Saturday, March 30, 2013

होली

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प्रतिकात्मक दृष्टीकोण से देखा जाए तो होली उन सब बुराईयों को तिलांजली है जो कि अग्नि में जल कर भस्म हो जाती है लेकिन आज कल इसके बिल्कुल उलट- लकडी तो जल जाती है लेकिन मन की कलुषता,अराजकता, ईर्ष्या-द्वेष,अनैतिकता,वहशीपन,कुटिलता,घोर लालच, बिना जले साफ़ तौर पर बाहर रह जाते है या युं कहे कि भक्त प्रह्लाद तो जल जाते है लेकिन होलीका साफ़ बचकर बाहर आ जाती है। आज इंसान -रंग की जगह खुन से खेल रहा है और खुद का खुन पानी होता जा रहा है।
ये कहानी उस कालेज की है जहां छात्र अपनी उच्छृंखलता को अपना हक समझते है,कालेज के चेयरमेन उसे व्यवसाय का अड्डा, कालेज का प्रिंसीपल चेयरमेन की चाटुकारी में शान समझता है, कुछ शिक्षक टाइम पास का साधन और कालेज के कर्मचारी हडताल को अपना हथियार।ऐसे में शिक्षा की फ़ेक्ट्री में से किस तरह का उत्पाद बाहर आएगा ये आसानी से समझा जा सकता है।
"होली"फ़िल्म मराठी नाटककार महेश एलकुंचवर के नाटक पर आधारित है जिसे कि ख्यात डायरेक्टर केतन मेहता ने ये भारतीय फ़िल्म एण्ड टेलिविजन संस्थान के छात्रो के साथ एक वर्कशाप के रुप में निर्माण किया था।फ़िल्म की खासियत ये है कि कालेज केम्पस और होस्टल के हालात को कैमेरा जस का तस बस घुमाता जाता है और ये याद दिलाता जाता है कि अरे हां ये छात्र तो हम ही है और ये कालेज,ये होस्टल भी तो हमारा है-जिसकी भद्दी दिवारे,भद्दे स्लोगन पटी पडी है,सिगरेट के धुंए में धुंधलाता भविष्य,बियर की बोतलो में लडखडाती जिंदगी।क्लास में शिक्षक है छात्र नहीं,महिला शिक्षिका की क्लास में बेहुदे कमेंट,आते-जाते लडकियों पर छिंटा-कसी,सीधे-सादे जुनियर छात्रो की रेगिंग और भी कई ऐसी हरकते हां शायद कुछ मीठी यादे भी.....।
छात्रो के मन में कडवाहट तब घुल जाती है जब होली के दिन छात्रो को छुट्टी नहीं मिलती और उस दिन कालेज के चेयरमेन (श्रीराम लागु) के आने की सुचना दी जाती है।छात्रो के यदि कोई नजदीक टीचर है तो वो है मि.सिंग(नासिरउद्दीन शाह)जो उन्हे समझता है।इसी बीच कालेज के क्लास टु कर्मचारी हडताल पर चले जाते है और इस वजह से परीक्षा स्थगित हो जाती है।इससे छात्रो का गुस्सा और भडक जाता है।मि.सिंग(नासिर) प्रिंसीपल(ओम पुरी) को आगाह करते है लेकिन वो इसे नजर अंदाज करते है।