Monday, November 5, 2012

गीत जिन्हे मन गाये (सातवीं किश्त):आशा जी की....जनम यात्रा सुरो में बहती रहे बस......और क्या कहे!!!!!!!!


आशा जी के सुरो की थाह पाना बहुत ही मुश्किल है, उनकी आवाज में जो उर्जा बहती है कई बार उनके साथ गाने वाले स्तब्ध प्राय:हो जाते है अब इस कव्वाली को ही लि्जिए (हम किसी से कम नही १९७७)"है अगर दुश्मन......." इस कव्वाली में स्वयं मो.रफ़ी सा. अवाक से नजर आते है, मध्यम गति के ठेके से मो.रफ़ी इस कव्वाली की शुरुआत करते है जिसमें उन्होने आलाप भी लिये है...लेकिन ज्यो ही आशा जी ५.१० वे सेकण्ड से अपने आलाप और बारीक मुरकियों से प्रवेश लेती है पुरे गाने की रंगत ही बदल जाती है पुरा गाना उर्जा से भर जाता है पुरे माहौल में अजीब सी हलचल मच जाती है ,साजिंदो में एक जोश सा भरा नजर आता है और एक विजयी नाद के साथ आशा जी इस गाने को चरम तक ले जाती है......यदि आप आंख बंद कर यदि आशा जी की आवाज को केन्द्रित  कर ये गाना सुन रहे हो तो वाकई ऐसा लगता है मानो स्वयं रफ़ी सा.कह रहे हो "आशा वाकई तुम किसी से कम नहीं".महौल अगर बोझिल हो तो ये गाना सुन भर लें.....फ़िर बतायें....
टीप: पंचम दा के हार्मोनियम के नोट्स शुरु में सुनने काबिल है और कव्वाली में ढोलक की थाप सीधे दिल पर महसुस होती है.
http://youtu.be/AOQKD32BB0Y

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