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एक डॉक्टर की मौत
इंसान की औसत उम्र यदि सत्तर साल मान ले और उसमें से बीस वर्ष निकाल दे तो भी पचास वर्ष साइंस पर काम करने के लिए काफ़ी कम है। दुनिया भर के लाखों वैज्ञानिक अपने अपने क्षेत्र में रिसर्च कार्यो में लगे है और इनमें से कई ऐसे है जो पारंपरिक वैज्ञानिक नहीं है यानि पीएचडी डिग्री हांसिल किए हुए नही है फ़िर भी वे इस ब्रम्हाण्ड के असिमित दायरे में अपनी खुली सोच को उन गुढ रहस्यों के निकट ले जाते है जहां एक नए विज्ञान का जन्म होता है। कई बार पारंपरिक शोधार्थी एक लीक पर चलते हुए वो परिणाम प्राप्त नहीं कर पाता जो कि एक साधारण शोधार्थी लीक से हटकर समग्रता में नए आयामों को ढुंढता है एवं वांछित परिणाम प्राप्त कर जाता है। ये ठीक वैसा ही है जैसे कबीर की आध्यात्मिक उपलब्धता की तुलना किसी पॊथी पुराण कंठस्थ पंडित से की जाए।जितनी भी वैज्ञानिक खोजे हुयी है उनमें से काफ़ी खोजे गैर पारंपरिक वैज्ञानिकों द्वारा ही की गयी है।
कोलकाता के फ़िजिशियन सुभाष मुखोपाध्याय जिन्होने भारत का पहला और विश्व का दुसरा टेस्ट ट्युब बेबी "दुर्गा" को अस्तित्व में लाने में सफ़लता हांसिल की,लेकिन दुर्भाग्य- सरकार ने इस उपलब्धी को इसे अंर्तराष्ट्रीय साईंटिफ़ीक कम्युनिटी में रखने की इजाजत तक नहीं दी,मानसिक प्रताडना,उपेक्षा,नौकरशाही रवैये से क्षुब्ध हो कर सुभाष मुखोपाध्याय ने आत्महत्या कर ली।जो व्यक्ति इस देश को बहुत कुछ दे सकता था उसे इस हश्र तक पहुंचना पडा,कई पारंपरिक वैज्ञानिकों को भी इस गैर पारंपरिक वैज्ञानिक व्यक्ति की सफ़लता पची नहीं।
निर्देशक तपन सिन्हा ने इसी घटना से प्रेरित होकर फ़िल्म "एक डॉक्टर की मौत" को बहुत ही प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है।
दीपांकर रॉय (पंकज कपुर) जो एक साधारण एम.बी.बी.एस.डॉक्टर है और एक सरकारी अस्पताल में नौकरी करता है।लेकिन साथ ही साथ उसका एक ही जुनुन है लेप्रोसी नामक बिमारी को इस पृथ्वी से जड से मिटा देना और इसके लिए वो अपने घर में ही बनी लेब में दिन रात मेहनत कर लेप्रोसी का सफ़ल वैक्सीन तैयार कर लेता है तथा ये संभावना भी प्रकट करता है कि ये वेक्सीन मातृत्व विहिन स्त्री को मातृत्व सुख भी दे सकता है।ये खबर समाचार पत्रो,एवं टेलिविजन पर भी फ़्लेश हो जाती है।इधर हेल्थ सेक्रेटरी डॉ.दीपांकर को बुला कर काफ़ी लताड लगाता है,वही ईष्यावश डॉक्टर्स का एक कुनबा डॉ. दीपांकर के विरोध में उठ खडा होता है उन्हे सार्वजनिक तौर पर काफ़ी प्रताडित किया जाता है कि एक साधारण एम.बी.बी.एस.डॉक्टर लेप्रोसी जैसे घृणित रोग का वैक्सिन कैसे बना सकता है।इसी के चलते डॉ. दीपांकर का ट्रांसफ़र एक गांव में कर दिया जाता है।