Sunday, April 7, 2013

देखी जमाने की यारी बिछडे सभी बारी बारी...

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रुपहला सफ़र: इस रविवार:कागज के फ़ूल
फ़िल्मी दुनिया में एक बात सबसे खराब ये है कि कुछ सफ़ल फ़िल्मकारो ने अपनी व्यवसायिक बेलेंस शीट में कुछ व्यक्तिगत एवं भावानात्मक रिश्तो को भी शामिल कर दिया परिणाम ये हुआ कि ना तो वे सफ़ल व्यवसायिक बन पाए ना ही निजी जिंदगी को संवार पाए भले ही वे योग्य एवं दक्ष फ़िल्मकार रहे हो।जब दौलत और शोहरत का नशा उतरता है तो शराब का नशा इन्हे  जिंदगी से दुर ले जाने का मन बना लेता है।  
"कागज के फ़ुल" फ़िल्म का जब भी जिक्र होगा सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही व्यक्ति का जिक्र होगा और वो है भारतीय फ़िल्म इतिहास के स्वर्णिम दौर के कलात्मक हस्ताक्षर वसंतकुमार शिवशंकर पादुकोण-"गुरुदत्त".सन 1944 से 1964 तक के फ़िल्मी सफ़र में गुरुदत्त ने इस तरह काम किया कि उन्हे अपनी अंर्तदृष्टि से सिनेमा रचने का हुनर मंद माना जाने लगा और उनके तकनिक सिनेमा को "गुरुदत्त का सिनेमा" पुकारा जाने लगा।बतौर निर्देशक उन्होने अपनी कलात्मक खुशबु बाजी,जाल,बाज,आर पार,मि.एण्ड मिसेस ५५,सैलाब,प्यासा तक फ़ैलायी लेकिन "कागज के फ़ुल" पर आकर समाप्त हो गई। फ़िल्मी पंडित फ़िल्म "कागज के फ़ुल" को गुरुदत्त की आत्मकथात्मक कृति मानते है। लेकिन दर्शको ने उस समय इस फ़िल्म को नकार दिया और बाक्स आफ़िस पर ये फ़िल्म ध्वस्त हो गई। फ़िल्म जगत में कई निर्देशको ने फ़िल्में अपने निजी गम,तन्हाई,प्रेम और अपने अंदर चल रहे तुफ़ान को एक चित्रकार की माफ़िक उसे अपने ही ब्रश से सफ़ेद सिनेमाई पर्दे पर उकेरने की कोशिश की लेकिन बहुत कम लोग सफ़ल हो सके कारण कि उन्होने अपनी नितांत एकाकी चित्रकारी को बेचने की कोशिश की जबकि खरीदार दर्शक तो खुद अपनी जमीनी हकीकत से मायुस तीन घंटे पर्दे पर सुखद स्वप्न में मनोरंजन तलाश रहा होता है।
फ़िल्म की शुरुआत कैमेरे का वाईड एंगल स्टुडियो को फ़ोकस करता है साथ ही एक बुजुर्ग स्टुडियों की सिढियां चढता हुआ बेक ग्राउंड में एस.डी.बर्मन की धुन वक्त ने किया क्या हसी सितम...चलता है,तब समझ आने लगता है कि फ़िल्म फ़्लेश बेक में जाने वाली है।सुरेश सिन्हा(गुरुदत्त)एक सफ़ल फ़िल्म डायरेक्टर है दौलत शौहरत कदम चुमती है लेकिन उतना ही असफ़ल अपनी निजी जिंदगी में है।सुरेश की पत्नि एक अमीर परिवार से है लेकिन उसे फ़िल्मी दुनिया के लोगो से नफ़रत है और सुरेश को अपनी बेटी पम्मी(बेबी नाज) से भी अलग कर देती है।बारिश की एक रात सुरेश की मुलाकात शांति(वहिदा रहमान) से होती है जहां वो उसे अपना रेन कोट बारिश से बचने के लिए दे देता है और ये ही रेन कोट सुरेश की जिंदगी में तुफ़ान की दस्तक ले कर आता है।शांति रेन कोट लौटाने स्टुडियों पहुंचती है और अचानक कैमरे के सामने आ जाती है।सुरेश को एक मासुम चेहरे की तलाश में फ़िल्म की नायिका मिल जाती है।शांति को लेकर सुरेश फ़िल्म बनाता है फ़िल्म सुपर हिट हो जाती है और शांति सुपर स्टार।फ़िल्मी पत्रिकाओं में सुरेश और शांति के संबधो के बारे में गासिप खबरे छपती है और स्कुल में पम्मी के दोस्त मजाक बनाते है।