मौसम आएगा जाएगा प्यार सदा मुसकाएगा(फ़िल्म-शायद) Hit here for Link
मौसम आएगा जाएगा प्यार सदा मुसकाएगा
दिन भर धुप का परबत काटा,शाम को पीने निकले हम, इन गलियो में मौत लिखी थी उनमें जीने निकले हम"निदा फ़ाजली ने फ़िल्म "शायद"(1979) के लिए ये गाना उस दृश्य के लिए लिखा जब इस फ़िल्म में गरीब तबके के कई सौ लोग जहरीली शराब पीने से मर जाते है,उनमें से एक सरोज कुमार"सरोज"(नासिरुद्दीन शाह) का एक शायर मित्र भी होता है।
हालांकि कई फ़िल्में अपनी लचर पटकथा और कमजोर कथा सुत्र की वजह से नाकाम फ़िल्मों की श्रेणी में आ जाती है।कई बार ऐसा होता है कि हमारे पास साधन की समपन्नता होते हुए भी हम खुबसुरत घर नहीं बना पाते ठीक वैसे ही फ़िल्म में उच्चकोटी के कलाकार,गीतकार,संगीतकार,गायक,गायिका होने बावजुद फ़िल्म सफ़ल नहीं हो पाती क्योकि कथा-पटकथा की गंभीरता एवं वाजिब होम-वर्क ना होना।फ़िर भी आज इस फ़िल्म पर बात करने का मन कुछ कारणॊं से है-एक तो यह कि इस फ़िल्म की शुटिंग इंदौर शहर में होना, दुसरा फ़िल्म का संगीत बेहतर होना,तीसरा फ़िल्म में कलाकार के तौर पर नासिरुद्दीन शाह,ओमपुरी,विजयेन्द्र घाटगे,नीता मेहता,फ़रीदाजलाल,इफ़्तेखार,सिम्मी गरेवाल इत्यादि का होना, एवं अवाज के तौर पर मो.रफ़ी,मन्नाडे,आशा भोंसले,उषा मंगेशकर,नितिन मुकेश का होना,गीतकार के तौर पर निदा फ़ाजली,विठ्ठ्ल भाई पटेल का होना। पुरी फ़िल्म का उम्दा पहलु इसके गाने है जिसे संगीत निर्देशक मानस मुखर्जी ने सजाया है, आपको लगेगा कि अरे हां ये तो हमने सुने है-जब मन्नाडे और आशा भोसले की आवाज आकाशवाणी पर गुंजती थी कि"मौसम आएगा जाएगा.प्यार सदा मुसकाएगा"एकार्डियन पर भागती तेज ऊगलियां आपको गाने की याद ताजा करा देती है,आपको याद आया होगा-"मैं सुरज की रोशनी मैं चंदा की चांदनी..".मो.रफ़ी और आशाजी, गौर करे- "खुशबु हुं मैं फ़ुल नहीं जो मुरझाउंगा.. मॊ, रफ़ी सा. बेहतरीन नगमा जो कि निदाफ़ाजली ने लिखा था। ये कुछ बेहतरीन कृति संगीत निर्देशक मानस मुखर्जी ने दी जो कि एक प्रतिभावान संगीतकार थे।उन्होने पुर्व में संगीतकार सलील चौधरी के सहायक के रुप में काम किया। वे सफ़लता के लिए हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्रीज में संघर्ष करते रहे और कुछ चंद सफ़लता उनके हाथ लगी। जब शान 14 वर्ष और सागरिका 16 वर्ष के थे तब उनका निधन हो गया था, आज लोग उन्हे प्रसिध्द गायक "शान" के पिता के नाम से पहचानते है।
