Friday, October 12, 2012

रिश्तों के बनते बिखरते बहाव को पिरोया था "आंधी" में.....(Click for Link)

रिश्तों के बनते बिखरते बहाव को पिरोया था "आंधी" में.....(click for link)

जिंदगी में रिश्ते गुनगुनी धूप के समान होते है..जरा तेज आंच लगी नहीं कि हम पीठ फ़ेर कर बैठ जाते है। गुलजार साहब की फ़िल्मों में सामाजिक और पारिवारिक रिश्तो के उतार चढाव के स्पंदन को बहुत ही सहज भाव से महसुस किया जा सकता है,वो ऐसे कि- कहीं एकाकी जज्बात टुट कर-गर बह निकले तो हौले से अपनी हथेलियों में थामने की इच्छा हो जाए........"जी में आता है, तेरे दामन में, सर छुपा के हम रोते रहें, रोते रहें तेरी भी आँखों में, आँसुओं की नमी तो नहीं......" जब गुलजार ने तन्हाईयों को अपनी कलम में समेट कर पन्नो पर ढुलकाया होगा तो ये ही गीत शायद फ़िल्म "आंधी" की नजाकत को बयां करने की वजह रहा होगा। कमलेश्वर के उपन्यास "काली आंधी" पर आधारित गुलजार द्वारा निर्देशित फ़िल्म "आंधी" एक दम्पत्ति के अहं और महत्वकांक्षा की कहानी है जिसमें बनते-बिखरते रिश्तो के बहाव को बखुबी पिरोया गया है। पात्र आरती देवी (सुचित्रा सेन) जो कि अमीर पिता की इकलौती संतान आक्सफ़ोर्ड से शिक्षित है तथा एक राजनितिग्य बनने की महत्वाकांक्षा भी रखती है लेकिन व्यवसायी पिता की इच्छा के विपरित होटल मैनेजर जे.के.(संजीव कुमार) से प्यार और फ़िर शादी कर बैठती है। लेकिन गुलजार की गुलजारियत कहा रुकने वाली थी प्यार का तिलिस्म रचना कोई गुलजार से सीखे बहुत ही मीठे और गुदगुदाने वाले प्रसंग संजीव कुमार और सुचित्रा सेन के बीच रचे "....इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त क़दम रस्ते कुछ तेज़ क़दम राहें,पत्थर की हवेली को शीशे के घरौंदों में तिनकों के नशेमन तक इस मोड़ से जाते हैं"। एक बार जी.पी. सिप्पी साहब ने कहा था ये गुलजार भी क्या लिखता है...कुछ समझ नहीं आता लेकिन लिखता कमाल का है....जैसे पंचम दा  ने ये गाना बनाते हुए चुटकी ली थी और गुलजार से पुछ बैठे थे "ये... नशेमन कौन सा शहर है यार" । बहरहाल-  आकांक्षाओं और इच्छा के आगे निज-संबंधो को लम्बे ग्रहण का सामना करना पडता है। आरती देवी राजनिति के लिए पति,बेटी व घर त्याग देती है वही जे.के. का अहं भी पत्नि को वो करने की स्वतंत्रता नहीं देता जो वो करना चाहती है। इस फ़िल्म पर एक ग्रहण तब भी लगा जब इस फ़िल्म को स्व. इंदिरा गांधी के जीवन से जोड कर देखा गया और इसके प्रदर्शन पर इमरजेंसी के दौरान बैन लगा दिया वही मुल रुप से ये कहानी राजनितिग्य तारकेश्वरी सिन्हा के जीवन से प्रेरित भी बताई जाती है। ये उस दौर की फ़िल्म है जब दीवार और शोले जैसी फ़िल्मे क्रमश: जनवरी और अगस्त १९७५ में आई और इनके बीच "आंधी" फ़रवरी १९७५ को लेकिन ये फ़िल्म बाक्स आफ़िस पर तो नहीं लेकिन लोगो के दिलो पर बहुत भारी रही। २३वें फ़िल्म फ़ेयर में संजीव कुमार को बेस्ट एक्टर और गुलजार को बेस्ट डायरेक्टर क्रिटीक अवार्ड दिया गया।
खैर.....ये कहानी ९ साल बाद फ़िर आरती देवी को अपने पति जे.के. के सामने लाकर खडा कर देती है और फ़िर जज्बातों के पिघलने की कसमसाहट को देखना इस फ़िल्म का मुख्य भाग है। ".....ये जो चांद है ना इसे रात में देखना ....य़ॆ तो रोज निकलता होगा....हां..बीच में अमावस्या आ जाती है वैसे तो ये पंद्रह दिन की होती है लेकिन इस बार बहुत लम्बी थी......नौ बरस लम्बी थी ना....".....वैसे .कहते है ना कि-जीवन की भाग-दौड, शोर-गुल के बीच कहीं भीतर सन्न्नाटा पसरा होता है और उस सन्नाटे के भीतर दफ़न अतित का चेहरा...और जब ये अतित एकदम सामने आ जाए तो जज्बातो का सैलाब उन बिते सालो को कम करने की कोशिश में जुट जाता है और यही इस फ़िल्म में संजीव कुमार और सुचित्रा सेन की अदाकारी में बार-बार देखने का मन करता है ब्रिंदा काका(ए.के.हंगल) जिन्होने अपने छोटे से रोल ने बहुत ज्यादा प्रभावित किया..... अंत में ये देखना सुखद है कि एक पति अपनी पत्नि को जीतते हुए देखना चाहता है और उसे विजयी भाव के साथ विदा करता है।
रिश्तो की उन्मुक्ततता एवं एकात्मकता जीवन में ज्यादा लय भरती है ठीक उसी तरह जैसे गिटार में तार साथ-साथ होते है लेकिन उनकी अपनी स्वतंत्र पहचान होती है लेकिन बंधे भी एक ही घूंटी से होते है लेकिन जरा तारो को छेड भर दो कितना मीठा सुर देते है...क्या हमारे जीवन में ऐसे सुर नहीं निकल सकते.......और ये ही गुलजार सा. कहना भी चाह्ते थे।
पंचम,गुलजार,लता,किशोर के सुरो की साजिश और सितार और एकार्डियन का सम्मोहन इन गानो से बाहर ही आने नहीं देता.....
"कहाँ से चले कहाँ के लिये ये खबर नहीं थी मगर कोइ भी सिरा जहाँ जा मिला वहीं तुम मिलोगे.................."
कुछ फ़िल्में हमारी जिंदगी का आइना होती है....आओ समय निकाल कर अपनी तस्वीर ही निहार ले।


फ़िल्म: आंधी
वर्ष: १३ फ़रवरी १९७५
निर्माता: जे.ओम प्रकाश
निर्देशक:गुलजार
लेखक: कमलेश्वर
संगीत: आर.डी.बर्मन
गीतकार: गुलजार
गीत:
इस मोड से जाते है.......किशोर/लता
तेरे बिना जिंदगी से कोई....किशोर/लता
तुम आ गये हो नुर आ गया है.....किशोर/लता
सलाम कीजिए.......मो. रफ़ी,अमित कुमार,भुपिन्दर
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड:(२३वें १९७६)
बेस्ट डायरेक्टर (क्रिटिक)-गुलजार
बेस्ट एक्टर-संजीव कुमार
-योगेन्द्र व्यास
९४२५०६१५३८
 

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