प्रिंसीपल का भतीजा जो कि इसी कालेज में पढता है उसका एक छात्र से झगडा हो जाता है और इसी वजह से दुसरे छात्र को कालेज से निकाल दिया जाता है और ये घटना आग में घी की तरह काम करती है।छात्रो का असंतोष बढ जाता है।फ़िल्म संस्थान पुणे में एक गिरे हुए पेड को केतन मेहता ने सांकेतिक रुप से "सिस्टम" के धराशायी होने को प्रतिकात्मक रुप से प्रस्तुत किया। कालेज के चेयर मेन आर्ट्स के विषयो को समाप्त कर व्यवसायिक पाठ्यक्रम शुरु करने का आदेश सुनाते है।चेयरमेन के संबोधन में छात्र जमकर हंगामा मचाते है और टमाटर और अंडे फ़ेंक कर चेयरमेन को वहां से भगा देते है।कालेज प्रिंसीपल एक छात्र को फ़ुसला कर उन सभी छात्रो के नाम उगलवा लेते है जिन्होने हंगामा मचाया था।लेकिन वो उन लोगो के नाम भी ले लेता है जो उस समय वहां नहीं थे।उन सभी छात्रो को कालेज से निकालने का फ़रमान जारी होता है।लेकिन जिसने प्रिंसीपल को नाम लिखवाए थे उन्हे उसका पता चल जाता है और होस्टल में सभी छात्र मिलकर उसे बहुत ही बुरी तरह प्रताडित करते है और वो छात्र शर्मिंदगी में आत्म-हत्या कर लेता है।अंतत: पुलिस आती है "होली" के दिन सभी छात्रो की गिरफ़्तारी होती है लोग रंग गुलाल खेलते है और ये छात्र पुलिस गाडी में सुनी आंखो से लोगो को होली खेलते बस देखते है।
आइए आपको बता दे कि ये कालेज से निकाले गए छात्र कौन-कौन है-तो ये है अमीर खान,आशुतोष गवारीकर,नीरज वोरा,राज जुत्शी,अमोल गुप्ते,मनोज पहावा,बेंजामिन गिलानी,यतिन्द्र करयेकर,राहुर रानाडे इत्यादि।लेकिन ये सभी छात्र फ़िल्म में से तो निकाले गए लेकिन आज फ़िल्म जगत में उतने ही सफ़ल कलाकार के तौर पर आपको काम करते दिखाई देंगे।इस फ़िल्म में कोई हीरो नहीं,जहांगीर चौधरी का कैमेरा कभी अमीर खान या अन्य कोई कलाकार पर फ़ोकस नहीं होता बस फ़ोकस में कालेज और स्क्रीप्ट।हालांकि फ़िल्म अपने अंदाज में शिक्षा व्यवस्थाओं पर कई तंज कर जाती है कि "शिक्षा संस्थान वो फ़ेक्ट्रीयां है जहां गुलाम नौकरी करने के लिए बनाए जाते है"फ़िल्म मनोरंजन के लिए देखना होतो ना देखे निराशा हाथ लगेगी इसीलिए इस बार कहानी को विस्तार से कह दिया है।लेकिन ऐसी फ़िल्मो पर भी चर्चा होनी चाहिए जो कभी चर्चाओं में नही रही ।
विशेष:इस फ़िल्म को नेशनल अवार्ड बेस्ट सिनेमेटोग्राफ़ी हेतु जहांगीर चौधरी को दिया गया था
फ़िल्म: होली (1984)
निर्माता: प्रदीप उप्पर
निर्देशक: केतन मेहता
लेखक: महेश एलकुंचवर
संगीत: रजत ढोलकिया
सिनेमेटोग्राफ़ी-जहांगीर चौधरी