अब बताईये इस सब के बावजुद ये फ़िल्म कही गुमनामी की गर्त में पडी रहे तो इसे निर्माता का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा।
राकेश(विजयेन्द्र घाटगे) और सुधा(नीता मेहता) कालेज के सहपाठी है और एक दुसरे को पसंद भी करते है लेकिन सुधा नाचने गाने वाले परिवार से होने से इनकी शादी मुकम्मल नहीं हो पाती है.राकेश मेडिकल की पढाई के लिए शहर छोड देता है और सुधा की शादी कवि एवं लेखक सरोज कुमार "सरोज"(नासिरुद्दीन शाह) से हो जाती है।राकेश कुछ सालो बाद शहर में डाक्टर बन कर आता है,सुधा एवं सरोज कुमार से मुलाकात होती है,इसी घटना क्रम में सरोज कुमार को कैंसर हो जाता है राकेश उसे हास्पिटल में भर्ती करता है। फ़िल्म में इंदौर के एम.वाय. हास्पिटल की शुटिंग की गई है,तथा सन 70 के दशक में इंदौर में हुए जहरीली शराब त्रासदी का जिक्र भी फ़िल्मांकन के रुप में किया गया है,जिसमें सरोज के शायर मित्र की भी शराब पीने से मौत हो जाती है।हकीकत में भी कई लोग शराब पीने से अपनी जान गवां बैठे थे जिन्हे एम.व्हाय हास्पिटल में ही भर्ती किया गया था जहां पलंग भी कम पड गये थे।सुत्रो की माने तो शवों को जलाने के लिए लकडियों की कमी के चलते एक ही चिता पर कई शवों का अंतिम संस्कार किया गया था।
बहरहाल-कैंसर कि असहनीय पीडा के बीच सरोज डां.राकेश से अपनी इच्छा मृत्यु की मांग करता है और एक रात वो खुद ही इंजेक्शन ले कर अपनी जान दे देता है।सुधा राकेश पर शक करती है एवं पुलिस उसे गिरफ़्तार कर लेती है।वही हास्पिटल में भर्ती नंदलाल(ओमपुरी) को सरोज का लिखा सुसाईड नोट मिल जाता है और राकेश बरी होजाता है।ओम पुरी के अभिनय की धार तब समझ आती है जब वे में इंदौरी भाषा एवं इंदौरी लटके झटके को पकड कर अपना किरदार पेश करते है। ये फ़िल्म नासिरुद्दीन शाह और ओमपुरी के अभिनय यात्रा की आरंभिक सीढियों में से एक थी जिसमें साफ़ नजर आता है कि ये किसी अभिनय स्कुल के प्रतिभावान विद्यार्थी रहे होंगे।इस फ़िल्म में सत्तर के दशक का इंदौर जिसमें लालबाग,पिपल्यापाला,रविन्द्र नाट्य गृह,नेहरु स्टेडियम देखना अच्छा लगता है। विशेष कर हमारे शहर के प्रतिभावान कलाकार विजयेन्द्र घाटगे को अपने ही शहर में अभिनय करते देखना।बस पुरे आलेख में एक नाम नही आया तो "शायद" वो निर्देशक का ही है जिन्होने नगीने तो इकठठे कर लिए लेकिन वे एक सुंदर हार ना बना सके।खैर आप मन्ना दा और रफ़ी सा.को सुने कुछ अलहदा अहसास देगा...
