Sunday, October 28, 2012

रुपहला सफ़र:जिंदगी आ रहा हुं मैं :मशाल
जीवन में यश तभी मिलता है जब कर्म को इस विश्वास के साथ करते है कि आपका काम आपकी धड़कनों में बार बार सुनाई दे  और ऐसे ही एक इंसान जो फ़िल्माकाश में यशस्वी बने जिन्हे आज दुनिया "यश चोपड़ा" के नाम से जानती है। ये सच नहीं है कि यश चोपड़ा ने केवल स्वीटजरलेंड की वादियों में ही रोमांटिक सिनेमा रचने का कारनामा किया बल्कि उन्होने ट्युलिप गार्डन से मुंबईया झोपड़ पट्टी की तंग गलियों तक में जाकर रियलिस्टिक सिनेमा को भी बखुबी प्रस्तुत किया।तथ्य ये है कि यश जी  हमेशा फ़िल्म की स्क्रिप्ट पर बहुत ही गहराई में जाकर उसे स्थापित करते है फ़िर अपनी निर्देशकीय कला से पुरी फ़िल्म को एक तस्वीर बना देते है।
ऐसी ही एक रियलिस्टक तस्वीर मशाल फ़िल्म के रुप में हम देखते है।जिसमें एक ईमानदार पत्रकार और झोपड़ पट्टी में पल रहे अपराधो की एक ईमानदार कोशिश हमें नजर आती है।
मुलत: ये फ़िल्म वसंत कानेटकर के मराठी नाटक "अश्रुंची झाली फ़ुले" पर आधारित है जिसे जावेद अख्तर ने कलम बध्द कर  स्क्रिन प्ले और संवाद लिखा और यश चोपड़ा जी अपने निर्देशन में बनाने के लिए तैयार हुए।संक्षेप में कहानी युं है कि एक कर्तव्यनिष्ट पत्रकार विनोद(दीलीप कुमार) जो कि निचली बस्ती में पल रहे अपराधों के बारे में रिपोर्ट तैयार करता है जिसमें शहर के सामाजिक रुतबे वाले जे.के.वरधान(अमरीशपुरी) की अपराधो में सक्रियता का उल्लेख करता है।लेकिन समाचार पत्र का मालिक उसे छापने से इंकार करता है और विनोद अपनी नौकर छोड कर  दृढ़ इरादे से अपनी पत्नि सुधा(वहीदा रहामान) के साथ संघर्ष एवं सच्चाई के रास्ते पर निकल पडता है।विनोद अपना खुद का न्युज पेपर निकालता है और जे.के.वरधान के काले कारनामो की पोल खोलता जाता है।वही बस्ती के राजा(अनिल कपुर) जो कि बस्ती का टपोरी और अपनी गैंग का लीडर भी है जिसे विनोद और पत्नि सुधा अपने प्रयासो सुधारते है आगे पढाई के लिए बाहर भेजते है।इधर जे.के. के प्रभाव से विनोद को बेघर कर दिया जाता है।यही वो सीन है जिसमें दिलीप कुमार बीच सड़क पर बदहवास होकर अपनी पत्नि को अस्पताल पहुंचाने के लिए गुहार लगाते है"...ए..ए...भाई....रोको गाड़ी  रोको"कोई नहीं सुनता और सुधा दम तोड़ देती है।यश चोपड़ा जी के अनुसार चार दिन लगे थे इस सीन को फ़िल्माने में।दिलीप साहब ने पुरी शिद्दत के साथ एक-एक भाव भंगिमा को इस तरह से प्रस्तुत किया कि ये सीन फ़िल्म इतिहास में याद किया जाता रहेगा।यही इस फ़िल्म का टर्निंग पाईंट है जहां विनोद जे.के. की तर्ज पर डॉन बनता है और राजा एक इमानदार पत्रकार बन कर लौटता है विनोद के आदर्शो पर चलता है लेकिन फ़िर विनोद और राजा में टकराव होता है।यदि ईमानदारी को बार कुचलने की कोशिश की जाए तो समझिए कि भ्रष्टाचार,बेईमानी का साम्राज्य काफ़ी उंचाई पर पहुंच चुका है। ये फ़िल्म आज के घटनाक्रमों का हुबहु फ़िल्मांकन है क्योकि हम भी तो दर्शक ही है जो जीवंत रुप में घट रहे घटनाक्रमों को पापकार्न के साथ मजे लेकर सिर्फ़ देख ही रहे है।
 यश जी ने पुरे समय फ़िल्म की पटकथा को संजीदा बनाए रखा।अपने पात्रो की कास्ट्युम लोकेशन में कोई अतिरंजना नहीं,संगीत के लिए बहुत ज्यादा गुंजाईश नहीं होने के बावजुद ह्रदयनाथ मंगेशकर ने वो धुने दी की हर गाना आज भी सुना व गुनगुनाया जाता है। आज भी हर होली पर "होली आई होली आई देखो होली आई रे" गाना हर चौराहो पर गुंज उठता है।
पहले अनिल कपुर को दिया गया रोल कमल हसन को आफ़र किया गया था लेकिन उन्होने अपने रोल को दिलीप साहब के रोल से कमतर आंका फ़िर ये आफ़र अनिल कपुर की झोली में गया और उन्हे बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फ़िल्म फ़ेयर खिताब मिला।
जावेद अख्तर की सलीम खान से अलग होने के बाद उनकी स्वतंत्र लेखक के रुप ये पहली फ़िल्म थी जिसमें उन्होने दिलीप कुमार को "एन्ग्री ओल्ड मेन" के रुप में प्रस्तुत किया।
यश जी की फ़िल्मों में हर पात्र को एक अमरता प्राप्त होती थी चाहे वो छोटा हो बडा। आज यश जी सशरीर नहीं है लेकिन वे हर उस पात्र की तरह अमर है जो हर वक्त परदे पर जीवंत होता है। यश जी की मशाल देखे हो सकता है मशाल ही थाम लें आप।

विशेष:लता जी का गाया एक भावप्रवण गीत "ओम नम: शिवाय..." एक अदभुत अलौकिक कम्पोजिशन है लेकिन किन्ही वजहो से फ़िल्म में शामिल नहीं किया जा सका।
फ़िल्म : मशाल
वर्ष: 12 जनवरी 1984
निर्माता निर्देशक: यश चोपड़ा
लेखक एवं गीतकार: जावेद अख्तर
संगीत: ह्रदयनाथ मंगेशकर
अवार्ड:
फ़िल्म फ़ेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर -अनिल कपुर
गीत:
१.होली आई होली आई देखो....लता मंगेशकर,किशोर कुमार
२.मुझे तुम याद करना और मुझको याद आना तुम.....लता मंगेशकर,किशोर कुमार
३.फ़ुटपाथो के हम रहने वाले-सुरेश वाडेकर,शैलेन्द्र सिंह,अनुप जलोटा,हरीहरन
४.लिये सपने निगाहो में...किशोर कुमार
-योगेन्द्र व्यास

Sunday, October 21, 2012

रुपहला सफ़र: "सफ़ल होगी तेरी अराधना"

"सफ़ल होगी तेरी अराधना"
सफ़ल होगी तेरी.....आराधना
"दिया टुटे तो है माटी जले तो ये ज्योति बने,आंसु बहे तो है पानी,रुके तो ये मोती बने,ये मोटी आंखो की पुंजी है ये ना खोए...काहे को रोए...."
जिंदगी को ये नहीं मालुम की सुख क्या है और दु:ख क्या है ये तो इन आंखो का तर्जुबा है कि गम और खुशी की इबारत आंसुओं में घोलकर गालों पर लुढ्का देती है.सचिन देव बर्मन की खासियत ही ये है कि वे पात्रों के दुख में एक बडे बुजुर्ग वार की भुमिका निभाने के लिए तैयार हो जाते है और अपनी गहरी आवाज से वो संबल देते है कि सुनने वाला भी निराशा के बादलो से राहत महसुस करता है।
आपको याद होगा फ़िल्म गाईड में भी सचिन देव बर्मन हताश निराश राजु गाईड को अपनी आवाज से पार ले जाते है "वहां कौन है तेरा मुसाफ़िर....".
शक्ति सामंत का मुख्य ब्रांड है रोमांटिक म्युजिकल हिट फ़िल्म और "आराधना" इस माइने में भी खास है कि इस फ़िल्म से राजेश खन्ना को सुपर स्टार का खिताब मिलने की सुगबुगाहट तेज हुयी,किशोर कुमार के स्वर्णिम भविष्य की पौ फ़टी और बर्मन घराने की फ़ेहरिस्त में एक और उम्दा संगीत का खिताब जुड गया।
अपने पुरे यौवन से दार्जिलिंग की वादियों में भागती टाय ट्रेन और हार्मोनिका का प्रिल्युड किशोर दा की आवाज को उकसाता हुआ"मेरे सपनो की रानी कब आएगी तु..."  गुंजता है, और एकार्डियन,गिटार के रोमांटिक लोकोमेटिव इफ़ेक्ट के साथ जब अरुण(राजेशखन्ना) अपनी अदाओं से ट्रेन में बैठी हुयी वंदना(शर्मीला टैगोर) के दिल पर दस्तक देते हुए आने वाले प्यार के लम्हो की एक लम्बी पटरी बिछाते हुए साथ साथ गाते चलते है जिसे शायद उम्र के लम्बे फ़ासलो को तय करते जाना था।इसी गाने में बर्मन दा ने गिटारिस्ट के ठीक से नोट ना लगा पाने की वजह से इस गाने की रिकार्डिंग केंसल कर दी थी जबकि युनिट को शुटिंग के लिए दार्जिलिंग निकलना थ|पंचम ने नजाकत को भांपते हुए भानु गुप्ता के साथ एस.डी. के नोट पर तुरंत धुन तैयार की जिसका इफ़ेक्ट आज भी मधुर एहसास देता है।वंदना और एयरफ़ोर्स आफ़िसर अरुण की नजदीकियां परवान चढती है और यहां एस.डी. फ़िर एक धुन वादियो में बिखरा देते है-"कोरा कागज था मन मेरा"।पहले शक्ति सामंत को इस की धुन बिल्कुल पसंद नहीं थी लेकिन जब केरसी लार्ड ने इकोलेट मशीन से इको इफ़ेक्ट दिया तब वे संतुष्ट हुए।इधर तेज बारिश में वंदना-अरुण की टकराती हुयी सांसे आने वाले कल का पता दे रही थी।जलती आग को हवा देता एकार्डियन का जेस्चर पीस जैसे ही उठता है सेक्साफ़ोन उसी शिद्दत के साथ उसकी धुन से लिपट जाता है और किशोर को कहना पडता है-"रुप तेरा मस्ताना....." सच मानिए दो वाद्यो को रोमांस करते सुनना दिल धडकनों को थामना मुश्किल कर देता है।अरुण वंदना का दैहिक भाषा में बात करना वो भी उस वक्त जब ये सामाजिक मर्यादाओं के अनुरुप नहीं था लेकिन निर्देशक ने इसे फ़िल्माने का निश्चय किया और भारतीय सिनेमा में ये पहला प्रयोग था जिसमें कैमेरा को लगातार घुमाते हुए सिंगल शाट में ये गाना फ़िल्मांकन किया था और इस गाने को एफ़टीआईआई में स्टडी मटेरियल के तौर पर आज भी पढाया जाता है।ये ही नहीं किशोर कुमार को पहला फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड इसी गाने पर मिला।अरुण की अचानक मौत और वदंना की देह में पलता बच्चा,समाज के नियम में बंधी वंदना अपना बच्चा पास होते भी उसे अपना नहीं कह सकती,एक घटना में बच्चे की खतिर 14 साल की जेल और फ़िर 22 साल के हुबहु एयर फ़ोर्स पायलेट सुरज(राजेश खन्ना) खुद के बेटे के रुप में मुलाकात। एक पत्नि- मां, के त्याग,धैर्य,और नियति की कहानी अपने बॆटॆ से सुखद मिलन के रुप में समाप्त होती है और फ़िर आंखो का तर्जुबा कि खुशी के आंसु बह निकलते है। कहानी तो फ़िल्म में देखी जा सकती है लेकिन क्या ये मजेदार बात नहीं कि "रुप तेरा मस्ताना" का तिलस्म मनोहारी सिंग और केरसी लार्ड ने रचा था और चार घंटे में रिकार्डिंग कर वो धुन दे गए कि आज भी मन बिना बारिश के झुम उठता है।क्या ये मजेदार नहीं कि पंचम ने किशोर दा को "रुप तेरा मस्ताना" की धुन में तब्दीली के लिए बर्मन दादा से बात करने के लिए कहा था। क्या ये मजेदार बात नहीं कि सुभाष घई ने इस फ़िल्म में प्रकाश नाम का एक छोटा सा किरदार किया और आज शो मेन सुभाष घई को देखना अदभुत है।क्या ये मजेदार बात नहीं कि शक्तिसामंत ने संगीत देने के लिए पहले शंकर-जयकिशन से संपर्क किया था लेकिन आराधना तो एस.डी.की ही थी ना।वाकई एक सफ़ल फ़िल्म बनाना भी किसी आराधना से कम नहीं।
विशेष: आराधना फ़िल्म मुल रुप से हालीवुड फ़िल्म "टु इच हिज ओन"(1946) से प्रेरित है और दोनो ही फ़िल्म में अभिनेत्री को बेस्ट अवार्ड प्राप्त हुआ।
फ़िल्म: आराधना
वर्ष: 7 नवंबर, 1969
निर्माता:शक्तिसामंत
निर्देशक: शक्ति सामंत
लेखक: सचिन भौमिक
संगीत: एस.डी.बर्मन
गीतकार: आनंद बख्शी
 फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड-
 बेस्ट फ़िल्म अवार्ड-शक्ति सामंत
  बेस्ट नायिका अवार्ड-शर्मिला टैगोर
 बेस्ट मेल प्ले बेक सिंगर-किशोर कुमार"रुप तेरा मस्ताना"
गीत:

"रुप तेरा मस्ताना"    किशोर कुमार      
"बागों में बहार है"    मो.रफ़ी, लता मंगेशकर      
"चंदा है तु मेरा सुरज है तु"    लता मंगेशकर      
"मेरे सपनों की रानी"    किशोर कुमार      
"गुनगुना रहे है भंवरे"    मो.रफ़ी, आशा भॊंसले      
"कोरा कगज था ये मन मेरा"    लता मंगेशकर, किशोर कुमार      
"सफ़ल होगी तेरी अराधना"    एस.डी.बर्मन   

-योगेन्द्र व्यास

Saturday, October 13, 2012

रुपहला सफ़र:अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यो आता है...





अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है.....
तुम आसमां पर बैठे हो तो सिर्फ़ इसलिए कि हम इस जमीं पर जड़ो तक धंसे है। ये मध्यमवर्गीय परिवार की एक अंदरुनी दास्तान है जो रोजाना जिंदगी के थपेड़ो  से अपनी जड़ो में कंपन महसुस करती है।ये उनका आत्मबल ही है जो उन्हे उस मध्यम मार्ग में थामें रखता है।सईद मिर्जा ऐसे ही फ़िल्मकार है जिन्होने मध्यम वर्ग को अपनी फ़िल्मों में मुख्य किरदार की भुमिका दी और ये किरदार उनकी फ़िल्म में अपने आप बोलता है उसे कोई डायलाग कोई स्क्रिप्ट नहीं दी जाती बस जैसे-जैसे उसकी जिंदगी चलती है कैमेरा खुद-ब-खुद चल पड़ता  है।
अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यो आता है.. दरअसल ये फ़िल्म ना हो कर सईद मिर्जा की नोट बुक के वे पन्ने है-जिसमें हर पात्र का एक पन्ना है और वो पात्र वैसा ही है जैसा आमतौर पर है।कोई पात्र हीरो नहीं ,किसी भी पात्र को वजनी डॉयलाग नहीं, कोई मेलोड्रामा नहीं बस एक मध्यमवर्गीय परिवार की एक तस्वीर जो देखी भाली सी लगती है। मि.पिंटो(अरविंद देशपांडे) एक मिल वर्कर है और वे अपने हक के लिए युनियन के साथ ह्डताल पर है उनका बेटा अल्बर्ट पिंटो (नासिरउद्दीन शाह) जो मोटर मैकेनिक है, इस हड़ताल को गैर जायज कहता है.अल्बर्ट अपनी धुन में और गलतफ़हमी में जीने वाला इंसान है लेकिन अपने परिवार को भी उसी शिद्दत से चाहता है।मोटर गैराज के कस्टमर उसे अपने दोस्त लगते है उसे लगता है उच्चवर्ग के लोग उसकी बात को महत्व देते है।स्टैला डिकोस्टा (शबाना आजमी) उसकी नजदीकी दोस्त है लेकिन अल्बर्ट ज्यादा पजेसिव होने से दोनो की खटपट चलती है।ये सब एक आम जिंदगी में होने वाले छोटे-छोटे वाकये है जो बडी ही संजीदगी से चलते है ऐसा लगता है जैसे हमारे किसी पड़ोसी  के यहां ये सब चल रहा है और हम एक पड़ोसी होने के नाते साथ साथ चल रहे है।जुआन पिंटो (स्मिता पाटिल) अल्बर्ट की बहन जो कि सेल्स गर्ल है तथा एक पांव से असामान्य है लेकिन उसे आए दिन पुरुष ग्राहको से उनके अनुचित व्यवहार का सामना करना पडता है और वो उसका दृढता से सामना करती भी है।इसमे शबाना आजमी और स्मिता पाटिल के किरदार को बहुत ही सशक्त और मजबुत बनाकर पेश किया गया है। किरदारो के लिहाज से इसमें सारे कलाकार थियेटर,एनएसडी,एनएफ़टीटीआई के जानेमाने कलाकार है लेकिन बात वही कि सईद मिर्जा अपने किरदार का उपयोग उन रंगो की तरह करते है जो उनके कैनवास में भले कम मात्रा में उपयोग हो लेकिन उनका एक स्ट्रोक पुरी तस्वीर में जान फ़ुंक देता है।सईद मिर्जा ने मध्यमवर्गीय परिवार पर केन्द्रित और भी कई फ़िल्मे बनाई मसलन मोहनजोशी हाजिर हो,सलीम लंगडे पर मत रो और नसीम साथ ही प्रसिद्ध टीवी सिरियल नुक्कड नाटक और इंतजार का निर्देशन भी किया।
डोमिनिक पिंटो(दिलीप धवन) अल्बर्ट का भाई जो बिना कुछ किए जिंदगी में पाना चाहता है और चोरी के आरोप में जेल चला जाता है और मध्यमवर्गीय़ परिवार की चिंता ग्रस्त मां मिसेस पिंटॊ(सुलभादेश पांडॆ) अपने बेटे और पति की चिंता में हमेशा चर्च की शरण में रहती है।स्टैला डिकोस्टा के भाई एवं पिता को अपने देश को कोसते दिखाया गया जो कि विदेश में बसने की इच्छा रखते है। मि.पिंटॊ को हड़ताल के दौरान गुंडो से पिटाई का सामना करना पडता है तब वो अपने परिवार में कहता है क्या एक मजदुर का कोई आत्म सम्मान नहीं क्या उसे व उसके परिवार को एक बेहतर जिंदगी जिने का हक नहीं,अल्बर्ट अपनी आत्म मुग्धता से बाहर आता है,दुसरे मजदुरो की दयनीय हालातो से परिचित होता है....ये फ़िल्म आपको कोई मनोरंजन नहीं देती लेकिन बस उस मसकती जिंदगी की तस्वीर दिखाती है,जो इन बिते सालो में और ज्यादा बिगडे रुप में आज हमारे सामने है।
सईद मिर्जा सिर्फ़ सोई हुयी जनता की आत्मा पर दस्तक देते हुए निकल जाते है।आज भी स्थितियां नहीं बदली सामाजिक और आर्थिक असमानता के नए नए रह्स्यो से रोज परदे उठ रहे है लेकिन ना जाने क्यो इन व्यवस्थाओं के खिलाफ़ अल्बर्ट पिंटो,रहमत अली,बलविंदर सिंग और रामनारायण को गुस्सा ही नहीं आता........
विशेष: ये सईद मिर्जा वही है जिनके पिता अख्तर मिर्जा ने फ़िल्म वक्त(1965) में बतौर लेखक के फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड जीता था।

फ़िल्म: अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यो आता है.....
वर्ष: 1980
निर्माता,निर्देशक,लेखक :सईद अख्तर मिर्जा
संगीत:मानस मुखर्जी,भास्कर चंदावरकर
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड(1981):
बेस्ट फ़िल्म क्रिटिक अवार्ड-सईद अख्तर मिर्जा
-योगेन्द्र व्यास

डी.के.बोस की व्यथा (व्यंग्य)

(व्यंग्य)
 डी.के.बोस की व्यथा हर हफ़्ते दस दिन में कुछ खबरे सुर्खियो में रहती है और फ़िर नयी चटपटी खबर उनका स्थान ले लेती है इसी उधेड-बुन में सुबह-सुबह गाली पुराण की जुगाली करते हुए अखबार समेट ही रहा था कि दुरभाष की घंटी घन-घनाई.मैने रिसिवर उठाया पुछा कौन बोल रहे है...उधर से आवाज आई हम बोल रहे है....मैने पुछा भाई "हम" यानि और कितने लोग है......अबे मैं दीपांकर कुमार बोल रहा हुं....मैने पुछा कौन दीपांकर......अब तो झल्लाह्ट भरी आवाज में उधर से तडा तड गालियो के साथ आवाज आई अरे मैं बोस बोल रहा हुं साले अब पहचानते भी नहीं ....ओह....डी.के. बोस.....जस्ट शटअप अब मैं डी.के. नहीं सिर्फ़ दीपांकर कुमार हुं.ये महाशय हमारे कालेज के जमाने के मित्र हुआ करते थे जिन्हे हम डी.के.  के नाम से बुलाते थे इनके असल नाम से तो कभी वास्ता ही नहीं पडा.इन महाशय का बात-बात में गालियो की बौझार करना इनकी हाबी में ही शामिल था अब ये उसी कालेज में प्रोफ़ेसर है जिस कालेज में हम पढा करते थे.बहरहाल पहले इनकी सुने -अरे मुझे एक वकील मांगता है,कोई अच्छा वकील हो तो बताओ और शाम को मिलो काफ़ी हाऊस में,इसके पहले कि- मैं कुछ पुछता खटाक!!! से रिसिवर पटकने की आवाज.मामला गंभीर लगा अब जाना तो पडेगा ही.लेकिन साथ साथ ही साथ सोचा ये गालियों का विग्यान भी बडा अजीब है जब मित्र दे तो गुदगुदी और यही गाली कोई और दे तो बात मरने मारने पर उतारु.खैर साहब शाम को डी.के. से मुलाकात हुई मुढ काफ़ी उखडा हुआ था बोले मुझे केस करना है ....मैने आश्चर्य से पुछा क्यो और किस पर....बोला आमीर खान पर.इसने मेरा जिंदगी हराम कर दिया है.....साला अच्छा भला जिंदगी चल रहा था इसने मेरा जिंदगी जहन्नुम कर दिया.....साले को मैं ही मिला था गाना बनाने के लिए.....मैने कहा डी.के. शांत हो जाओ....फ़िर साला तुम डी.के. बोला.....तुम को पता है कालेज में लडका लोग ब्लेक बोर्ड पर मेरा बडा-बडा नाम लिखता है,लडकिया लोग मुंह पर हाथ रखकर फ़ुसफ़ुसा के हंसता है.......और तो और कालोनी में लोगो ने अपने मकान का पता बताने के लिए मेरा घर को लेंड्मार्क बना दिया है.मेरा कमीना दुश्मन पडोसी रोज जोर-जोर से ये गाना बजाता है.मेरा बीबी बोलता है अपना नाम बदल डालो अब बोलो इस उम्र ऐसी फ़जिहत कि नाम बदलना पडे.मैं छोडुंगा नहीं उस आमीर को और साले तुम लेखक बने फ़िरते हो हमारी संस्कृति पर हमला हो रहा है तुम कुछ करते क्यो नहीं.मैने बोला भाई देखो केस दायर करने से कुछ नहीं होने वाला उसने अपनी फ़िल्म पर "ए" सर्टिफ़िकेट लिया है ज्यादा से ज्यादा तुम भी अपने नाम के आगे (ए) लिखवा लो.....ऐ..स्साला तुम भी हमारा हंसी उडाता है......सारी..सारी बाबु मोशाय....अच्छा एक काम करो अभी तो तुम अपना गुस्सा ठंडा करो और काफ़ी पियो इस पर हम थोडा विचार करते है फ़िर देखते है क्या करना है.जैसे तैसे विदा किया डी.के. बोस को.सोचा जिस व्यक्ति ने जिंदगी भर गाली को अपना ताकिया-कलाम बनाया वो आज उसी के गले ब्याज के साथ पड गयी..मेरे ख्याल में ये मन की कुंठा निकालने का एक तरीका हो सकता है जिसे हम आज से उपयोग नहीं कर रहे ये हर समय काल से उपयोग लाई जाती रही है,इसका उद्दभव उलाहना देने साथ-साथ शुरु हो कर आज प्रचलित गालियों में तब्दील हो गया है.कहां उपयोग नही होता इसके कई स्वरुप है -दोस्तो में,आफ़िस में,अफ़सर को गाली देने में,सिस्टम को गाली देने में,मोहल्ले के झगडे में,आंदोलनों में,राजनिति में.गाली एक यांत्रिक क्रिया की प्रतिक्रिया स्वरुप पैदा होने वाली संडाध है जिसे कई लोग आनंद पुर्वक लेते देते रहते है,मुख की तंग जबान से गोली की तरह निकल कर सुनने वाले के दिल में धंस जाए तो वो गाली है.सकारात्मक नजरिये से देखे भाई सा. तो ये बुलेट का सब्सटिट्युट है.फ़र्ज करो अगर गाली नहीं होती तो क्या होता.वो ही जिंदा होता जिसके हाथ में बंदुक होती.यदि हर आतंक वादी गाली बक कर अपनी कुंठा विसर्जित कर दे तो हो सकता है उसकी बंदुक से कुछ गोली कम चले. फ़िर भी ये एक असभ्यता की निशानी है इससे परहेज किया जा सकता है सभ्यता के गलियारे में इसका प्रयोग किसी भी लिहाज से उचित नहीं कहा जा सकता. .......गाली देना बुरी बात है बस ये मान लेना काफ़ी है.अब डी. के. बोस का जो होगा सो होगा इससे हमारी संस्कृति को कोई फ़र्क नहीं पडने वाला ये तय है.
-योगेन्द्र व्यास

पेलवान की शोक सभा ( व्यंग्य )

पेलवान की शोक सभा
जिंदगी में कभी ऐसा अवसर आए कि आपको ऐसी शवयात्रा में शरीक होना पडे और शोक सभा में कुछ बोलना भी पडे तो क्या नजारा बनता है आइए जरा देखे.....।शहर के नामी गिरामी पहलवान भिया असमय चल बसे.....अब भिया चल बसे तो पठ्ठे शवयात्रा की तैयारी में जुटे ..ऐ...गोली,पप्पु,टुड्डा चल एरिया की दुकाने बंद करा...मोहल्ले को भेला कर भिया को शमशान पोचाना है.कुछ तो दुकान बंद कर धीरे से कट लिए बाकी शवयात्रा में धकेल दिए गए.श्मशान पहुंचे पहलवान का अंतिम संस्कार हुआ,तभी भिया के खास पठ्ठे  गोटी-डेंजर को कुछ याद आई वो चिल्ला के बोला..ऐ सब को घेर के शेड में लिया....पेलवान की शोक सभा करनी है........ और वो मास्टर को बोल पेलवान के बारे में बोलेगा...अब कुछ सफ़ेद पोश मन ही मन प्रार्थना कर रहे थे कि हमारा नाम ना ले तो अच्छा .....अब बेचारे मास्टर की आफ़त क्या बोले कैसे बोले.....अब मरता क्या न करता....मास्टर सा. बोले हमारे भैया जी से पहली मुलाकात जब हुयी जब वे अपने बच्चे को परीक्षा दिलाने स्कुल आए,तब उनके हाथ में चाकु और बच्चे के हाथ में कलम पुरी परीक्षा लिखवा के ही उठे....मैं उनके असामयिक निधन पर मैं दुख प्रकट करता हुं और ईश्वर उनके परिवार को दुख सहन करने की शक्ति दे...ओम शांति.अब श्री गोटी जी अपनी भावनाएं प्रकट करेंगे.....अब गोटी-डेंजर के चेहरे पर हवाईयां उड गई ...अभी क्या बोले...अब तक तो दादागिरी की अब भाषण....जैसे तैसे गोटी डेंजर हकलाते हुए बोले ....अब भिया के बारे में क्या बोले भिया तो भिया थे.पेली-पेली बार पेलवान से मुलाकात अंदर(जेल) हुई थी...तीन चार महीने भिया की सेवा की बस तभी से भिया का पठ्ठा बन गिया.पेलवान हमेशा कहते थे अपनी सोच उंची रखो,भिया कहते थे समय बदल रिया है अब अपन को चिंदी चोर जैसे काम नी करना है.भिया ने कित्तो को काम पे लगा दिया कित्ते रोजगार के अवसर खोल दिये पेलवान ने,.. आज सब अपनी रोजी रोटी बढिया कमा रिये है..कोई ह्फ़्ता वसुली में,तो कोई गाडी खडी कराई में,कोई पार्किंग में,कोई प्लाट- मकान कब्जे-खाली कराई में.पेलवान को भण्डारा भोत पसंद था, उनके नेतृत्व में कित्ते ही भण्डारे हमने करे.भिया की सेंटिग उपर से नीचे तक जोर दार थी.पेलवान दो दिन पेले ही केरिये थे कि इस बार पार्षद का चुनाव लडना है और फ़ुल फ़्लेश में पोलीटिस्क में आना है.अब पेलवान तो हमारे बीच नी रिये है पर उनके काम को आगे और बढाना है.पेलवान की स्मृति में उनके तेरवे पर एक विशाल भण्डारे का आयोजन माता रानी के मंदिर में किया जाएगा.अपनी पुरी टीम से निवेदन है कि सब लोग काम पे लग जाए और आप सभी लोग अधिक से अधिक सहयोग कर भण्डारे को सफ़ल बानाएं. अब मैं सोच रहा हुं..... शासन प्रशासन क्या रोजगार के इन कुत्सित अवसरो को कभी समाप्त कर पाएगा या ऐसे ही दादा-पहलवानों की शोक सभाओं में भी जबरजस्ती जाना पडेगा...........!

