Sunday, November 25, 2012

रुपहला सफ़र: रामचंद पाकिस्तानी

रुपहला सफ़र: रामचंद पाकिस्तानी




पंच तत्वों में से इंसान सिर्फ़ धरती और आकाश को ही बांट पाया और ये शायद इंसान की सबसे बडी गलतफ़हमी है कि उसने इस ब्रम्हाण्ड के सबसे महीन टुकडे पर अधिकार कर लिया। चुल्हे सरहदों के इस पार भी जलते है उस पार भी,पानी का सैलाब इधर भी है उधर भी,सरहदॊ की हवाओं में दर्द और सिसकियां इधर भी है उधर भी।सियासी और मजहबी ताकतो को बारुद की गंध में इंसानियत की सुगंध महसुस ही नहीं होती और ये ही एक हारे हुए इंसान की सबसे बडी हार है।
रामचंद पाकिस्तानी एक सत्य घटना पर आधारित कहानी है। चम्पा(नंदिता दास) उन अभागी स्त्रियों में से एक है जिसका आठ साल बच्चा रामचंद(सैयद फ़जल हुसैन/नावेद जब्बार) व पति शंकर (राशिद फ़ारुकी) अनजाने में भारतीय सीमा में चले जाते है और भारतीय़ आर्मी उन्हे जासुस समझ कर हिरासत में ले लेती है ये सब उस समय हुआ जब वर्ष 2002 में भारतीय संसद पर हमला हुआ था और उस समय भारत और पाकिस्तान की सरहदों पर काफ़ी तनाव भी उत्पन्न हो गया था। पाकिस्तान की सटी हुयी सरहदों पर कुछ दलित जातियां बसती है।उसी गरीब हिन्दु दलित जाति का बच्चा रामचंद अपनी मां से खफ़ा होकर दौडते हुए अनजाने में भारतीय सीमा में चला आता है और उसे ढुंढते हुए उस का पिता शंकर भारतीय सीमा में प्रवेश कर जाता है। यहां से शुरु होता है पिता पुत्र का जेल का सफ़र और एक हताश मां और पत्नि सरहद पर टकटकी लगाए उनके आवन की बाट जोह रही होती है।जेल किसी भी देश की हो वहां रहना एक भयावह अनुभव से कम नहीं होता जबकि आपको ये मालुम हो कि यहां आपकी पुरी की पुरी उम्र भी गुजर सकती है।आज भी ऐसे कई सौ कैदी होंगे जो दोनो देशो की जेलो में बिना किसी जुर्म के सजा भुगत रहे हो और अपनी ख्वाहिशे और सपने अनजान जेल की चाहर दिवारी में दफ़न होते देखते है।जुर्म सिर्फ़ इतना की सफ़ेद पुते पत्थरों की सीमा को लांघ कर कदम बढा देना।
चम्पा अकेले अपनी गरीबी और साहुकारी से लडती हुयी जीने की आस को थामे रखती है।पाकिस्तानी फ़िल्मकार और डायरेक्टर मेहरीन जब्बार ने एक सकारत्मक नजरिये से व्यक्तिगत स्वतंत्रता,उसके अधिकार और जातिगत असमानता को इस फ़िल्म में उठाया है।एक बच्चा जेल में भी सामाजिक असमानता पर तंज बात अपनी महिला जेलर को कहता है जो छु जाने वाली है।मेहरीन जब्बार ने जेल में सडती गलती जिंदगी को बिना कोई सनसनी पैदा किए जस का तस रखा है बल्कि असल हालातों को थोडा नरम रुप में ही प्रस्तुत किया है। रामचंद और उसके पिता अपनी जिंदगी के चार साल जेल में कडवे अनुभवो के सहारे गुजारते है।इंसान की आस तब और टुट जाती है जब उसे ये पता लगे वो अब रिहा किया जाने वाला है लेकिन फ़िर उसे जेल में डाल दिया जाए।
ये फ़िल्म पाकिस्तान और भारत के कलाकारों की साझा फ़िल्म है।जिसे कई अंर्तराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए है। इस फ़िल्म का संगीत भारतीय संगीतकार देबोजीत मिश्रा ने तैयार किया और स्वर दिए शुभा मुद्दगल और शफ़ाकत अमानत अली ने।एक आभासी संगीत और सोद्देश्य बोलो से गुजरते हुए हम सरहदॊं पर चहल कदमी करते हुए उसकी संवेदनशीलता को महसुस करते है।इस फ़िल्म के को-एडीटर असीम सिन्हा रहे है जिन्होने सत्यजीत रे के साथ काफ़ी काम किया। सरहदो की दिवानगी को खत्म करना हो तो इस फ़िल्म को देखा जाना चाहिए।
विशेष:पाकिस्तानी फ़िल्मों में शायद ये पहली फ़िल्म है जिसमें पाकिस्तानी हिन्दु को केन्द्रिय पात्र रखकर फ़िल्म बनाई गई है। नंदिता दास को छोड कर सारे कलाकार पाकिस्तानी ही है।
फ़िल्म: रामचंद पाकिस्तानी
वर्ष: 2 अक्टुबर, 2008
निर्माता:जावेद जब्बार
निर्देशक:मेहरीन जब्बार
संगीत:देबोजीत मिश्रा
गीतकार: अनवर मकसुद
गीत:
01 तेरी मेरी प्रीत -शुभा मुद्दगल
02 अल्लाह मेघ दे-शुभा मुद्दगल और शफ़ाकत अमानत अली
03 फ़िर वही रास्ते-शफ़ाकत अमानत अली
04 खारी नीम के नीचे -माईभागी
05 तेरीन पौंडा-अलन फ़कीर

