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दो घाटो के बीच एक पतली सी धारा है,घाट नहीं चलते धारा चलती है,पतली सी धारा जो समंदर से मिलती है और समंदर हो जाती है और घाट घाट रह जाते है जो कही आते है ना जाते है।ये है जीवन का दृष्टीकोण कि हमारी सोच सकारात्मक धारा की तरह है या जड घाटो की तरह स्थिर।विराट को अपना लेना और उसे अपने में समा लेना जीवन के प्रति खिलंद्ड पन की निशानी है।उदासी,संकोच,कुंठा,अवसाद और निराशा इस जीवन की जरुरत नहीं है।जरुरत है तो बस थोडा सा रुमानी होने की।
अमोल पालेकर कृत ये फ़िल्म अपने ही अंदर पल रही दमित इच्छाओं को जगाने कामयाब होती है और सपनो और आशाओं को जगाकर उन्मुक्ततता की बारिश में भीगने छोड देती है।
बिन्नी (अनिता कंवर) जो कि एक बहुत ही साधारण सी लडकी है जिस पर उम्र की बैल चढती जाती है अपने रहन सहन पहनावे की वजह से समाज की नजरों में उसकी एक नीरस लडकी की छबि बन जाती है।बिन्नी के दो भाई एक छोटा जो कि अपने परिवार को बहुत प्यार करता है लेकिन आत्मविश्वास से एक टुटा हुआ है जिसे ये एहसास है कि जीवन में वो कभी कुछ कर ही नहीं सकता।बिन्नी का बडा भाई जिसे बौध्दिक सनक का अतिरेक है और जिसे कोई भी चीज आसानी से गले नहीं उतरती।बिन्नी के पिता जिन्हे बस बिन्नी की चिंता है कोई बिन्नी का हाथ थाम ले।बहुत ही उमस का महौल है वातावरण में रत्ती भर भी हवा नहीं,उदास लोग उदास प्रकृति,इनकी चिंता बारिश कब होगी,कब ठंडक होगी....ऐसे में धृष्ट्द्युम्न पद्मनाभ प्रजापति निलकंठ धुमकेतु बारिशंकर(नाना पाटेकर) इनके घर में दस्तक देते है जो एक पोटली लेकर सिर्फ़ पांच हजार में बारिश करवाने का वादा करता है।एक केन्द्रिय पात्र के रुप में नाना पाटेकर बहुत ज्यादा प्रभावित करते है और सिध्द करते है एक कलाकार कला की असिमित गहराईयों में कितने अंदर तक जा सकता है।एक ऐसा सेल्स-मेन बनकर आना जो कि आपको अडतालिस घंटो में बारिश करवाने का दावा करे तो मानना चाहिए कि वो कितना आत्मविश्वास से लबरेज होगा।वो कहता है ये दुनिया समझदारी की वजह से इतनी नासमझ हो गयी है कि कोई पागल ही इस दुनिया को बचा सकता है।ये फ़िल्म मैनेजमेंट की कक्षाओं आज भी पढाई जाती है।पुरी फ़िल्म में संवाद आदायगी पद्य रुपेण है जो कि एक अनोखा प्रयोग अमोल पालेकर ने किया और उसे अपनी अदाकरी से नानापाटेकर और अनिता कंवर ने पुरी फ़िल्म को कविता में ढाल दिया।तो बात हो रही थी बारिश की बारिशंकर किस प्रकार से अपनी बातो से बिन्नी और उसके भाई के अंदर सोये आत्मविश्वास को जगाता है,वो उदासी छांटता है,मन में बसी हिन भावना को तार-तार करता है,मन के अंदर बसी कुंठा को बाहर का रास्ता दिखाता है,बिन्नी का मन कुलांचे मारने लगता है,उमस में उमंग का यौवन दौड पडता है मुस्कान और मुस्काराहट चेहरो पर लौट आती है....तब पानी की बुंदे आसमान से ट्पकने लगती है,बारिश होती है,बारिशंकर की दृढता और अदम्य इच्छा शक्ति बारिश के रुप में बहुत कुछ कह जाती है......कमलेश पांडे की लेखनी को नानापाटेकर के मुख से सुनना बहुत सुखद लगता है विशेष कर "पानी" की कविता-कि-"पानी तो पानी है पानी जिन्दगानी है इसलिए जब रूह की नदी सूखी हो और मन का हिरण प्यासा हो दिमाग में लगी हो आग और प्यार की घागर खाली हो तब मैं….हमेशा ये बारिश नाम का गीला पानी लेने की राय देता हूं मेरी मानिए तो ये बारिश खरीदिये सस्ती सुन्दर टिकाऊ बारिश सिर्फ 5 हज़ार रुपये में....."
वैसे तो ये फ़िल्म सभी को देखना चाहिए लेकिन विशेषकर उन्हे जो किसी कुंठा में जी रहे हो या आत्मविश्वास कुछ कमजोर पडने लगा हो तो बस एक काम करना है-"थोडा सा रुमानी हो जाना है"
विशेष: ये फ़िल्म रिचर्ड नेश द्वारा लिखित अमेरिकन नाटक "द रेन मेकर" से प्रेरित है"इसकी शुटिंग मध्यप्रदेश के हिल स्टेशन "पचमढी" में की गई थी।
फ़िल्म:थोडा सा रुमानी हो जाए
वर्ष:1990
निर्माता-निर्देशक :अमोल पालेकर
संगीत: भास्कर चंदावरकर
गीतकार एवं डायलाग- कमलेश पांडे,चित्रा पालेकर
गीत:
छाया गांगुली-१.चांदी रात भर २.धर-धर बरसे ३.जब कभी हम मिलते ४. पापा ओ पापा ५. नन्ही सी सिल्लु६. थोडा सा रुमानी हो जाए ७. तारो ने कहा ८. ये लडका
विनोद राठौड- ९.थोडा सा रुमानी हो जाए १०.समंदर को बांधने ११.अनवर-प्यार प्यार प्यार-१२.कोरस-आज तो बिजलियां-
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