रुपहला सफ़र इस रविवार :"आंखे है पर दिखता नहीं": जागते रहोssss...sss
इंसान की चेतना पर सांसारिक परते इतनी गहरी चढ गयी है कि वह सिर्फ़ शारीरिक रुप से ही जागता है और सोता है।गहरी मुर्छा इस कदर छाई है कि आंखे है पर दिखता नहीं, आत्मा है पर संवेदना नहीं,आंख है पर आंसु नहीं,समृध्दि है पर सुख नहीं,बुध्दि है पर विवेक नहीं।बहुत कम ऐसे व्यवसायिक फ़िल्मकार होते है जो अपने नफ़ा नुकसान से परे उद्देश्य परक फ़िल्म बनाते है उनमें से राजकपुर का नाम बरबस याद आता है।
"सुबह होने के बाद दरवाजे खोलना चाहिए नहीं तो रोशनी कैसे आएगी"ऐसी प्रतिकात्मक बातो से भरी फ़िल्म "जागते रहो" जिसमें पात्र राजकपुर की मासुम आंखे दरवाजो में बंद समाज के लोगो का असली चेहरा उजागर करती है और ये फ़िल्म निर्देशकीय अनुभव का उत्कृष्ट उदाहरण है।
रात के अंधेरे में किस्मत का मारा फ़टॆहाल व्यक्ति(राजकपुर) अपनी बदनसीब किस्मत के साथ बंबई आ जाता है। उसे सिर्फ़ पानी की प्यास किन किन मुसीबतो से रुबरु कराती है।पहले रास्ते में उसे मिलता है आशिक मिजाज धनी शराबी मोतीलाल जिनकी आमद शैलेन्द्र के लिखे एक उम्दा गाने से होती है"जिंदगी ख्वाब है,ख्वाब में झुठ क्या और भला सच है क्या" मोतीलाल की आदाकारी को दाद देने का मन करता है। मोतीलाल प्यासे को शराब से प्यास बुझाने की सलाह देता है और जब तक ये प्यासा व्यक्ति आने वाली मुसिबतो से लडता है तब तक दर्शक भी पुरे समय अपने आपको प्यासा महसुस करता है।
पुरी फ़िल्म एक विशाल अपार्टमेंट में घुमती है जहां गलती से ये फ़टेहाल व्यक्ति पानी पीने चला जाता है और उसे चोर समझ लिया जाता है,जान बचाने के लिए ये एक फ़्लेट से दुसरे फ़्लेट छुपता फ़िरता है और बंद दरवाजो के पीछे के वो राज देखता है जहां सफ़ेदपोश व्यक्ति का अवैध शराब खाना है और उसकी बेटी का चोरी छुपे प्रदीप कुमार से रोमांस करना,फ़िर भाग कर उस फ़्लेट में जा छुपता है जहां पति घोडॊ की रेस में पैसा लगाने के लिए अपनी पत्नि के जेवरा चुराता मिलता है।एक के बाद एक लोगो के नकाब के पीछे की हकीकत खुलती जाती है। अंतत: वो जिस फ़्लेट में छुपता है वहां रामनारायण नाम का व्यक्ति नकली नोट बनाने का छापा खाना चलाता है ।इधर बिल्डिंग के लोग बदहवासे से चोर को फ़्लेट दर फ़्लेट ढुंढते है।जब मुसिबत सिर पर ही आ पडे तो भागने के बजाय उसका ड्ट कर मुकाबला कर लेना चाहिए और राजकपुर लठ्ठ लेकर भीड के सामने हो जाता है और जो कहता है "मैं कोई चोर नहीं मैं एक गरीब किसान का बेटा हूं नौकरी करने आपके शहर आया हुं,पानी की प्यास मुझे आपके यहां ले आई। असल चोर आपके घरॊ में कैद है-कोई औरतो की इज्जत आबरु का चोर तो कोई नकली नोट बनाने वाला चोर तो कॊई अवैध शराब वाला चोर तो कॊई अपनी पत्नि के जेवर चुराने वाल चोर,मुझ गंवार को यही शिक्षा दी कि बिना चोर बने कोई बडा आदमी नहीं बन सकता"।बात बहुत ही गहरी है अपने अवचेतन के चोर को छोड कर सब बाहर के चोर को ढुंढते है और ये इसलिए भी होता है कि हम अपनी आत्माओं को खुरचते तक नहीं।यही कारण है कि हमारी आत्माएं नि:स्तेज खोखले शरीर को
छोड कर दबे पांव कहीं अनंत की ओर निकल गई है।संपुर्ण फ़िल्म नायक नायिका विहिन होने के बावजुद पुरे समय बांधे रखती है।केन्द्रिय पात्र के रुप में राजकपुर ने बहुत कम संवाद बोले लेकिन अपनी अदाकारी से काफ़ी कुछ कह गए।
फ़िल्म के आखरी क्षण में नरगिस का एक उजली भोर के रुप में आना और गाना" जब उजियारा छाए,मन का अंधेरा जाए, किरणो की रानी गाए, जागो है मेरे मन मोहन प्यारे"और राजकपुर नरगिस के पवित्र हाथो से पानी पी कर अपनी प्यास को बुझाकर एक आशा की किरण लेकर विदा होता है।
