Saturday, February 23, 2013

रुपहला सफ़र -36 चौरंगी लेन-एकाकी जीवन का केनवास

36 चौरंगी लेन-एकाकी जीवन का केनवास
समाज में रहकर एकाकी जीवन व्यतित करने पर मजबुर होना ये किसी अभिशाप से कम नहीं तब ये और भयावह लगता है जब उम्र ढलान पर खडी हो।अतीत उन बडती झुर्रियो में तेजी से समाने लगता है।यह एक तरह से एक व्यक्ति की एकाकी पन से लडाई ही कही जाएगी जिसमें निरंकुश भंक सा माहौल,एकाकी जिंदगी में कोई ताजी आवाजे ना हो तो वे आवाजे स्थान ले लेती है जो किसी और को ना सुनाई देती हो ,कमरे में सजी वस्तुओं तक में उदासी पसरी पडी हो उस स्थिति की कल्पना कर के ही मन उचाट हो उठता है। क्या इस दुनिया में ऐसे भी लोग है जिन्हे भावनाओं की थाप की दरकार है।ऐसे में कुछ कदम उस ओर भी उठ जाए तो ढलती शामें भी मुस्करा सकती है।
"36 चौरंगी लेन" कोलकाता की गलियों का वो पता है जहां पर वायोलेट स्टोनहेम(जेनिफ़र केंडल) रहती है।वायोलेट स्टोनहेम एक मध्यमवर्गीय एंग्लो-इंडियन स्कुल टीचर है जिसके जीवन में दो कमरो का पुराना सा फ़्लेट,एक बिल्ली,एक बीमार भाई एडी स्टोनहेम(ज्योफ़री केंडल) जो हेल्प-एज होम में है और एक लेटर बाक्स जिसमें कभी-कभी कोई चिठ्ठी उसकी भतीजी रोजमेरी(सोनी राजदान) की आ जाती है जो थोडी मुस्कराहट की वजह बन जाती है और साथ में अतित की यादे बस।स्वतंत्रता के बाद भारत में कुछ एंग्लो-इंडियन परिवार बचे थे उनमें से कुछ बाहर जाकर बस गए और कुछ यही भारत में रह गए।ये फ़िल्म उन्ही में से एक एकाकी महिला की कहानी है जिसका अतित ही उसका परिवार है।वायोलेट हर रोज फ़ुल लेकर अपने परिजनो की कब्र पर चढाती है जहां वो अपनो के होने का एहसास करती है (उनमें से एक कब्र उस व्यक्ति की भी है जो शादी के पहले ही चल बसा) और फ़िर अपने स्कुल में जाती है जहां से वापिस थके और बोझिल कदमो से अपने घर आती है। निर्देशक अपर्णा सेन की तारीफ़ करना होगी कि उन्होने वायोलेट स्टोनहेम के किरदार के लिए जेनिफ़र केंडल को एक कृति के रुप में पेश किया है,फ़्रेम दर फ़्रेम जीवन की शांतता,उचाट मन,चेहरे और आंखो से बुझी सी जिंदगी ओढे -संवेदनशीलता को जिस तरह उकेरा है इसे एक फ़िल्मकार की गहन अंर्तद्र्ष्टी ही कहा जाएगा।अशोक मेहता की सिनेमेटॊग्राफ़ी इसे और अधिक जीवंत बनाती है जो वाकई वो महौल रचती है जिसमें ऐसा लगता है कि क्यो ना हम कुछ रंग डाल दे स्टोनहेम की जिंदगी में।
