपर स्टार।फ़िल्मी पत्रिकाओं में सुरेश और शांति के संबधो के बारे में गासिप खबरे छपती है और स्कुल में पम्मी के दोस्त मजाक बनाते है।पम्मी शांति से मिलकर झगडा करती है और शांति फ़िल्म दुनिया और शहर छॊड कर जाने का फ़ैसला कर लेती है।निजी जिंदगी में अदालत भी बच्ची को सुरेश से अलग कर देती है।सुरेश की फ़िल्मे फ़्लाप होती जाती है दिलो दिमाग में शांति उथल पुथल मचा रही होती है प्यार का एक आसरा वो भी चला जाता है।धीरे धीरे सब कुछ बिक जाता है शराब सहारा बनकर खुद्दारी का आवरण ओढ लेती है देखी जमाने की यारी,बिछडे सभी बारी-बारी।ये फ़िल्म उदासी और मायुसी का ऐसा महौल रचती है कि एस.डी.बर्मन के मस्ती वाले गाने भी उससे उबार नही पाते।शांति लौट आती है इस आस में कि सुरेश की जिंदगी फ़िर से लाईट कैमरा एक्शन बोल सके लेकिन सुरेश की खुद्दारी और बेक ड्राप में ये कोरस गाना "रात भर मेहमा है बहारे यहां, रात गर ढल गयी फ़िर ये खुशियां कहा"आखिरी सीन में सुरेश(गुरुदत्त)खाली स्टुडियों में दाखिल होता है और अपने फ़िल्मी सुनहरे पलो को याद करता है और डायरेक्टर की कुर्सी पर अपनी अंतिम सांस लेता है। कुल मिलाकर ये फ़िल्म पुरे समय,उदासी,मायुसी,निराशा के तंग गलियारो से गुजरती जाती है और अंत भी खुद से हार का संदेश देती है।हालांकि तकनीकी रुप से देखा जाए तो ये काफ़ी उम्दा फ़िल्म कही जा सकती है।गुरुदत्त ने मेहबुब खान से मेहबुब स्टुडियों में एक दिवार में तोड्फ़ोड करवायी थी ताकि नेचुरल और स्पाट लाईट का बेहतरीन इफ़ेक्ट ले सके और वी.के. मुर्ती ने अपने कैमरे से ये सीन वाहिदा जी पर फ़िल्माया गया जो देखने लायक है।एक बात घोर आश्चर्य में डालती है और इस पर विचार भी होना चाहिए कि यदि ये गुरुदत्त की आत्मकथात्मक कृति है तो फ़िर गुरुदत्त जैसे व्यक्ति को इस कहानी का दुखद अंत असल जिंदगी में तो समझ आ ही जाना चाहिए था।कहते है  वहिदा जी के प्रेम में डुब गए थे गुरुदत्त और गीता दत्त(पत्नि)से इसी वजह से अलगाव हुआ जो 10 अक्टूबर 1964 तक जारी रहा जब उन्होने नशे की हालत में नींद की गोलियां ज्यादा खा ली थी और सिर्फ़ ३९ वर्ष की उम्र में पेक अप कह गए।कैफ़ी आजमी के शब्दों में"रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई,तुम जैसे गए वैसे भी जाता नहीं कोई"।
विशेष:कागज के फ़ुल को पहली सिनेमा स्कोप फ़िल्म होने का फ़क्र हासिल है।अस्सी के दशक में इस फ़िल्म को विश्व सिनेमा सुची में एक नायाब फ़िल्म की श्रेणी में रखा गया।फ़िल्म के अंत में बजी धुन को पंचम ने 1942 ए लव-स्टॊरी में कुछ ना कहो गाने में उपयोग किया।
फ़िल्म:कागज के फ़ुल (1959)
निर्माता एवं निर्देशक: गुरुदत्त
लेखक एवं संवाद: अबरार अल्वी
गीत: कैफ़ी आजमी
संगीत:एस.डी. बर्मन
सिनेमेटोग्राफ़ी-वी.के. मुर्ती
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड:
बेस्ट सिनेमेटोग्राफ़ी-वी.के. मुर्ती
बेस्ट आर्ट डायरेक्शन-एम.आर.आचरेकर
गीत:
1.देखी जमाने की यारी-मो.रफ़ी
2.वक्त ने किया क्या हसीन सितम-गीता दत्त  
3 सन सन वो चली हवा-मो.रफ़ी,आशा भॊंसले
4.हम तुम जिसे कहता है-मो.रफ़ी
5.एक दो तीन चार-गीता दत्त
6. उल्टे सीधे दांव लगाए-मो.रफ़ी,आशा भॊंसले


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