Sunday, October 28, 2012

रुपहला सफ़र:जिंदगी आ रहा हुं मैं :मशाल
जीवन में यश तभी मिलता है जब कर्म को इस विश्वास के साथ करते है कि आपका काम आपकी धड़कनों में बार बार सुनाई दे  और ऐसे ही एक इंसान जो फ़िल्माकाश में यशस्वी बने जिन्हे आज दुनिया "यश चोपड़ा" के नाम से जानती है। ये सच नहीं है कि यश चोपड़ा ने केवल स्वीटजरलेंड की वादियों में ही रोमांटिक सिनेमा रचने का कारनामा किया बल्कि उन्होने ट्युलिप गार्डन से मुंबईया झोपड़ पट्टी की तंग गलियों तक में जाकर रियलिस्टिक सिनेमा को भी बखुबी प्रस्तुत किया।तथ्य ये है कि यश जी  हमेशा फ़िल्म की स्क्रिप्ट पर बहुत ही गहराई में जाकर उसे स्थापित करते है फ़िर अपनी निर्देशकीय कला से पुरी फ़िल्म को एक तस्वीर बना देते है।
ऐसी ही एक रियलिस्टक तस्वीर मशाल फ़िल्म के रुप में हम देखते है।जिसमें एक ईमानदार पत्रकार और झोपड़ पट्टी में पल रहे अपराधो की एक ईमानदार कोशिश हमें नजर आती है।
मुलत: ये फ़िल्म वसंत कानेटकर के मराठी नाटक "अश्रुंची झाली फ़ुले" पर आधारित है जिसे जावेद अख्तर ने कलम बध्द कर  स्क्रिन प्ले और संवाद लिखा और यश चोपड़ा जी अपने निर्देशन में बनाने के लिए तैयार हुए।संक्षेप में कहानी युं है कि एक कर्तव्यनिष्ट पत्रकार विनोद(दीलीप कुमार) जो कि निचली बस्ती में पल रहे अपराधों के बारे में रिपोर्ट तैयार करता है जिसमें शहर के सामाजिक रुतबे वाले जे.के.वरधान(अमरीशपुरी) की अपराधो में सक्रियता का उल्लेख करता है।लेकिन समाचार पत्र का मालिक उसे छापने से इंकार करता है और विनोद अपनी नौकर छोड कर  दृढ़ इरादे से अपनी पत्नि सुधा(वहीदा रहामान) के साथ संघर्ष एवं सच्चाई के रास्ते पर निकल पडता है।विनोद अपना खुद का न्युज पेपर निकालता है और जे.के.वरधान के काले कारनामो की पोल खोलता जाता है।वही बस्ती के राजा(अनिल कपुर) जो कि बस्ती का टपोरी और अपनी गैंग का लीडर भी है जिसे विनोद और पत्नि सुधा अपने प्रयासो सुधारते है आगे पढाई के लिए बाहर भेजते है।इधर जे.के. के प्रभाव से विनोद को बेघर कर दिया जाता है।यही वो सीन है जिसमें दिलीप कुमार बीच सड़क पर बदहवास होकर अपनी पत्नि को अस्पताल पहुंचाने के लिए गुहार लगाते है"...ए..ए...भाई....रोको गाड़ी  रोको"कोई नहीं सुनता और सुधा दम तोड़ देती है।यश चोपड़ा जी के अनुसार चार दिन लगे थे इस सीन को फ़िल्माने में।दिलीप साहब ने पुरी शिद्दत के साथ एक-एक भाव भंगिमा को इस तरह से प्रस्तुत किया कि ये सीन फ़िल्म इतिहास में याद किया जाता रहेगा।यही इस फ़िल्म का टर्निंग पाईंट है जहां विनोद जे.के. की तर्ज पर डॉन बनता है और राजा एक इमानदार पत्रकार बन कर लौटता है विनोद के आदर्शो पर चलता है लेकिन फ़िर विनोद और राजा में टकराव होता है।यदि ईमानदारी को बार कुचलने की कोशिश की जाए तो समझिए कि भ्रष्टाचार,बेईमानी का साम्राज्य काफ़ी उंचाई पर पहुंच चुका है। ये फ़िल्म आज के घटनाक्रमों का हुबहु फ़िल्मांकन है क्योकि हम भी तो दर्शक ही है जो जीवंत रुप में घट रहे घटनाक्रमों को पापकार्न के साथ मजे लेकर सिर्फ़ देख ही रहे है।
 यश जी ने पुरे समय फ़िल्म की पटकथा को संजीदा बनाए रखा।अपने पात्रो की कास्ट्युम लोकेशन में कोई अतिरंजना नहीं,संगीत के लिए बहुत ज्यादा गुंजाईश नहीं होने के बावजुद ह्रदयनाथ मंगेशकर ने वो धुने दी की हर गाना आज भी सुना व गुनगुनाया जाता है। आज भी हर होली पर "होली आई होली आई देखो होली आई रे" गाना हर चौराहो पर गुंज उठता है।
पहले अनिल कपुर को दिया गया रोल कमल हसन को आफ़र किया गया था लेकिन उन्होने अपने रोल को दिलीप साहब के रोल से कमतर आंका फ़िर ये आफ़र अनिल कपुर की झोली में गया और उन्हे बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फ़िल्म फ़ेयर खिताब मिला।
जावेद अख्तर की सलीम खान से अलग होने के बाद उनकी स्वतंत्र लेखक के रुप ये पहली फ़िल्म थी जिसमें उन्होने दिलीप कुमार को "एन्ग्री ओल्ड मेन" के रुप में प्रस्तुत किया।
यश जी की फ़िल्मों में हर पात्र को एक अमरता प्राप्त होती थी चाहे वो छोटा हो बडा। आज यश जी सशरीर नहीं है लेकिन वे हर उस पात्र की तरह अमर है जो हर वक्त परदे पर जीवंत होता है। यश जी की मशाल देखे हो सकता है मशाल ही थाम लें आप।

विशेष:लता जी का गाया एक भावप्रवण गीत "ओम नम: शिवाय..." एक अदभुत अलौकिक कम्पोजिशन है लेकिन किन्ही वजहो से फ़िल्म में शामिल नहीं किया जा सका।
फ़िल्म : मशाल
वर्ष: 12 जनवरी 1984
निर्माता निर्देशक: यश चोपड़ा
लेखक एवं गीतकार: जावेद अख्तर
संगीत: ह्रदयनाथ मंगेशकर
अवार्ड:
फ़िल्म फ़ेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर -अनिल कपुर
गीत:
१.होली आई होली आई देखो....लता मंगेशकर,किशोर कुमार
२.मुझे तुम याद करना और मुझको याद आना तुम.....लता मंगेशकर,किशोर कुमार
३.फ़ुटपाथो के हम रहने वाले-सुरेश वाडेकर,शैलेन्द्र सिंह,अनुप जलोटा,हरीहरन
४.लिये सपने निगाहो में...किशोर कुमार
-योगेन्द्र व्यास

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