रुपहला सफ़र:हम होंगे कामयाब?:जाने भी दो यारो
आज भी देश के नैतिक हाला्तो पर स्तब्धता बरकरार है,बिते सालो से अब तक कुछ नहींबदला।नौकरशाही,राजनिति,व्ययसायी,मिडिया गठजोड ने लोकतंत्र के स्तंभॊ का एक दुसरा प्रतिरुप तैयार कर लिया है।उन्नत्तीस साल पहले निर्देशक कुंदन शाह ने "जाने भी दो यारो" फ़िल्म का निर्माण किया और आज जब अखबार उठा कर देखते है तो ये फ़िल्म उतनी ही प्रासंगिक लगती है।पुरी तरह हास्य-बोध से सारोबार ये फ़िल्म एक बार पुन: रिलिज की गयी है इसका कारण ही ये है कि भले हास्य रुप में ही सही लेकिन हमारी व्यवस्थाओं पर बहुत तीखा कटाक्ष है।
फ़िल्म का मजमुन कुछ युं है कि विनोद चॊपडा(नासिर उद्दीन शाह) और सुधीर मिश्रा (रवि वासवनी) बेरोजगार युवक है और अपनी एक फ़ोटो ग्राफ़ी की शाप खोलते है लेकिन एक षडयंत्र का शिकार हो जाते है।फ़िल्म में खबरदार पत्रिका की एडिटर शोभा सेन (भक्ति बर्वे), दो प्रतिद्वंदी बिल्डर तनेजा(पंकज कपुर) और आहुजा(ओम पुरी), म्युनिसिपल कमिश्नर डी’मेलो(सतीश शाह) और श्रीवास्तव(दीपक काजिर) के गठजोड की हास्य में लिपटी हुयी कहानी है जो आज के चरित्र को जीवंत करती है। तनेजा के हाथो डी’मेलो की हत्या हो जाती है और ये दृश्य एक गार्डन में उनकी फ़ोटो ग्राफ़ी में कैद हो जाता है।इस दृश्य के माध्यम से कुंदन शाह ने फ़िल्म ब्लो अप(1966) के निर्देशक माइकल ऐटॊंनियोन को अपनी आदरांजली दी है जिसमें ऐटॊंनियोन गार्डन में बंदर के खेल के दौरान हत्या का दृश्य एक कांच में फ़्लेश हो जाता है।
किसी को जिवित व्यक्ति का रोल करते तो हमने कई बार देखा है लेकिन सतीश शाह ने एक लाश का रोल बहुत ही दमदार तरीके निभाते हुए गुदगुदाया है।कई जगह तंज बात डायलाग के माध्यम से कही गयी है जब पत्रकार तनेजा से पुछता है आप उंची बिल्डिंग बनाते जा रहे है और आम आदमी उतना निचे धंसता जा रहा है"।
ओम पुरी संघर्ष के उन दिनो को याद करते हुए कहते है कि शुटिंग के दौरान हमें नीचे फ़र्श ही सो जाना पडता था और खाने में केवल लौकी की सब्जी और दाल मिलती थी,चाय का कहो तो कंट्रोलर की तेज आवाज आती थी अरे..एक घंटे पहले ही तो पी थी। ये फ़िल्म कुल सात लाख के बजट में एन.एफ़.डी.सी. के बैनर तले तैयार हुयी थी।एक लाश को लेकर की गयी भागा दौडी में ये सारे पात्र एक महाभारत पर हो रहे मंचन में पहुंच जाते है और बस हास्य का फ़व्वारा सतत बह निकलता है।बाहरी पात्रो का मंच के किरदारॊ में घुस जाना धुर्योधन द्वारा चीरहरण से मना कर देना बस आप सबको लोटपोट कर देने के लिए काफ़ी है।लेकिन इसी बीच धृतराष्ट्र के पात्र को देखकर अनायास हमारे आज के राजकाजी चरित्र की याद आ जाती है जो सिर्फ़ ये कहता है "ये क्या हो रहा है" पर करता कुछ नहीं।कुल मिला कर कुंदन शाह के निर्देशन में सभी कलालारो ने वो रसोई बनाई है जिसकी खुशबु फ़िर से मल्टीफ़्लेक्स थियेटर में जीवंत हो रही है।इस फ़िल्म में विधुविनोद चोपडा ने दुशासन का रोल किया है और सबसे ज्यादा हंसाया भी उन्होने ही है।अंत में बुराई की जीत होती है और न्याय की मौत।विनोद और सुधीर पर सारा दोष मढ दिया जाता है लेकिन ये नौजवान फ़िर भी गाते है हम होंगे कामयाब एक दिन..।काश कि ऐसा दिन आए कि हमें ये गाना पडे "हम हो गए कामयाब"।
विशेष:नासिरउद्दीन शाह को इस फ़िल्म के लिए केवल 15000 रुपये मिले और उन्हे साथ में शुटिंग के लिए खुद का कैमेरा भी लाना होता था लेकिन शुटिंग के दौरान वो भी चोरी हो गया।
फ़िल्म: जाने भी दो यारों
वर्ष: 12 अगस्त 1984
निर्माता:नेशनल फ़िल्म डेव्हलपमेंट कार्पोरेशन
निर्देशक: कुंदन शाह
संगीत:वनराज भाटिया
स्टोरी एवं स्क्रिन प्ले:कुंदन शाह,सुधीर मिश्रा
डायलाग: सतीश कौशिक,रणजीत कपुर
अवार्ड:
1984 इंदिरा गांधी अवार्ड-बेस्ट फ़िल्म डायरेक्टर -कुंदन शाह
1984: फ़िल्म फ़ेयर बेस्ट कामेडियन-रवि बासवानी
-योगेन्द्र व्यास
Sunday, November 4, 2012
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