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समाज में धर्म एक जीवन शैली है जिसमें सामुहिक तौर रहने के तौर तरीके-मसलन सदाचार,नैतिकता,ईमानदारी,सहिष्णुता एवं दुसरो के हित की रक्षा इत्यादि की सीख दी जाती है।जब मनुष्य़ इन दायरो के बाहर जाता है तो कानुन उसकी समीक्षा कर दोषी को दंडित करता है।आज धर्म के पांडालो में भी उतनी भीड है जितनी की अदालतॊ में।अब ऐसे में चुनैतिया दोनो ही जगह बराबर की है।ऐसे में गुनाहगार और बेगुनाह के द्वंद को मथना वाकई एक विचारणीय मुद्दा है क्योकि कानुन को जो दिखाया जाता है वही देखता है ऐसे में अगर गवाही सच्ची है तो इंसाफ़ सच्चा और यदि गवाही झुठी तो इंसाफ़ भी झुठा। ऐसे में बेगुनाही साबित करना अति कठिन होता है और जब गुनाहगार कानुन की गलियों का फ़ायदा उठा कर बच निकलता है तो वो आने वाले मुकदमो की नजीर बन जाता है।कई मर्तबा कानुन भय पैदा करता है इसीलिए लोग ये संज्ञा देने लगे है कि कानुन के पचडे में ना पडा जाए तो ही बेहतर है,ऐसा इसलिए कि कोर्ट कचहरी के अनुभव बहुत अच्छे नहीं कहे जा सकते।कानुन ने पचडे की शक्ल इसीलिए ली कि कानुन के पंडितो ने इसे एक चक्रव्युह के रुप में इजाद कर लिया और जो इस चक्रव्युह में फ़ंसा उसे अपनी जिंदगी को दाव पर लगाना पढा।
बी.आर. चोपडा ने फ़िल्म "कानुन" में उन तथ्यो को रखने की कोशीश की जिसमें किस तरह व्यक्ति हत्या के आरोप में गुनाही और बेगुनाही की जद्दोजहद के बीच झुलता है। उसे उन साक्ष्य और गवाहों के आधार पर दोषी साबित करने की कोशिश की जाती है जो कि परिस्थिति जन्य पैदा हुए है।ऐसे में अदालत के सामने इंसाफ़ एक चुनैती है कि फ़ैसला कानुन की किताबो से करें या इंसानियत के आधार पर करें।
फ़िल्म के आरंभ में कालिदास (जीवन) एक गणपत नाम के व्यक्ति की हत्या के अरोप में जज बद्रीप्रसाद(अशोक कुमार) की आदालत में पेश होता है वो ये दलील देता है इसी गणपत नाम के व्यक्ति की हत्या के आरोप में वो बेगुनाह होते हुए भी दस साल जेल में सजा काट चुका है इसलिए देश का कोई भी कानुन उसे सजा नहीं दे सकता।क्या एक आदमी का खुन दो बार किया जा सकता है।अगर गणपत खुन दस साल पहले हुआ तो मुझे आज यहां अदालत में क्यो लाया गया है और यदि गणपत का खुन आज हुआ है तो दस साल पहले मुझे किस बात की सजा दी गयी।जो वाकई चौकाने वाला तथ्य है ऐसे में अगर फ़ैसला गलत हो तो उसे वापिस लिया जा सकता है लेकिन अगर ऐसे में किसी को फ़ांसी होगयी तो उस दशा में कानुन क्या करेगा? आज इस तरह के कई घटना क्रम आए दिन होते है जिसमें बेगुनाह को एक आरोपी तरह खडा कर दिया जाता है।मसलन यदि कोई एक्सीडेंट हो गया है और आरोपी की गाडी का नंबर नहीं होने की दशा में इंश्योरेंस क्लेम के लिए कोई नंबर छांट कर लिखवा दिया जाता है और उस बेगुनाह व्यक्ति को आरोपी बना कर खडा कर दिया जाता है जो एक्सीडेंट उसने किया ही नहीं।ऐसे में अदालत के सामने झुठ का पुलिंदा सच के रुप दिखाया जाता है।