ये फ़िल्म ये संदेश दे जाती है "जागते रहो वर्ना आने वाले समय ऐसा ना हो कि सवेरा देखने की भी कीमत चुकानी पडे।
विशेष: ये फ़िल्म राजकपुर और नरगिस की रुपहले पर्दे पर आखिरी फ़िल्म थी। भारतीय सिनेमा में सलील चौधरी ने कोरस सिंगिग को इसी फ़िल्म से स्थापित किया और ये फ़िल्म हिन्दी/बंगाली भाषा में भी बनी।
फ़िल्म: जागते रहो
वर्ष:1956
निर्माता: राजकपुर
निर्देशक: अमित मित्रा,सोम्बु मित्रा
लेखक :ख्वाजा अहमद अब्बास
संगीत:सलिल चौधरी
गीत:शैलेन्द्र,प्रेम धवन
गीत:
1 जिंदगी ख्वाब है,ख्वाब में झुठ क्या-मुकेश(गीत-शैलेन्द्र)
2 जब उजियारा छाए मन का अंधेरा जाए-लता मंगेशकर(गीत-शैलेन्द्र)
3 तेकी मे झुठ बोलिया-मो. रफ़ी,बलबीर(गीत-प्रेम धवन)
4 ठंडॆ ठंडे सावन की फ़ुहार-आशा भोंसले (गीत-शैलेन्द्र)
5 जागो मोहन प्यारे-लता मंगेशकर(गीत-शैलेन्द्र)
6 मैने जो ली अंगडाई-संध्या मुखर्जी,हरिधन(गीत-शैलेन्द्र)
अवार्ड:
अंर्तराष्ट्रीय फ़िल्म फ़ेस्टीवल चेकोस्लोवाकिया क्रिस्ट्ल ग्लोब ग्रांड प्रिक्स अवार्ड
चौथा नेशनल फ़िल्म अवार्ड
-योगेन्द्र व्यास
Monday, December 24, 2012
Sunday, December 16, 2012
रुपहला सफ़र -सीने में सुलगते है अरमान: तराना
सीने में सुलगते है अरमान: तराना
कुछ फ़िल्मों की ब्लाक बस्टर के तुफ़ान में कम चर्चा होती है। दिलीप कुमार जब एक्टिंग का अपना स्कुल रच रहे थे और उनकी तबियत में रोमांस का एक मीठा चक्करदार तुफ़ान उठने की तैयारी में था तब उनकी ये फ़िल्म "तराना" मधुबाला के साथ पर्दे पर उतरी। कहानी अल्हड प्रेम व उसे पाने की एक मदहोश भरी दास्तान है।बाद में इसी से मिलती जुलती कहानी को लेकर कई फ़िल्में भी बनी।
डा.मोतीलाल(दिलीप कुमार) जो कि लंदन से अपनी पढाई कर हवाई जहाज से लौट रहा होता है लेकिन हवाई जहाज में खराबी आ जाने की वजह से उसे आपात स्थिति में एक गांव में उतरना पडता है।धरती पर रहने वाले को ये नहीं पता कि आसमान आने वाली चीज उसकी जिंदगी में कयामत लाएगी या बहार। डा. मोतीलाल एक बीमार महिला के साथ एक अंधे व्यक्ति के यहां मेहमान बनकर रुकता है लेकिन उसे पता नहीं कि जिंदगी उसकी परिक्षा लेने वाली है और भिडंत तराना (मधुबाला) से होती है।तराना बेहद खुबसुरत लेकिन मुंहफ़ट गवंई लडकी है।मोतीलाल और तराना के बीच तीखी नोंक झोंक गुदगुदाने वाली है।उधर मोतीलाल के पिता दिवान(जीवन) उसके आने का रास्ता देखते है और उसकी शादी अपने दोस्त की बेटी से तय भी कर देते है।लेकिन प्यार की लौ जल चुकी थी मोतीलाल कुछ दिन और गांव में रुक जाता है और तराना के अंधे पिता का इलाज कर आंखे लौटा देता है।गांव वाले उनके रिश्ते को बदनामी लिबास पहना कर बदनाम कर देते है और तराना के पिता का रहना मुश्किल कर देते है इसी ग्लानि में वो अपने घर को आग लगाकर खुद भी मर जाता है। मोतीलाल ये समझता है कि तराना भी आग में जल चुकी है वो हताशा के भंवर में डुबने लगता है। लेकिन दिल की लगी कहां बुझने वाली है तराना किसी तरह शहर आती है और अपने प्यार को विरले अंदाज में पा लेती है।अनिल बिस्वास के संगीत निर्देशन में इस फ़िल्म में लता जी ने कुल नौ गाने गाए है जिन्हे सुनना तो अलौकिक अनुभव है ही साथ तलत महमुद के साथ सीने में सुलगते है अरमा..."को सुनना..बस...आह! सी निकल जाती है.....वो दिन याद आते जब चारपाई पर खुले में सिरहाने रेडियो पर गुंजती ये कशीश भरी आवाज और आसमान में टिमटिमाते तारे....