-योगेन्द्र व्यास

स्वर जन्म: ताल या लता



बहुत ही विस्मय कारी घटना है कि इंन्दौर के सिक्ख मोहल्ले से निकली नवजात किलकारी  आलाप ,तान और मुरकियों में बदल जाएगी और सात सुरो को अपनी आवाज की प्रत्यंचा पर चढा कर सुरों के एक से बढ कर एक सुरीले बाणॊ से इन हवाओं पर एक कवच सा खींच देगी.मेरे ख्याल में लताजी के जन्म को स्वरों का अवतार कहें तो ज्यादा तसल्ली महसुस होगी. राग-रागिनियो में डुबे एक एक शब्द गीत बनकर बडे ही अनुशासित भाव से लता आकण्ठ में गोते लगाने के लिए बडे ही अधीर देखे व महसुस किए जा सकते है......और हां गीत के मुखडे तो गर्वोक्ति भाव से अंतरे को ये बताते है कि देखो लता के गले में हमने कितनी बार जगह पाई है......कई बार ऐसा लिखना भी गर्वोक्ति का अनुभव देता है कि ऐसी जिवित किवदंती लताजी के रुप में हमारे बीच मौजुद है और जो संपदा उन्होने हमारे लिए छोडी है उस उपकार को चुका पाना हमारे बस में नहीं......लता जी की आवाज सिर्फ़ कानों तक नहीं वरन अवचेतन मन की गहरायों में परकाया की तरह प्रवेश करती है और आपको एक ध्यानस्थ बना कर हौले से बाहर निकल आती है.....यही तो है "सत्यम शिवम सुंदरम" का भाव.क्या ही ये बिल्कुल संभव हो कि शिवालय-देवालय की तरह कहीं "लतालय" आकार ले जहां उनके गीत अखण्ड रुप से किसी पिरामिड के अंदर इस कायनात के कायम रहने तक बजते रहे....तो चलिए अब आप क्या कर रहे है मैने तो........
लता जी के सुरॊ के अंतराल पर अपने दोनो घुटने मोड कर सवारी कर ली है बस अब उनके आलाप,तान,मुरकियो पर तैर रहा हुं.......बडा ही विस्मयकारी संसार है यहां कहीं कोई सितार की स्ट्रिंग पास से गुजरती है तो कहीं एकार्डियन गुदगुदी कर जाता है...तबले की तिहाई ,ढोलक की थाप चौंका देती है....बीच में हवाई गिटार का पीस ढकेल देता है....वही से वायलिन का कारवां तेजी से लता जी की आवाज के पास छोड आता है....ये सारे वाद्य उत्सवी नाद में रंगे है कि कैसे-कैसे लताजी का "स्वर-जन्म" मनाया जाए....अब ऐसे में कौन उतरे इन सुरो की सवारी से.....बस उनिंदा सा हूं.......
-योगेन्द्र व्यास
yvyas2010@gmail.com

Friday, October 12, 2012

आंखो ही आंखो में दर्द बांटने की कोशिश (Hit here for Link)

भागती जिंदगी में बेलगाम हांफ़ते लब्ज कई बार उन मासुस तालुओ को अपना शिकार बना लेते है जहां वे शांति की आस में कानों तक पैर पसार कर हमेशा के लिए सो जाते है।कोई शब्द नहीं ,कोई आवाज नहीं गहरे सन्नाटे में शब्द हमेशा के लिए दफ़न...दिमाग दस्तक देता है....हे..उठो..बोलो कुछ..तो सुनो..सुनो ना...कोई जवाब नहीं।आंखे है ना सब समझती है,ममतामयी पलके झपकती है,बोली मैं हुं ना तुम्हारी जबान और मैं सब सुनकर समझादुंगी..भावुक आंखो से ढुलका एक मोती गुलजार के पन्नों पर फ़ैल गया और लिख गया "कोशिश"!
गुलजार जैसे निष्णांत निर्देशक अपनी पटकथा मेज पर बैठ कर नहीं लिखते वे किरदारों के भीतर छुप कर अपनी कलम और कैमेरा फ़ोकस करते है कि-देखने वाला इन किरदारों से संवाद स्थापित करने की चेष्टा करता है।दर्शको की आंखो को सकुन देने लिए गुलजार का कैमेरा दार्जिंलिंग की वादियों या नीली रोशनी में गिरती बर्फ़ का रोमांच नहीं रचता वो हरीचरण (संजीव कुमार)एवं आरती(जयाभादुडी-बच्चन) की खामोश अंर्तमन गहराईयों से लांग शाट लेता हुआ उनकी आने वाली जिंदगी पर फ़ोकस करता है।
हरीचरण और आरती को जिंदगी एक चौराहे पर मिलाती है और होता है न कि दो व्यक्ति एक ही जबान के एक अनजान देश में मिल जाएं तो उनमें जो तसल्ली का भाव आता है वही भाव हरीचरण और आरती को महसुस होता है जब उन्हे ये पता लगता है कि वे दोनो ही मुक एवं बधीर है।दोनो ही गरीब है,हरीचरण हाकर है और आरती अपनी मां (दीनापाठक) और निकम्मे भाई(असरानी) के साथ रहती है।हरीचरण आरती का दाखिला मुकबधीर स्कुल में करा देता है और उनका मेल-जोल बाहर के शोर-गुल से बेखबर अपने दिल की आवाजें सुनने लगता है,प्रेम के भाव उमड रहे है कह नहीं पा रहे लेकिन जो आखों से छलक रहे है छोटी-छोटी चिठ्ठियों में बह रहे है और फ़िर दोनो की शादी "प्यार अंधा होता है ये तो सुना था लेकिन गुंगा बहरा हो तब भी प्यार ही होता है"ये बात अंधे नारायण अंकल (ओमशिवपुरी) कहते है जब ये दोनो अनायास ही उन्हे राह में मिल जाते है और फ़िर उनके अपने हो जाते है. गुलजार ने उन व्यवहारिक दिक्कतो को बहुत ही संजीदा तरीके से फ़्रेम दर फ़्रेम उकेरा है जो एक मुक बधिर दम्पत्ति के सामने आती है।बहुत ही मार्मिक सीन है जब वे रात में अपने बच्चे की रोने की आवाज नहीं सुन पाते और बच्चा तेज बारिश में घर के बाहर दम तोड देता है। बहुत टुट जाते है दोनो..पुरी फ़िल्म में संजीव कुमार कहीं नजर नहीं आए हरीचरण पात्र ने स्टार संजीव कुमार को कहीं पीछे छोड दिया। संजीव कुमार ने अंदरुनी खामोशी के इतने सारे रंग उडेले कि एक आंसु का हाल पुछ्ने दुसरा चला आता है। हैलो..बर्फ़ी काश कि तुमने थोडी सी कोशिश करके "कोशिश" देख ली होती।समझ नहीं आता हमें इंसपायर होने के लिए देश के बाहर अभिनय क्यो तलाशना पडता है जबकि हरीचरण पात्र भी अपने देश में उपलब्ध है।
खैर..आरती एवं हरीचरण के दुसरा बच्चा होता है।कुछ सीन दिल को छु लेने वाले है, जब एक मां को ये पता नहीं हो कि लोरी क्या होती है जब नारायण अंकल बच्चे को लोरी गा कर सुनाते है ये जया बच्चन कि अभिनय क्षमता का चरम है कि कैसे चेहरे भावों को अभिनय से प्रकट करना,फ़िर बच्चा सुन-बोल पाता है या नहीं इसकी कसमसाहट को देखना फ़िर डॉक्टर को लेकर आना और तसल्ली करना, हल्का-फ़ुल्का विनोद सुखद है।संघर्ष करते करते हरीचरण नौकरी में अच्छे ओहदे पर पहुंच जाता है लेकिन आरती खामोशी से साथ छोड़ कर चिर निंद्रा में चली जाती है....हरीचरण आज भी आखों से आरती को आवाज देने की कोशिश करता है..
कई आलोचको को फ़िल्म का अंतिम सीन पसंद नहीं जिसमें हरीचरण अपने जवान बेटे की शादी एक मुक बधीर लडकी से करने का निर्णय लेता है लेकिन बेटा इससे इंकार कर देता है। जैसा कि गुलजार पात्रो के अंदर बैठ कर कहानी कहते है इसलिए इसे एक पिता के नजरिए से देखा जाना चाहिए जो अपने बच्चे के लिए स्वार्थी नहीं हो सकता वो उसे बेहतर इंसान के रुप में देखना चाहता है ताकि वो एक मुक बधिर लडकी के लब्ज बन कर उसके मुरझाए चेहरे पर मुस्कान लौटा सके।
इस फ़िल्म ने करोडो तो नहीं कमाएं लेकिन आज भी ये फ़िल्म करोडो में एक है.."एक बार हरीचरण से मिल तो लिजिए"

विशेष:गुलजार साहब का उनकी फ़िल्मों में गीत और संगीत का नाता जग जाहिर है,लेकिन इस फ़िल्म में उन्होने संगीत को दुर रखा कारण विषय की संजीदगी या कुछ और इसका खुलासा  शायद उन्होने नहीं किया.....

फ़िल्म: कोशिश
वर्ष: 1972
निर्देशन :गुलजार
निर्माता:रोमु एन.सिप्पी,राज एन. सिप्पी
लेखक एवं गीतकार: गुलजार
संगीत:मदनमोहन

गीत:
1. "सो जा बाबा मेरे"   -    मो.रफ़ी   
2. "हमसे है वतन हमारा" -  सुषमा श्रेष्ठ   
अवार्ड:
नेशनल फ़िल्म अवार्ड (1973)
-बेस्ट स्क्रिन प्ले -गुलजार
-बेस्ट एक्टर-संजीव कुमार

योगेन्द्र व्यास
 
एक डॉक्टर की मौत (hit her for Link)http://www.epaperdainikdabangdunia.com/Details.aspx?id=7748&boxid=11573312

एक डॉक्टर की मौत
इंसान की औसत उम्र यदि सत्तर साल मान ले और उसमें से बीस वर्ष निकाल दे तो भी पचास वर्ष साइंस पर काम करने के लिए काफ़ी कम है। दुनिया भर के लाखों वैज्ञानिक  अपने अपने क्षेत्र में रिसर्च कार्यो में लगे है और इनमें से कई ऐसे है जो पारंपरिक वैज्ञानिक  नहीं है यानि पीएचडी डिग्री हांसिल किए हुए नही है फ़िर भी वे इस ब्रम्हाण्ड के असिमित दायरे में अपनी खुली सोच को उन गुढ रहस्यों के निकट ले जाते है जहां एक नए विज्ञान का जन्म होता है। कई बार पारंपरिक शोधार्थी एक लीक पर चलते हुए वो परिणाम प्राप्त नहीं कर पाता जो कि एक साधारण शोधार्थी लीक से हटकर समग्रता में नए आयामों को ढुंढता है एवं वांछित परिणाम प्राप्त कर जाता है। ये ठीक वैसा ही है जैसे कबीर की आध्यात्मिक उपलब्धता की तुलना किसी पॊथी पुराण कंठस्थ पंडित से की जाए।जितनी भी वैज्ञानिक खोजे हुयी है उनमें से काफ़ी खोजे गैर पारंपरिक वैज्ञानिकों द्वारा ही की गयी है।
कोलकाता के फ़िजिशियन सुभाष मुखोपाध्याय जिन्होने भारत का पहला और विश्व का दुसरा टेस्ट ट्युब बेबी "दुर्गा" को अस्तित्व में लाने में सफ़लता हांसिल की,लेकिन दुर्भाग्य- सरकार ने इस उपलब्धी को इसे अंर्तराष्ट्रीय साईंटिफ़ीक कम्युनिटी में रखने की इजाजत तक नहीं दी,मानसिक प्रताडना,उपेक्षा,नौकरशाही रवैये से क्षुब्ध हो कर सुभाष मुखोपाध्याय ने आत्महत्या कर ली।जो व्यक्ति इस देश को बहुत कुछ दे सकता था उसे इस हश्र तक पहुंचना पडा,कई पारंपरिक वैज्ञानिकों को भी इस गैर पारंपरिक वैज्ञानिक व्यक्ति की सफ़लता पची नहीं।
निर्देशक तपन सिन्हा ने इसी घटना से प्रेरित होकर फ़िल्म "एक डॉक्टर  की मौत" को बहुत ही प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है।
दीपांकर रॉय (पंकज कपुर) जो एक साधारण एम.बी.बी.एस.डॉक्टर  है और एक सरकारी अस्पताल में नौकरी करता है।लेकिन साथ ही साथ उसका एक ही जुनुन है लेप्रोसी नामक बिमारी को इस पृथ्वी से जड से मिटा देना और इसके लिए वो अपने घर में ही बनी लेब में दिन रात मेहनत कर लेप्रोसी का सफ़ल वैक्सीन तैयार कर लेता है तथा ये संभावना भी प्रकट करता है कि  ये वेक्सीन मातृत्व विहिन स्त्री को मातृत्व सुख भी दे सकता है।ये खबर समाचार पत्रो,एवं टेलिविजन पर भी फ़्लेश हो जाती है।इधर हेल्थ सेक्रेटरी डॉ.दीपांकर को बुला कर काफ़ी लताड लगाता है,वही ईष्यावश डॉक्टर्स का एक कुनबा डॉ. दीपांकर  के विरोध में उठ खडा होता है उन्हे सार्वजनिक तौर पर काफ़ी प्रताडित किया जाता है कि एक साधारण एम.बी.बी.एस.डॉक्टर लेप्रोसी जैसे घृणित रोग का वैक्सिन कैसे बना सकता है।इसी के चलते डॉ. दीपांकर का ट्रांसफ़र एक गांव में कर दिया जाता है।लेकिन इस ज्यादती की खबर अखबार के मालिक छापने से मना कर देते है कि-हमें सरकार से विज्ञापन नहीं मिलेंगे और अखबार विज्ञापन  से चलते है वैज्ञानिक से नहीं।वही ये खबर अमेरिका के जान एंडरसन फ़ाउंडेशन को लगती है।इसी फ़ाउंडेश की एक महिला सदस्य डॉ.दीपांकर से मिलने गांव आती है तथा वे डॉ. दीपांकर को जल्द से जल्द अपने रिसर्च पेपर तैयार करने को कहती है।लेकिन एक ईमानदार डॉ.को नौकरशाही पेपर बनाने का मौका तक नहीं देती है और जांच आयोग बैठा देती है,जांच कमेटी में ऐसे लोग है जिन्हे आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली दवाईयों के नाम तक नहीं पता। अतंत:एक हताश,निराश डॉ. दीपांकर नाकारॊ की कमेटी से हार मान लेता है।दुसरी और अमेरिका में लेप्रोसी के वैक्सिन तैयार करने वाले दो अमेरिकी वैज्ञानिको के   नामो की घोषणा हो जाती है। ये उपलब्धि हमारे देश का गौरव बनने के बजाय अन्य देश की उपलब्धी बन जाती है। ये हमारे देश की हकीकत के काफ़ी नजदीक है। हमारे देश में आज भी कई ऐसे सुभाष मुखोपाध्याय और दीपांकर है जो अपने ही लोगो के बीच अपनी ही कु-व्यवस्थाओं से जुझ रहे है।
ये पंकज कपुर के बस में ही था कि एक किरदार को पुरी तरह आत्मसात कर ले। एक ध्यानस्थ मुनी अवस्था और पंकज कपुर के किरदार को निभाने की अवस्था लगभग एक सी ही है।शबाना आजमी ने डॉ.दीपांकर की पत्नि के किरदार को इस तरह जिया वाकई लगा कि एक जुनुनी इंसान की पत्नि अपनी सांसारिक इच्छाओं के दमन के साथ एक एकांत में कैसे रहती होगी।और हां दुबले पतले इरफ़ान खान जो कि समाचार पत्र के साइंस एडिटर के किरदार के रुप में है देखना ऐसा लगा मानो सही में अभिनय में उनकी दौड पान सिंह तोमर तक सार्थक रही. अब क्या डॉ.दीपांकर राय आत्महत्या करते है? ये देखना हो तो तपन सिन्हा की निर्देशकीय कला में तहकीकात करना होगी बस थोडा समय इस फ़िल्म के साथ गुजारिए,आपको ये एहसास नहीं होगा कि आप फ़िल्म देख रहे है,अपने आप को इन व्यवस्थाओं के बीच छ्टपटाते पाएंगे।
विशेष:डां.सुभाष मुखोपाध्याय जिन्हे उनकी मृत्यु के 5 वर्ष बाद एक अविष्कारक के रुप में अधिकारिक पहचान मिली।ये फ़िल्म उन असाधारण प्रतिभाओं के प्रति आदरांजली है जिन्हे हम अपने आसपास होते हुए भी नजर अंदाज कर देते है।