Saturday, March 23, 2013

ये रातें नई पुरानी- जूली


उम्र सोलह की हो या अठ्ठारह की जब यौवन का समंदर हीलौरे लेता है तो तृप्त होने किनारे की ओर तेजी से भागता है।मगर कुछ किनारे छलावे साबित होते है और कुछ लहरो को तृप्त कर हौले से सहारा देकर फ़िर से उन्मुक्तता के समंदर में छोड देते है।ये तटस्थता ना सिर्फ़ सुरक्षा देती है बल्कि लहरो का आत्मविश्वास मजबुत करती है।ये किनारा एक अच्छा दोस्त,एक अच्छा प्रेमी,एक अच्छे पति-पत्नि और एक अच्छा समाज भी हो सकता है।

प्रेम तृप्ति भी है और प्यास भी, सुंदरता उसी में है कि तृप्त भी हो जाए और प्यास भी बनी रहे लेकिन ये तभी संभव है जब होश पुर्वक उम्र में प्रवेश किया जाए और प्रकृति की अनुपम कृति शरीर का सम्मानपुर्वक वैभव बरकरार रखा जाए।

"जुली" वो यौवन है जो अपनी उम्र की करवटो को महसुस करती है और "शशी" वो डरपोक भौंरा है करवट ले रहे फ़ुल में सलवटे डाल कर भाग जाना चाहता है।फ़िल्म जुली सत्तर के दशक की सबसे चर्चित फ़िल्मों से एक है जिसमें एक एग्लो इंडियन लडकी जुली(लक्ष्मी) जो कि बंगाली ब्राम्हण परिवार के लडके शशी भट्टाचार्य(विक्रम) से प्यार करने लगती है।जुली का पिता ओमप्रकाश जो अपने परिवार को बहुत प्यार करता है उस परिवार में जुली के अलावा एक छोटी बेटी और दो बेटॆ है।जुली की मां नादिरा सख्त मिजाज है और पति ओमप्रकाश की रोज पीने की आदत से परेशान भी है।लेकिन ये परिवार लडते झगडते हर हाल में खुश रहना जानता है और इन्हे खुशी मनाते देखते हुए अपनी भी इच्छा हो जाती है कि यार चलो परिवार के साथ मिल कर "माय हार्ट इज बिटिंग गाना गाया जाए."शायद यही खुशी आज परिवारो में कही पीछे छुट गयी है कि हम खुशी के पलो को साथ में जीने में भी संकोच करते है।दुरियां इतनी हो जाती है कि अपने ही बच्चों की आवाज हम तक नहीं पहुंच पाती और जब तक पहुंचती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

थोडी बात राजेश रोशन की करे जो अपने संगीत के जरिये रोमांस का एक बहुत ही उम्दा परफ़्युम छिडक देते है और वाद्ययंत्रो से मादकता का वो महौल पैदा करते है जिसमें बाहर आना सचमुच अच्छा नहीं लगता "भुल गया सब कुछ याद नहीं अब कुछ.....किशोर और लता जी की आवाज में जो नशा है शायद कोई मदिरा में नहीं। सेक्साफ़ोन और गिटार के बेहतरीन नोट्स पुरे रोमांटिक माहौल पर पहरा देते नजर आते है।लेकिन जैसा कि मैने उपर कहा कि ऐसे माहौल से बाहर आने का मन नहीं करता लेकिन इस गाने के तुरंत बाद यदि आप इसी फ़िल्म का गाना "साचा नाम तेरा" सुनेगे तो आपको "मादकता से समाधी" वाली बात बिल्कुल सटिक लगेगी बस एक प्रयोग करके देख लीजिए।आशाजी और उषा जी की आवाज का सम्मोहन जाल बस माहौल बदल जाएगा।बेक ग्राउंड स्कोर बेहतरीन है। इसी में से एक धुन पर राजेश जी ने एक गाना आगे चलकर फ़िल्म काश में बनाया था "ओ यारा तु प्यारो से है प्यारा"।

जुली प्रेगनेंट हो जाती है,शशी शहर भाग जाता है,जुली की मां उसे शहर से बाहर नौकरी करने के बहाने भेज देती है।बच्चा जन्म ले लेता है, जिसे जद्दो जहद के बीच नादिरा अनाथ आश्रम में भेजती है।एक मां अपने बच्चे के बिना कैसे रहे और एक मां अपनी बेटी का दुख कैसे सहन करे इसी के चलते नादिरा पुरे परिवार के साथ इंग्लैण्ड जाने का फ़ैसला करती है लेकिन शशी के पिता उत्पल दत्त को ये बात पता चलती है वो एक समझदार इंसान के रुप में दोनो परिवारो को जात पांत से परे होकर मिला देते है।जुली के चेहरे पर फ़िर मुस्कान लौट आती है उसे अपना प्यार और बच्चा दोनो मिल जाते है।लेकिन असल जिंदगी में ऐसी कहानियों का अंत बहुत ही गमगीन और दुर्दांत तरीके से होता है।

लता जी द्वारा फ़िल्म में गाया एक गाना बहुत असरदार है ये राते नई पुरानी...सबके दिल है जागे जागे..सबकी आंखे खोई खोई,खामोशी करती है बातें।

अगरबत्ती अगर भगवान के लिए जलती है तो कोशिश हो कि इसकी खुशबु उस तक पहुंचा दे।
विशेष:जुली फ़िल्म मलयालम फ़िल्म चत्ताकारी से प्रेरित है,इसमें श्री देवी ने बाल कलाकार की भुमिका निभाई थी और प्रिति  सागर ने पहला अंग्रेजी गाना हिन्दी फ़िल्म के लिए गाया।