-योगेन्द्र व्यास

Sunday, November 18, 2012

गुलजार की "किताब"

मास्टर जी की आ गई चिठ्ठी: किताब
बच्चों का मन बहुत कोमल होता है और हम सब उस कोमल मन पर अपने हिसाब से इबारत लिखने की कोशिश में लगे रहते है। बच्चॊं के मनोविज्ञान को समझना है तो थोडा हमें भी बच्चा हो जाने की जरुरत है जैसे कि गुलजार साहब खुद फ़िल्म "किताब" बनाते वक्त बच्चे के अंर्तमन में जा बैठते है और उनकी छोटी-छोटी इच्छाओं,जिज्ञासा और शैतानियों को हौले से निकाल कर किसी रुई के फ़ोए पर आहिस्ता से रख देते है।
समरेश बसु के उपन्यास "पथिक" पर आधारित फ़िल्म "किताब" एक बिल्कुल अलग नजरिये से बनाई गयी फ़िल्म जिसमें एक बच्चा बाबला(मास्टर राजु) जिंदगी को अपने ढंग से देखना चाहता और उस नजरिये में वो खट्टे-मीठे अनुभवो से गुजरता हुआ जिंदगी की सच्चाईयों से सामना करता है जो उसके मन पर गहरा प्रभाव डालती है।बाबला की मां(दीना पाठक) उसे गांव से शहर उसकी दीदी एवं जिजाजी(विध्या सिन्हा,उत्तम कुमार) के पास पढ़ने  भेजती है ताकि पढ़ लिख कर वो बड़ा बन सके।यहां बाल मन जो कहता है वो हंसी पैदा करता है-बाबला अपनी मां से कहता है"तुम भी अजीब हो मां कभी कहती हो बच्चे दुध पीने से बड़े होते है,और कभी कहती हो पड़ने लिखने से"।शुरुआती तौर पर बाबला को स्कुल व दीदी का घर दोनो अच्छे लगते है लेकिन धीरे धीरे उसे बाहरी दुनिया लुभाने लगती है।स्कुल में मास्टर जी की दुनिया उसे उब पैदा करती है।फ़िर शुरु होता है शरारतॊ का दौर स्कुल में मास्टर जी मजाक बनाना,अपने दोस्त पप्पु(मा.टीटो) के साथ सड़को पर घुमना,मदारी का जादु,दुनिया को अपने नजरिये से देखना उसे अच्छा लगने लगता है।इधर घर पर शिकायती चिठ्ठीयाँ स्कुल से आने लगती है।फ़िर स्कुल में धमाचौकड़ी मचाते बच्चे गाना गाते है"आ..आ..इ.ई.मास्टर जी की आ गई चिठ्ठी"।इस गाने में पंचम दा ने क्लास की मेज को ही रिदम के रुप में इस्तेमाल किया था।इसी बीच बाबला बीमार हो जाता है तब डाक्टर कहता है "बच्चो के टेंशन बहुत सख्त होते  बच्चों को हम जिंदगी से बहुत डरा कर रखते है,हमेशा ये कहते है कि पड़ोगे नहीं तो क्या भाड़ झोंकोगे।ये नहीं बताते कि जिंदगी कितनी खुबसुरत भी है।"स्कुल और मां बाप इसी उलझन में रहते है कि आखिर बच्चॊ को संस्कारित करने की जिम्मेवारी किस की है।शायद हमारा समाज बच्चों के मामलो में उतना संवेदनशील नहीं है जितना उसे होना चाहिए।