बहरहाल फ़िल्म में आगे के घटना क्रम में एक बार फ़िर ऐसे हालात बनते है कि कैलाश खन्ना(राजेन्द्र कुमार) जो कि एक सरकारी वकील है और जज बद्रीनाथ का होने वाला दामाद भी।वो जज बद्रीनाथ को शहर के साहुकार धनीराम(ओमप्रकाश) का खुन करते हुए देख लेता है।बद्रीप्रसाद का बेटा विजय(मेहमुद) जो कि आवारा किस्म की फ़ितरत रखता है और धनीराम से काफ़ी कर्ज ले लेता है उसी सिलसिले में विजय की बहन मीना (नंदा) कैलाश को धनीराम से बात करने के के लिए कहती है और उसी समय उसका खुन हो जाता है।इसी खुन के आरोप में एक चोर कालिया(नाना पलसीकर) पकडा जाता है जो महज चोरी करने के इरादे से धनीराम के घर में घुसता है।बस यही से शुरु होता है अदालती ड्रामा मीना समझती है कि कैलाश आरोपी है इसलिए चुप रहती है ,कैलाश चुप रहता है तो कालिया गुनाहगार साबित होता है।आखिरकार कैलाश जज बद्रीप्रसाद पर आरोप लगाता है तो मीना कालिया को गुनाह कबुल करने के लिए राजी कर लेती है।अब फ़िल्म देखनी ही चाहिए कि आखिर सच्चाई क्या है।अशोक कुमार नाना पलसीकर अभिनय तारिफ़े काबिल है।सलील चौधरी का बेक ग्राऊंड म्युजिक काफ़ी हुनर मंद और सधा हुआ लगता है।
बी.आ.चोपडा की तारीफ़ करना होगी उन्होने सन साठ के दशक में एक ऐसी फ़िल्म बनाने जोखिम लिया जिसमें एक भी गाना नहीं जबकि उस समय के दौर में एक फ़िल्म में आठ से दस गानो की भरमार रहती थी। ये फ़िल्म अंत में वही विषय उठती है कि मृत्युदंड दिया जाना चाहिए या नहीं। हालात की मजबुरी किस तरह गवाहों को सच को झुठ और झुठ को सच बनाने में मजबुर कर देते है।क्योकि जान के बदले जान इंसाफ़ नहीं इंतेकाम ही कहलाएगा।
फ़िल्म :कानुन(१९६०)
निर्माता: बी.आर.चोपडा,स्वरुप सिंग
निर्देशक:बी.आर.चोपडा
लेखक: अख्तर-उल-इमान,सी.जे. परवी
संगीत: सलील चौधरी
अवार्ड:
नेशनल फ़िल्म अवार्ड-बेस्ट फ़ीचर फ़िल्म(सर्टिफ़िकेट आफ़ मेरिट)
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड-
बेस्ट डायरेक्टर-बी.आर. चोपडा
बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर-नाना पलसीकर
बी.आर. चोपडा ने फ़िल्म "कानुन" में उन तथ्यो को रखने की कोशीश की जिसमें किस तरह व्यक्ति हत्या के आरोप में गुनाही और बेगुनाही की जद्दोजहद के बीच झुलता है। उसे उन साक्ष्य और गवाहों के आधार पर दोषी साबित करने की कोशिश की जाती है जो कि परिस्थिति जन्य पैदा हुए है।ऐसे में अदालत के सामने इंसाफ़ एक चुनैती है कि फ़ैसला कानुन की किताबो से करें या इंसानियत के आधार पर करें।