हांलाकि फ़िल्म की कहानी सन 1951 के लिहाज से काफ़ी रोमांटिक है और दिलीप कुमार और मधुबाला को अपने पुरे अस्तित्व के साथ अभिनय करते देखना काफ़ी सुखद अहसास देता है।यदि आज की तकनीक के साथ अगर इन कलाकारो को काम करने का मौका मिला होता तो शायद ही कोई कलाकार इनके तराशे हुए परिपक्व अभिनय की बराबरी में खडा हो पाता।दिलीप कुमार अपने भावो को अभिनय के द्वारा तह-दर-तह खोलते जाते है देखने वाला अपने को उन तहो में अपने आप को लिपटा महसुस कर धन्य होता रहता है।दिलीप कुमार ने सन चालीस से इन्ठानवें तक हर दशक में अपने अभिनय की अलग-अलग शिल्पकारी कर आने वाली पीढी के लिए जीता जागता स्कुल दे दिया है।भारतीय फ़िल्म इतिहास के १०० बरस के साथ दिलीप साहब की उम्र के सौ बरस देखने की शुभेच्छा उनके सभी प्रशंसको को है।
विशेष:ख्यात साहित्यकार श्री भगवती चरण वर्मा ने मो.युसुफ़ खान को दिलीप कुमार नाम दिया और सत्यजित राय ने उन्हे अल्टीमेट मेथड एक्टर का खिताब दिया।
फ़िल्म: तराना
वर्ष:1951
निर्माता: राम दरयानी
निर्देशक: के.एस. दरयानी
लेखक :के.एस. दरयानी
डायलाग एवं गीत: डी.एन.मधोक
संगीत:अनिल बिस्वास
गीत:
1 नैन मिले नैन हुए बावरे-लता मंगेशकर, तलत महमुद (गीत-प्रेम धवन)
2 बोल पपीहे बोल-लता मंगेशकर,संध्या मुखर्जी (गीत-प्रेम धवन)
3 मोहसे रुठ गए मोरा सांवरियां -लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
4 युं छुप छुप के मेरा आना-लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
5 बेईमान तोहरे नैनवा-लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
6 सीने में सुलगते है अरमान-लता मंगेशकर, तलत महमुद (गीत-प्रेम धवन)
7 वापस लेले ये जवानी-लता मंगेशकर(गीत-प्रेम धवन)
8 एक मैं हुं एक मेरी-तलत महमुद (गीत-डी.एन.मधोक)
9 वो दिन कहां गए बता-लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
-योगेन्द्र व्यास
कुछ फ़िल्मों की ब्लाक बस्टर के तुफ़ान में कम चर्चा होती है। दिलीप कुमार जब एक्टिंग का अपना स्कुल रच रहे थे और उनकी तबियत में रोमांस का एक मीठा चक्करदार तुफ़ान उठने की तैयारी में था तब उनकी ये फ़िल्म "तराना" मधुबाला के साथ पर्दे पर उतरी। कहानी अल्हड प्रेम व उसे पाने की एक मदहोश भरी दास्तान है।बाद में इसी से मिलती जुलती कहानी को लेकर कई फ़िल्में भी बनी।
डा.मोतीलाल(दिलीप कुमार) जो कि लंदन से अपनी पढाई कर हवाई जहाज से लौट रहा होता है लेकिन हवाई जहाज में खराबी आ जाने की वजह से उसे आपात स्थिति में एक गांव में उतरना पडता है।धरती पर रहने वाले को ये नहीं पता कि आसमान आने वाली चीज उसकी जिंदगी में कयामत लाएगी या बहार। डा. मोतीलाल एक बीमार महिला के साथ एक अंधे व्यक्ति के यहां मेहमान बनकर रुकता है लेकिन उसे पता नहीं कि जिंदगी उसकी परिक्षा लेने वाली है और भिडंत तराना (मधुबाला) से होती है।तराना बेहद खुबसुरत लेकिन मुंहफ़ट गवंई लडकी है।मोतीलाल और तराना के बीच तीखी नोंक झोंक गुदगुदाने वाली है।उधर मोतीलाल के पिता दिवान(जीवन) उसके आने का रास्ता देखते है और उसकी शादी अपने दोस्त की बेटी से तय भी कर देते है।लेकिन प्यार की लौ जल चुकी थी मोतीलाल कुछ दिन और गांव में रुक जाता है और तराना के अंधे पिता का इलाज कर आंखे लौटा देता है।गांव वाले उनके रिश्ते को बदनामी लिबास पहना कर बदनाम कर देते है और तराना के पिता का रहना मुश्किल कर देते है इसी ग्लानि में वो अपने घर को आग लगाकर खुद भी मर जाता है। मोतीलाल ये समझता है कि तराना भी आग में जल चुकी है वो हताशा के भंवर में डुबने लगता है। लेकिन दिल की लगी कहां बुझने वाली है तराना किसी तरह शहर आती है और अपने प्यार को विरले अंदाज में पा लेती है।अनिल बिस्वास के संगीत निर्देशन में इस फ़िल्म में लता जी ने कुल नौ गाने गाए है जिन्हे सुनना तो अलौकिक अनुभव है ही साथ तलत महमुद के साथ सीने में सुलगते है अरमा..."को सुनना..बस...आह! सी निकल जाती है.....वो दिन याद आते जब चारपाई पर खुले में सिरहाने रेडियो पर गुंजती ये कशीश भरी आवाज और आसमान में टिमटिमाते तारे....
