उम्र सोलह की हो या अठ्ठारह की जब यौवन का समंदर हीलौरे लेता है तो तृप्त होने किनारे की ओर तेजी से भागता है।मगर कुछ किनारे छलावे साबित होते है और कुछ लहरो को तृप्त कर हौले से सहारा देकर फ़िर से उन्मुक्तता के समंदर में छोड देते है।ये तटस्थता ना सिर्फ़ सुरक्षा देती है बल्कि लहरो का आत्मविश्वास मजबुत करती है।ये किनारा एक अच्छा दोस्त,एक अच्छा प्रेमी,एक अच्छे पति-पत्नि और एक अच्छा समाज भी हो सकता है।
प्रेम तृप्ति भी है और प्यास भी, सुंदरता उसी में है कि तृप्त भी हो जाए और प्यास भी बनी रहे लेकिन ये तभी संभव है जब होश पुर्वक उम्र में प्रवेश किया जाए और प्रकृति की अनुपम कृति शरीर का सम्मानपुर्वक वैभव बरकरार रखा जाए।
"जुली" वो यौवन है जो अपनी उम्र की करवटो को महसुस करती है और "शशी" वो डरपोक भौंरा है करवट ले रहे फ़ुल में सलवटे डाल कर भाग जाना चाहता है।फ़िल्म जुली सत्तर के दशक की सबसे चर्चित फ़िल्मों से एक है जिसमें एक एग्लो इंडियन लडकी जुली(लक्ष्मी) जो कि बंगाली ब्राम्हण परिवार के लडके शशी भट्टाचार्य(विक्रम) से प्यार करने लगती है।जुली का पिता ओमप्रकाश जो अपने परिवार को बहुत प्यार करता है उस परिवार में जुली के अलावा एक छोटी बेटी और दो बेटॆ है।जुली की मां नादिरा सख्त मिजाज है और पति ओमप्रकाश की रोज पीने की आदत से परेशान भी है।लेकिन ये परिवार लडते झगडते हर हाल में खुश रहना जानता है और इन्हे खुशी मनाते देखते हुए अपनी भी इच्छा हो जाती है कि यार चलो परिवार के साथ मिल कर "माय हार्ट इज बिटिंग गाना गाया जाए."शायद यही खुशी आज परिवारो में कही पीछे छुट गयी है कि हम खुशी के पलो को साथ में जीने में भी संकोच करते है।दुरियां इतनी हो जाती है कि अपने ही बच्चों की आवाज हम तक नहीं पहुंच पाती और जब तक पहुंचती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
थोडी बात राजेश रोशन की करे जो अपने संगीत के जरिये रोमांस का एक बहुत ही उम्दा परफ़्युम छिडक देते है और वाद्ययंत्रो से मादकता का वो महौल पैदा करते है जिसमें बाहर आना सचमुच अच्छा नहीं लगता "भुल गया सब कुछ याद नहीं अब कुछ.....किशोर और लता जी की आवाज में जो नशा है शायद कोई मदिरा में नहीं। सेक्साफ़ोन और गिटार के बेहतरीन नोट्स पुरे रोमांटिक माहौल पर पहरा देते नजर आते है।लेकिन जैसा कि मैने उपर कहा कि ऐसे माहौल से बाहर आने का मन नहीं करता लेकिन इस गाने के तुरंत बाद यदि आप इसी फ़िल्म का गाना "साचा नाम तेरा" सुनेगे तो आपको "मादकता से समाधी" वाली बात बिल्कुल सटिक लगेगी बस एक प्रयोग करके देख लीजिए।आशाजी और उषा जी की आवाज का सम्मोहन जाल बस माहौल बदल जाएगा।बेक ग्राउंड स्कोर बेहतरीन है। इसी में से एक धुन पर राजेश जी ने एक गाना आगे चलकर फ़िल्म काश में बनाया था "ओ यारा तु प्यारो से है प्यारा"।
जुली प्रेगनेंट हो जाती है,शशी शहर भाग जाता है,जुली की मां उसे शहर से बाहर नौकरी करने के बहाने भेज देती है।बच्चा जन्म ले लेता है, जिसे जद्दो जहद के बीच नादिरा अनाथ आश्रम में भेजती है।एक मां अपने बच्चे के बिना कैसे रहे और एक मां अपनी बेटी का दुख कैसे सहन करे इसी के चलते नादिरा पुरे परिवार के साथ इंग्लैण्ड जाने का फ़ैसला करती है लेकिन शशी के पिता उत्पल दत्त को ये बात पता चलती है वो एक समझदार इंसान के रुप में दोनो परिवारो को जात पांत से परे होकर मिला देते है।जुली के चेहरे पर फ़िर मुस्कान लौट आती है उसे अपना प्यार और बच्चा दोनो मिल जाते है।लेकिन असल जिंदगी में ऐसी कहानियों का अंत बहुत ही गमगीन और दुर्दांत तरीके से होता है।
लता जी द्वारा फ़िल्म में गाया एक गाना बहुत असरदार है ये राते नई पुरानी...सबके दिल है जागे जागे..सबकी आंखे खोई खोई,खामोशी करती है बातें।
अगरबत्ती अगर भगवान के लिए जलती है तो कोशिश हो कि इसकी खुशबु उस तक पहुंचा दे।
विशेष:जुली फ़िल्म मलयालम फ़िल्म चत्ताकारी से प्रेरित है,इसमें श्री देवी ने बाल कलाकार की भुमिका निभाई थी और प्रिति सागर ने पहला अंग्रेजी गाना हिन्दी फ़िल्म के लिए गाया।
फ़िल्म:
जुली- (अप्रेल 18, 1975)
निर्माता:बी.नागारेड्डी-चक्रपानी
निर्देशक : के.एस.सेथुमाधवन
लेखक(संवाद)-इंदर राज आनंद
संगीत:राजेश रोशन
अवार्ड:
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड /बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन अवार्ड-
बेस्ट एक्ट्रेस- -लक्ष्मी
बेस्ट म्युजिक डायरेक्टर-राजेश रोशन
बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस-नादिरा
बेस्ट गीतकार-आनंद बक्क्षी(बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन अवार्ड)
गीत:
1. दिल क्या करे..किशोर कुमार(गीत-हरीन्द्रनाथ चटॊपाध्याय)
2. ये राते नई पुरानी-लता मंगेशकर(गीत -आनंद बक्क्षी)
3. भुल गया सब कुछ-किशोर कुमार,लता मंगेशकर(गीत-हरीन्द्रनाथ चटॊपाध्याय)
4. माय हर्ट इज बिटिंग-प्रिति सागर (गीत-हरीन्द्रनाथ चटॊपाध्याय)
5. सांचा नाम तेरा-आशा भॊंसले,उषा मंगेशकर (गीत -आनंद बक्क्षी)
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