बाबला जहां भी जाता है लोग उसे नसीहते देने लगते है एक मर्तबा वो रास्ते में हलवाई की दुकान पर जाता है उससे कहता है हमें जलेबी बनाना सीखा दो ना..हलवाई बोलता है तुम अच्छे घर के हो तो बाबला कहता है तो क्या हलवाई अच्छे घर के नहीं होते।बाबला को ये समझ नहीं आता कि सितार बजाने के लिए ज्योग्राफ़ी सिखना क्यो जरुरी है,मदारी भी बिना पढ़े लिखे क्या गजब का जादु दिखाता है।इन सब मजे मस्ती के बीच वो स्कुल और घर पर डांट डपट का शिकार होता रहता है और कहता है बड़ो की सबको जरुरत होती है,लेकिन बड़ो को किसी की नहीं। इसी के चलते वो एक रात वापस अपनी मां के पास जाने के लिए घर से अकेला निकल जाता है।ट्रेन में बिना टिकट रास्ते में उतार दिया जाता है फ़िर बालमन जीवन की कड़वी हकीकत का सामना करता है,जिसमें अंधे भिखारी से मुलाकात,इंजिन ड्रायवर से मुलाकात और एक रात ठंड में ठिठुरते हुए एक प्लेटफ़र्म पर एक बुढी भिखारिन के पास उसके कंबल में सो जाता है।सुबह जब उसे पता चलता है कि रात भर वो एक मृत भिखारिन के पास सोया रहा।तब वो दुखी हो जाता है और उसने जो सिक्का उसके डब्बे से निकाला था वो वापस डाल देता है।एक सीख लेकर घर पहुंचता है और फ़िर अच्छे से पढ़ाई लिखाई करने का वादा करता है।
गुलजार सा.ने पुरी फ़िल्म में फ़्लेश बेक को बहुत ही उम्दा तरीके प्रस्तुत किया है साथ ही साथ कुछ डायलाग को दार्शनिक पुट भी दिया, एक प्रसंग जहां भिखारी(श्रीराम लागु)बाबला को कहते है-"गाडी छुटने का गम नहीं स्टेशन नहीं छुटना चाहिए"।
बाल दिवस सिर्फ़ बच्चो के लिए ही नहीं बडो के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है कि- एक दिन तो बच्चो के साथ बच्चा बन कर देखा जाए..।"बाल दिवस" पर "किताब" ही हो जाए......
विशेष: प्रयोगधर्मी पंचम ने "धन्नो की आंखो में रात का सुरमा" गाने में एक बेसुरी सी आवाज वाला फ़्लेंजिंग गजेट को गिटार में जोड कर एक नायब धुन तैयार की और फ़िर बाद इसे कई प्रसिध्द गानो में उपयोग किया।