हांलाकि फ़िल्म की कहानी सन 1951 के लिहाज से काफ़ी रोमांटिक है और दिलीप कुमार और मधुबाला को अपने पुरे अस्तित्व के साथ अभिनय करते देखना काफ़ी सुखद अहसास देता है।यदि आज की तकनीक के साथ अगर इन कलाकारो को काम करने का मौका मिला होता तो शायद ही कोई कलाकार इनके तराशे हुए परिपक्व अभिनय की बराबरी में खडा हो पाता।दिलीप कुमार अपने भावो को अभिनय के द्वारा तह-दर-तह खोलते जाते है देखने वाला अपने को उन तहो में अपने आप को लिपटा महसुस कर धन्य होता रहता है।दिलीप कुमार ने सन चालीस से इन्ठानवें तक हर दशक में अपने अभिनय की अलग-अलग शिल्पकारी कर आने वाली पीढी के लिए जीता जागता स्कुल दे दिया है।भारतीय फ़िल्म इतिहास के १०० बरस के साथ दिलीप साहब की उम्र के सौ बरस देखने की शुभेच्छा उनके सभी प्रशंसको को है।
विशेष:ख्यात साहित्यकार श्री भगवती चरण वर्मा ने मो.युसुफ़ खान को दिलीप कुमार नाम दिया और सत्यजित राय ने उन्हे अल्टीमेट मेथड एक्टर का खिताब दिया।
फ़िल्म: तराना
वर्ष:1951
निर्माता: राम दरयानी
निर्देशक: के.एस. दरयानी
लेखक :के.एस. दरयानी
डायलाग एवं गीत: डी.एन.मधोक
संगीत:अनिल बिस्वास
गीत:
1 नैन मिले नैन हुए बावरे-लता मंगेशकर, तलत महमुद (गीत-प्रेम धवन)
2 बोल पपीहे बोल-लता मंगेशकर,संध्या मुखर्जी (गीत-प्रेम धवन)
3 मोहसे रुठ गए मोरा सांवरियां -लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
4 युं छुप छुप के मेरा आना-लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
5 बेईमान तोहरे नैनवा-लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
6 सीने में सुलगते है अरमान-लता मंगेशकर, तलत महमुद (गीत-प्रेम धवन)
7 वापस लेले ये जवानी-लता मंगेशकर(गीत-प्रेम धवन)
8 एक मैं हुं एक मेरी-तलत महमुद (गीत-डी.एन.मधोक)
9 वो दिन कहां गए बता-लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
-योगेन्द्र व्यास
Sunday, December 9, 2012
रुपहला सफ़र:क्या हवा चली बाबु ऋतु बदली: परख
रुपहला सफ़र:क्या हवा चली बाबु ऋतु बदली: परख
हमारा प्रजातंत्र वो गरम तंदुर की मानिंद है जिसमें कई धुर्त लोग मजे से लोभ,प्रलोभन,झुठी सेवा,योजानाओं का पापड़ सेंकते है और फ़िर मजे से खुद ही सत्ता का मसाला लगा कर चखते रहते है।आजादी के बाद ये स्वाद उन्हे ऐसा मुंह चढ़ा कि कोशिश यही रहती है कि ये तंदुर ठंडा ना होने पाए।
इसे और सरल ढंग से समझे तो सन साठ के द्शक का एक गांव है और गांव तभी बनता है जब वहां बड़ी संख्या में गरीब,एक साहुकार,एक जमींदार,पैसे की नब्ज जानने वाला डॉक्टर,जात-पाती खुर्राट संत और सीधा-सरल स्कुल मास्टर हो। गांव में एक पोस्टमास्टर है जो कर्ज में डुबा हुआ आर्थिक रुप से कमजोर इंसान है जो अपनी बीमार पत्नि,एक जवान बेटी के साथ गुजर बसर करता है। जी हां आज हम बात कर रहे है बिमल राय और सलील चौधरी के उस चलचित्र "परख" की जिसकी रील आज बावन साल लम्बी हो चुकी है और इसका प्रोजेक्शन दायरा इतना बड़ा हो चुका है कि ये फ़िल्म हमें पुरे देश में रोजाना जस की तस नजर आती है।कुछ फ़िल्में इतिहास बन कर हमें ये बताती है कि अतित से वर्तमान तक हम कितने बदलें।
एक दिन गांव का पोस्टमेन (मोतीलाल) पोस्ट मास्टर निवारन(नासिर हुसैन) के नाम से एक लिफ़ाफ़ा देता है जिसमें पांच लाख रुपये के चेक के साथ पत्र होता है जिसमें यह लिखा होता है कि गांव के विकास के लिए ये पांच लाख रुपये उस व्यक्ति को दे दिए जाए जो सबसे ईमानदार एवं योग्य हो।हक्का बक्का पोस्टमास्टर इतनी बड़ी रकम का बोझ कैसे सम्हाले, चाहे तो वो ये रकम खुद ही रख ले बिमार पत्नि के इलाज के लिए या अपना कर्ज उतारने के लिए।लेकिन खुद्दार पोस्टमास्टर पत्र लेकर गांव के उन पांच बड़े लोगो के बीच जाता है जिन्हे वो ईमानदार समझता है और समझे भी क्यो ना जब इंसान खुद आर्थिक रुप से अक्षम और दबा हुआ हो वो प्रभुत्व वाले लोगो की ही शरण में जाता है। वो एक मिटिंग में साहुकार,जमींदार,डॉक्टर,मंदिर का संत और स्कुल मास्टर को पत्र पढ़ कर सुनाता है।