लेकिन इस ज्यादती की खबर अखबार के मालिक छापने से मना कर देते है कि-हमें सरकार से विज्ञापन नहीं मिलेंगे और अखबार विज्ञापन से चलते है वैज्ञानिक से नहीं।वही ये खबर अमेरिका के जान एंडरसन फ़ाउंडेशन को लगती है।इसी फ़ाउंडेश की एक महिला सदस्य डॉ.दीपांकर से मिलने गांव आती है तथा वे डॉ. दीपांकर को जल्द से जल्द अपने रिसर्च पेपर तैयार करने को कहती है।लेकिन एक ईमानदार डॉ.को नौकरशाही पेपर बनाने का मौका तक नहीं देती है और जांच आयोग बैठा देती है,जांच कमेटी में ऐसे लोग है जिन्हे आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली दवाईयों के नाम तक नहीं पता। अतंत:एक हताश,निराश डॉ. दीपांकर नाकारॊ की कमेटी से हार मान लेता है।दुसरी और अमेरिका में लेप्रोसी के वैक्सिन तैयार करने वाले दो अमेरिकी वैज्ञानिको के नामो की घोषणा हो जाती है। ये उपलब्धि हमारे देश का गौरव बनने के बजाय अन्य देश की उपलब्धी बन जाती है। ये हमारे देश की हकीकत के काफ़ी नजदीक है। हमारे देश में आज भी कई ऐसे सुभाष मुखोपाध्याय और दीपांकर है जो अपने ही लोगो के बीच अपनी ही कु-व्यवस्थाओं से जुझ रहे है।
ये पंकज कपुर के बस में ही था कि एक किरदार को पुरी तरह आत्मसात कर ले। एक ध्यानस्थ मुनी अवस्था और पंकज कपुर के किरदार को निभाने की अवस्था लगभग एक सी ही है।शबाना आजमी ने डॉ.दीपांकर की पत्नि के किरदार को इस तरह जिया वाकई लगा कि एक जुनुनी इंसान की पत्नि अपनी सांसारिक इच्छाओं के दमन के साथ एक एकांत में कैसे रहती होगी।और हां दुबले पतले इरफ़ान खान जो कि समाचार पत्र के साइंस एडिटर के किरदार के रुप में है देखना ऐसा लगा मानो सही में अभिनय में उनकी दौड पान सिंह तोमर तक सार्थक रही. अब क्या डॉ.दीपांकर राय आत्महत्या करते है? ये देखना हो तो तपन सिन्हा की निर्देशकीय कला में तहकीकात करना होगी बस थोडा समय इस फ़िल्म के साथ गुजारिए,आपको ये एहसास नहीं होगा कि आप फ़िल्म देख रहे है,अपने आप को इन व्यवस्थाओं के बीच छ्टपटाते पाएंगे।
विशेष:डां.सुभाष मुखोपाध्याय जिन्हे उनकी मृत्यु के 5 वर्ष बाद एक अविष्कारक के रुप में अधिकारिक पहचान मिली।ये फ़िल्म उन असाधारण प्रतिभाओं के प्रति आदरांजली है जिन्हे हम अपने आसपास होते हुए भी नजर अंदाज कर देते है।
फ़िल्म: एक डॉक्टर की मौत
वर्ष: 31 अगस्त 1990
निर्देशन एवं स्क्रिन प्ले:तपन सिन्हा
निर्माता: नेशनल फ़िल्म्स डेव्हलपमेंट कर्पोरेशन
लेखक: रामापदा चौधरी
संगीत:वनराज भाटिया
अवार्ड:
38 वां नेशनल फ़िल्म अवार्ड(1991)
-द्वितीय बेस्ट फ़िचर फ़िल्म
-बेस्ट डायरेक्टर -तपन सिन्हा
-स्पेशल ज्युरी अवार्ड-पंकज कपुर
बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन आवार्ड (1991)
-बेस्ट फ़िल्म
-बेस्ट डायरेक्टर
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड(1992)
-बेस्ट स्क्रिन प्ले अवार्ड-तपन सिन्हा
-योगेन्द्र व्यास
