Saturday, October 13, 2012

डी.के.बोस की व्यथा (व्यंग्य)

(व्यंग्य)
 डी.के.बोस की व्यथा हर हफ़्ते दस दिन में कुछ खबरे सुर्खियो में रहती है और फ़िर नयी चटपटी खबर उनका स्थान ले लेती है इसी उधेड-बुन में सुबह-सुबह गाली पुराण की जुगाली करते हुए अखबार समेट ही रहा था कि दुरभाष की घंटी घन-घनाई.मैने रिसिवर उठाया पुछा कौन बोल रहे है...उधर से आवाज आई हम बोल रहे है....मैने पुछा भाई "हम" यानि और कितने लोग है......अबे मैं दीपांकर कुमार बोल रहा हुं....मैने पुछा कौन दीपांकर......अब तो झल्लाह्ट भरी आवाज में उधर से तडा तड गालियो के साथ आवाज आई अरे मैं बोस बोल रहा हुं साले अब पहचानते भी नहीं ....ओह....डी.के. बोस.....जस्ट शटअप अब मैं डी.के. नहीं सिर्फ़ दीपांकर कुमार हुं.ये महाशय हमारे कालेज के जमाने के मित्र हुआ करते थे जिन्हे हम डी.के.  के नाम से बुलाते थे इनके असल नाम से तो कभी वास्ता ही नहीं पडा.इन महाशय का बात-बात में गालियो की बौझार करना इनकी हाबी में ही शामिल था अब ये उसी कालेज में प्रोफ़ेसर है जिस कालेज में हम पढा करते थे.बहरहाल पहले इनकी सुने -अरे मुझे एक वकील मांगता है,कोई अच्छा वकील हो तो बताओ और शाम को मिलो काफ़ी हाऊस में,इसके पहले कि- मैं कुछ पुछता खटाक!!! से रिसिवर पटकने की आवाज.मामला गंभीर लगा अब जाना तो पडेगा ही.लेकिन साथ साथ ही साथ सोचा ये गालियों का विग्यान भी बडा अजीब है जब मित्र दे तो गुदगुदी और यही गाली कोई और दे तो बात मरने मारने पर उतारु.खैर साहब शाम को डी.के. से मुलाकात हुई मुढ काफ़ी उखडा हुआ था बोले मुझे केस करना है ....मैने आश्चर्य से पुछा क्यो और किस पर....बोला आमीर खान पर.इसने मेरा जिंदगी हराम कर दिया है.....साला अच्छा भला जिंदगी चल रहा था इसने मेरा जिंदगी जहन्नुम कर दिया.....साले को मैं ही मिला था गाना बनाने के लिए.....मैने कहा डी.के. शांत हो जाओ....फ़िर साला तुम डी.के. बोला.....तुम को पता है कालेज में लडका लोग ब्लेक बोर्ड पर मेरा बडा-बडा नाम लिखता है,लडकिया लोग मुंह पर हाथ रखकर फ़ुसफ़ुसा के हंसता है.......और तो और कालोनी में लोगो ने अपने मकान का पता बताने के लिए मेरा घर को लेंड्मार्क बना दिया है.मेरा कमीना दुश्मन पडोसी रोज जोर-जोर से ये गाना बजाता है.मेरा बीबी बोलता है अपना नाम बदल डालो अब बोलो इस उम्र ऐसी फ़जिहत कि नाम बदलना पडे.मैं छोडुंगा नहीं उस आमीर को और साले तुम लेखक बने फ़िरते हो हमारी संस्कृति पर हमला हो रहा है तुम कुछ करते क्यो नहीं.मैने बोला भाई देखो केस दायर करने से कुछ नहीं होने वाला उसने अपनी फ़िल्म पर "ए" सर्टिफ़िकेट लिया है ज्यादा से ज्यादा तुम भी अपने नाम के आगे (ए) लिखवा लो.....ऐ..स्साला तुम भी हमारा हंसी उडाता है......सारी..सारी बाबु मोशाय....अच्छा एक काम करो अभी तो तुम अपना गुस्सा ठंडा करो और काफ़ी पियो इस पर हम थोडा विचार करते है फ़िर देखते है क्या करना है.जैसे तैसे विदा किया डी.के. बोस को.सोचा जिस व्यक्ति ने जिंदगी भर गाली को अपना ताकिया-कलाम बनाया वो आज उसी के गले ब्याज के साथ पड गयी..मेरे ख्याल में ये मन की कुंठा निकालने का एक तरीका हो सकता है जिसे हम आज से उपयोग नहीं कर रहे ये हर समय काल से उपयोग लाई जाती रही है,इसका उद्दभव उलाहना देने साथ-साथ शुरु हो कर आज प्रचलित गालियों में तब्दील हो गया है.कहां उपयोग नही होता इसके कई स्वरुप है -दोस्तो में,आफ़िस में,अफ़सर को गाली देने में,सिस्टम को गाली देने में,मोहल्ले के झगडे में,आंदोलनों में,राजनिति में.गाली एक यांत्रिक क्रिया की प्रतिक्रिया स्वरुप पैदा होने वाली संडाध है जिसे कई लोग आनंद पुर्वक लेते देते रहते है,मुख की तंग जबान से गोली की तरह निकल कर सुनने वाले के दिल में धंस जाए तो वो गाली है.सकारात्मक नजरिये से देखे भाई सा. तो ये बुलेट का सब्सटिट्युट है.फ़र्ज करो अगर गाली नहीं होती तो क्या होता.वो ही जिंदा होता जिसके हाथ में बंदुक होती.यदि हर आतंक वादी गाली बक कर अपनी कुंठा विसर्जित कर दे तो हो सकता है उसकी बंदुक से कुछ गोली कम चले. फ़िर भी ये एक असभ्यता की निशानी है इससे परहेज किया जा सकता है सभ्यता के गलियारे में इसका प्रयोग किसी भी लिहाज से उचित नहीं कहा जा सकता. .......गाली देना बुरी बात है बस ये मान लेना काफ़ी है.अब डी. के. बोस का जो होगा सो होगा इससे हमारी संस्कृति को कोई फ़र्क नहीं पडने वाला ये तय है.
-योगेन्द्र व्यास

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