जाहिर है स्कुल मास्टर को छोड़ कर सभी के जहन में पांच लाख रुपये का जादु सिर चढ़ कर बोलता है। अंतत: ये फ़ैसला होता है कि इसके लिए गांव में चुनाव कराएं जाए जो जितेगा वो ही पांच लाख रुपये का हकदार होगा।जहां उद्देश्य सेवा भाव ना होकर लक्ष्य सिर्फ़ पैसा प्राप्त करना हो वहां लालच फ़ेंक कर बस चुनाव जीतने का जुनुन पैदा हो जाता है। आज भी कई राजनितिक पार्टियां वही दांव पेंच इस्तेमाल कर रही है।गांव में जमींदार लगान माफ़ करने की घोषणा करता है तो डाक्टर मुफ़्त इलाज करना शुरु करता है,वही मंदिर का पुजारी ढोंग ढकोसलों से गांव वालो को फ़ुसलाने का काम करता है,साहुकार अपने दांवपेंच खेलता है और व्यंग्यत्मक लहजे में मन्ना डे की आवाज गुंजती है "क्या हवा चली बाबु ऋत बदली"।इसी बीच पोस्टमास्टर की बेटी (साधना) और स्कुल मास्टर के बीच प्यार की सुगबुगाहट बढ़ने लगती है और सलील दा का राग हंसध्वनि में ये गाना"ओ सजना बरखा बहार आई’ दरअसल ये गाना बांग्ला गीत "ना जेओ ना,राजोनो एखोनी बाकी"कीधुन पर तैयार हुआ लेकिन लता जी को छोड कर कोई भी इस गाने से संतुष्ट नहीं था।लताजी की तबियत खराब थी और सलील दा भी बेमन से रिकार्डिंग पर आए,पंन्द्रह मिनट में अंतरा लिखा और आर्केस्ट्रा को सरगम देकर गीत रिकार्ड किया।वो दिन है और आज का दिन है लता जी की आवाज में आज भी ये गाना रेडियो पर गुंजता है तो लगता है कविता की रुह आवाज में उतर आई हो। लता जी का एक और गाना"मेरे मन के दिये" जो कि साइलेंट रिदम पर है, कम सुना गया लेकिन इसे सुनना आपने आप में एक अदभुत अनुभव है। चुनाव में जमकर जुतम-पैर होती है,तब अंत में इस चेक को भेजने वाले जे.सी.राय गांव आते है सफ़ेद पोश लोगो का असली चेहरा सामने लाते है और गांव में सबके सामने योग्य व्यक्ति पोस्टमास्टर को पांच लाख रु की राशि सौंपतें है।बिमल राय चाहते तो इस फ़िल्म में जे.सी.राय कौन है सस्पेंस में रख सकते थे कि लेकिन उन्होने सोद्देश्य फ़िल्म बनाई और ये बताने का पुरजोर प्रयास किया कि प्रजातंत्र की चोपड़ में पासा मोहरे और खिलाडी कौन-कौन होते है।ये खेल आज भी वैसा ही चल रहा है लेकिन एक विस्तृत रुप में फ़ैल चुका है लेकिन हम यहां नहीं बताएंगे कि जे.सी.राय कौन है।यदि आपको बिमल राय,सलील चौधरी,लतामंगेशकर,शैलेन्द्र जैसे गुणी लोगो को एक जगह महसुस करना हो तो "परख" जरुर देखिए।
विशेष: परख फ़िल्म बिमल राय की उन सात फ़िल्मो में से एक है जिसमें उन्हे बेस्ट डायरेक्टर फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड प्राप्त हुआ।
फ़िल्म: परख
वर्ष: 5 अगस्त 1960
निर्माता: बिमल राय
निर्देशक: बिमल राय
लेखक एवं संगीत: सलील चौधरी
गीतकार एवं संवाद :शैलेन्द्र
अवार्ड:
फ़िल्म फ़ेयर आवार्ड-
बेस्ट डायरेक्टर-बिमल राय
बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर -मोतीलाल
बेस्ट साउंड-ज्योर्ज डिक्रुज
गीत:
1. ओ सजना बरखा बहार आई -लता मंगेशकर
2. मिला है किसी का झुमका-लता मंगेशकर
3. ये बंसी क्यु गाये-लता मंगेशकर
4. मेरे मन के दिये-लता मंगेशकर
5. क्या हवा चली बाबु ऋत बदली-मन्ना डे
-योगेन्द्र व्यास
इसे और सरल ढंग से समझे तो सन साठ के द्शक का एक गांव है और गांव तभी बनता है जब वहां बड़ी संख्या में गरीब,एक साहुकार,एक जमींदार,पैसे की नब्ज जानने वाला डॉक्टर,जात-पाती खुर्राट संत और सीधा-सरल स्कुल मास्टर हो। गांव में एक पोस्टमास्टर है जो कर्ज में डुबा हुआ आर्थिक रुप से कमजोर इंसान है जो अपनी बीमार पत्नि,एक जवान बेटी के साथ गुजर बसर करता है। जी हां आज हम बात कर रहे है बिमल राय और सलील चौधरी के उस चलचित्र "परख" की जिसकी रील आज बावन साल लम्बी हो चुकी है और इसका प्रोजेक्शन दायरा इतना बड़ा हो चुका है कि ये फ़िल्म हमें पुरे देश में रोजाना जस की तस नजर आती है।कुछ फ़िल्में इतिहास बन कर हमें ये बताती है कि अतित से वर्तमान तक हम कितने बदलें।