फ़िल्म: एक डॉक्टर की मौत
वर्ष: 31 अगस्त 1990
निर्देशन एवं स्क्रिन प्ले:तपन सिन्हा
निर्माता: नेशनल फ़िल्म्स डेव्हलपमेंट कर्पोरेशन
लेखक: रामापदा चौधरी
संगीत:वनराज भाटिया
अवार्ड:
38 वां  नेशनल फ़िल्म अवार्ड(1991)
-द्वितीय बेस्ट फ़िचर फ़िल्म
-बेस्ट डायरेक्टर -तपन सिन्हा
-स्पेशल ज्युरी अवार्ड-पंकज कपुर 
बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन आवार्ड (1991)
 -बेस्ट फ़िल्म
 -बेस्ट डायरेक्टर
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड(1992)
-बेस्ट स्क्रिन प्ले अवार्ड-तपन सिन्हा


-योगेन्द्र व्यास
हमने दो बुंदो से मन भर लिया (hit here for Link)

हमने दो बुंदो से मन भर लिया
प्यार को परिभाषित करना उतना ही कठिन है जितना प्यार को जानना व समझना,फ़िर भी कम शब्दों में इसे समझना हो तो ये कहा जा सकता है कि-"बिना किसी प्रयासों से हुआ भावनात्मक लगाव ही प्यार है"बहुत ही दबे पांव ये आता है और जब अचानक जब छुट कर फ़िसल जाता है तो ऐसा लगता है मानो आनंदित तैरती मछली को किसी ने किनारे पर पटक दिया हो।
ऐसी ही एक कहानी फ़िल्म "सदमा" जिसमें कि -एक सह्रदय इंसान के जज्बातो से खेलती जिंदगी उसे एक हाथ से खुशी देती है और दुसरे हाथ से दर्द का वो तकिया देती है जिस पर ना तो सिर रखा जाता है ना ही नींद आती है-"सच्चा कोई सपना होता,मेरा कोई अपना होता...सुरमई अंखियों में एक नन्हा मुन्ना सपना दे जा रे..."
महेन्द्र बालु दक्षिण के एक ऐसे प्रतिभासंपन्न निर्देशक है जिन्होने तमिल फ़िल्म"मुंडरम पिरई"का निर्देशन किया और जस का तस हिन्दी रिमेक फ़िल्म "सदमा"का निर्देशन किया।एक निर्देशक की प्रतिभा वही है कि फ़िल्म में दर्शक अपने आपको किरदारो के इतने नजदीक महसुस करे कि उनके सुख और दुख का मफ़लर खुद ही ओढा महसुस करें और कलाकरो की अदाकारी ऐसी कि  देखने वाला अंत में उन्हे अपनी डबडबाई आंखो में छुपा कर अपने साथ ले जाए।
युवा सुंदर आधुनिक ख्यालात लडकी नेहलता(श्रीदेवी) का कार का एक्सीडेंट हो जाता है जिसमें उसकी याददाश्त सिर्फ़ उसके बचपन तक ही सिमट जाती है यानि शरीर से जवान दिमाग से एकदम बच्ची।अपनी मासुमियत के चलते नेहलता धोखे से वेश्यालय पहुंच जाती है जहां से सोमु(कमलहसन) उसे छुडा कर अपने साथ अपने गांव ऊंटी ले जाता है।सोमु उसे रेशमी के नाम से जानता है सोमु निच्छल भाव से उसकी शरारतों,शैतानियो को सहता है तथा कब उससे लगाव महसुस करने लगता है पता ही नहीं चलता वो चाहता है कि रेशमी ठीक हो जाए और उसकी अकेली जिंदगी में कुछ रंग भर जाए। वो रेशमी को इलाज के लिए एक वैद्य के पास ले जाता है जहां वो एकदम ठीक हो जाती है उसके मां बाप उसे लेने आ जाते है अब उसे सोमु के साथ बिताए पलो में एक पल भी याद नहीं।यही वो सीन है जहां कमल हासन सोमु किरदार को उस शिखर पर ले जाते है जहां कमल हासन नहीं बल्कि सिर्फ़ हताश,बदहवास सोमु ही नजर आते है जिसके हाथ से जिंदगी का हंसता खेलता टुकडा फ़िसलकर ट्रेन की पटरियों पर जाता दिखता है...ये दृश्य लिखा नहीं जा सकता सिर्फ़ देख कर ही उस दर्द के अहसास को महसुस किया जा सकता है। इसी दृश्य के लिए कमल हसन को मुंडरम पिरई  फ़िल्म में नेशनल आवार्ड और महेन्द्र बालु को सर्वश्रेष्ट सिनेमेटोग्राफ़र आवार्ड मिला लेकिन हिन्दी रिमेक में सिर्फ़ नामिनेशन ही प्राप्त हुए।
लेकिन क्या करें..जिंदगी से शिकायत करे या प्यार तो फ़िर ये गाना सुने "ऐ जिंदगी गले लगा ले..."जिंदगी के काफ़ी नजदीक ये गाना गीतकार की कलम से शब्द ढुलक कर संगीतकार इल्याराजा के नोटेशन पर स्पंदित हो कर वायलिन की स्ट्रींग,फ़िर संतुर पर जम्प लेते हुए बांसुरी के अधरो पर बस लॆट से जाते है, फ़िर सुरेश वाडेकर अपनी रुहानी आवाज से निकल पडते है जिंदगी को गले लगाने।गुलजार सा. तो ऐसे फ़नकार है कि दो बुंदो में भी किनारा ढुंढ लेते है। एक गाने में अपने साजो से जिंदगी की पुरी सैर करा देना कोई मामुली काम तो नहीं वो ही काम इल्याराजा ने 5 मिनट 20 से. में कर दिखाया.
मात्र दो अंतरे वाले इस गाने में आप जिंदगी के साथ कुलांचे मारते नजर आएंगे,जब गाना खत्म होगा तो आप यही पाएंगे कि हमने दो बुंदो से मन भर लिया।यदि किसी को छोटा-मोटा दुख या परेशानी है तो वो डुब कर इस गाने को सुन भर ले आप किनारे पर जिंदगी को गले लगाते मिलेंगे।
विशेष:पंचम के बाद इल्याराजा ही ऐसे संगीतकार है जिन्होने वेस्टर्न,जाज को हिन्दुस्तानी फ़ोक के साथ गुंथ कर कई बेजोड संगीत रचनाएं दी है.

फ़िल्म: सदमा
वर्ष: 8 जुलाई 1983
निर्माता:राज एन.सिप्पी,रोमु एन.सिप्पी
निर्देशक एवं लेखक : बालु महेन्द्र
गीतकार: गुलजार
संगीत: इल्याराजा
गीत:
ऐ जिंदगी गले लगा ले....सुरेश वाडेकर
ओ बबुआ ये महुआ -आशा भोंसले
सुरमई अंखियों में...यसुदास
एक दफ़ा एक जंगल था.....कमल हासन श्रीदेवी
ये हवा ये फ़िजा..आशा भोंसले,सुरेश वाडेकर
 
मौसम आएगा जाएगा प्यार सदा मुसकाएगा(फ़िल्म-शायद) Hit here for Link

मौसम आएगा जाएगा प्यार सदा मुसकाएगा

दिन भर धुप का परबत काटा,शाम को पीने निकले हम, इन गलियो में मौत लिखी थी उनमें जीने निकले हम"निदा फ़ाजली ने फ़िल्म "शायद"(1979) के लिए ये गाना उस दृश्य के लिए लिखा जब इस फ़िल्म में गरीब तबके के कई सौ लोग जहरीली शराब पीने से मर जाते है,उनमें से एक सरोज कुमार"सरोज"(नासिरुद्दीन शाह) का एक शायर मित्र भी होता है।
हालांकि कई फ़िल्में अपनी लचर पटकथा और कमजोर कथा सुत्र की वजह से नाकाम फ़िल्मों की श्रेणी में आ जाती है।कई बार ऐसा होता है कि हमारे पास साधन की समपन्नता होते हुए भी हम खुबसुरत घर नहीं बना पाते ठीक वैसे ही फ़िल्म में उच्चकोटी के कलाकार,गीतकार,संगीतकार,गायक,गायिका होने बावजुद फ़िल्म सफ़ल नहीं हो पाती क्योकि कथा-पटकथा की गंभीरता एवं वाजिब होम-वर्क ना होना।फ़िर भी आज इस फ़िल्म पर बात करने का मन कुछ कारणॊं से है-एक तो यह कि इस फ़िल्म की शुटिंग इंदौर शहर में होना, दुसरा फ़िल्म का संगीत बेहतर होना,तीसरा फ़िल्म में कलाकार के तौर पर नासिरुद्दीन शाह,ओमपुरी,विजयेन्द्र घाटगे,नीता मेहता,फ़रीदाजलाल,इफ़्तेखार,सिम्मी गरेवाल इत्यादि का होना, एवं अवाज के तौर पर मो.रफ़ी,मन्नाडे,आशा भोंसले,उषा मंगेशकर,नितिन मुकेश का होना,गीतकार के तौर पर निदा फ़ाजली,विठ्ठ्ल भाई पटेल का होना। पुरी फ़िल्म का उम्दा पहलु इसके गाने है जिसे संगीत निर्देशक मानस मुखर्जी ने सजाया है, आपको लगेगा कि अरे हां ये तो हमने सुने है-जब मन्नाडे और आशा भोसले की आवाज आकाशवाणी पर गुंजती थी कि"मौसम आएगा जाएगा.प्यार सदा मुसकाएगा"एकार्डियन पर भागती तेज ऊगलियां आपको गाने की याद ताजा करा देती है,आपको याद आया होगा-"मैं सुरज की रोशनी मैं चंदा की चांदनी..".मो.रफ़ी और आशाजी, गौर करे- "खुशबु हुं मैं फ़ुल नहीं जो मुरझाउंगा.. मॊ, रफ़ी सा. बेहतरीन नगमा जो कि निदाफ़ाजली ने लिखा था। ये कुछ बेहतरीन कृति संगीत निर्देशक मानस मुखर्जी ने दी जो कि एक प्रतिभावान संगीतकार थे।उन्होने पुर्व में संगीतकार सलील चौधरी के सहायक के रुप में काम किया। वे सफ़लता के लिए हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्रीज में संघर्ष करते रहे और कुछ चंद सफ़लता उनके हाथ लगी। जब शान 14 वर्ष और सागरिका 16 वर्ष के थे तब उनका निधन हो गया था, आज लोग उन्हे प्रसिध्द गायक "शान" के पिता के नाम से पहचानते है।
अब बताईये इस सब के बावजुद ये फ़िल्म कही गुमनामी की गर्त में पडी रहे तो इसे निर्माता का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। 
राकेश(विजयेन्द्र घाटगे) और सुधा(नीता मेहता) कालेज के सहपाठी है और एक दुसरे को पसंद भी करते है लेकिन सुधा नाचने गाने वाले परिवार से होने से इनकी शादी मुकम्मल नहीं हो पाती है.राकेश मेडिकल की पढाई के लिए शहर छोड देता है और सुधा की शादी कवि एवं लेखक सरोज कुमार "सरोज"(नासिरुद्दीन शाह) से हो जाती है।राकेश कुछ सालो बाद शहर में डाक्टर बन कर आता है,सुधा एवं सरोज कुमार से मुलाकात होती है,इसी घटना क्रम में सरोज कुमार को कैंसर हो जाता है राकेश उसे हास्पिटल में भर्ती करता है। फ़िल्म में इंदौर के एम.वाय. हास्पिटल की शुटिंग की गई है,तथा सन 70 के दशक में इंदौर में हुए जहरीली शराब त्रासदी का जिक्र भी फ़िल्मांकन के रुप में किया गया है,जिसमें सरोज के शायर मित्र की भी शराब पीने से मौत हो जाती है।हकीकत में भी कई लोग शराब पीने से अपनी जान गवां बैठे थे जिन्हे एम.व्हाय हास्पिटल में ही भर्ती किया गया था जहां पलंग भी कम पड गये थे।सुत्रो की माने तो शवों को जलाने के लिए लकडियों की कमी के चलते एक ही चिता पर कई शवों का अंतिम संस्कार किया गया था।
बहरहाल-कैंसर कि असहनीय पीडा के बीच सरोज डां.राकेश से अपनी इच्छा मृत्यु की मांग करता है और एक रात वो खुद ही इंजेक्शन ले कर अपनी जान दे देता है।सुधा राकेश पर शक करती है एवं पुलिस उसे गिरफ़्तार कर लेती है।वही हास्पिटल में भर्ती नंदलाल(ओमपुरी) को सरोज का लिखा सुसाईड नोट मिल जाता है और राकेश बरी होजाता है।ओम पुरी के अभिनय की धार तब समझ आती है जब वे में इंदौरी भाषा एवं इंदौरी लटके झटके को पकड कर अपना किरदार पेश करते है। ये फ़िल्म नासिरुद्दीन शाह और ओमपुरी के अभिनय यात्रा की आरंभिक  सीढियों में से एक थी जिसमें साफ़ नजर आता है कि ये किसी अभिनय स्कुल के प्रतिभावान विद्यार्थी रहे होंगे।इस फ़िल्म में सत्तर के दशक का इंदौर जिसमें लालबाग,पिपल्यापाला,रविन्द्र नाट्य गृह,नेहरु स्टेडियम देखना अच्छा लगता है। विशेष कर हमारे शहर के प्रतिभावान कलाकार विजयेन्द्र घाटगे को अपने ही शहर में अभिनय करते देखना।बस पुरे आलेख में एक नाम नही आया तो "शायद" वो निर्देशक का ही है जिन्होने नगीने तो इकठठे कर लिए लेकिन वे एक सुंदर हार ना बना सके।खैर आप मन्ना दा और रफ़ी सा.को सुने कुछ अलहदा अहसास देगा...
विशेष:इस फ़िल्म में बेबी सागरिका मुखर्जी ने (गायक शान की बहन) "खुशबु हुं मैं...अपनी मासुम आवाज दी है।"