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फ़िल्म:
जुली- (अप्रेल 18, 1975)
निर्माता:बी.नागारेड्डी-चक्रपानी
निर्देशक : के.एस.सेथुमाधवन
लेखक(संवाद)-इंदर राज आनंद
संगीत:राजेश रोशन
अवार्ड:
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड /बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन अवार्ड-
बेस्ट एक्ट्रेस- -लक्ष्मी
बेस्ट म्युजिक डायरेक्टर-राजेश रोशन
बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस-नादिरा
बेस्ट गीतकार-आनंद बक्क्षी(बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन अवार्ड)
गीत:
1. दिल क्या करे..किशोर कुमार(गीत-हरीन्द्रनाथ चटॊपाध्याय)
2. ये राते नई पुरानी-लता मंगेशकर(गीत -आनंद बक्क्षी)
3. भुल गया सब कुछ-किशोर कुमार,लता मंगेशकर(गीत-हरीन्द्रनाथ चटॊपाध्याय)
4. माय हर्ट इज बिटिंग-प्रिति सागर (गीत-हरीन्द्रनाथ चटॊपाध्याय)
5. सांचा नाम तेरा-आशा भॊंसले,उषा मंगेशकर    (गीत -आनंद बक्क्षी)


Sunday, March 10, 2013

जागो सोने वालो.....सुनो मेरी कहानी: भुत बंगला

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सौ वर्ष के भारतीय फ़िल्म ब्रम्हाण्ड की सैर करे तो हजारों वर्ष भी कम पड जाएंगे- अनगिनत सफ़लताएं-असफ़लताएं,किस्मत-बदकिस्मती,बुलंदियां-बदहाली,खुशी-अवसाद,सुरीलापन-बेसुरापन,बेशुमार कालजयी हुनरमंद कलाकारो की एक पुरी आकाश गंगा,जीवित एवं अजीवित किवदंतियां।सतत चलायमान ये फ़िल्मी दुनिया सफ़ेद पर्दे पर अपना रुपहला सफ़र तय करती रहेगी जब तक कि कोई सुरज अपनी किरणॊ को समेट ना लें।
तो चलिए आज की सैर भुत बंगले पर कर आते है।इसी फ़िल्मी ब्रम्हाण्ड के एक सितारे मेहमुद जिन्होने विषम परिस्थितियों में कई असफ़लताओं को एक साथ जिया,बहके कदमो को संभाला और एक और असफ़ल फ़िल्म अपने भाई उस्मान अली के साथ मिल कर बनाई।बात असफ़लता की नहीं हिम्मत की है जब साठ के द्शक में फ़िल्मे एक से बढ कर एक टिकिट खिडकियों पर अपने रिकार्ड तोड रही थी ऐसे में भुत बंगला जैसी फ़िल्म बनाना वाकई साहस का काम ही कहा जाएगा। एक तो मर्डर मिस्ट्री उपर से फ़िल्म को सेंसर बोर्ड से ए-सर्टिफ़िकेट मिलना पुरी फ़िल्म पर ग्रहण ही कहा जा सकता है।फ़िल्म में कुछ खिंचाव था तो मेहमुद और पंचम की कामेडी।इस फ़िल्म में पंचम ने पहली और आखिरी बार फ़िल्म में अभिनय किया लेकिन जो भी किया अद-"भुत" ही था।