एक दिन गांव का पोस्टमेन (मोतीलाल) पोस्ट मास्टर निवारन(नासिर हुसैन) के नाम से एक लिफ़ाफ़ा देता है जिसमें पांच लाख रुपये के चेक के साथ पत्र होता है जिसमें यह लिखा होता है कि गांव के विकास के लिए ये पांच लाख रुपये उस व्यक्ति को दे दिए जाए जो सबसे ईमानदार एवं योग्य हो।हक्का बक्का पोस्टमास्टर इतनी बड़ी रकम का बोझ कैसे सम्हाले, चाहे तो वो ये रकम खुद ही रख ले बिमार पत्नि के इलाज के लिए या अपना कर्ज उतारने के लिए।लेकिन खुद्दार पोस्टमास्टर पत्र लेकर गांव के उन पांच बड़े लोगो के बीच जाता है जिन्हे वो ईमानदार समझता है और समझे भी क्यो ना जब इंसान खुद आर्थिक रुप से अक्षम और दबा हुआ हो वो प्रभुत्व वाले लोगो की ही शरण में जाता है। वो एक मिटिंग में साहुकार,जमींदार,डॉक्टर,मंदिर का संत और स्कुल मास्टर को पत्र पढ़ कर सुनाता है।जाहिर है स्कुल मास्टर को छोड़ कर सभी के जहन में पांच लाख रुपये का जादु सिर चढ़ कर बोलता है। अंतत: ये फ़ैसला होता है कि इसके लिए गांव में चुनाव कराएं जाए जो जितेगा वो ही पांच लाख रुपये का हकदार होगा।जहां उद्देश्य सेवा भाव ना होकर लक्ष्य सिर्फ़ पैसा प्राप्त करना हो वहां लालच फ़ेंक कर बस चुनाव जीतने का जुनुन पैदा हो जाता है। आज भी कई राजनितिक पार्टियां वही दांव पेंच इस्तेमाल कर रही है।गांव में जमींदार लगान माफ़ करने की घोषणा करता है तो डाक्टर मुफ़्त इलाज करना शुरु करता है,वही मंदिर का पुजारी ढोंग ढकोसलों से गांव वालो को फ़ुसलाने का काम करता है,साहुकार अपने दांवपेंच खेलता है और व्यंग्यत्मक लहजे में मन्ना डे की आवाज गुंजती है "क्या हवा चली बाबु ऋत बदली"।इसी बीच पोस्टमास्टर की बेटी (साधना) और स्कुल मास्टर के बीच प्यार की सुगबुगाहट बढ़ने लगती है और सलील दा का राग हंसध्वनि में ये गाना"ओ सजना बरखा बहार आई’ दरअसल ये गाना बांग्ला गीत "ना जेओ ना,राजोनो एखोनी बाकी"कीधुन पर तैयार हुआ लेकिन लता जी को छोड कर कोई भी इस गाने से संतुष्ट नहीं था।लताजी की तबियत खराब थी और सलील दा भी बेमन से रिकार्डिंग पर आए,पंन्द्रह मिनट में अंतरा लिखा और आर्केस्ट्रा को सरगम देकर गीत रिकार्ड किया।वो दिन है और आज का दिन है लता जी की आवाज में आज भी ये गाना रेडियो पर गुंजता है तो लगता है कविता की रुह आवाज में उतर आई हो। लता जी का एक और गाना"मेरे मन के दिये" जो कि साइलेंट रिदम पर है, कम सुना गया लेकिन इसे सुनना आपने आप में एक अदभुत अनुभव है। चुनाव में जमकर जुतम-पैर होती है,तब अंत में इस चेक को भेजने वाले जे.सी.राय गांव आते है सफ़ेद पोश लोगो का असली चेहरा सामने लाते है और गांव में सबके सामने योग्य व्यक्ति पोस्टमास्टर को पांच लाख रु की राशि सौंपतें है।बिमल राय चाहते तो इस फ़िल्म में जे.सी.राय कौन है सस्पेंस में रख सकते थे कि लेकिन उन्होने सोद्देश्य फ़िल्म बनाई और ये बताने का पुरजोर प्रयास किया कि प्रजातंत्र की चोपड़ में पासा मोहरे और खिलाडी कौन-कौन होते है।ये खेल आज भी वैसा ही चल रहा है लेकिन एक विस्तृत रुप में फ़ैल चुका है लेकिन हम यहां नहीं बताएंगे कि जे.सी.राय कौन है।यदि आपको बिमल राय,सलील चौधरी,लतामंगेशकर,शैलेन्द्र जैसे गुणी लोगो को एक जगह महसुस करना हो तो "परख" जरुर देखिए।
विशेष: परख फ़िल्म बिमल राय की उन सात फ़िल्मो में से एक है जिसमें उन्हे बेस्ट डायरेक्टर फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड प्राप्त हुआ।
फ़िल्म: परख
वर्ष: 5 अगस्त 1960
निर्माता: बिमल राय
निर्देशक: बिमल राय
लेखक एवं संगीत: सलील चौधरी
गीतकार एवं संवाद :शैलेन्द्र
अवार्ड:
फ़िल्म फ़ेयर आवार्ड-
बेस्ट डायरेक्टर-बिमल राय
बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर -मोतीलाल
बेस्ट साउंड-ज्योर्ज डिक्रुज
गीत:
1. ओ सजना बरखा बहार आई -लता मंगेशकर
2. मिला है किसी का झुमका-लता मंगेशकर
3. ये बंसी क्यु गाये-लता मंगेशकर
4. मेरे मन के दिये-लता मंगेशकर
5. क्या हवा चली बाबु ऋत बदली-मन्ना डे
-योगेन्द्र व्यास
Saturday, December 1, 2012
रुपहला सफ़र :दिल से निकलने वाले रस्ते का शुक्रिया
दिल से निकलने वाले रस्ते का शुक्रिया
http://www.epaperdainikdabangdunia.com/Details.aspx?id=3842&boxid=174620125