फ़िल्म: शायद
वर्ष: 20 मार्च 1979
निर्माता:एस.जेठवानी
निर्देशक: मदन बावरिया
संगीत: मानस मुखर्जी
गीत:
मौसम आएगा जाएगा-मन्नाडे,आशा भोंसले(गीत-विठ्ठ्ल भाई पटेल)
मैं सुरज की रोशनी....मो. रफ़ी,आशा भोंसले(गीत-विठ्ठ्ल भाई पटेल)
दिन भर धुप का परबत ...मन्नाडे,(गीत-निदा फ़ाजली )
युं जुबा हमसे सी नहीं जाती...उषा मंगेशकर(गीत-दुष्य़ंत कुमार त्यागी)
दि दिलो को ऐसे मिला लो...नितिन मुकेश प्रिति सागर(गीत-विठ्ठ्ल भाई पटेल)
खुशबु हुं मैं फ़ुल नहीं....मो.रफ़ी,बेबी सागरिका(गीत-निदा फ़ाजली )

-योगेन्द्र व्यास
yvyas2010@gmail.com
 
आज फिर जीने की तमन्ना है:गाईड (Hit here for Link)

आज फिर जीने की तमन्ना है:गाईड
जिंदगी का फ़लसफ़ा गीतकार शैलेन्द्र ने बहुत ही आसान शब्दॊं में बयां करते हुए कहा है कि-"कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है पानी, पानी पे लिखी लिखाई, है सबकी देखी, है सबकी जानी, हाथ किसी के ना आनी"।वही देव आनंद साहब ने जिंदगी के केनवास से कुछ रंग लेकर अपनी फ़िल्म "गाईड" में बडी ही खुबसुरती से भरे है,जो आज भी उतनी ही ताजगी के साथ कायम है।आर.के. नारायण के उपन्यास पर आधारित इस फ़िल्म में विजय आनंद की निर्देशकीय कला फ़्रेम दर फ़्रेम आज भी भारतीय़ फ़िल्म के 100 वर्ष के इतिहास में एक दस्तावेज के रुप में कायम है।
साठ के दशक में गैर-पारंपरिक फ़िल्म का निर्माण वाकई साहसिक कदम था,जब नायिका अपने पति को छोड कर अपने नौजवान प्रेमी के साथ रहने चली जाती है इसे उस समय के हिसाब से लिव-इन रिलेशन कह सकते है।ये फ़िल्म प्रेम,आसक्ति,मद-फ़रेब,दर्शन और आत्म साक्षात्कार के साथ अपने चरम तक जाती है।राजु गाईड(देव आनंद) अपने शहर का प्रसिध्द गाईड है,उसी शहर में मार्को(किशोर साहु) अपनी पत्नि रोजी(वहीदा रहमान) के साथ आता है,चुंकि मार्को एक पुरातत्व विशेषज्ञ है तथा वहां एक प्राचीन गुफ़ा को खोजना उसका मकसद है।मार्को राजु को अपना गाईड बनाता है,वो अपने काम से लगाव के चलते रोजी को भी नजरअंदाज करता है,इसके चलते रोजी कई बार आत्महत्या का प्रयास करती है,राजु कई बार उसे बचाता है और समझाता है- बेहतर है- तुम अपने सपनो को हकीकत में बदलों और यही से रोजी एक उन्मुक्तता की उडान भरती है और अपने शौक नृत्य को पांवो में घुंघरु पहन कर पुर्नजिवित करती है और गाती है "कल के अंधेरों से निकल के देखा है आँखें मलते-मलते.....आज फ़िर जीने की तमन्ना है"।इधर राजु की महत्वाकांक्षा को पर मिल जाते है और रोजी को सफ़लता के मुकाम पर ले जाते कदम डगमगा जाते है जुए और शराब में डुब जाता है। राजु अंदर ही अंदर मार्को से असुरक्षा महसुस करता है और इसी के चलते रोजी के जाली दस्तखत करने के अपराध में दो साल की कैद में चला जाता है।तीन घंटे की यह फ़िल्म फ़्लेश बेक से शुरु होती है। राजु जेल से छुटता है लेकिन आत्मग्लानि और बदनामी के कारण किसी दुसरे शहर का रास्ता पकड लेता है और बेक ड्राप में एस.डी. बर्मन की आवाज "यहां कौन है तेरा मुसाफ़िर जाएगा कहां....."चलते चलते एक गांव में पहुंचता है जहां गांव में उसे संत समझ लिया जाता है। चुंकि पढा लिखा होने की वजह से वो उनकी समस्याएं हल कर देता है.यही से शुरु होता है राजु का तीसरा जीवन। राजु अपने बचपन की कहानी उन्हे सुनाता है जो उसकी मां ने उसे सुनाई थी एक गांव में अकाल पडता है और बारिश के लिए एक संत ने १२ दिन का उपवास रखा था और फ़िर बारिश से उस गांव का अकाल दुर होता है।संयोग से उसी गांव में अकाल पडता है और गांव के लोग राजु को ही संत के रुप में इस उपवास के लिए विनती करते है,राजु घबरा कर भागने का उपक्रम करता है लेकिन लोगो की आस्था उसे ऐसा करने नहीं देती।वो बारह दिन उसे आत्म साक्षात्कार के करीब ले जाते है वो ईश्वरीय अनुभुती को महसुस करता है"ना सुख है ना दुख है ना दिन ना दुनिया,ना इंसा ना भगवान..मैं हुं बस मैं.।बारिश होती है गांव के लोग झुम उठते है उधर राजु अनंत यात्रा की ओर निकल पडता है।
एस.डी.बर्मन ने पुरी फ़िल्म के केनवास को बहुत खुबसुरती से अपने दस गानों से सजाया है.तीन घंटे कि फ़िल्म में चालीस मिनट बर्मन दा ने संगीतिय प्रतिभा बिखेरी है।जब एक गाने की रिकार्डिंग के बाद बर्मन दा बिमार हो गए तो उन्होने देव सा. को फ़िल्म छॊडने की पेशकश की थी तब देव सा.ने कहा था दादा आपका इंतजार करूगा या एक ही गाना फ़िल्म में होगा। बर्मन दा ने वो रंग उढेले कि आज भी ये गाने कानो से ज्यादा दिल से सुने जाते है। जैसे-"तेरे मेरे सपने" और "दिन ढल जाए"में मनोहारी दादा का आल्टो साक्स पुरे गाने में मुख्य साज के रुप एक ओरा सा खींच देता है जिसे सुनना एक सुखद अनुभुति से कम नहीं.एक अलहदा बात ये कि "मोसे छल किए जाए" और "पिया तोसे नैना"में पं.शिवकुमार शर्मा ने तबले पर अपनी उंगलियो का जादु बिखेरा था."वही तेरे मेरे सपने"गाने को जयदेव साहब ने कम्पोज किया था जो कि उस समय बर्मन दा के सहायक के तौर पर थे।
"गाईड"-फ़िल्म के अलावा वो दस्तावेज है जो वहीदा रहमान की नृत्य भंगिमाएं,देव सा. की अदाकारी,बर्मन दा का संगीत,विजय आनंद की दृश्य संयोजन निपुणता कहानी के मर्म को समझने के कई आयाम देती है।
विशेष: इस फ़िल्म का क्लाईमेक्स अहमदाबाद से 90 किमी. लिमडी गांव में फ़िल्माया गया,जहां एक सीन में देव सा. को एक सुंदर विदेशी महिला पत्रकार के रोल की आवश्यकता थी वो भी पांच घंटे में,उनके मित्र भरतशीन जी ने अहमदाबाद में राह चलते विदेशी कपल को इसके लिए तैयार किया और विदेशी महिला पर सीन फ़िल्माया.
फ़िल्म: गाईड
वर्ष: 6 फ़रवरी 1965
निर्माता:देव आनंद
निर्देशक: विजय आनंद
लेखक: आर.के.नारायण
संगीत: एस.डी.बर्मन
गीतकार: शैलेन्द्र
अंग्रेजी संस्करण द्वारा:टेड डेनियलवस्की और पर्लबक
अवार्ड:
  १३वां नेशनल फ़िल्म अवार्ड
    फ़िल्म फ़ेयर -बेस्ट फ़िल्म अवार्ड
 १४ वां फ़िल्म फ़ेयर -
 बेस्ट फ़िल्म अवार्ड
  बेस्ट एक्टर अवार्ड-देव आनंद
 बेस्ट डायरेक्टर अवार्ड-विजय आनंद
  बेस्ट नायिका अवार्ड-वहीदा रहमान
 बेस्ट स्टोरी अवार्ड-आर.के.नारायण
 बेस्ट डायलोग अवार्ड-विजय आनंद
 बेस्ट सिनेमेटोग्राफ़ी अवार्ड-फ़ली मिस्त्री
गीत:

  कांटो से खींच के     लता मंगेशकर      
 पिया तोसे नैना लागे रे     लता मंगेशकर      
 मोसे छ्ल किए जाए     लता मंगेशकर      
 गाता रहे मेरा दिल     लता मंगेशकर, किशोर कुमार      
 दिन ढल जाए     मो.रफ़ी      
तेरे मेरे सपने     मो.रफ़ी      
 हे राम    मन्ना डॆ      
मेघ दे    एस.डी.बर्मन      
 वहां कौन है तेरा.     एस.डी.बर्मन   
क्या से क्या हो गया        मो.रफ़ी
 
भयावह सच्चाईयों को उधेडती है-अमु (hit here for Link)

अमु
"जल कर खाक हुआ मकान और उसके बीच सहमी हुयी चार वर्षीया "अमु", उसका दो वर्षीय छोटा भाई अर्जुन उसे "अमु" कह कर बुलाता था, आंसु की धार उसके गालों पर सुख चुकी थी,शाम हो चली थी-सन्नाटे में उठते धुएं के बीच कुत्ते के भौकने की आवाज कपां देने वाली थी। कहते है ना कि-जिंदगी में कब उजली सुबह थोड़ी देर में काली स्याह हो जाए पता नहीं।सुबह की ही बात है,कच्ची ईंटो के घर में रहने वाला अति सामान्य सिक्ख परिवार अपने दो बच्चो के साथ सुबह के खाने की तैयारी कर ही रहा था कि बाहर कुछ साम्प्रदायिक बवंडर के आने की आहट हुयी,पिता अपने बच्चों को उनकी मां की सुरक्षा में छोड़ ये देखने गया कि आखिर बात क्या है,पिता को दंगाईयो ने मार दिया,मां बदहवास सी सहायता के लिए गुहार लगाने दौड़ी,पीछे-पीछे अबोध अमु भी,पुलिस,मंत्री-नेता किसी ने उसकी चित्कार ना देखी ना सुनी जबकि वो भीड़ उकसाने की कार्यवाही में व्यस्त थे,पथराई आंखे लिए मां जब घर लौटी तो जले घर में वो अपने बेटे और पति को खो चुकी थी...बची थी तो सिर्फ़ "अमु"।
सन 1984 के सिक्ख दंगो की पृष्ट भूमी पर सोनाली बोस द्वारा निर्देशित फ़िल्म "अमु"(2005) जो कि मुल भाषा अंग्रेजी में बनी है जिसका प्रिमियर बर्लिन और टोरंटो फ़िल्म फ़ेस्टीवल किया गया।निर्देशिका इसे भारतीय टेलीविजन पर भी रिलिज करना चाहती थी लेकिन सेंसर द्वारा ए-सर्टिफ़िकेट के साथ दस मिनट के कट के सुझाव दिए गए इसलिए ये फ़िल्म सन 2008 मे डीवीडी के माध्यम से अमीर खान द्वारा रिलिज की गयी।
बहरहाल, फ़िल्म की शुरुआत के कथानक में एक 21 वर्षीया अमेरिकन भारतीय लड़की काजु(कोंकणा सेन शर्मा) जो कि भारत (दिल्ली)  अपने रिश्तेदार के यहां मिलने आती है,उसे यहां कि हर बात चौंकाती है,जिसे हम असल भारत कहते है लोगो का रहन सहन,गंदी बस्तियां यहां के लोग।दिल्ली में घुमाने के लिए उसे एक साथी मिल जाता है कबीर(अंकुर खन्ना) जो यह समझता है कि बाहर से आए लोग सिर्फ़ एक शौक और कौतुभ के चलते इंडिया को अपने कैमरे में कैद करने के लिए आते है.लेकिन काजु इन सबके बीच अपने अतीत को खोज रही होती है।इन सबके बीच काजु की मां केया(वृंदा करात) भी अमेरिका से भारत आ जाती है।कम्युनिस्ट पार्टी एवं सामाजिक कार्यकर्ता वृंदा करात को अभिनय करते देखना बडा विस्मित करता है। काजु को चुंकि ये बात पता है कि उसे उसकी मां केया ने बचपन में दिल्ली की एक संस्था से गोद लिया था और वो एक बस्ती में पैदा हुयी थी इसके अलावा उसे और कुछ पता नहीं कि उसके मां बाप कौन थे? कहां रहते थे?दिल्ली आकर काजु को अपने अतित को जानने की तीव्रता बढ जाती है।वो बार बार अपनी मां केया व परिवार के अन्य सदस्यों से जानने की कोशिश करती है लेकिन सभी किन्ही वजहों से उसे टाल जाते है।लेकिन हार कर केया को बताना पडता है कि उसकी असल मां ने ही ये राज ना खोलने को कहा था। केया बताती है किस तरह उसे एक बच्ची और उसकी मां रिलिफ़ केम्प में मिली,किस तरह उसकी मां न्याय के दर-दर भटकी और हद तो तब हो गयी जब दोषी मंत्री ही रिलिफ़ केम्प मे कंबल बांटने आता है और केया की मां वो कंबल उसी मंत्री के मुंह पर फ़ेंक देती है अन्याय से हताश होकर वो मां आत्महत्या कर लेती है और बच्ची केया को सौप जाती है वो बच्ची ही अमु है।
निर्देशिका सोनाली बसु के अनुसार 1984 के दंगो पर अब तक कोई फ़िल्म नहीं बनी और इसी विषय पर उन्होने किताब भी अमु नाम से ही लिखी है।हांलाकि पटकथा के तौर पर फ़िल्म में इतनी कसावट तो नहीं है लेकिन कुछ भयावह सच्चाईयों को जरुर उधेड़ती है मसलन काजु एक विधवा कालोनी में पहुंच जाती है जहां दंगा ग्रस्त महिलाए रहती है,यहां पर एक बहुत तंज बात महिला द्वारा कही गयी कि "इंदिरा गांधी के हत्यारों को तो फ़ांसी पर चढा कर न्याय कर लिया लेकिन हमें न्याय कब मिलेगा"।
अंत में गोधरा कांड की न्युज फ़्लेश के साथ समाप्त होती है.ये फ़िल्म कोई समाधान नहीं देती लेकिन घटनाओं को बिना किसी पुर्वाग्रह के जस का तस कहने का साहस रखती है.ये समझना मुश्किल है कि क्या सांप्रदायिक बवंडर के आगे शासन और प्रशासनिक शक्तियां नतमस्तक हो जाती है?
 फ़िल्म: अमु
 वर्ष: 2005
निर्माता:बेडाबार्टा पेन
निर्देशक: सोनाली बोस
लेखक: सोनाली बोस
संगीत: नंदलाल नायक
भाषा: अंग्रेजी/हिन्दी डब
अवार्ड:
   2005: नेशनल फ़िल्म अवार्ड-बेस्ट फ़िचर फ़िल्म(इंग्लिश)
    2005: एफ़.आई.पी.आर.ई.एस.सी.आई. क्रिटीक आवार्ड
    2005: गोलापुडी श्रीनिवास नेशनल आवार्ड -बेस्ट डेब्यु डायरेक्टर
    2005: टिन एज चाईस अवार्ड,टोरिनो इटली(सिने डोन फ़िल्म फ़ेस्टीवल)
    2005: ज्युरीअवार्ड,टोरिनो इटली(सिने डोन फ़िल्म फ़ेस्टीवल)
    2006: स्टार स्क्रिन अवार्ड-बेस्ट इंग्लिश फ़िल्म