लेकिन दो किरदार और जुडते है वायोलेट स्टोनहेम की जिंदगी में नंदिता राय( देबाश्री राय ) जो वायोलेट स्टेनहोम की पुर्व छात्रा रही है और समरेश(ध्रितीमन चटर्जी) जो कि नंदिता का बाय फ़्रेड है ।इनके अचानक आने से वायोलेट स्टेनहोम जिंदगी में बहार सी आ जाती है उसका निश्चल स्नेह,पवित्र मन से दोनो का स्वागत करता है।एक नीरस घर को खुशियों की चाबी मिल जाती है।अचानक एकाकी जिंदगी से बाहर आने की खुशी स्टोनहेम के चेहरे पर देखी जा सकती है।बातो ही बातॊ में ये दोनो स्टोनहेम को इस बात के लिए राजी कर लेते है कि समरेश को नावेल लिखने के लिए एक निजता की जरुरत है और स्टेनहोम उन्हे अपना फ़्लेट दिन में उपयोग करने के लिए दे देती है।लेकिन ये दोनो फ़्लेट का उपयोग रोमांस के लिए करते है और काफ़ी अंतरंग दृश्य अपर्णा सेन ने डाले है जो अपर्णा सेन की फ़िल्मो का टेग है।दोनो की शादी हो जाती है।जब भावुकता एकाकीपन के अतिरेक से बाहर आती है तो वो अतिसंवेदनशील भी हो जाती है।स्टोनहेम समरेश को अपना पुराना ग्रामोफ़ोन और उसके रिकार्ड भी दे देती है। संवेदनशीलता तब छली जाती है जब स्टोनहेम उन्हे क्रिसमस साथ में मनाने का न्यौता देती है लेकिन वे लोग शहर से बाहर होने का बहाना बनाकर टाल देते है।स्टेनहोम सरप्राइज के तौर पर खुद केक बनाकर उनके घर देने आती है तो देखती है पुरे शबाब में पार्टी चल रही है.... टुट जाती है कपडे में लिपटा हुआ केक लेकर वापिस लौट जाती है....एकाकीपन फ़िर चादर ओढ लेता है।पुरी फ़िल्म में जेनिफ़र केंडल की अदाकारी देखने लायक है। उस समय के फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड में रेखा ने उमराव जान फ़िल्म के लिए अवार्ड लेते समय ये स्वीकारोक्ति की थी ये अवार्ड की हकदार सिर्फ़ जेनिफ़र केंडल है।फ़िल्म के निर्माता शशिकपुर जिन्हे इस फ़िल्म के शो भी अपने पैसे से करने पडे थे कुल मिलाकर ये फ़िल्म व्यवसायिक तौर पर पुरी तरह असफ़ल रही थी लेकिन अंर्तराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में इसे काफ़ी सराहना मिली एवं अवार्ड भी प्राप्त हुए।भले ही ये फ़िल्म अंगरेजी में है लेकिन एक संवेदनशील इंसान को ये फ़िल्म भाषाओ के चंगुल से बाहर खींच कर एकाकी लोगो की जिंदगी में खुशिया बिखेरने के लिए जरुर धकेलती है।
विशेष:इस फ़िल्म में जेनिफ़र केंडल के पिता ज्योफ़री केंडल ने उनके भाई एडी स्टेनहोम की भुमिका निभाई थी।

फ़िल्म:36 चौरंगी लेन(२९ अगस्त १९८१)
निर्माता: शशिकपुर
निर्देशक एवं लेखक : अपर्णा सेन
संगीत:वनराज भाटिया
सिनेमेटोग्राफ़ी-अशोक मेहता
अवार्ड:
नेशनल फ़िल्म अवार्ड-
सिल्वर लोटस आवार्ड-बेस्ट फ़िल्म(अंगरेजी)
गोल्डन लोटस आवार्ड-बेस्ट डायरेक्टर-अपर्णा सेन
सिल्वर लोटस आवार्ड-बेस्ट सिनेमेटो ग्राफ़ी- अशोक मेहता
ब्रिटिश फ़िल्म अवार्ड-बेस्ट एक्ट्रेस -जेनिफ़र केंडल
गोल्डन एज अवार्ड-बेस्ट फ़िचर फ़िल्म-अपर्णा सेन


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