सीने में सुलगते है अरमान: तराना
कुछ फ़िल्मों की ब्लाक बस्टर के तुफ़ान में कम चर्चा होती है। दिलीप कुमार जब एक्टिंग का अपना स्कुल रच रहे थे और उनकी तबियत में रोमांस का एक मीठा चक्करदार तुफ़ान उठने की तैयारी में था तब उनकी ये फ़िल्म "तराना" मधुबाला के साथ पर्दे पर उतरी। कहानी अल्हड प्रेम व उसे पाने की एक मदहोश भरी दास्तान है।बाद में इसी से मिलती जुलती कहानी को लेकर कई फ़िल्में भी बनी।
डा.मोतीलाल(दिलीप कुमार) जो कि लंदन से अपनी पढाई कर हवाई जहाज से लौट रहा होता है लेकिन हवाई जहाज में खराबी आ जाने की वजह से उसे आपात स्थिति में एक गांव में उतरना पडता है।धरती पर रहने वाले को ये नहीं पता कि आसमान आने वाली चीज उसकी जिंदगी में कयामत लाएगी या बहार। डा. मोतीलाल एक बीमार महिला के साथ एक अंधे व्यक्ति के यहां मेहमान बनकर रुकता है लेकिन उसे पता नहीं कि जिंदगी उसकी परिक्षा लेने वाली है और भिडंत तराना (मधुबाला) से होती है।तराना बेहद खुबसुरत लेकिन मुंहफ़ट गवंई लडकी है।मोतीलाल और तराना के बीच तीखी नोंक झोंक गुदगुदाने वाली है।उधर मोतीलाल के पिता दिवान(जीवन) उसके आने का रास्ता देखते है और उसकी शादी अपने दोस्त की बेटी से तय भी कर देते है।लेकिन प्यार की लौ जल चुकी थी मोतीलाल कुछ दिन और गांव में रुक जाता है और तराना के अंधे पिता का इलाज कर आंखे लौटा देता है।गांव वाले उनके रिश्ते को बदनामी लिबास पहना कर बदनाम कर देते है और तराना के पिता का रहना मुश्किल कर देते है इसी ग्लानि में वो अपने घर को आग लगाकर खुद भी मर जाता है। मोतीलाल ये समझता है कि तराना भी आग में जल चुकी है वो हताशा के भंवर में डुबने लगता है। लेकिन दिल की लगी कहां बुझने वाली है तराना किसी तरह शहर आती है और अपने प्यार को विरले अंदाज में पा लेती है।अनिल बिस्वास के संगीत निर्देशन में इस फ़िल्म में लता जी ने कुल नौ गाने गाए है जिन्हे सुनना तो अलौकिक अनुभव है ही साथ तलत महमुद के साथ सीने में सुलगते है अरमा..."को सुनना..बस...आह! सी निकल जाती है.....वो दिन याद आते जब चारपाई पर खुले में सिरहाने रेडियो पर गुंजती ये कशीश भरी आवाज और आसमान में टिमटिमाते तारे....
हांलाकि फ़िल्म की कहानी सन 1951 के लिहाज से काफ़ी रोमांटिक है और दिलीप कुमार और मधुबाला को अपने पुरे अस्तित्व के साथ अभिनय करते देखना काफ़ी सुखद अहसास देता है।यदि आज की तकनीक के साथ अगर इन कलाकारो को काम करने का मौका मिला होता तो शायद ही कोई कलाकार इनके तराशे हुए परिपक्व अभिनय की बराबरी में खडा हो पाता।दिलीप कुमार अपने भावो को अभिनय के द्वारा तह-दर-तह खोलते जाते है देखने वाला अपने को उन तहो में अपने आप को लिपटा महसुस कर धन्य होता रहता है।दिलीप कुमार ने सन चालीस से इन्ठानवें तक हर दशक में अपने अभिनय की अलग-अलग शिल्पकारी कर आने वाली पीढी के लिए जीता जागता स्कुल दे दिया है।भारतीय फ़िल्म इतिहास के १०० बरस के साथ दिलीप साहब की उम्र के सौ बरस देखने की शुभेच्छा उनके सभी प्रशंसको को है।
विशेष:ख्यात साहित्यकार श्री भगवती चरण वर्मा ने मो.युसुफ़ खान को दिलीप कुमार नाम दिया और सत्यजित राय ने उन्हे अल्टीमेट मेथड एक्टर का खिताब दिया।
फ़िल्म: तराना
वर्ष:1951
निर्माता: राम दरयानी
निर्देशक: के.एस. दरयानी
लेखक :के.एस. दरयानी
डायलाग एवं गीत: डी.एन.मधोक
संगीत:अनिल बिस्वास
गीत:
1 नैन मिले नैन हुए बावरे-लता मंगेशकर, तलत महमुद (गीत-प्रेम धवन)
2 बोल पपीहे बोल-लता मंगेशकर,संध्या मुखर्जी (गीत-प्रेम धवन)
3 मोहसे रुठ गए मोरा सांवरियां -लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
4 युं छुप छुप के मेरा आना-लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
5 बेईमान तोहरे नैनवा-लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
6 सीने में सुलगते है अरमान-लता मंगेशकर, तलत महमुद (गीत-प्रेम धवन)
7 वापस लेले ये जवानी-लता मंगेशकर(गीत-प्रेम धवन)
8 एक मैं हुं एक मेरी-तलत महमुद (गीत-डी.एन.मधोक)
9 वो दिन कहां गए बता-लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
-योगेन्द्र व्यास
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