नरम नरम रात में-गरम गरम चांद पर
इस संसार में इंसान ही एक ऐसा प्राणी है जो हंस सकता है और जिस पर हंसा जा सकता है।आज के कलुषित भरे वातावरण में जहां कुटिल हंसी का बोलबाला है वहां स्वस्थ्य हास्य सहज उपलब्ध हो जाए तो क्या बात है। ऋषिकेश मुखर्जी फ़िल्मो में हास्य प्रस्तुतिकरण के मामले में अव्वल कहे जा सकते है।गोलमाल(1979) की सफ़लता के बाद उसी तर्ज पर उन्होने नरम-गरम(1981) नाम की हास्य प्रधान फ़िल्म का निर्माण किया जिसमें उन्होने ये सिध्द किया कि एक फ़िल्मकार को अपने दर्शको को गुदगुदाने के लिए कोई बहुत बडे तामझाम की जरुरत नहीं जैसा कि आजकल की कथित हास्यप्रधान फ़िल्मो में होता है-"सहज रुप से अंर्तमन से हास्य बोध हो वो ही असल हास्य है।"
भवानी शंकर(उत्पल द्त्त)जो कि कंजुस अमीर विधुर है लेकिन साथ ही अति अंधविश्वासी भी है जब एक किरदार में इतने गुण है और अगर वो उत्पल द्त्त है तो निश्चित तौर समझिए कि हास्य का पुरा पुरा इंतजाम है ।भवानी शंकर एकदम खुर्राट किस्म का इंसान है जो अपनी सास(दीना पाठक) के अलावा किसी से नहीं डरता। एक किरदार है रामप्रसाद(अमोल पालेकर) जो कि भावानी शंकर के यहां मामुली नौकरी करता है पर काम बडॆ-बडे करता है।सिर्फ़ शर्ट-पैजामे में पुरी फ़िल्म के किरदार को जी जाना और सहज रुप से हंसी का पात्र बन जाना ये ही आमोल पालेकर की खासियत रही है।ये ही काम आज अच्छे से अच्छे हास्य कलाकार अपने चेहरे,आंखो शरीर को पुरा तोडमरोड ना ले तब तक दर्शको की हंसी नहीं निकाल पाते।कुसुम(स्वरुप सम्पत) एक गरीब विष्णु प्रसाद(ए.के.हंगल) की बेटी है और रामप्रसाद से प्यार करती है।लेकिन रामप्रसाद की इतनी तनख्वाह नहीं है कि वो कुसुम से शादी कर सके।गरीब विष्णु प्रसाद के घर को गांव का महाजन कुर्क कर लेता है और वो कुसुम को लेकर रामप्रसाद के पास भावानी शंकर के मकान में रहने आ जाता है।सुंदर कुसुम को देखकर भवानी शंकर का भ्रष्ट मैनेजर विष्णु प्रसाद के समक्ष कुसुम से शादी का प्रस्ताव रखता है अब यही से शुरु होता है असल ड्रामा,राम प्रसाद किस तरह से झुठ बोलकर ये शादी रुकवाता है और फ़िर एक किरदार के रुप से भवानी शंकर का भाई काली शंकर(शत्रुध्न सिन्हा) का प्रवेश होता है वो भी कुसुम से शादी करना चाहता है फ़िर भवानी शंकर खुद ये शादी करना चाहता है इन सब के बीच रामप्रसाद कैसे इन परिस्थितियो से निबटता है ये वाकई देखने लायक है।पुरी फ़िल्म में हंसी का सिलसिला जो शुरु होता है वो "द एन्ड" में जाकर ही खत्म होता है।एक बहुत ही सकुन भरी फ़िल्म आपको तनाव से दुर रखने का पुरा ख्याल रखती है।