फ़िल्म में नुकसान ना हो इसलिए मेहमुद कि बहन मीनु मुमताज ने अपना पहला बच्चा तक कोख में आते ही उसे जन्म ना देने का निर्णय लिया।ऐसे में जब फ़िल्म कुछ कमाल ना कर पाए तो क्या स्थिति पैदा होती होगी, लेकिन ये फ़िल्मी दुनिया दिल और दिमाग दोनो की मजबुती मांगती है।इस फ़िल्म में किशोर कुमार और पंचम ने पहली बार साथ काम किया और वो गाना बनाया जो आज भी गुनगुनाया जाता है.."जागो सोने वालो सुनो मेरी कहानी." मन्ना डे से "आओ ट्विस्ट करे" जैसा गाना गवा लिया ये गाना बिनाका गीत माला की दुसरी पायदान पर खुब बजा और लता जी से बेहद एक सुंदर गीत "ओ मेरे प्यार आजा"जो कि बेहद करीने से तैयार किया लगता है।
लेकिन उस समय मिडिया छब्बीस वर्षीय पंचम से बहुत सख्ती से पेश आया उसने छोटॆ नवाब और भुतबंगला की जम कर खिंचाई की। लेकिन जब आज इन गानो के नोट्स और आर्केस्ट्राइजेशन को सुनते है तो उनकी थाप बाद के दशको में सुनाई देती है।क्या ही अजीब बात है जिस भुतबंगला मर्डर मिस्ट्री ने पंचम के संगीत को नकारा वही "तीसरी मंजिल" की मर्डर मिस्ट्री ने पंचम को सातवे आसमान पर पहुंचा दिया।
अरे!फ़िल्म की कहानी पर तो बात ही नहीं की...चलिए संक्षेप में कहानी युं है कि अमीर सेठ कुंदनलाल का बंगले कत्ल हो जाता है और उसकी बीबी और बच्चा डर कर कही चले जाते है।पचास साल बाद उसी बंगले में कुंदनलाल के तीन भतीजे श्यामलाल(नासीर हुसैन),रामलाल(नाना पलसीकर) और रामु रहते है।रामलाल की बेटी रेखा(तनुजा) जिस दिन लंदन से आने वाली होती है उसी दिन रामलाल की कार एक्सीडेंट में मौत हो जाती है और उसी रात को रामु का भी कत्ल हो जाता है।ऐसे में मोहन(मेहमुद) जो कि युथ क्लब का सदस्य है और उनकी पुरी टीम है रेखा की मदद करती है।मोहन और रेखा की मोहब्बत और कौन रेखा को भी मारना चाहता है,पिछले कत्लो का कातिल कौन हो सकता है?ये जानना हो तो फ़िल्म तो देखनी पडेगी ना।क्या पंचम और मेहमुद को गाते और खाते भुत बंगले में नहीं देखिएगा क्या?
विशेष: भुत बंगला से मेहमुद ने पहली बार निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा।इस फ़िल्म में दुबले पतले अमीन सयानी को अपनी मोहक आवाज के साथ देखना सुखद है।
फ़िल्म: भुत बंगला(1965)
निर्माता: उस्मान अली
निर्देशक: मेहमुद
गीत: महरुह सुल्तानपुरी
संगीत: आर.डी.बर्मन
लेखक एवं संवाद: अख्तर-उल-इमान
गीत:
1.ओ मेरे प्यार आजा -लता मंगेशकर
2.जागो सोने वालो-किशोर कुमार
3.प्यार करता जा-मन्ना डे
4.आओ ट्विस्ट करे-मन्ना डे
5.भुत-बंगला-मेहमुद,आर.डी.बर्मन,सुरेश