पम्मी शांति से मिलकर झगडा करती है और शांति फ़िल्म दुनिया और शहर छॊड कर जाने का फ़ैसला कर लेती है।निजी जिंदगी में अदालत भी बच्ची को सुरेश से अलग कर देती है।सुरेश की फ़िल्मे फ़्लाप होती जाती है दिलो दिमाग में शांति उथल पुथल मचा रही होती है प्यार का एक आसरा वो भी चला जाता है।धीरे धीरे सब कुछ बिक जाता है शराब सहारा बनकर खुद्दारी का आवरण ओढ लेती है देखी जमाने की यारी,बिछडे सभी बारी-बारी।ये फ़िल्म उदासी और मायुसी का ऐसा महौल रचती है कि एस.डी.बर्मन के मस्ती वाले गाने भी उससे उबार नही पाते।शांति लौट आती है इस आस में कि सुरेश की जिंदगी फ़िर से लाईट कैमरा एक्शन बोल सके लेकिन सुरेश की खुद्दारी और बेक ड्राप में ये कोरस गाना "रात भर मेहमा है बहारे यहां, रात गर ढल गयी फ़िर ये खुशियां कहा"आखिरी सीन में सुरेश(गुरुदत्त)खाली स्टुडियों में दाखिल होता है और अपने फ़िल्मी सुनहरे पलो को याद करता है और डायरेक्टर की कुर्सी पर अपनी अंतिम सांस लेता है। कुल मिलाकर ये फ़िल्म पुरे समय,उदासी,मायुसी,निराशा के तंग गलियारो से गुजरती जाती है और अंत भी खुद से हार का संदेश देती है।हालांकि तकनीकी रुप से देखा जाए तो ये काफ़ी उम्दा फ़िल्म कही जा सकती है।गुरुदत्त ने मेहबुब खान से मेहबुब स्टुडियों में एक दिवार में तोड्फ़ोड करवायी थी ताकि नेचुरल और स्पाट लाईट का बेहतरीन इफ़ेक्ट ले सके और वी.के. मुर्ती ने अपने कैमरे से ये सीन वाहिदा जी पर फ़िल्माया गया जो देखने लायक है।एक बात घोर आश्चर्य में डालती है और इस पर विचार भी होना चाहिए कि यदि ये गुरुदत्त की आत्मकथात्मक कृति है तो फ़िर गुरुदत्त जैसे व्यक्ति को इस कहानी का दुखद अंत असल जिंदगी में तो समझ आ ही जाना चाहिए था।कहते है  वहिदा जी के प्रेम में डुब गए थे गुरुदत्त और गीता दत्त(पत्नि)से इसी वजह से अलगाव हुआ जो 10 अक्टूबर 1964 तक जारी रहा जब उन्होने नशे की हालत में नींद की गोलियां ज्यादा खा ली थी और सिर्फ़ ३९ वर्ष की उम्र में पेक अप कह गए।कैफ़ी आजमी के शब्दों में"रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई,तुम जैसे गए वैसे भी जाता नहीं कोई"।
विशेष:कागज के फ़ुल को पहली सिनेमा स्कोप फ़िल्म होने का फ़क्र हासिल है।अस्सी के दशक में इस फ़िल्म को विश्व सिनेमा सुची में एक नायाब फ़िल्म की श्रेणी में रखा गया।फ़िल्म के अंत में बजी धुन को पंचम ने 1942 ए लव-स्टॊरी में कुछ ना कहो गाने में उपयोग किया।
फ़िल्म:कागज के फ़ुल (1959)
निर्माता एवं निर्देशक: गुरुदत्त
लेखक एवं संवाद: अबरार अल्वी
गीत: कैफ़ी आजमी
संगीत:एस.डी. बर्मन
सिनेमेटोग्राफ़ी-वी.के. मुर्ती
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड:
बेस्ट सिनेमेटोग्राफ़ी-वी.के. मुर्ती
बेस्ट आर्ट डायरेक्शन-एम.आर.आचरेकर
गीत:
1.देखी जमाने की यारी-मो.रफ़ी
2.वक्त ने किया क्या हसीन सितम-गीता दत्त  
3 सन सन वो चली हवा-मो.रफ़ी,आशा भॊंसले
4.हम तुम जिसे कहता है-मो.रफ़ी
5.एक दो तीन चार-गीता दत्त
6. उल्टे सीधे दांव लगाए-मो.रफ़ी,आशा भॊंसले


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