फ़िल्म: किताब
वर्ष: 31अगस्त 1977
निर्माता:प्राणलाल मेहता,गुलजार
निर्देशक: गुलजार
संगीत:आर.डी. बर्मन
गीतकार:गुलजार

गीत:
1. अआइई मास्टर जी की आ गई चिठ्ठी-शिवांगी कोल्हापुरे
2. धन्नो की आंखो में रात का सुरमा- आर. डी.
3. हरि दिन तो बिता- राजकुमारी
4. मेरे साथ चले ना साया- सपन चक्रवर्ती

-योगेन्द्र व्यास

"रुपहला सफ़र": लीक से हटकर कथा कहने की कला-"चीनी कम"

"रुपहला सफ़र": लीक से हटकर कथा कहने की कला-"चीनी कम"
जिंदगी की मिठास इसी में है कि आपके व्यक्तित्व में मिठास की संभावना उम्र के पढाव से तय ना हो बल्कि आंतरिक सुघडता उम्र तो धता बताती हुई आपके व्यक्तित्व पर बिछ जाए।
समाज ने अपना एक नजरिया नामक चश्मा बना रखा है और हर व्यक्ति उसी चश्में से अपनी नजरों को पैनी करने की कोशिश में लगा रहता है। लेकिन कई लोग ऐसे भी है जो जिंदगी को खुद के नजरिये से देखते है और अपनी जोखिम पर रोमांच रचते है।
फ़िल्म चीनी कम ६४ वर्ष और ३४ वर्ष के उम्र के फ़ासले पर बनी मनोरंजक फ़िल्म है जिसमें नि:स्तेज उम्र में प्यार की कपोले फ़ुटना और ३० वर्ष के फ़ासले पर खडी लडकी से प्यार का इजहार,इजहार में इकरार पुरे प्रकरण को बहुत ही हास्य-विनोद से भरपुर बनाता हुआ एक फ़िल्मी ड्रामा है।
बुद्धदेव गुप्ता(अमिताभ बच्चन)सख्त मिजाज शेफ़ और लंदन में नामचीन स्पाइस-६ इंडियन रेस्टोरेंट का मालिक है। जिसके मुताबिक उसके किचन से खाना सिर्फ़ बाहर आता है अंदर नहीं जाता।लेकिन एक कस्टमर नेहा वर्मा(तब्बु) हैदराबादी जाफ़रानी पुलाव ये कह कर लौटा देती है ये पुलाव मीठा नहीं होता ये कैसा इंडियन फ़्राड रेस्टारेंट है। ये जाफ़रानी पुलाव बातचीत में कडवाहट के साथ कुछ-कुछ इश्क की जमीन तैयार करता है।बुध्ददेव की जिंदगी में ८५ वर्षीय़ मां(जोहरा सहगल) और पडोस में ही रहने वाली ९ वर्षीय़ बच्ची है जो कैंसर से पीडित है।नामचीन शेफ़ होने के बावजुद बुध्ददेव अपने घर में ही अपने मां के हाथ की बनी रबर जैसी रोटी और सुख करेला और बेस्वादु खाना ही खाता है ये मां बेटे के प्यार की नोंक-झोंक बहुत आत्मीय और विनोदी माहौल पैदा करती है।इसी बीच एक और मजेदार केरेक्टर ओमप्रकाश वर्मा(परेश रावल) जो नेहा वर्मा के पिता है और बुध्ददेव से ६ साल छोटॆ।अपने से छ: साल छोटे व्यक्ति से उसकी लडकी हाथ मांगना और फ़िर कुछ गंभीर और हास्यापद सीन देखने काबिल है,कुछ टेस्ट चेंज करना हो तो ये फ़िल्म देखने काबिल है।
समाज में ये बहस होना कि एक बेटी की उम्र की लडकी से शादी तो समाज के सवाल समाज में ही मिलेंगे कि दो परिपक्व शरीर यदि मानसिक रुप से एक दुसरे के साथ रहने को तैयार है तो इसमें सवाल जवाब की गुंजाईश ना के बराबर होना चाहिए।प्यार उम्र के फ़ासले को नजर अंदाज करता है और जो नैसर्गिक है तो फ़िर स्वीकारोक्ति से परहेज कैसा।इल्याराज का संगीत ताजगी देता है कभी सुने तो कानों को सुकुन देता सरसराहट से निकल जाता है।