पुरी फ़िल्म फ़ुहडता से परे एक नितांत सात्विक और मौलिक हास्य के रुप में सामाजिक संदेश भी दे जाती है कि अंधविश्वास के जाल में इंसान का बडा नुकसान होने की पुर्ण संभावना रहती है।शत्रुध्न सिन्हा पहली बार एक हास्य फ़िल्म में एक उम्दा प्रस्तुती के साथ दाखिल हुए है रामलीला वाला दृश्य काफ़ी गुदगुदाता है, वही ओमप्रकाश ने पंडित के किरदार में अपनी छोटी सी भुमिका से हास्य की फ़ुहार छोडी है वो तारीफ़े काबिल है।
फ़िल्म का संगीत पंचम ने दिया है टाइटल गीत "नरम नरम रात में गरम गरम चांद पर" उम्दा बन पडा है, धुन गोलमाल से उठाई गयी है लेकिन कहीं कुछ कसर रह गई लगती है जहां गुलजार,ऋषिकेश मुखर्जी,पंचम जैसी तिकडी हो वहां लगता है संगीत के मामले में चावल कुछ अधपका सा रह गया लगता है।ऋषि दा ने एक मासुम से झुठ को हास्य का जामा पहना कर कई हिट फ़िल्म दी है मसलन चुपके-चुपके,गोलमाल,झुठ बोले कव्वा काटे इत्यादि।फ़ुरसत ना हो तो निकालकर थोडा "नरम-गरम" ठहाके हो जाए.....
फ़िल्म: नरम-गरम(1981)
निर्माता: सुभाष गुप्ता,उदय नारायण सिंह
निर्देशक:ऋषिकेश मुखर्जी
लेखकीय योगदान:शानु मुखर्जी,मनोज बसु,डी.एन.मुखर्जी,अशोक रावत,
संवाद:राही मासुम रजा
गीत:गुलजार
संगीत:आर.डी.बर्मन
गीत:
1 मेरे अंगना आए-आशा भोंसले
2 हमें रास्तो की जरुरत नहीं-आशा भोंसले
3 मेरे चेहरे में छुपा-आशा भोंसले
4 एक बात सुनी है -सुषमा श्रेष्ठ,शत्रुध्न सिन्हा
5 नरम नरम रात में -सपन चक्रवर्ती,आर.डी.बर्मन
विशेष: इस फ़िल्म में एक गाना"हमें रास्तो की जरुरत नहीं"जो कि उस समय तो हिट नही हुआ लेकिन पंचम ने इसी गाने की हुबहु धुन फ़िल्म सागर(1985) में "सागर किनारे..." में उपायोग की और देखिए उस गाने का तिलस्म आज भी कायम है।
भवानी शंकर(उत्पल द्त्त)जो कि कंजुस अमीर विधुर है लेकिन साथ ही अति अंधविश्वासी भी है जब एक किरदार में इतने गुण है और अगर वो उत्पल द्त्त है तो निश्चित तौर समझिए कि हास्य का पुरा पुरा इंतजाम है ।भवानी शंकर एकदम खुर्राट किस्म का इंसान है जो अपनी सास(दीना पाठक) के अलावा किसी से नहीं डरता। एक किरदार है रामप्रसाद(अमोल पालेकर) जो कि भावानी शंकर के यहां मामुली नौकरी करता है पर काम बडॆ-बडे करता है।सिर्फ़ शर्ट-पैजामे में पुरी फ़िल्म के किरदार को जी जाना और सहज रुप से हंसी का पात्र बन जाना ये ही आमोल पालेकर की खासियत रही है।ये ही काम आज अच्छे से अच्छे हास्य कलाकार अपने चेहरे,आंखो शरीर को पुरा तोडमरोड ना ले तब तक दर्शको की हंसी नहीं निकाल पाते।कुसुम(स्वरुप सम्पत) एक गरीब विष्णु प्रसाद(ए.के.हंगल) की बेटी है और रामप्रसाद से प्यार करती है।लेकिन रामप्रसाद की इतनी तनख्वाह नहीं है कि वो कुसुम से शादी कर सके।