ये बेसबरी उम्र कब फ़िसल कर सोलवें बरस में पहुंच जाती है और सोलवें बरस में पहुंचने पर प्यार का एहसास तो ऐसा कि कब ओंस की बुंद पत्ते से फ़िसलकर दुब में समा जाए और ऐसे नाजुक समय यदि कोई इस दुब को छिल दे तो- उस सोलह बरस के यौवन का डंक लता की आवाज में ऐसा घुलता है कि- ये तपीश भरी आवाज जहां से भी गुजरती है एक स्तब्धता सा माहौल खींच देती है...."जब वो ये कहती है कि- जिसने हमें मिलाया-जिसने जुदा किया उस वक्त, उस घडी,उस गजर को सलाम..." जिस प्यार के महीन धागे खींच दिए गये हो फ़िर भी वो प्यार जीवन,समाज के प्रति कृतज्ञता अर्पित कर भौचक कर दे ऐसे कलम कार आनंद बक्क्षी सा.को सलाम।
ये फ़िल्म सपना (रतिअग्निहोत्री) उत्तर भारतीय और वासु(कमल हासन) दक्षिण भारतीय नवयुगल के प्यार की दास्तान है। उनके जीवन में प्यार जात-पात को धता बताता हुआ तेजी से दस्तक देता उनके दिलो दिमाग को जकड लेता है।दोनो के पारंपरिक परिवार इनके प्यार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं। इसी बीच दोनो की उच्छृंखलता दोनो परिवारो की कटुता को और बढा देती है।दोनो के परिवार उनके प्यार को वासना का नाम देकर उन्हे एक साल के लिए कडी शर्तो के बीच अलग-अलग रहने के लिए राजी कर लेते है,अगर इस एक साल के बाद भी अगर दोनो का एक दुसरे के लिए प्यार बना रहता है तब वे शादी कर सकते है।प्यार जितना तपता है उतना ही निखरता भी है।वे शिद्दत से एक साल का इंतजार करते है लेकिन दोनो के बीच पैदा की गयी गलतफ़हमी अंत में दोनो की जान ले लेती है।
एक दुजे के लिए फ़िल्म उस समय आई जब समाज बदलाव की नई करवट ले रहा था और तब नवयुगलों ने घर की चौखटो को पार कर खुले दालानों में कुदने का साहस पैदा कर लिया था। लेकिन फ़िल्मे केवल दृष्टि देती है दिशा नहीं तो ऐसे में कई युगल इस दृष्टि भ्रम का शिकार हो कर फ़िल्म और वास्तविकता के अंतर को समझ नहीं पाते और अनुपयुक्त कदम उठा लेते है।फ़िल्म के आखिर में एक संदेश जिसे बिल्कुल उचित नहीं कहा जा सकता जिसमें कहा गया है कि "प्यार में जो हार जाते है वे एक दुजे के लिए जान देकर सदा के लिए अमर हो जाते है"हांलाकि ये फ़िल्मकार की स्वतंत्रता है लेकिन सच्चा प्यार तो वो ही है जो जीने की बात करता है।प्यार में कोशिश ये ही होनी चाहिए कि ये होश पुर्वक हो,आत्मनिर्भरता हो,एक दुसरे का सम्मान हो और परिवार एवं समाज भी अपनी वैश्विक सोच रखे।यदि आशावादी दृष्टीकोण से देखे तो आने वाला समय सत्तर के द्शक और उसके बाद की पीढी का आ रहा है जिसकी खुली सोच ना सिर्फ़ धर्म और जाति के समीकरण को नेस्तानाबुत करेगी बल्कि आनरकिलिंग जैसे घृणित कार्यो से हमेशा के लिए निजात भी पा लेगी।
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी ने अपने सभी गानो में अपने साजो को भावनाओं के ज्वर में लता जी की करुण तान के साथ बहुत बडा संबल बना कर छोड दिया है....साज क्या बजते है मानो वे अपनी थाप और तानो पर झर-झर आंसु बन कर ऊछल रहे हो..... और सुनने वाले को ये कहते है कि वापिस जाओ अपने उस सोलहवें बरस में जहां तुम कुछ टपकती बुंदो को प्यासा छोड आए थे.केवल कुछ समय ले लिए सोलहवां बरस फ़िर अपने जिस्म पर चिपका लिजिए तय है बाहर आने का मन नहीं करेगा....."घुंघट को छोड के जो सर से सरक गयी...ऐसी निगोडी धानी चुनर को सलाम....."ये फ़िल्म कमलहासन रतिअग्निहोत्री के दमदार अभिनय, के.बालचंदर की कसी हुई स्क्रिप्ट, उम्दा संगीत,लता जी और एस.पी.बाल सुब्रमण्यम,अनुराधा पोंडवाल की आवाजॊ में हमेशा याद की जाएगी।
विशेष: जब लता जी प्रेम,दर्द,उल्लास-उमंग को गाती है तो निश्चय ही सप्त सुरो का अमृत घोल उनकी आत्मा से झर कर कंठ पर बैठी मां शारदे हमें आचमन करा रही होती है।
फ़िल्म: एक दुजे के लिए
वर्ष: 5 जुन 1981
निर्माता: एल.वी. प्रसाद
निर्देशक: के.बालचंदर
संगीत: लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल
गीतकार:आनंद बक्क्षी
अवार्ड:फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड में दस नामीनेशन प्राप्त हुए।
नेशनल फ़िल्म आवार्ड-
सर्वश्रेष्ट गायक-एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड-
सर्वश्रेष्ट गीतकार-आनंद बक्क्षी(तेरे मेरे बीच में)
सर्वश्रेष्ट संपादन-के.आर.किट्टो.
