दिल से निकलने वाले रस्ते का शुक्रिया
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ये बेसबरी उम्र कब फ़िसल कर सोलवें बरस में पहुंच जाती है और सोलवें बरस में पहुंचने पर प्यार का एहसास तो ऐसा कि कब ओंस की बुंद पत्ते से फ़िसलकर दुब में समा जाए और ऐसे नाजुक समय यदि कोई इस दुब को छिल दे तो- उस सोलह बरस के यौवन का डंक लता की आवाज में ऐसा घुलता है कि- ये तपीश भरी आवाज जहां से भी गुजरती है एक स्तब्धता सा माहौल खींच देती है...."जब वो ये कहती है कि- जिसने हमें मिलाया-जिसने जुदा किया उस वक्त, उस घडी,उस गजर को सलाम..." जिस प्यार के महीन धागे खींच दिए गये हो फ़िर भी वो प्यार जीवन,समाज के प्रति कृतज्ञता अर्पित कर भौचक कर दे ऐसे कलम कार आनंद बक्क्षी सा.को सलाम।
ये फ़िल्म सपना (रतिअग्निहोत्री) उत्तर भारतीय और वासु(कमल हासन) दक्षिण भारतीय नवयुगल के प्यार की दास्तान है। उनके जीवन में प्यार जात-पात को धता बताता हुआ तेजी से दस्तक देता उनके दिलो दिमाग को जकड लेता है।दोनो के पारंपरिक परिवार इनके प्यार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं। इसी बीच दोनो की उच्छृंखलता दोनो परिवारो की कटुता को और बढा देती है।दोनो के परिवार उनके प्यार को वासना का नाम देकर उन्हे एक साल के लिए कडी शर्तो के बीच अलग-अलग रहने के लिए राजी कर लेते है,अगर इस एक साल के बाद भी अगर दोनो का एक दुसरे के लिए प्यार बना रहता है तब वे शादी कर सकते है।प्यार जितना तपता है उतना ही निखरता भी है।वे शिद्दत से एक साल का इंतजार करते है लेकिन दोनो के बीच पैदा की गयी गलतफ़हमी अंत में दोनो की जान ले लेती है।
एक दुजे के लिए फ़िल्म उस समय आई जब समाज बदलाव की नई करवट ले रहा था और तब नवयुगलों ने घर की चौखटो को पार कर खुले दालानों में कुदने का साहस पैदा कर लिया था। लेकिन फ़िल्मे केवल दृष्टि देती है दिशा नहीं तो ऐसे में कई युगल इस दृष्टि भ्रम का शिकार हो कर फ़िल्म और वास्तविकता के अंतर को समझ नहीं पाते और अनुपयुक्त कदम उठा लेते है।फ़िल्म के आखिर में एक संदेश जिसे बिल्कुल उचित नहीं कहा जा सकता जिसमें कहा गया है कि "प्यार में जो हार जाते है वे एक दुजे के लिए जान देकर सदा के लिए अमर हो जाते है"हांलाकि ये फ़िल्मकार की स्वतंत्रता है लेकिन सच्चा प्यार तो वो ही है जो जीने की बात करता है।प्यार में कोशिश ये ही होनी चाहिए कि ये होश पुर्वक हो,आत्मनिर्भरता हो,एक दुसरे का सम्मान हो और परिवार एवं समाज भी अपनी वैश्विक सोच रखे।यदि आशावादी दृष्टीकोण से देखे तो आने वाला समय सत्तर के द्शक और उसके बाद की पीढी का आ रहा है जिसकी खुली सोच ना सिर्फ़ धर्म और जाति के समीकरण को नेस्तानाबुत करेगी बल्कि आनरकिलिंग जैसे घृणित कार्यो से हमेशा के लिए निजात भी पा लेगी।
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी ने अपने सभी गानो में अपने साजो को भावनाओं के ज्वर में लता जी की करुण तान के साथ बहुत बडा संबल बना कर छोड दिया है....साज क्या बजते है मानो वे अपनी थाप और तानो पर झर-झर आंसु बन कर ऊछल रहे हो..... और सुनने वाले को ये कहते है कि वापिस जाओ अपने उस सोलहवें बरस में जहां तुम कुछ टपकती बुंदो को प्यासा छोड आए थे.केवल कुछ समय ले लिए सोलहवां बरस फ़िर अपने जिस्म पर चिपका लिजिए तय है बाहर आने का मन नहीं करेगा....."घुंघट को छोड के जो सर से सरक गयी...ऐसी निगोडी धानी चुनर को सलाम....."ये फ़िल्म कमलहासन रतिअग्निहोत्री के दमदार अभिनय, के.बालचंदर की कसी हुई स्क्रिप्ट, उम्दा संगीत,लता जी और एस.पी.बाल सुब्रमण्यम,अनुराधा पोंडवाल की आवाजॊ में हमेशा याद की जाएगी।
विशेष: जब लता जी प्रेम,दर्द,उल्लास-उमंग को गाती है तो निश्चय ही सप्त सुरो का अमृत घोल उनकी आत्मा से झर कर कंठ पर बैठी मां शारदे हमें आचमन करा रही होती है।
फ़िल्म: एक दुजे के लिए
वर्ष: 5 जुन 1981
निर्माता: एल.वी. प्रसाद
निर्देशक: के.बालचंदर
संगीत: लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल
गीतकार:आनंद बक्क्षी
अवार्ड:फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड में दस नामीनेशन प्राप्त हुए।
नेशनल फ़िल्म आवार्ड-
सर्वश्रेष्ट गायक-एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड-
सर्वश्रेष्ट गीतकार-आनंद बक्क्षी(तेरे मेरे बीच में)
सर्वश्रेष्ट संपादन-के.आर.किट्टो.
गीत:
1.तेरे मेरे बीच में- लता मंगेशकर,एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
2.हम तुम दोनो जब मिल जाएंगें- लता मंगेशकर,एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
3.मेरे जीवन साथी-एस.पी.बाल सुब्रमण्यम ,अनुराधा पोंडवाल
4.हम बने तुम बने -लता मंगेशकर,एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
5.सोलह बरस की बाली उमर-लता मंगेशकर.अनुप जलोटा
-योगेन्द्र व्यास
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