विशेष:इस फ़िल्म में बेबी सागरिका मुखर्जी ने (गायक शान की बहन) "खुशबु हुं मैं...अपनी मासुम आवाज दी है।"
फ़िल्म: शायद
वर्ष: 20 मार्च 1979
निर्माता:एस.जेठवानी
निर्देशक: मदन बावरिया
संगीत: मानस मुखर्जी
गीत:
मौसम आएगा जाएगा-मन्नाडे,आशा भोंसले(गीत-विठ्ठ्ल भाई पटेल)
मैं सुरज की रोशनी....मो. रफ़ी,आशा भोंसले(गीत-विठ्ठ्ल भाई पटेल)
दिन भर धुप का परबत ...मन्नाडे,(गीत-निदा फ़ाजली )
युं जुबा हमसे सी नहीं जाती...उषा मंगेशकर(गीत-दुष्य़ंत कुमार त्यागी)
दि दिलो को ऐसे मिला लो...नितिन मुकेश प्रिति सागर(गीत-विठ्ठ्ल भाई पटेल)
खुशबु हुं मैं फ़ुल नहीं....मो.रफ़ी,बेबी सागरिका(गीत-निदा फ़ाजली )
-योगेन्द्र व्यास
yvyas2010@gmail.com
मौसम आएगा जाएगा प्यार सदा मुसकाएगा
दिन भर धुप का परबत काटा,शाम को पीने निकले हम, इन गलियो में मौत लिखी थी उनमें जीने निकले हम"निदा फ़ाजली ने फ़िल्म "शायद"(1979) के लिए ये गाना उस दृश्य के लिए लिखा जब इस फ़िल्म में गरीब तबके के कई सौ लोग जहरीली शराब पीने से मर जाते है,उनमें से एक सरोज कुमार"सरोज"(नासिरुद्दीन शाह) का एक शायर मित्र भी होता है।
हालांकि कई फ़िल्में अपनी लचर पटकथा और कमजोर कथा सुत्र की वजह से नाकाम फ़िल्मों की श्रेणी में आ जाती है।कई बार ऐसा होता है कि हमारे पास साधन की समपन्नता होते हुए भी हम खुबसुरत घर नहीं बना पाते ठीक वैसे ही फ़िल्म में उच्चकोटी के कलाकार,गीतकार,संगीतकार,गायक,गायिका होने बावजुद फ़िल्म सफ़ल नहीं हो पाती क्योकि कथा-पटकथा की गंभीरता एवं वाजिब होम-वर्क ना होना।फ़िर भी आज इस फ़िल्म पर बात करने का मन कुछ कारणॊं से है-एक तो यह कि इस फ़िल्म की शुटिंग इंदौर शहर में होना, दुसरा फ़िल्म का संगीत बेहतर होना,तीसरा फ़िल्म में कलाकार के तौर पर नासिरुद्दीन शाह,ओमपुरी,विजयेन्द्र घाटगे,नीता मेहता,फ़रीदाजलाल,इफ़्तेखार,सिम्मी गरेवाल इत्यादि का होना, एवं अवाज के तौर पर मो.रफ़ी,मन्नाडे,आशा भोंसले,उषा मंगेशकर,नितिन मुकेश का होना,गीतकार के तौर पर निदा फ़ाजली,विठ्ठ्ल भाई पटेल का होना। पुरी फ़िल्म का उम्दा पहलु इसके गाने है जिसे संगीत निर्देशक मानस मुखर्जी ने सजाया है, आपको लगेगा कि अरे हां ये तो हमने सुने है-जब मन्नाडे और आशा भोसले की आवाज आकाशवाणी पर गुंजती थी कि"मौसम आएगा जाएगा.प्यार सदा मुसकाएगा"एकार्डियन पर भागती तेज ऊगलियां आपको गाने की याद ताजा करा देती है,आपको याद आया होगा-"मैं सुरज की रोशनी मैं चंदा की चांदनी..".मो.रफ़ी और आशाजी, गौर करे- "खुशबु हुं मैं फ़ुल नहीं जो मुरझाउंगा.. मॊ, रफ़ी सा. बेहतरीन नगमा जो कि निदाफ़ाजली ने लिखा था। ये कुछ बेहतरीन कृति संगीत निर्देशक मानस मुखर्जी ने दी जो कि एक प्रतिभावान संगीतकार थे।उन्होने पुर्व में संगीतकार सलील चौधरी के सहायक के रुप में काम किया। वे सफ़लता के लिए हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्रीज में संघर्ष करते रहे और कुछ चंद सफ़लता उनके हाथ लगी। जब शान 14 वर्ष और सागरिका 16 वर्ष के थे तब उनका निधन हो गया था, आज लोग उन्हे प्रसिध्द गायक "शान" के पिता के नाम से पहचानते है।