-योगेन्द्र व्यास
 
तीसरी मंजिल बनाम पंचम (hit here for Link)

तीसरी मंजिल बनाम पंचम
जिस समय नासिर हुसैन और विजय आनंद तीसरी मंजिल की पटकथा पर खडॆ हो कर सस्पेंस थ्रिलर रच रहे थे वही राहुल देव बर्मन- बोसानोवा,लेटिनो,राक,जाज का वो बेहतरीन घोल तैयार कर रहे थे जो आने वाले दशको तक संगीत के रसिको को मदहोश करने वाला था।
गीतकार गुलशन बावरा ने उस समय के ख्यात संगीतकार जयकिशन जी (शंकर-जयकिशन) से पुछा कि आपको आज के दौर के संगीतकारो में किससे ज्यादा प्रतिस्पर्धात्मक भय लगता है,तब उन्होने कहा था "आज के दौर में मुझे एस.डी.बर्मन के बेटे राहुल देव बर्मन से ज्यादा से भय लगता है, ये लडका इतनी खुबसुरती से साउंड मिक्सिंग करता है कि ये आने वाले समय में म्युजिक ट्रेंड सेटर होगा और नए जमाने के संगीत के साथ लम्बे समय तक राज करेगा"।
ये बात गौर तलब है कि उस दौर में शम्मीकपुर के पसंदीदा संगीतकार शंकर-जयकिशन एवं ओ.पी. नैयर थे और तीसरी मंजिल फ़िल्म के लिए जयकिशन जी,सचिन भौमिक और मजरुह सुल्तान पुरी ने आर.डी. के नाम की सिफ़ारिश की और बकायदा आर.डी. ने शम्मीकपुर को धुनों का आडीशन दिया था,और सम्मोहित करने वाली धुन को सुनकर शम्मी ने कहा था-तुम ही मेरे संगीतकार हो पंचम।
नासिर हुसैन पहले ये फ़िल्म  देवाआनंद के साथ करने वाले थे लेकिन गाईड फ़िल्म की तैयारी के चलते वे रोल नहीं कर सके. नासिर हुसैन ने शम्मी कपुर को एच.एस.रवैल के घर से ताश की बीच बाजी में से उठाकर उन्हे तीसरी मंजिल के लिए राजी किया।
तीसरी मंजिल फ़िल्म की कहानी पर बात करने का ज्यादा मन नहीं है,क्योकि ये एक सस्पेंस,मर्डर थ्रिलर फ़िल्म है फ़िर भी -संक्षेप में - राकी(शम्मी कपुर ) एक होटल में राक सिंगर एवं ड्र्मर है और वो एक लडकी रुपा को होटल की तीसरी मंजिल से कुदते हुए देखता है, जो कि पहले राकी को सबके सामने अपने प्यार का इजहार कर चुकी है।रुपा की छोटी बहन सुनिता(आशापारेख ) राकी को ही अपनी बहन की मौत का जिम्मेदार मानती है। लेकिन राकी अपनी पहचान छुपा कर सुनिता को अपनी मोहब्बत के आगोश में ले लेता है...और इन सबके बीच रुपा की मौत हत्या है या आत्महत्या इसकी खुफ़िया पडताल और मुजरिम की चालों के बीच ये फ़िल्म अंत में असल मुजरिम को पकड्ने में कामयाब होती है।
इस फ़िल्म को हिट होने में मुख्य रुप से पंचम के संगीत का योगदान था,तो बेहतर यही होगा कि इस फ़िल्म से जुडे संगीत के दिलचस्प पहलुओ पर बाते की जाए।
इस फ़िल्म में पंचम ने पारंपरिक संगीत से हट कर अपने आर्केस्ट्रा में ब्रास सेक्शन को मुख्य धारा में जोडा जैसा कि-"ओ हसीना जुल्फ़ो वाली ...." में ड्र्म,ट्र्म्पेट,एकास्टिक्स गिटार,साक्स और वो "अंजाना ढूंढती हुं....." के बाद खली जगह को ट्राइऎंगल पर्क्युजन से बहुत ही खुबसुरती से भरा गया है। इस गाने में अस्सी वादको का पुरा हुजुम था और नोट्स और बीट को इतनी फ़ुर्ती से चेंज करना,वाकई जब रिकार्डिंग सुनते है तो अचंभा होता है, जबकि उस समय रिकार्डिंग तकनीकी इतनी उन्नत नहीं थी.. एक बार फ़िर से सुने ये गाना एक नए अंदाज में जाहिर है पंचम को दाद देने का तो मन करेगा ही......
कुछ लोग परदे के पीछे रह कर वो काम करते है कि हमें उनका नाम तक पता नहीं चल पाता जैसे कि "ओ हसीना" और "तुमने मुझे देखा" गाने में "लेसली गोडीन्हॊ ने" ड्र्म पर अपनी स्टीक का जादु चलाया था और वही परदे पर "सलीम खान" ने हेलन के साथ इसे अदा किया था जो आगे चलकर उनकी बेगम बनी. "आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा .." में लिड गिटार दिलीप नायक ने सम्हाला था जो टुकडा उन्होने बजाया था-शायद उसे जस का तस उठाना उतना ही कठिन है।"ओ मेरे सोना रे..." वो पहला गाना था जिसमें पहली बार इलेक्ट्रिक आर्गन का उपयोग हुआ और जिसे केरसी लार्ड ने बजाया था और ये गाना पहाडी धुन पर आधारित था।  तीसरी मंजिल ने पंचम को उन कलाकारों का साथ दे दिया जो पंचम को सफ़लता के सातवें आसमान तक पहुंचाने में साथ खडे रहे,उनमें से है...मनोहारी सिंग,लार्ड फ़ेमेली-केरसी,कवास,बिजुर,भानुगुप्ता,बासुदेव चक्रवर्ती,मारुतीराव कीर,देवीचंद चौहान,होमीमुलीन इत्यादि।
ये फ़िल्म बाक्स-आफ़िस पर एक म्युजिकल हिट के रुप में हमेशा याद की जाएगी लेकिन अफ़सोस इसे फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड में फ़ेयर नामिनेशन नहीं मिल सका.....लेकिन बात तो वही है जो आवाज और साज लोगो के दिल पर चढ कर बोले वो ही तो सच्चा अवार्ड है।
पंचम ने मुख्य रुप से उन सब धाराओं को तोडा है और एक ऐसा मेलोडी संगीत संसार रच कर दिया है जिसमे बस सुनने वाला  हौले से कभी गिटार स्ट्रिंग पर फ़िसलता है तो कभी ट्रंपेट के उठाव को अपने दिल पर महसुस करता है और वहीं ड्र्म स्टीक पुरे शरीर में एक मीठा सा कंपन पैदा करती है। अब ये पंचम की शिराओं में बहने वाले नोटेशन ही तो है जो आज भी साजो में दौडते है।फ़िल्म भी देखिए और इन गानो को पंचम के अंदाज में सुनिए एक नया आयाम संगीत में पाएंगे फ़िर चाहे आप संगीत के जानकार हो या ना हो।
विशेष: आशा जी ने विशेष जयमाला रेडियो शो में बताया था कि मो. रफ़ी सा. का "आजा आजा" गाना.... तीसरे टेक में रिकार्ड हुआ क्योकि पंचम उसके उठाव से संतुष्ट नहीं हो पा रहे थे।
फ़िल्म: तीसरी मंजिल
वर्ष: १९६६
निर्माता: नासिर हुसैन
निर्देशक:विजय आनंद
लेखक: नासिर हुसैन
संगीत: आर.डी. बर्मन
गीतकार: मजरुह सुल्तानपुरी
गीत:
"तुमने मुझे देखा हो कर....मो. रफ़ी.
"ओ मेरे सोना रे सोना .....मो. रफ़ी/आशा भोंसले.
"ओ हसीना जुल्फ़ों वाली जाने जहां.......मो. रफ़ी/आशा भोंसले.
"आजा आजा मैं हुं प्यार तेरा .......मो. रफ़ी/आशा भोंसले
"देखिए साहिबान वो कोई और थी.......मो. रफ़ी/आशा भोंसले
"दीवाना मुझसा नहीं इस अंबर के नीचे......मो. रफ़ी

-योगेन्द्र व्यास
 
दुख अपने लिए रख- "आनंद" सब के लिए-(फ़िल्म -आनंद) (hit here for Link)
दुख अपने लिए रख- "आनंद" सब के लिए

जीवन किसी कांपते हुए पत्ते पर पडी ओंस की बुंद के समान है, कुछ जीवन पत्ते पर ज्यादा समय ठहर जाते है और कुछ जल्दी अपनी चमक बिखेर कर जल्दी ही ओझल हो जाते है..."जिंदगी कैसी है पहेली ये हाए ...कभी तो हंसाए कभी ये रुलाए........राजेश खन्ना की उन सभी अदाओं और अदाकारी को श्रध्दांजली- जो उनके चाहने वालो के जहन में जिंदादिल बन कर स्फ़ुर्त होती है।रीषिकेश मुखर्जी को "दर्द में मुस्कराहट ढुंढ्ने की महारत उन मध्यम-वर्गीय परिवारों से मिली जहां उन्हे जिंदगी के रंग एक खरदरे केनवास की मानिंद महसुस होते थे तभी तो उनकी फ़िल्मों में सुपरस्टारियत एक आम आदमी के किरदार में खो सी जाती है, २.८९५ किमी. लम्बी फ़िल्म "आनंद" जिसकी हर फ़्रेम में हम अपने आप को जुडा पाते है और किरदार के साथ हंसते -हंसते अचानक आंखों में नमी महसुस करने लगते है और अंत में यही ख्याल आता है कि जिंदगी लम्बाई से ज्यादा गहरी भी हो तो शायद ज्यादा खुशनुमा हो सकती है।कुछ किरदार निभाने के बाद वो हमेशा के लिए अमर हो जाते है जैसे कि आनंद सहगल(राजेश खन्ना) एक ऐसे जिंदादिल इंसान की कहानी है जो कि कैंसर(लिंफ़ोसरकोमा आफ़ इंटेस्टाइन) पिडीत होते हुए भी जिंदादिली से हंसकर उसका सामना करता है।जिंदगी में उसका कॊई नजदिकी रिश्तेदार नहीं है इसीलिए वो एक जगह कहता है कि "काश इंसान दोस्तो की तरह अपने रिश्तेदार भी चुन सकता.।" वही दुसरी ओर डा.भास्कर बेनर्जी-’बाबु-मोशाय’(अमिताभ बच्चन) जो कि खुद एक डाक्टर है लेकिन लोगो की गरीबी तंगहाली की वजह से हताश है-जो अपनी डायरी में लिखते हुए कहता है कि "दुख,बिमारी,गरीबी से लडा जा सकता है लेकिन भुख से कैसे लडा जा सकता है,जिनके पास खाने को नहीं उनको विटामिन देने से क्या फ़ायदा,लोगो के पास नमक खरीदने के लिए पैसे नहीं दवा खरीदने के लिए कैसे कहुं......"सचमुच इन बीते सालो में समय बदल गया लेकिन ये सच्चाई आज भी उतनी ही कढवी है। इसी दौरान डा.भास्कर की मुलाकात डा.प्रकाश(रमेश देव) के मार्फ़त आनंद सहगल से होती है और ये मुलाकात डा. भास्कर के जीवन में वो रंग भरती है कि वो आनंद को मरते हुए नही देखना चाहता और फ़िल्म का हर वो किरदार जो फ़्रेम में आता है आनंद सहगल से जुडता चला जाता है।महत्वपुर्ण बात ये कि यदि ये पता हो कि परिवार का कोई सदस्य अब ज्यादा दिन इस दुनिया में नहीं रहने वाला है तो वो अपनी मौत को अपने ही लोगो के चेहरे पर देखकर हताशा सी महसुस करता है-" हम आने वाले गम को खींच-तान कर आज की खुशी पर ले आते है।"आनंद किरदार का एक मजेदार पहलु ये कि वो राह चलते अजनबी शख्स को पीठ पर धौल जमा कर मुरारीलाल कहकर अपना दोस्त बना लेने की अदा के चलते उसकी मुलाकात ईसा-भाई(जानी वाकर) से हो जाती है और इसे कहते है अदाकारी- जानी वाकर मेहमान कलाकार के तौर पर दर्शकों के आंसु चुराकर ले जाते है और अपने छोटे से रोल से ईसा-भाई के पात्र को हमेशा के लिए यादगार बना कर छोड गए."...कह गए- दुख अपने लिए रख आनंद सब के लिए...."
आनंद फ़िल्म की एक विशेषता इसका बेक ग्राउंड स्कोर जो कि पात्र की आदाकारी को उसके चरम तक ले जाता है जहां सेक्साफ़ोन को बहुत ही उम्दा तौर पर इस्तेमाल किया है ,कहते है ना कि सलील चौधरी का संगीत केवल कानो में नहीं शरीर पर मुलायम थपकी देता है......डा. भास्कर और आनंद के बीच का भावातिरेक ही उनके अभिनय की जान है,ये राजेश खन्ना की पकी हुयी उम्दा अदाकारी और अमिताभबच्च्न की परिपक्व होती अदाकारी को देखना बहुत सुखद अनुभव है। गुलजार साहब के उम्दा संवाद पुरी फ़िल्म को एक आभामंडल देते है मसलन-"भगवान से सुख नहीं शांति मांगना चाहिए.."हर एक पात्र को इस फ़िल्म में बहुत करीने से गढा गया लगता है......इन आंखो को थोडा डबडबाने दे.....भावातिरेक के चरम पर थोडी देर ठहर कर देखिए बहुत हल्का महसुस करेंगे आप............यही राजेश खन्ना को सच्ची श्रध्दांजली होगी......
विशेष: "पहले रिषिकेश मुखर्जी ये रोल किशोर कुमार और मेहमुद को देने वाले थे लेकिन किसी गलत फ़हमी के चलते ये पात्र राजेश खन्ना और अमिताभ की जिंदगी की पटकथा लिख गए....."
फ़िल्म: आनंद
वर्ष: १९७१
निर्माता: रिषिकेश मुखर्जी,एन.सी. सिप्पी     
निर्देशक:रिषिकेश मुखर्जी,एन.सी. सिप्पी
लेखक: बिमल दत्ता,गुलजार
संगीत: सलील चौधरी
गीतकार: गुलजार,योगेश
गीत:
जिंदगी कैसी है पहेली .......मन्ना डे/गीत-योगेश
कहीं दुर जब दिन ढल जाए....मुकेश/गीत-योगेश
मैने तेरे लिए ही सात रंग के सपने.....मुकेश/गीत-गुलजार
ना जिया लागे ना.......लता/गीत-गुलजार
फ़िल्म अवार्ड:
 1971: नेशनल फ़िल्म अवार्ड -बेस्ट फ़िल्म
 1972: फ़िल्म फ़ेयर -बेस्ट फ़िल्म अवार्ड
1972:  फ़िल्म फ़ेयर -बेस्ट एक्टर अवार्ड-राजेश खन्ना.
1972:  फ़िल्म फ़ेयर -बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर अवार्ड-अमिताभ बच्चन.
1972:  फ़िल्म फ़ेयर -बेस्ट डायलाग अवार्ड -गुलजार
1972:  फ़िल्म फ़ेयर -बेस्ट एडिटींग अवार्ड-रिषिकेश मुखर्जी.
1972:  फ़िल्म फ़ेयर -बेस्ट स्टोरी अवार्ड-रिषिकेश मुखर्जी.

