Monday, November 5, 2012

गीत जिन्हे मन गाये- 2 :"छुप के जमाने से..... पलको के परदे में घर भर लिया......"

"छुप के जमाने से..... पलको के परदे में घर भर लिया......"

by Yogendra Vyas on Friday, April 29, 2011 at 6:34pm ·
जिंदगी के काफ़ी नजदीक ये गाना .....गीतकार की कलम से ढुलक कर शब्द .. इल्याराजा के नोटेशन पर स्पंदित हो कर वायलिन की स्ट्रींग..... फ़िर संतुर पर जम्प लेते हुए... बांसुरी के अधरो पर....बस लॆट से जाते है......फ़िर सुरेश जी अपनी रुहानी आवाज से .......निकल पडते है जिंदगी को गले लगाने.......
गुलजार सा. तो ऐसे फ़नकार है कि दो बुंदो में भी किनारा ढुंढ लेते है. किसी भी गाने की रुह उसके शब्दो के साथ उसका संगीत भी होती है....अब बताईये 5 मिनट 20 से. में एक गाने को अपने साजो से जिंदगी की पुरी सैर करा देना कोई मामुली काम तो नहीं......गिटार के नॊट्स पहले अंतरे पर और 3 मि. 10 से. पर सितार का पीस ..............बेकग्राउंड में पानी की सी हिलोरे मारता वायलिन का हुजुम पुरे समय साथ-साथ......संगीत में आनंद की कोई सीमा नहीं........
मात्र दो अंतरे वाले इस गाने में आप जिंदगी के साथ कुलांचे मारते नजर आएंगे.......जब गाना खत्म होगा तो आप यही पाएंगे कि........हमने दो बुंदो से मन भर लिया.......यदि किसी को छोटा-मोटा भी दुख या परेशानी है वो डुब कर इस गाने को सुन भर ले........आप किनारे पर जिंदगी को गले लगाते मिलेंगे........"
(पंचम के बाद इल्याराजा ही ऐसे संगीतकार है जिन्होने वेस्टर्न,जाज को हिन्दुस्तानी फ़ोक के साथ गुंथ कर कई बेजोड संगीत रचनाएं दी है.....और उसी मे से एक बेजोड गाना "सदमा"(१९८१) ऐ जिन्दगी गले लगा ले............)
Link:http://youtu.be/ecmn6i7h7ow
yogendra

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