Saturday, March 2, 2013

आओ थोडे से सपने सजाएं-थोडा सा रुमानी हो जाएं.........

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दो घाटो के बीच एक पतली सी धारा है,घाट नहीं चलते धारा चलती है,पतली सी धारा जो समंदर से मिलती है और समंदर हो जाती है और घाट घाट रह जाते है जो कही आते है ना जाते है।ये है जीवन का दृष्टीकोण कि हमारी सोच सकारात्मक धारा की तरह है या जड घाटो की तरह स्थिर।विराट को अपना लेना और उसे अपने में समा लेना जीवन के प्रति खिलंद्ड पन की निशानी है।उदासी,संकोच,कुंठा,अवसाद और निराशा इस जीवन की जरुरत नहीं है।जरुरत है तो बस थोडा सा रुमानी होने की।
अमोल पालेकर कृत ये फ़िल्म अपने ही अंदर पल रही दमित इच्छाओं को जगाने कामयाब होती है और सपनो और आशाओं को जगाकर उन्मुक्ततता की बारिश में भीगने छोड देती है।
बिन्नी (अनिता कंवर) जो कि एक बहुत ही साधारण सी लडकी है जिस पर उम्र की बैल चढती जाती है अपने रहन सहन पहनावे की वजह से समाज की नजरों में उसकी एक नीरस लडकी की छबि बन जाती है।बिन्नी के दो भाई एक छोटा जो कि अपने परिवार को बहुत प्यार करता है लेकिन आत्मविश्वास से एक टुटा हुआ है जिसे ये एहसास है कि जीवन में वो कभी कुछ कर ही नहीं सकता।बिन्नी का बडा भाई जिसे बौध्दिक सनक का अतिरेक है और जिसे कोई भी चीज आसानी से गले नहीं उतरती।बिन्नी के पिता जिन्हे बस बिन्नी की चिंता है कोई बिन्नी का हाथ थाम ले।बहुत ही उमस का महौल है वातावरण में रत्ती भर भी हवा नहीं,उदास लोग उदास प्रकृति,इनकी चिंता बारिश कब होगी,कब ठंडक होगी....ऐसे में धृष्ट्द्युम्न पद्मनाभ प्रजापति निलकंठ धुमकेतु बारिशंकर(नाना पाटेकर) इनके घर में दस्तक देते है जो एक पोटली लेकर सिर्फ़ पांच हजार में बारिश करवाने का वादा करता है।एक केन्द्रिय पात्र के रुप में नाना पाटेकर बहुत ज्यादा प्रभावित करते है और सिध्द करते है एक कलाकार कला की असिमित गहराईयों में कितने अंदर तक जा सकता है।एक ऐसा सेल्स-मेन बनकर आना जो कि आपको अडतालिस घंटो में बारिश करवाने का दावा करे तो मानना चाहिए कि वो कितना आत्मविश्वास से लबरेज होगा।वो कहता है ये दुनिया समझदारी की वजह से इतनी नासमझ हो गयी है कि कोई पागल ही इस दुनिया को बचा सकता है।ये फ़िल्म मैनेजमेंट की कक्षाओं आज भी पढाई जाती है।पुरी फ़िल्म में संवाद आदायगी पद्य रुपेण है जो कि एक अनोखा प्रयोग अमोल पालेकर ने किया और उसे अपनी अदाकरी से नानापाटेकर और अनिता कंवर ने पुरी फ़िल्म को कविता में ढाल दिया।तो बात हो रही थी बारिश की बारिशंकर किस प्रकार से अपनी बातो से बिन्नी और उसके भाई के अंदर सोये आत्मविश्वास को जगाता है,वो उदासी छांटता है,मन में बसी हिन भावना को तार-तार करता है,मन के अंदर बसी कुंठा को बाहर का रास्ता दिखाता है,बिन्नी का मन कुलांचे मारने लगता है,उमस में उमंग का यौवन दौड पडता है मुस्कान और मुस्काराहट चेहरो पर लौट आती है....तब पानी की बुंदे आसमान से ट्पकने लगती है,बारिश होती है,बारिशंकर की दृढता और अदम्य इच्छा शक्ति बारिश के रुप में बहुत कुछ कह जाती है......कमलेश पांडे की लेखनी को नानापाटेकर के मुख से सुनना बहुत सुखद लगता है विशेष कर "पानी" की कविता-कि-"पानी तो पानी है पानी जिन्दगानी है इसलिए जब रूह की नदी सूखी हो और मन का हिरण प्यासा हो दिमाग में लगी हो आग और प्यार की घागर खाली हो तब मैं….हमेशा ये बारिश नाम का गीला पानी लेने की राय देता हूं मेरी मानिए तो ये बारिश खरीदिये सस्ती सुन्दर टिकाऊ बारिश सिर्फ 5 हज़ार रुपये में....."
वैसे तो ये फ़िल्म सभी को देखना चाहिए लेकिन विशेषकर उन्हे जो किसी कुंठा में जी रहे हो या आत्मविश्वास कुछ कमजोर पडने लगा हो तो बस एक काम करना है-"थोडा सा रुमानी हो जाना है"

विशेष: ये फ़िल्म रिचर्ड नेश द्वारा लिखित अमेरिकन नाटक "द रेन मेकर" से प्रेरित है"इसकी शुटिंग मध्यप्रदेश के हिल स्टेशन "पचमढी" में की गई थी।
फ़िल्म:थोडा सा रुमानी हो जाए
वर्ष:1990
निर्माता-निर्देशक :अमोल पालेकर
संगीत: भास्कर चंदावरकर
गीतकार एवं डायलाग- कमलेश पांडे,चित्रा पालेकर

गीत:
छाया गांगुली-१.चांदी रात भर २.धर-धर बरसे ३.जब कभी हम मिलते ४. पापा ओ पापा ५. नन्ही सी सिल्लु६. थोडा सा रुमानी हो जाए ७. तारो ने कहा ८. ये लडका
विनोद राठौड- ९.थोडा सा रुमानी हो जाए १०.समंदर को बांधने ११.अनवर-प्यार प्यार प्यार-१२.कोरस-आज तो बिजलियां-


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