विशेष: फ़िल्म में सारे गीत अलग अलग तमिल फ़िल्मों से उठाए गए है तो अच्छे बन पडे है।
फ़िल्म: चीनी कम
वर्ष: 25 मई 2007
निर्माता:सुनील मनचंदा
निर्देशक: आर.बाल्की
संगीत:इल्याराजा
गीत:
1     चीनी कम-श्रेया घोषाल
2     सुनी सुनी -विजय प्रकाश
3     बातें हवा -अमिताभ बच्चन,श्रेया घोषाल
4     जाने दो -श्रेया घोषाल

-योगेन्द्र व्यास


Monday, November 5, 2012

गीत जिन्हे मन गाये (ग्यारहवीं किश्त):दिल से निकलने वाले रस्ते का शुक्रिया....दिल तक पहुंचने वाली डगर को सलाम....


ये बेसबरी उमर कब फ़िसल कर सोलवें बरस में पहुंच जाती है... सोलहवे बरस की दस्तक का एहसास ठीक वैसा ही है जैसे कली का चटकना, भौंरो का गुनगुन करना, शाखो पर कपोले फ़ुटना... और सोलवें बरस में पहुंचने पर प्यार का एहसास तो ऐसा कि कब ओंस की बुंद पत्ते से फ़िसलकर दुब में समा जाए और वो गीले पन का एहसासssss- जब दुब पर हाथ घुमाएं तो महसुस होगा कि कोई यहां प्यार में अभी-अभी तरबतर होकर अपनी मदहोशी का जश्न मना रहा है.......और ऐसे नाजुक समय यदि कोई इस दुब को छिल दे तो- उस सोलह बरस के यौवन का डंक लता की आवाज में ऐसा घुलता है कि- ये तपीश भरी आवाज जहां से भी गुजरती है एक स्तब्धता सा माहौल खींच देती है...."जब वो ये कहती है कि- जिसने हमें मिलाया-जिसने जुदा किया उस वक्त, उस घडी,उस गजर को सलाम..." जिस प्यार के महीन धागे खींच दिए गये हो फ़िर भी वो प्यार जीवन,समाज के प्रति कृतग्यता अर्पित कर भौचक कर दे ऐसे कलम कार आनंद बक्क्षी सा.को सलाम। इन सब के बीच लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी ने पुरे गाने में अपने साजो को भावनाओं के ज्वर में लता जी की करुण तान के साथ बहुत बडा संबल बना कर छोड दिया है....साज क्या बजते है मानो वे अपनी थाप और तानो पर झर-झर आंसु बन कर ऊछल रहे हो.....राग अहीर भैरव में लक्ष्मी-प्यारे का  बेजोड संगीत- रूआब,मेंडोलिन,सारंगी,बांसुरी,डोलक, का प्रभावी उपयोग इस गाने को अपने चरम तक लेकर जाता है और सुनने वाले को ये कहता है कि वापिस जाओ अपने उस सोलहवें बरस में जहां तुम कुछ टपकती बुंदो को प्यासा छोड आए थे.केवल 6 मिनिट 35 सेकन्ड के लिए सोलहवां बरस फ़िर अपने जिस्म पर चिपका लिजिए तय है बाहर आने का मन नहीं करेगा....."घुंघट को छोड के जो सर से सरक गयी...ऐसी निगोडी धानी चुनर को सलाम....."
टीप: जब लता जी प्रेम,प्यास,दर्द,उल्लास,उमंग को गाती है तो निश्चय ही नव रसो का अमृत घोल उनकी आत्मा से झर कर कंठ पर बैठी मां शारदे हमें सुर का आचमन करा रही होती है.......

