Friday, October 12, 2012

अभी भी पोलियो ग्रस्त ही है हिन्दुस्तान..... (फ़िल्म-कुंआरा बाप) Hit here for Link

हिन्दुस्तान अभी भी पोलियो ग्रस्त ही है....
 मजरुह साहब की ये लाइने मेहमुद जब परदे पर किशोर दा की आवाज में गाते है कि-" हम आजाद है मिस्टर क्या इंसा और क्या जनवर,.......,कुत्ता गद्दे पर सोये मानव चादर को रोये,जिंदगी लगती है गाली...."तब समझ आता है कि ये फ़िल्म कुछ तगडा संदेश देने वाली है। महेश रिक्शावाला(मेहमुद) एक गरीब सहृदय इंसान है और रिक्शा के पैडल पर अपनी तंग जिंदगी को तीन पहियो के सहारे हंसी-खुशी बिताने की ख्वाहिश रखता है।लेकिन जीवन में खुशी की मियाद कितनी होती है ये आज तक कोई ग्यारंटीड तौर पर बता नहीं पाया.महेश रिक्शावाला को एक नवजात बच्चा मंदिर की सीढियों पर बिलखता हुआ मिलता है, दयावश वो उसे उठाकर उसके मां बाप को ढुंढने कि चेष्टा करता है, लेकिन जब नियति को कुछ और ही मंजुर हो तो भला गरीब आदमी की तो कोई बिसात ही नहीं, महेश मंदिर के पंडित और दरोगा को लाख कहता है कि "साहब ये बच्चा मेरा नहीं है,मेरे खुद के खाने के वांदे है तो ये बच्चा कहा से पालुंगा" उसकी एक ना चलती है और बच्चे को उसी का समझकर उसके हवाले कर दिया जाता है.मेहमुद की अदाकारी में उन साठ वर्षो की गहराई नजर आती है जो उन्होने फ़िल्म इंडस्ट्रीज के उथले समंदर से पाई थी।
महेश एक कुंआरे बाप के रुप में बच्चे को पालने की चुनौती स्वीकार करता है और गरीब बस्ती में बच्चे के आगमन का जश्न और कोरस गाना "सज रही गली मेरी मां....."जिसे मो. रफ़ी सा. ने स्वर दिए थे -ये गाना वार्षिक बिनाका गीत माला के पहले पायदान पर बजा था"।महेश बच्चे का नाम हिन्दुस्तान रखता है लेकिन दुर्भाग्यवश बच्चा पोलियो ग्रस्त हो जाता है। दरअसल ये पुरी फ़िल्म की जमीन मेहमुद ने तभी तैयार की थी जब खुद का बेटा मेकी पोलियो का शिकार हुआ था। मेहमुद को जे.जे. हास्पिटल के डा.उदानी ने जमकर लताड लगाई थी-जब मेहमुद ने सिर्फ़ ये पुछा था कि ये पोलियो क्या होता है।उसके बाद मेहमुद ने तय किया कि इस विषय एक संदेश परक फ़िल्म बनाउंगा और अपने खुद के बेटे मेकी को कास्ट किया और डा. उदानी वाला प्रसंग जस का तस संजीव कुमार पर फ़िल्मांकन किया और एक उम्दा संदेश परक फ़िल्म को निर्देशित किया।     ये फ़िल्म इतनी यथार्थ परक है कि यदि इस फ़िल्म को उस वक्त हर गांव हर शहर में दिखाया जाता तो शायद "एक बुंद जिंदगी की" पर आज इतना खर्चा भारी नहीं पडता।
....बेहद मार्मिक प्रसंग मेहमुद ने किये कि आंसुओं को थामना मुश्किल हो जाता है. राजेश रोशन ने दिल को छु लेने वाला संगीत दिया विशेष कर लोरी वाला गाना.....सच मानिए दिल भर आता है.....संगीत निर्देशक के रुप में ये उनकी पहली फ़िल्म थी।
अचानक बच्चे के असल मां बाप प्रकट होते है और बच्चे को ले जाने की जिद करते है। असहाय भावुक कुंआरा बाप जिसने अपनी जवानी बच्चे को पालने पोसने में लगाई लेकिन वो ही लोग जिन्होने बच्चे को जबरजस्ती महेश को सौपा था अब वे ही उस पर कोर्ट में बच्चा चोरी का इल्जाम लगाते है,जब ये सीन देखते है तो लगता है ये किरदार आज भी हमारे ही देश में आसपास मौजुद है.........मेहमुद तुमने सच ही कहा था "हिन्दुस्तान अभी भी पोलियो ग्रस्त ही है....." अंत में मेहमुद अपनी मौत के साथ बहुत सारे संदेश दे जाते है ...जो शायद आमीर खान आज कर रहे है...
अपने समय की सफ़ल फ़िल्म जिसे भले ही कोई अवार्ड ना मिला हो लेकिन यदि निर्देशक दर्शको के आंसु चुरा कर समाज को संदेश दे जाए वो ही उसका बेहतर अवार्ड है........
नोट: मेहमुद की पत्नि ट्रेसी ने मेकी को स्कुल में एडमीशन ना दिए जाने पर काफ़ी हंगामा खडा किया था जिसे मेहमुद ने फ़िल्म में फ़िल्मांकन किया जो प्रभावी बन पडा.
फ़िल्म: कुंआरा बाप
वर्ष: 23 नवंबर 1974
निर्माता: अमरलाल छाबरिया
निर्देशक:मेहमुद
संगीत: राजेश रोशन
गीतकार: मजरुह सुल्तानपुरी
गीत:
1.सज रही गली मेरी......     मो.रफ़ी,मेहमुद
2  मैं हुं घोडा ये है गाडी....किशोरकुमार,मेहमुद   
3  जय भोलेनाथ जय हो प्रभु......किशोरकुमार,लता मंगेशकर
4 आ री निंदिया.... किशोर कुमार,लता मंगेशकर,मेहमुद
-योगेन्द्र व्यास
9425061538

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