गीत:
1.तेरे मेरे बीच में- लता मंगेशकर,एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
2.हम तुम दोनो जब मिल जाएंगें- लता मंगेशकर,एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
3.मेरे जीवन साथी-एस.पी.बाल सुब्रमण्यम ,अनुराधा पोंडवाल
4.हम बने तुम बने -लता मंगेशकर,एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
5.सोलह बरस की बाली उमर-लता मंगेशकर.अनुप जलोटा
-योगेन्द्र व्यास
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ये बेसबरी उम्र कब फ़िसल कर सोलवें बरस में पहुंच जाती है और सोलवें बरस में पहुंचने पर प्यार का एहसास तो ऐसा कि कब ओंस की बुंद पत्ते से फ़िसलकर दुब में समा जाए और ऐसे नाजुक समय यदि कोई इस दुब को छिल दे तो- उस सोलह बरस के यौवन का डंक लता की आवाज में ऐसा घुलता है कि- ये तपीश भरी आवाज जहां से भी गुजरती है एक स्तब्धता सा माहौल खींच देती है...."जब वो ये कहती है कि- जिसने हमें मिलाया-जिसने जुदा किया उस वक्त, उस घडी,उस गजर को सलाम..." जिस प्यार के महीन धागे खींच दिए गये हो फ़िर भी वो प्यार जीवन,समाज के प्रति कृतज्ञता अर्पित कर भौचक कर दे ऐसे कलम कार आनंद बक्क्षी सा.को सलाम।
ये फ़िल्म सपना (रतिअग्निहोत्री) उत्तर भारतीय और वासु(कमल हासन) दक्षिण भारतीय नवयुगल के प्यार की दास्तान है। उनके जीवन में प्यार जात-पात को धता बताता हुआ तेजी से दस्तक देता उनके दिलो दिमाग को जकड लेता है।दोनो के पारंपरिक परिवार इनके प्यार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं। इसी बीच दोनो की उच्छृंखलता दोनो परिवारो की कटुता को और बढा देती है।दोनो के परिवार उनके प्यार को वासना का नाम देकर उन्हे एक साल के लिए कडी शर्तो के बीच अलग-अलग रहने के लिए राजी कर लेते है,अगर इस एक साल के बाद भी अगर दोनो का एक दुसरे के लिए प्यार बना रहता है तब वे शादी कर सकते है।प्यार जितना तपता है उतना ही निखरता भी है।वे शिद्दत से एक साल का इंतजार करते है लेकिन दोनो के बीच पैदा की गयी गलतफ़हमी अंत में दोनो की जान ले लेती है।
एक दुजे के लिए फ़िल्म उस समय आई जब समाज बदलाव की नई करवट ले रहा था और तब नवयुगलों ने घर की चौखटो को पार कर खुले दालानों में कुदने का साहस पैदा कर लिया था। लेकिन फ़िल्मे केवल दृष्टि देती है दिशा नहीं तो ऐसे में कई युगल इस दृष्टि भ्रम का शिकार हो कर फ़िल्म और वास्तविकता के अंतर को समझ नहीं पाते और अनुपयुक्त कदम उठा लेते है।फ़िल्म के आखिर में एक संदेश जिसे बिल्कुल उचित नहीं कहा जा सकता जिसमें कहा गया है कि "प्यार में जो हार जाते है वे एक दुजे के लिए जान देकर सदा के लिए अमर हो जाते है"हांलाकि ये फ़िल्मकार की स्वतंत्रता है लेकिन सच्चा प्यार तो वो ही है जो जीने की बात करता है।प्यार में कोशिश ये ही होनी चाहिए कि ये होश पुर्वक हो,आत्मनिर्भरता हो,एक दुसरे का सम्मान हो और परिवार एवं समाज भी अपनी वैश्विक सोच रखे।यदि आशावादी दृष्टीकोण से देखे तो आने वाला समय सत्तर के द्शक और उसके बाद की पीढी का आ रहा है जिसकी खुली सोच ना सिर्फ़ धर्म और जाति के समीकरण को नेस्तानाबुत करेगी बल्कि आनरकिलिंग जैसे घृणित कार्यो से हमेशा के लिए निजात भी पा लेगी।
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी ने अपने सभी गानो में अपने साजो को भावनाओं के ज्वर में लता जी की करुण तान के साथ बहुत बडा संबल बना कर छोड दिया है....साज क्या बजते है मानो वे अपनी थाप और तानो पर झर-झर आंसु बन कर ऊछल रहे हो..... और सुनने वाले को ये कहते है कि वापिस जाओ अपने उस सोलहवें बरस में जहां तुम कुछ टपकती बुंदो को प्यासा छोड आए थे.केवल कुछ समय ले लिए सोलहवां बरस फ़िर अपने जिस्म पर चिपका लिजिए तय है बाहर आने का मन नहीं करेगा....."घुंघट को छोड के जो सर से सरक गयी...ऐसी निगोडी धानी चुनर को सलाम....."ये फ़िल्म कमलहासन रतिअग्निहोत्री के दमदार अभिनय, के.बालचंदर की कसी हुई स्क्रिप्ट, उम्दा संगीत,लता जी और एस.पी.बाल सुब्रमण्यम,अनुराधा पोंडवाल की आवाजॊ में हमेशा याद की जाएगी।
विशेष: जब लता जी प्रेम,दर्द,उल्लास-उमंग को गाती है तो निश्चय ही सप्त सुरो का अमृत घोल उनकी आत्मा से झर कर कंठ पर बैठी मां शारदे हमें आचमन करा रही होती है।
फ़िल्म: एक दुजे के लिए
वर्ष: 5 जुन 1981
निर्माता: एल.वी. प्रसाद
निर्देशक: के.बालचंदर
संगीत: लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल
गीतकार:आनंद बक्क्षी
अवार्ड:फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड में दस नामीनेशन प्राप्त हुए।
नेशनल फ़िल्म आवार्ड-
सर्वश्रेष्ट गायक-एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड-
सर्वश्रेष्ट गीतकार-आनंद बक्क्षी(तेरे मेरे बीच में)
सर्वश्रेष्ट संपादन-के.आर.किट्टो.
गीत:
1.तेरे मेरे बीच में- लता मंगेशकर,एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
2.हम तुम दोनो जब मिल जाएंगें- लता मंगेशकर,एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
3.मेरे जीवन साथी-एस.पी.बाल सुब्रमण्यम ,अनुराधा पोंडवाल
4.हम बने तुम बने -लता मंगेशकर,एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
5.सोलह बरस की बाली उमर-लता मंगेशकर.अनुप जलोटा
-योगेन्द्र व्यास
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