-योगेन्द्र व्यास
yvyas2010@gmail.com
 
एक रुका हुआ फ़ैसला.... (Hit here for Link)

एक रुका हुआ फ़ैसला........
कल्पना करे कि अदालत की ओर से आपको एक ऐसे 12 लोगो के ज्युरी दल में शामिल किया जाता है जिसमें आपको एक ऐसे नवयुवक मुल्जिम के बारे में फ़ैसला देना है जिस पर अपने पिता के खुन का इल्जाम है।फ़ैसला एक मत से होना चाहिए,यदि आपका फ़ैसला "कुसुरवार" का आता है तो उस लडके को सजा-ए-मौत मिलना तय है । कोर्ट में जिरह के दौरान वकील दो गवाह और परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर युवक को दोषी साबित कर देता है लेकिन कोर्ट एक मौका ज्युरी मेंबर को देती है।
बासु चटर्जी द्वारा निर्देशित फ़िल्म "एक रुका हुआ फ़ैसला" जिसमें बारह ज्युरी मेंबर को एक बंद कमरे में हत्या के आरोपी युवक का फ़ैसला करने को कहा जाता है तथा ताकिद की जाती है कि कोई भी ज्युरी मेंबर फ़ैसला होने तक कमरे के बाहर नहीं जा सकता और ना ही उन्हे फ़ोन करने की इजाजत है,और यही से शुरु होता है एक बंद कमरे में 1 घंटे 17 मिनट का वो फ़िल्मांकन जहां से खुद कैमेरा भी बाहर नहीं जाता,देखने वाला खुद अपने को ज्युरी का एक हिस्सा मानने लगता है।
ज्युरी में अलग-अलग व्यवसाय ,सोच, उम्र और तबके लोग है...और लगता है अरे! ये तो अपने ही चेहरे है.ज्युरी के लोग ये मानकर ही अंदर आते है कि युवक अपने पिता की हत्या का दोषी है और पांच मिनट में ये फ़ैसला सर्वसम्मति से हो जाएगा और कोर्ट को जाकर सुचना दे आएंगे कि युवक "कसुरवार" है....इसी उहापोह में वोटिंग की जाती है कि सब एक मत से कसुरवार की वोटिंग कर दे  ...लेकिन इनमें से ८ नबंर के ज्युरी के.के. रैना युवक को "बेकसुर"कह कर अपना मत 11 के मुकाबले 1 से यह कह कर खारिज कर देते है कि "मुझे भी मालुम नहीं कि युवक दोषी है या नहीं लेकिन हमें कम से कम बातचीत कर उन तथ्यों पर फ़िर से गौर करना चाहिए कि जिस आधार पर उसे दोषी ठहराया गया है क्योकि- ये किसी की जिंदगी और मौत का सवाल है। लेकिन क्या जुरी नं 8 के साथ और लोग आ पाते है या नहीं ये जनने के लिए आपको 1 घंटे 17 मिनट देना होगा। लेकिन हां यही से उजागर होते है समाज के वो सारे चेहरे जो शायद जो हमें इन बारह लोगो में नजर आते है। कुछ अपने पुर्वाग्रहों से ग्रसित चेहरे,कुछ निहायत ही उज्जड, सफ़ेदपोश बदतमीज,गैर-जिम्मेदार,कुछ ऐसे जिनकी अपनी कोई निजी राय नहीं ,कुछ दुसरो की राय को अपनी राय बना कर चलने वाले,कुछ वो लोग जो सोचने समझने की क्षमता तो रखते है लेकिन बोलने से डरते है,कुछ लोग जो ड्ट कर अकेले खडे होते है और अपनी योग्यता के बल पर लोगो को एकजुट करने का प्रयास करते है।
इस फ़िल्म को देखने के बाद दिमाग की वो सारी परते भी उघडती जाती है कि क्या न्याय का सिद्धांत वाकई काम करता है,कमेटी में शामिल लोग क्या वाकई अपने निज पुर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं होते, क्या समाज जिन्हे हम चुनकर भेजते है वो क्या वाकई बुध्दिमतता व निष्पक्षता से अपना कार्य करते होंगे,क्या वाकई ईमानदार लोगो की आवाज को सुना जाता होगा,क्या वाकई क्षेत्रियता,जातियता,तबकावाद निर्णयों को प्रभावित करते है.लेकिन ये फ़िल्म अंदर ही अंदर ये भी संदेश दे जाती है कि यदि हम सुक्ष्मता और निष्पक्षता से तथ्यों पर सामुहिक विचार करे तो शायद हम एक बेहतर न्याय व्यवस्था को कायम कर एक उन्नत समाज का निर्माण कर सकेंगे.....
चुंकि इस फ़िल्म में नाच गाना मनोरंजन नहीं है इसलिए इसे पुरुस्कार ना मिलना भी प्रश्न तो खडा करता ही है।
ये फ़िल्म उन सभी कलाकारो को भी सेल्युट है विशेष कर पंकज कपुर,अन्नुकपुर जिन्होने अपने दमदार अभिनय से हर उस दर्शक को एक कमरे में अपने साथ उन बारह ज्युरी में शामिल कर लेते है और अंत में दर्शक खुद को जिम्मेदार ज्युरी के रुप महसुस कर ये जान लेता है कि जीवन में उसके फ़ैसलों की कसौटी कैसी होगी....

विशेष : ये फ़िल्म- "12 एग्री मेन(1957)" का रिमेक है जिसे सिडनी ल्युमेट ने निर्देशित किया था.
फ़िल्म: एक रुका हुआ फ़ैसला
वर्ष: २३ जुलाई १९८५
निर्माता: बासु चटर्जी
निर्देशक:बासु चटर्जी
डायलाग: रंजीत कपुर
संगीत: सपन चक्रवर्ती

-योगेन्द्र व्यास
 
अभी भी पोलियो ग्रस्त ही है हिन्दुस्तान..... (फ़िल्म-कुंआरा बाप) Hit here for Link

हिन्दुस्तान अभी भी पोलियो ग्रस्त ही है....
 मजरुह साहब की ये लाइने मेहमुद जब परदे पर किशोर दा की आवाज में गाते है कि-" हम आजाद है मिस्टर क्या इंसा और क्या जनवर,.......,कुत्ता गद्दे पर सोये मानव चादर को रोये,जिंदगी लगती है गाली...."तब समझ आता है कि ये फ़िल्म कुछ तगडा संदेश देने वाली है। महेश रिक्शावाला(मेहमुद) एक गरीब सहृदय इंसान है और रिक्शा के पैडल पर अपनी तंग जिंदगी को तीन पहियो के सहारे हंसी-खुशी बिताने की ख्वाहिश रखता है।लेकिन जीवन में खुशी की मियाद कितनी होती है ये आज तक कोई ग्यारंटीड तौर पर बता नहीं पाया.महेश रिक्शावाला को एक नवजात बच्चा मंदिर की सीढियों पर बिलखता हुआ मिलता है, दयावश वो उसे उठाकर उसके मां बाप को ढुंढने कि चेष्टा करता है, लेकिन जब नियति को कुछ और ही मंजुर हो तो भला गरीब आदमी की तो कोई बिसात ही नहीं, महेश मंदिर के पंडित और दरोगा को लाख कहता है कि "साहब ये बच्चा मेरा नहीं है,मेरे खुद के खाने के वांदे है तो ये बच्चा कहा से पालुंगा" उसकी एक ना चलती है और बच्चे को उसी का समझकर उसके हवाले कर दिया जाता है.मेहमुद की अदाकारी में उन साठ वर्षो की गहराई नजर आती है जो उन्होने फ़िल्म इंडस्ट्रीज के उथले समंदर से पाई थी।
महेश एक कुंआरे बाप के रुप में बच्चे को पालने की चुनौती स्वीकार करता है और गरीब बस्ती में बच्चे के आगमन का जश्न और कोरस गाना "सज रही गली मेरी मां....."जिसे मो. रफ़ी सा. ने स्वर दिए थे -ये गाना वार्षिक बिनाका गीत माला के पहले पायदान पर बजा था"।महेश बच्चे का नाम हिन्दुस्तान रखता है लेकिन दुर्भाग्यवश बच्चा पोलियो ग्रस्त हो जाता है। दरअसल ये पुरी फ़िल्म की जमीन मेहमुद ने तभी तैयार की थी जब खुद का बेटा मेकी पोलियो का शिकार हुआ था। मेहमुद को जे.जे. हास्पिटल के डा.उदानी ने जमकर लताड लगाई थी-जब मेहमुद ने सिर्फ़ ये पुछा था कि ये पोलियो क्या होता है।उसके बाद मेहमुद ने तय किया कि इस विषय एक संदेश परक फ़िल्म बनाउंगा और अपने खुद के बेटे मेकी को कास्ट किया और डा. उदानी वाला प्रसंग जस का तस संजीव कुमार पर फ़िल्मांकन किया और एक उम्दा संदेश परक फ़िल्म को निर्देशित किया।     ये फ़िल्म इतनी यथार्थ परक है कि यदि इस फ़िल्म को उस वक्त हर गांव हर शहर में दिखाया जाता तो शायद "एक बुंद जिंदगी की" पर आज इतना खर्चा भारी नहीं पडता।
....बेहद मार्मिक प्रसंग मेहमुद ने किये कि आंसुओं को थामना मुश्किल हो जाता है. राजेश रोशन ने दिल को छु लेने वाला संगीत दिया विशेष कर लोरी वाला गाना.....सच मानिए दिल भर आता है.....संगीत निर्देशक के रुप में ये उनकी पहली फ़िल्म थी।
अचानक बच्चे के असल मां बाप प्रकट होते है और बच्चे को ले जाने की जिद करते है। असहाय भावुक कुंआरा बाप जिसने अपनी जवानी बच्चे को पालने पोसने में लगाई लेकिन वो ही लोग जिन्होने बच्चे को जबरजस्ती महेश को सौपा था अब वे ही उस पर कोर्ट में बच्चा चोरी का इल्जाम लगाते है,जब ये सीन देखते है तो लगता है ये किरदार आज भी हमारे ही देश में आसपास मौजुद है.........मेहमुद तुमने सच ही कहा था "हिन्दुस्तान अभी भी पोलियो ग्रस्त ही है....." अंत में मेहमुद अपनी मौत के साथ बहुत सारे संदेश दे जाते है ...जो शायद आमीर खान आज कर रहे है...
अपने समय की सफ़ल फ़िल्म जिसे भले ही कोई अवार्ड ना मिला हो लेकिन यदि निर्देशक दर्शको के आंसु चुरा कर समाज को संदेश दे जाए वो ही उसका बेहतर अवार्ड है........
नोट: मेहमुद की पत्नि ट्रेसी ने मेकी को स्कुल में एडमीशन ना दिए जाने पर काफ़ी हंगामा खडा किया था जिसे मेहमुद ने फ़िल्म में फ़िल्मांकन किया जो प्रभावी बन पडा.
फ़िल्म: कुंआरा बाप
वर्ष: 23 नवंबर 1974
निर्माता: अमरलाल छाबरिया
निर्देशक:मेहमुद
संगीत: राजेश रोशन
गीतकार: मजरुह सुल्तानपुरी
गीत:
1.सज रही गली मेरी......     मो.रफ़ी,मेहमुद
2  मैं हुं घोडा ये है गाडी....किशोरकुमार,मेहमुद   
3  जय भोलेनाथ जय हो प्रभु......किशोरकुमार,लता मंगेशकर
4 आ री निंदिया.... किशोर कुमार,लता मंगेशकर,मेहमुद
-योगेन्द्र व्यास
9425061538

रिश्तों के बनते बिखरते बहाव को पिरोया था "आंधी" में.....(Click for Link)

रिश्तों के बनते बिखरते बहाव को पिरोया था "आंधी" में.....(click for link)