एक डॉक्टर की मौत
इंसान की औसत उम्र यदि सत्तर साल मान ले और उसमें से बीस वर्ष निकाल दे तो भी पचास वर्ष साइंस पर काम करने के लिए काफ़ी कम है। दुनिया भर के लाखों वैज्ञानिक अपने अपने क्षेत्र में रिसर्च कार्यो में लगे है और इनमें से कई ऐसे है जो पारंपरिक वैज्ञानिक नहीं है यानि पीएचडी डिग्री हांसिल किए हुए नही है फ़िर भी वे इस ब्रम्हाण्ड के असिमित दायरे में अपनी खुली सोच को उन गुढ रहस्यों के निकट ले जाते है जहां एक नए विज्ञान का जन्म होता है। कई बार पारंपरिक शोधार्थी एक लीक पर चलते हुए वो परिणाम प्राप्त नहीं कर पाता जो कि एक साधारण शोधार्थी लीक से हटकर समग्रता में नए आयामों को ढुंढता है एवं वांछित परिणाम प्राप्त कर जाता है। ये ठीक वैसा ही है जैसे कबीर की आध्यात्मिक उपलब्धता की तुलना किसी पॊथी पुराण कंठस्थ पंडित से की जाए।जितनी भी वैज्ञानिक खोजे हुयी है उनमें से काफ़ी खोजे गैर पारंपरिक वैज्ञानिकों द्वारा ही की गयी है।
कोलकाता के फ़िजिशियन सुभाष मुखोपाध्याय जिन्होने भारत का पहला और विश्व का दुसरा टेस्ट ट्युब बेबी "दुर्गा" को अस्तित्व में लाने में सफ़लता हांसिल की,लेकिन दुर्भाग्य- सरकार ने इस उपलब्धी को इसे अंर्तराष्ट्रीय साईंटिफ़ीक कम्युनिटी में रखने की इजाजत तक नहीं दी,मानसिक प्रताडना,उपेक्षा,नौकरशाही रवैये से क्षुब्ध हो कर सुभाष मुखोपाध्याय ने आत्महत्या कर ली।जो व्यक्ति इस देश को बहुत कुछ दे सकता था उसे इस हश्र तक पहुंचना पडा,कई पारंपरिक वैज्ञानिकों को भी इस गैर पारंपरिक वैज्ञानिक व्यक्ति की सफ़लता पची नहीं।
निर्देशक तपन सिन्हा ने इसी घटना से प्रेरित होकर फ़िल्म "एक डॉक्टर की मौत" को बहुत ही प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है।
दीपांकर रॉय (पंकज कपुर) जो एक साधारण एम.बी.बी.एस.डॉक्टर है और एक सरकारी अस्पताल में नौकरी करता है।लेकिन साथ ही साथ उसका एक ही जुनुन है लेप्रोसी नामक बिमारी को इस पृथ्वी से जड से मिटा देना और इसके लिए वो अपने घर में ही बनी लेब में दिन रात मेहनत कर लेप्रोसी का सफ़ल वैक्सीन तैयार कर लेता है तथा ये संभावना भी प्रकट करता है कि ये वेक्सीन मातृत्व विहिन स्त्री को मातृत्व सुख भी दे सकता है।ये खबर समाचार पत्रो,एवं टेलिविजन पर भी फ़्लेश हो जाती है।इधर हेल्थ सेक्रेटरी डॉ.दीपांकर को बुला कर काफ़ी लताड लगाता है,वही ईष्यावश डॉक्टर्स का एक कुनबा डॉ. दीपांकर के विरोध में उठ खडा होता है उन्हे सार्वजनिक तौर पर काफ़ी प्रताडित किया जाता है कि एक साधारण एम.बी.बी.एस.डॉक्टर लेप्रोसी जैसे घृणित रोग का वैक्सिन कैसे बना सकता है।इसी के चलते डॉ. दीपांकर का ट्रांसफ़र एक गांव में कर दिया जाता है।लेकिन इस ज्यादती की खबर अखबार के मालिक छापने से मना कर देते है कि-हमें सरकार से विज्ञापन नहीं मिलेंगे और अखबार विज्ञापन से चलते है वैज्ञानिक से नहीं।