अब बताईये इस सब के बावजुद ये फ़िल्म कही गुमनामी की गर्त में पडी रहे तो इसे निर्माता का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा।
राकेश(विजयेन्द्र घाटगे) और सुधा(नीता मेहता) कालेज के सहपाठी है और एक दुसरे को पसंद भी करते है लेकिन सुधा नाचने गाने वाले परिवार से होने से इनकी शादी मुकम्मल नहीं हो पाती है.राकेश मेडिकल की पढाई के लिए शहर छोड देता है और सुधा की शादी कवि एवं लेखक सरोज कुमार "सरोज"(नासिरुद्दीन शाह) से हो जाती है।राकेश कुछ सालो बाद शहर में डाक्टर बन कर आता है,सुधा एवं सरोज कुमार से मुलाकात होती है,इसी घटना क्रम में सरोज कुमार को कैंसर हो जाता है राकेश उसे हास्पिटल में भर्ती करता है। फ़िल्म में इंदौर के एम.वाय. हास्पिटल की शुटिंग की गई है,तथा सन 70 के दशक में इंदौर में हुए जहरीली शराब त्रासदी का जिक्र भी फ़िल्मांकन के रुप में किया गया है,जिसमें सरोज के शायर मित्र की भी शराब पीने से मौत हो जाती है।हकीकत में भी कई लोग शराब पीने से अपनी जान गवां बैठे थे जिन्हे एम.व्हाय हास्पिटल में ही भर्ती किया गया था जहां पलंग भी कम पड गये थे।सुत्रो की माने तो शवों को जलाने के लिए लकडियों की कमी के चलते एक ही चिता पर कई शवों का अंतिम संस्कार किया गया था।
बहरहाल-कैंसर कि असहनीय पीडा के बीच सरोज डां.राकेश से अपनी इच्छा मृत्यु की मांग करता है और एक रात वो खुद ही इंजेक्शन ले कर अपनी जान दे देता है।सुधा राकेश पर शक करती है एवं पुलिस उसे गिरफ़्तार कर लेती है।वही हास्पिटल में भर्ती नंदलाल(ओमपुरी) को सरोज का लिखा सुसाईड नोट मिल जाता है और राकेश बरी होजाता है।ओम पुरी के अभिनय की धार तब समझ आती है जब वे में इंदौरी भाषा एवं इंदौरी लटके झटके को पकड कर अपना किरदार पेश करते है। ये फ़िल्म नासिरुद्दीन शाह और ओमपुरी के अभिनय यात्रा की आरंभिक सीढियों में से एक थी जिसमें साफ़ नजर आता है कि ये किसी अभिनय स्कुल के प्रतिभावान विद्यार्थी रहे होंगे।इस फ़िल्म में सत्तर के दशक का इंदौर जिसमें लालबाग,पिपल्यापाला,रविन्द्र नाट्य गृह,नेहरु स्टेडियम देखना अच्छा लगता है। विशेष कर हमारे शहर के प्रतिभावान कलाकार विजयेन्द्र घाटगे को अपने ही शहर में अभिनय करते देखना।बस पुरे आलेख में एक नाम नही आया तो "शायद" वो निर्देशक का ही है जिन्होने नगीने तो इकठठे कर लिए लेकिन वे एक सुंदर हार ना बना सके।खैर आप मन्ना दा और रफ़ी सा.को सुने कुछ अलहदा अहसास देगा...
विशेष:इस फ़िल्म में बेबी सागरिका मुखर्जी ने (गायक शान की बहन) "खुशबु हुं मैं...अपनी मासुम आवाज दी है।"
फ़िल्म: शायद
वर्ष: 20 मार्च 1979
निर्माता:एस.जेठवानी
निर्देशक: मदन बावरिया
संगीत: मानस मुखर्जी
गीत:
मौसम आएगा जाएगा-मन्नाडे,आशा भोंसले(गीत-विठ्ठ्ल भाई पटेल)
मैं सुरज की रोशनी....मो. रफ़ी,आशा भोंसले(गीत-विठ्ठ्ल भाई पटेल)
दिन भर धुप का परबत ...मन्नाडे,(गीत-निदा फ़ाजली )
युं जुबा हमसे सी नहीं जाती...उषा मंगेशकर(गीत-दुष्य़ंत कुमार त्यागी)
दि दिलो को ऐसे मिला लो...नितिन मुकेश प्रिति सागर(गीत-विठ्ठ्ल भाई पटेल)
खुशबु हुं मैं फ़ुल नहीं....मो.रफ़ी,बेबी सागरिका(गीत-निदा फ़ाजली )
-योगेन्द्र व्यास
yvyas2010@gmail.com
No comments:
Post a Comment