जिंदगी में रिश्ते गुनगुनी धूप के समान होते है..जरा तेज आंच लगी नहीं कि हम पीठ फ़ेर कर बैठ जाते है। गुलजार साहब की फ़िल्मों में सामाजिक और पारिवारिक रिश्तो के उतार चढाव के स्पंदन को बहुत ही सहज भाव से महसुस किया जा सकता है,वो ऐसे कि- कहीं एकाकी जज्बात टुट कर-गर बह निकले तो हौले से अपनी हथेलियों में थामने की इच्छा हो जाए........"जी में आता है, तेरे दामन में, सर छुपा के हम रोते रहें, रोते रहें तेरी भी आँखों में, आँसुओं की नमी तो नहीं......" जब गुलजार ने तन्हाईयों को अपनी कलम में समेट कर पन्नो पर ढुलकाया होगा तो ये ही गीत शायद फ़िल्म "आंधी" की नजाकत को बयां करने की वजह रहा होगा। कमलेश्वर के उपन्यास "काली आंधी" पर आधारित गुलजार द्वारा निर्देशित फ़िल्म "आंधी" एक दम्पत्ति के अहं और महत्वकांक्षा की कहानी है जिसमें बनते-बिखरते रिश्तो के बहाव को बखुबी पिरोया गया है। पात्र आरती देवी (सुचित्रा सेन) जो कि अमीर पिता की इकलौती संतान आक्सफ़ोर्ड से शिक्षित है तथा एक राजनितिग्य बनने की महत्वाकांक्षा भी रखती है लेकिन व्यवसायी पिता की इच्छा के विपरित होटल मैनेजर जे.के.(संजीव कुमार) से प्यार और फ़िर शादी कर बैठती है। लेकिन गुलजार की गुलजारियत कहा रुकने वाली थी प्यार का तिलिस्म रचना कोई गुलजार से सीखे बहुत ही मीठे और गुदगुदाने वाले प्रसंग संजीव कुमार और सुचित्रा सेन के बीच रचे "....इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त क़दम रस्ते कुछ तेज़ क़दम राहें,पत्थर की हवेली को शीशे के घरौंदों में तिनकों के नशेमन तक इस मोड़ से जाते हैं"। एक बार जी.पी. सिप्पी साहब ने कहा था ये गुलजार भी क्या लिखता है...कुछ समझ नहीं आता लेकिन लिखता कमाल का है....जैसे पंचम दा  ने ये गाना बनाते हुए चुटकी ली थी और गुलजार से पुछ बैठे थे "ये... नशेमन कौन सा शहर है यार" । बहरहाल-  आकांक्षाओं और इच्छा के आगे निज-संबंधो को लम्बे ग्रहण का सामना करना पडता है। आरती देवी राजनिति के लिए पति,बेटी व घर त्याग देती है वही जे.के. का अहं भी पत्नि को वो करने की स्वतंत्रता नहीं देता जो वो करना चाहती है। इस फ़िल्म पर एक ग्रहण तब भी लगा जब इस फ़िल्म को स्व. इंदिरा गांधी के जीवन से जोड कर देखा गया और इसके प्रदर्शन पर इमरजेंसी के दौरान बैन लगा दिया वही मुल रुप से ये कहानी राजनितिग्य तारकेश्वरी सिन्हा के जीवन से प्रेरित भी बताई जाती है। ये उस दौर की फ़िल्म है जब दीवार और शोले जैसी फ़िल्मे क्रमश: जनवरी और अगस्त १९७५ में आई और इनके बीच "आंधी" फ़रवरी १९७५ को लेकिन ये फ़िल्म बाक्स आफ़िस पर तो नहीं लेकिन लोगो के दिलो पर बहुत भारी रही। २३वें फ़िल्म फ़ेयर में संजीव कुमार को बेस्ट एक्टर और गुलजार को बेस्ट डायरेक्टर क्रिटीक अवार्ड दिया गया।
खैर.....ये कहानी ९ साल बाद फ़िर आरती देवी को अपने पति जे.के. के सामने लाकर खडा कर देती है और फ़िर जज्बातों के पिघलने की कसमसाहट को देखना इस फ़िल्म का मुख्य भाग है। ".....ये जो चांद है ना इसे रात में देखना ....य़ॆ तो रोज निकलता होगा....हां..बीच में अमावस्या आ जाती है वैसे तो ये पंद्रह दिन की होती है लेकिन इस बार बहुत लम्बी थी......नौ बरस लम्बी थी ना....".....वैसे .कहते है ना कि-जीवन की भाग-दौड, शोर-गुल के बीच कहीं भीतर सन्न्नाटा पसरा होता है और उस सन्नाटे के भीतर दफ़न अतित का चेहरा...और जब ये अतित एकदम सामने आ जाए तो जज्बातो का सैलाब उन बिते सालो को कम करने की कोशिश में जुट जाता है और यही इस फ़िल्म में संजीव कुमार और सुचित्रा सेन की अदाकारी में बार-बार देखने का मन करता है ब्रिंदा काका(ए.के.हंगल) जिन्होने अपने छोटे से रोल ने बहुत ज्यादा प्रभावित किया..... अंत में ये देखना सुखद है कि एक पति अपनी पत्नि को जीतते हुए देखना चाहता है और उसे विजयी भाव के साथ विदा करता है।
रिश्तो की उन्मुक्ततता एवं एकात्मकता जीवन में ज्यादा लय भरती है ठीक उसी तरह जैसे गिटार में तार साथ-साथ होते है लेकिन उनकी अपनी स्वतंत्र पहचान होती है लेकिन बंधे भी एक ही घूंटी से होते है लेकिन जरा तारो को छेड भर दो कितना मीठा सुर देते है...क्या हमारे जीवन में ऐसे सुर नहीं निकल सकते.......और ये ही गुलजार सा. कहना भी चाह्ते थे।
पंचम,गुलजार,लता,किशोर के सुरो की साजिश और सितार और एकार्डियन का सम्मोहन इन गानो से बाहर ही आने नहीं देता.....
"कहाँ से चले कहाँ के लिये ये खबर नहीं थी मगर कोइ भी सिरा जहाँ जा मिला वहीं तुम मिलोगे.................."
कुछ फ़िल्में हमारी जिंदगी का आइना होती है....आओ समय निकाल कर अपनी तस्वीर ही निहार ले।


फ़िल्म: आंधी
वर्ष: १३ फ़रवरी १९७५
निर्माता: जे.ओम प्रकाश
निर्देशक:गुलजार
लेखक: कमलेश्वर
संगीत: आर.डी.बर्मन
गीतकार: गुलजार
गीत:
इस मोड से जाते है.......किशोर/लता
तेरे बिना जिंदगी से कोई....किशोर/लता
तुम आ गये हो नुर आ गया है.....किशोर/लता
सलाम कीजिए.......मो. रफ़ी,अमित कुमार,भुपिन्दर
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड:(२३वें १९७६)
बेस्ट डायरेक्टर (क्रिटिक)-गुलजार
बेस्ट एक्टर-संजीव कुमार
-योगेन्द्र व्यास
९४२५०६१५३८
 
रुपहला सफ़र:हिरो से जोकर बन जाना पडता है.....



प्यार कोई ऐसी चीज नहीं कि एक ही बार हो जाए बल्कि प्यार तो ऐसा फ़ितुर है कि बार-बार हो जाए, और ये ही प्रश्न राजकपुर की हर फ़िल्म के बाद लोग उनसे करते रहे कि उनकी नायिकाएं उनकी जिंदगी में क्या अहमियत रखती है तो उन्होने एक कलाकार की हैसियत से ईमानदारी से जवाब दिया कि -"पत्नि मेरी नायिका नहीं है और नायिका मेरी पत्नि नहीं है"। जिंदगी को जी लेना और जिंदगी को पी लेना इसमें एक महीन फ़र्क है,जिसने जिंदगी को उसकी अंतिम बुंद तक पिया हो वो ही सही मायने में साहसी कहलाता है वरना खालिस जिंदगी जी लेना कोई खास बात नहीं|  राजकपुर एक ऐसे कमर्शियल फ़िल्म कार थे जिन्होने कभी व्यवसाय को जज्बातों से अलग नहीं रखा और ये ही बात एक निर्माता निर्देशक को कुछ अलहदा बानती है| उनकी  फ़िल्म "आवारा" विश्व की उन बेहतरीन सौ फ़िल्मो में शुमार हुयी है और होना भी चाहिए लेकिन जो फ़िल्म राजकपुर के दिल के बेहद करीब थी वो है "मेरा नाम जोकर" और "जागते रहो"। भले ही मेरा नाम-जोकर कमर्शियल तौर पर असफ़ल हुयी हो लेकिन जज्बाती तौर पर राजकपुर की ये फ़िल्म बेहद सफ़ल हुयी| मेरा नाम जोकर में राजकपुर ने उन पिछली फ़िल्मों की कुछ बुंदे निचोडी है -जिसमें उनकी तीन नायिकाएं एक के बाद एक जोकर के दिल पर पांव रखकर उड जाती है और ये जोकर बडा दिल लेकर ये ही गाता है "....कल खेल में हम हो ना...हो....पर हम तुम्हारे रहेंगे सदा"| दिल रोए जग हंसे- ये ही एक जोकर की नियति है| 1970 में रिलिज हुयी तीन भागो में सिमटी चार घंटे पच्चीस मिनट की ये फ़िल्म- एक जोकर के जीवन के उस हिस्से को उकेरती है जिसमें उसे अपने सारे दुखॊ को दिल में दफ़न कर सिर्फ़ दुसरो को हंसाना है| एक सोलह बरस के बच्चे की उफ़नते जज्बातो के ज्वार से गुजरती हुयी ये फ़िल्म एक परिपक्व होते दिल के उथले समंदर तक पहुंचती है| पहले भाग में ये उस सोलह बरस के बच्चे राजु(बाल-रिषी-कपुर) पर केद्नित है जिसमें वो अपनी ही टीचर (मैरी-सिम्मीग्रेवाल) के प्रति आसक्ति महसुस करता है- जब वो उसे वस्त्र विहिन देखने की कल्पना करता है चुंकि उम्र के इस पढाव पर चढते यौवन की रस्सा-कशी उस किशोर वय को घबरा देती है और वो एक पाप की ग्लानि में जलने लगता है, जब चर्च में मैरी उससे ये कहती है कि बच्चे पाप नहीं करते तब-राजु तैश में कहता है "मैं बच्चा नहीं हूं....."और ये ही वो सीन है जहां राजकपुर चढ्ते यौवन के मनोविग्यान को समझाना चाहते थे। ये उम्र हमेशा दोहराव वाले रास्ते पर आ खडी होती है जहां फ़िसलन भरा रास्ता उसे खींचता है। यहां किशोर वय में हम थोडी सी भावनात्मक समझ पैदा कर सके तो शायद ये उम्र दुविधा से बाहर निकल सकती है. दुसरे व तीसरे भाग में भी पारिपक्व राजु (राजकपुर) अपनी प्रेमिकओं के प्रेम को अपने बडे होते दिल में दफ़न कर देता है और सर्कस के अपने आखिरी शो में अपनी तीनो प्रेमिकाओं को बुलाता है जहां एक सीन में दुसरे जोकर उसके दिल का आपरेशन करते है और कहते है राजु तुम्हारा आपरेशन करना है क्योकि "तुम्हारा दिल बडा और दुनिया छोटी है ......" वह कहता है -जॊकर की हस्ती को कोई नहीं समझ सकता इस दो टांग के आवारा बादल को कॊई बेडिया नहीं डाल सकता ना सोने की ,ना प्यार की ना मोहब्बत की। दरअसल ये फ़िल्म एक तरह से राजकपुर (जोकर) की आत्मकथात्मक संगीतिय तस्वीर है जिसमें जीवन की फ़िलोसाफ़ी को भावप्रवण ढंग से समाहित किया गया है और एक नये आयाम के साथ यह फ़िल्म दिल के कोने में दस्तक जरुर देती है.कमर्शियल तौर पर ये फ़िल्म बाक्स आफ़िस पर असफ़ल साबित हुयी जिसका सीधा सा कारण कि-ये फ़िल्म समय से काफ़ी पहले आ गयी थी उस समय दर्शक मानसिक रुप से इतने तैयार नहीं थे कि बोल्ड दृश्यो को आत्मसात कर सके और उस काल खंड में एक से एक रोमांटिक नायक राजेश खन्ना,देवआनंद जैसो का दबदबा था और बिना नायक-नायिका आधारित सिनेमा को भी दर्शक स्वीकार नहीं कर सके.... और एक कारण इस फ़िल्म की लंबाई ज्यादा हॊना.लेकिन शंकर-जयकिशन के उम्दा संगीत और मन्ना-डे,आशा और मुकेश की  गहराई वाली आवाजों ने शंकर-जयकिशन को बेस्ट फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड का तमगा दिलवाया और यही नही इसे कुल जमा पांच फ़िल्म-फ़ेयर अवार्ड प्राप्त हुए.पार्श्व संगीत पुरी फ़िल्म में एक साये की तरह चलता रहता है वायलिन ,गिटार का कमाल का उपयोग किया गया है जो सुनने वाले के दिल पर सवार होकर एकात्मकता की ओर ले जाता है......इस फ़िल्म को फ़िर से देखिए अपने अंदर कुछ हलचल जरुर महसुस करेंगे आप-
"ये मेरा गीत-जीवन संगीत कल भी कोई दोहराएगा...जग को हंसाने बहरुपिया रुप बदल फ़िर आएगा......"
फ़िल्म : मेरा-नाम जोकर
वर्ष: 1970
निर्देशक: राजकपुर
संगीत: शंकर जयकिशन
सुर-संगीत:
1.तीतर के आगे दो तितर......        (गायकी)आशा भॊसले,मुकेश,सिमी ....(गीत)हसरत जयपुरी
2.कहता है जोकर सारा जमाना......(गायक)मुकेश- ......      (गीत)नीरज
3.अंग लग जा बालमा...........         (गायिका)आशा भॊसले....(गीत)शैलेन्द्र
4.जीना यहां मरना यहां.........         (गायक)मुकेश...........     (गीत)शैलेन्द्र
5.जाने कहां गये वो दिन-  ......       (गायक)मुकेश-..........    (गीत)हसरत जयपुरी
6.ऐ भाई जरा देख के चलो...........(गायक)मन्नाडे.............(गीत)नीरज
7.काटे ना कटे रैना.....                      (गायिका) आशा भॊसले....(गीत)शैलेन्द्र
8.दाग ना लग जाए.....                    (गायकी)आशा भॊसले,मुकेश......(गीत)हसरत जयपुरी
9.सदके हीर तुझपे..........              (गायक)मो.रफ़ी............(गीत)प्रेम धवन

फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड:
1.सर्वश्रेष्ट निर्देशक: राजकपुर
2.सर्वश्रेष्ट संगीत-शंकर-जयकिशन
3.सर्वश्रेष्ट गायक-मन्ना डे(ए भाई देख के चलो)
4.सर्वश्रेष्ट सिनेमेटॊग्राफ़ी-राधु करमाकर
5.सर्वश्रेष्ट साऊंड रिकार्डिस्ट-अलाउद्दीन खान कुरेशी

-योगेन्द्र व्यास

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