फ़िल्म के आरंभ में कालिदास (जीवन) एक गणपत नाम के व्यक्ति की हत्या के अरोप में जज बद्रीप्रसाद(अशोक कुमार) की आदालत में पेश होता है वो ये दलील देता है इसी गणपत नाम के व्यक्ति की हत्या के आरोप में वो बेगुनाह होते हुए भी दस साल जेल में सजा काट चुका है इसलिए देश का कोई भी कानुन उसे सजा नहीं दे सकता।क्या एक आदमी का खुन दो बार किया जा सकता है।अगर गणपत खुन दस साल पहले हुआ तो मुझे आज यहां अदालत में क्यो लाया गया है और यदि गणपत का खुन आज हुआ है तो दस साल पहले मुझे किस बात की सजा दी गयी।जो वाकई चौकाने वाला तथ्य है ऐसे में अगर फ़ैसला गलत हो तो उसे वापिस लिया जा सकता है लेकिन अगर ऐसे में किसी को फ़ांसी होगयी तो उस दशा में कानुन क्या करेगा? आज इस तरह के कई घटना क्रम आए दिन होते है जिसमें बेगुनाह को एक आरोपी तरह खडा कर दिया जाता है।मसलन यदि कोई एक्सीडेंट हो गया है और आरोपी की गाडी का नंबर नहीं होने की दशा में इंश्योरेंस क्लेम के लिए कोई नंबर छांट कर लिखवा दिया जाता है और उस बेगुनाह व्यक्ति को आरोपी बना कर खडा कर दिया जाता है जो एक्सीडेंट उसने किया ही नहीं।ऐसे में अदालत के सामने झुठ का पुलिंदा सच के रुप दिखाया जाता है।बहरहाल फ़िल्म में आगे के घटना क्रम में एक बार फ़िर ऐसे हालात बनते है कि कैलाश खन्ना(राजेन्द्र कुमार) जो कि एक सरकारी वकील है और जज बद्रीनाथ का होने वाला दामाद भी।वो जज बद्रीनाथ को शहर के साहुकार धनीराम(ओमप्रकाश) का खुन करते हुए देख लेता है।बद्रीप्रसाद का बेटा विजय(मेहमुद) जो कि आवारा किस्म की फ़ितरत रखता है और धनीराम से काफ़ी कर्ज ले लेता है उसी सिलसिले में विजय की बहन मीना (नंदा) कैलाश को धनीराम से बात करने के के लिए कहती है और उसी समय उसका खुन हो जाता है।इसी खुन के आरोप में एक चोर कालिया(नाना पलसीकर) पकडा जाता है जो महज चोरी करने के इरादे से धनीराम के घर में घुसता है।बस यही से शुरु होता है अदालती ड्रामा मीना समझती है कि कैलाश आरोपी है इसलिए चुप रहती है ,कैलाश चुप रहता है तो कालिया गुनाहगार साबित होता है।आखिरकार कैलाश जज बद्रीप्रसाद पर आरोप लगाता है तो मीना कालिया को गुनाह कबुल करने के लिए राजी कर लेती है।अब फ़िल्म देखनी ही चाहिए कि आखिर सच्चाई क्या है।अशोक कुमार नाना पलसीकर अभिनय तारिफ़े काबिल है।सलील चौधरी का बेक ग्राऊंड म्युजिक काफ़ी हुनर मंद और सधा हुआ लगता है।
बी.आ.चोपडा की तारीफ़ करना होगी उन्होने सन साठ के दशक में एक ऐसी फ़िल्म बनाने जोखिम लिया जिसमें एक भी गाना नहीं जबकि उस समय के दौर में एक फ़िल्म में आठ से दस गानो की भरमार रहती थी। ये फ़िल्म अंत में वही विषय उठती है कि मृत्युदंड दिया जाना चाहिए या नहीं। हालात की मजबुरी किस तरह गवाहों को सच को झुठ और झुठ को सच बनाने में मजबुर कर देते है।क्योकि जान के बदले जान इंसाफ़ नहीं इंतेकाम ही कहलाएगा।
फ़िल्म :कानुन(१९६०)
निर्माता: बी.आर.चोपडा,स्वरुप सिंग
निर्देशक:बी.आर.चोपडा
लेखक: अख्तर-उल-इमान,सी.जे. परवी
संगीत: सलील चौधरी
अवार्ड:
नेशनल फ़िल्म अवार्ड-बेस्ट फ़ीचर फ़िल्म(सर्टिफ़िकेट आफ़ मेरिट)
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड-
बेस्ट डायरेक्टर-बी.आर. चोपडा
बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर-नाना पलसीकर
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