वही ये खबर अमेरिका के जान एंडरसन फ़ाउंडेशन को लगती है।इसी फ़ाउंडेश की एक महिला सदस्य डॉ.दीपांकर से मिलने गांव आती है तथा वे डॉ. दीपांकर को जल्द से जल्द अपने रिसर्च पेपर तैयार करने को कहती है।लेकिन एक ईमानदार डॉ.को नौकरशाही पेपर बनाने का मौका तक नहीं देती है और जांच आयोग बैठा देती है,जांच कमेटी में ऐसे लोग है जिन्हे आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली दवाईयों के नाम तक नहीं पता। अतंत:एक हताश,निराश डॉ. दीपांकर नाकारॊ की कमेटी से हार मान लेता है।दुसरी और अमेरिका में लेप्रोसी के वैक्सिन तैयार करने वाले दो अमेरिकी वैज्ञानिको के नामो की घोषणा हो जाती है। ये उपलब्धि हमारे देश का गौरव बनने के बजाय अन्य देश की उपलब्धी बन जाती है। ये हमारे देश की हकीकत के काफ़ी नजदीक है। हमारे देश में आज भी कई ऐसे सुभाष मुखोपाध्याय और दीपांकर है जो अपने ही लोगो के बीच अपनी ही कु-व्यवस्थाओं से जुझ रहे है।
ये पंकज कपुर के बस में ही था कि एक किरदार को पुरी तरह आत्मसात कर ले। एक ध्यानस्थ मुनी अवस्था और पंकज कपुर के किरदार को निभाने की अवस्था लगभग एक सी ही है।शबाना आजमी ने डॉ.दीपांकर की पत्नि के किरदार को इस तरह जिया वाकई लगा कि एक जुनुनी इंसान की पत्नि अपनी सांसारिक इच्छाओं के दमन के साथ एक एकांत में कैसे रहती होगी।और हां दुबले पतले इरफ़ान खान जो कि समाचार पत्र के साइंस एडिटर के किरदार के रुप में है देखना ऐसा लगा मानो सही में अभिनय में उनकी दौड पान सिंह तोमर तक सार्थक रही. अब क्या डॉ.दीपांकर राय आत्महत्या करते है? ये देखना हो तो तपन सिन्हा की निर्देशकीय कला में तहकीकात करना होगी बस थोडा समय इस फ़िल्म के साथ गुजारिए,आपको ये एहसास नहीं होगा कि आप फ़िल्म देख रहे है,अपने आप को इन व्यवस्थाओं के बीच छ्टपटाते पाएंगे।
विशेष:डां.सुभाष मुखोपाध्याय जिन्हे उनकी मृत्यु के 5 वर्ष बाद एक अविष्कारक के रुप में अधिकारिक पहचान मिली।ये फ़िल्म उन असाधारण प्रतिभाओं के प्रति आदरांजली है जिन्हे हम अपने आसपास होते हुए भी नजर अंदाज कर देते है।
फ़िल्म: एक डॉक्टर की मौत
वर्ष: 31 अगस्त 1990
निर्देशन एवं स्क्रिन प्ले:तपन सिन्हा
निर्माता: नेशनल फ़िल्म्स डेव्हलपमेंट कर्पोरेशन
लेखक: रामापदा चौधरी
संगीत:वनराज भाटिया
अवार्ड:
38 वां नेशनल फ़िल्म अवार्ड(1991)
-द्वितीय बेस्ट फ़िचर फ़िल्म
-बेस्ट डायरेक्टर -तपन सिन्हा
-स्पेशल ज्युरी अवार्ड-पंकज कपुर
बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन आवार्ड (1991)
-बेस्ट फ़िल्म
-बेस्ट डायरेक्टर
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड(1992)
-बेस्ट स्क्रिन प्ले अवार्ड-तपन सिन्हा
-योगेन्द्र व्यास
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