गरीब विष्णु प्रसाद के घर को गांव का महाजन कुर्क कर लेता है और वो कुसुम को लेकर रामप्रसाद के पास भावानी शंकर के मकान में रहने आ जाता है।सुंदर कुसुम को देखकर भवानी शंकर का भ्रष्ट मैनेजर विष्णु प्रसाद के समक्ष कुसुम से शादी का प्रस्ताव रखता है अब यही से शुरु होता है असल ड्रामा,राम प्रसाद किस तरह से झुठ बोलकर ये शादी रुकवाता है और फ़िर एक किरदार के रुप से भवानी शंकर का भाई काली शंकर(शत्रुध्न सिन्हा) का प्रवेश होता है वो भी कुसुम से शादी करना चाहता है फ़िर भवानी शंकर खुद ये शादी करना चाहता है इन सब के बीच रामप्रसाद कैसे इन परिस्थितियो से निबटता है ये वाकई देखने लायक है।पुरी फ़िल्म में हंसी का सिलसिला जो शुरु होता है वो "द एन्ड" में जाकर ही खत्म होता है।एक बहुत ही सकुन भरी फ़िल्म आपको तनाव से दुर रखने का पुरा ख्याल रखती है।पुरी फ़िल्म फ़ुहडता से परे एक नितांत सात्विक और मौलिक हास्य के रुप में सामाजिक संदेश भी दे जाती है कि अंधविश्वास के जाल में इंसान का बडा नुकसान होने की पुर्ण संभावना रहती है।शत्रुध्न सिन्हा पहली बार एक हास्य फ़िल्म में एक उम्दा प्रस्तुती के साथ दाखिल हुए है रामलीला वाला दृश्य काफ़ी गुदगुदाता है, वही ओमप्रकाश ने पंडित के किरदार में अपनी छोटी सी भुमिका से हास्य की फ़ुहार छोडी है वो तारीफ़े काबिल है।
फ़िल्म का संगीत पंचम ने दिया है टाइटल गीत "नरम नरम रात में गरम गरम चांद पर" उम्दा बन पडा है, धुन गोलमाल से उठाई गयी है लेकिन कहीं कुछ कसर रह गई लगती है जहां गुलजार,ऋषिकेश मुखर्जी,पंचम जैसी तिकडी हो वहां लगता है संगीत के मामले में चावल कुछ अधपका सा रह गया लगता है।ऋषि दा ने एक मासुम से झुठ को हास्य का जामा पहना कर कई हिट फ़िल्म दी है मसलन चुपके-चुपके,गोलमाल,झुठ बोले कव्वा काटे इत्यादि।फ़ुरसत ना हो तो निकालकर थोडा "नरम-गरम" ठहाके हो जाए.....
फ़िल्म: नरम-गरम(1981)
निर्माता: सुभाष गुप्ता,उदय नारायण सिंह
निर्देशक:ऋषिकेश मुखर्जी
लेखकीय योगदान:शानु मुखर्जी,मनोज बसु,डी.एन.मुखर्जी,अशोक रावत,
संवाद:राही मासुम रजा
गीत:गुलजार
संगीत:आर.डी.बर्मन
गीत:
1 मेरे अंगना आए-आशा भोंसले
2 हमें रास्तो की जरुरत नहीं-आशा भोंसले
3 मेरे चेहरे में छुपा-आशा भोंसले
4 एक बात सुनी है -सुषमा श्रेष्ठ,शत्रुध्न सिन्हा
5 नरम नरम रात में -सपन चक्रवर्ती,आर.डी.बर्मन
विशेष: इस फ़िल्म में एक गाना"हमें रास्तो की जरुरत नहीं"जो कि उस समय तो हिट नही हुआ लेकिन पंचम ने इसी गाने की हुबहु धुन फ़िल्म सागर(1985) में "सागर किनारे..." में उपायोग की और देखिए उस गाने का तिलस्म आज भी कायम है।
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