गीत जिन्हे मन गाये (दसवीं किश्त) :सताएगा क्या गम उसे जिन्दगी का.....मोहब्बत में जो हो गया हो किसी का


http://youtu.be/-RF-A6lPK2A
गीतकार के शब्दों का नशा तभी चढता है जब उसके दिल में मोहब्बत का फ़रमेंटेशन इस कदर हो कि गाने वाला खुद नशे में हो जाए और उसकी केवल आवाज के सुरुर में सुनने वाल बेसुध हो जाए....जी हां इस बेहतरीन वाइनेरी के शिल्प कार है-लिजेंड ओ.पी. नैय्यर और काश्मीर की कली (१९६४)का संगीत डल-झील की तरंगो पर ओ.पी.साहब के हस्ताक्षर है.
"है दुनिया उसी की..जमाना उसी का........" यह गाना सच्ची मोहब्बत करने वालो के प्रति एच.एस, बिहारी का प्रतिसंवेदन प्रमाण-पत्र है.जब भी ये गाना रिकार्ड हुआ होगा वहां माइक्रोफ़ोन और रफ़ी साहब की आवाज के बीच मोहब्बत आपनी रुहानियत लिए तीन अंतरो तक अपनी प्यास बुझाती रही होगी.और इस जश्नने मोहब्ब्त में मनोहारी दा ने सेक्साफ़ोन पर अपनी सांसे को इस कदर धक्का दिया मानो बोतल में लगी कार्क पुरे वेग से उछल कर पुरे माहौल की संजीदगी को बयां कर रही हो.ओ.पी. साहब की खासियत है कि वे बहुत कम इंस्ट्रुमेंट का उपयोग करते है. इस गाने में मुख्य रुप से सेक्साफ़ोन,बांगो बीट्स और साइड रिदम मार्कस ने पुरे गाने का तिलस्म रचा है.
यदि गाना गाने की अदायगी है तो सुनने के भी रस्मो रिवाज है इस गाने को बहुत करीने से सुनिए ठीक उसी तरह जिस तरह  वाईन सीप को जबान के नीचे रख कर धीरे-धीरे आनंद पुर्वक गले से नीचे ले जाते है......
लूटा जो मुसाफिर, दिल के सफ़र में..........है जन्नत ये दुनियाँ उसकी नजर में....
मजा ले फ़िर कहें....!!!!!!!!!!!!
टीप: मोहब्बत करना स्वाथ्य के लिए हानिकारक है या नही मालुम नहीं लेकिन हां संगीत इसकी दर्दे दवा जरुर है तो संगीत सुनिये और मोहब्बत के एहसास को महसुस किजिए......

गीत जिन्हे मन गाये(नौंवी किश्त):सर्दी में जब पियोगे यारोssss.....


गरम कोट बन जाएगा".....एक नायाब गीत हाथ लगा है, एक आम आदमी जीवन की फ़िलोसाफ़ी को "मधुशाला" पढ कर समझ ही नहीं सकता उसे तो बस देशी भाषा में जिंदगी का वो फ़साना सुनाना जो सीधे दिल में धंस कर ड्बड्बाई आंखो से झुमने पर मजबुर कर दे.....ये गाना एक निपट आम आदमी की मधुशाला है और अमित खन्ना ने महज ६ मिनिट १९ सेकण्ड में पुरी मधुशाला को एक ग्लास में उतार कर फ़िर से जी लेने के लिए झुमा देता है......इस गाने का आडियो जब सुना तो लगा बहुत दम है इस गाने में लेकिन  मलाल सिर्फ़ ये है कि इसका पिक्चराइजेशन गाने की आत्मा को नहीं छु सका.
ये राजेश रोशन और किशोर दा के बस में ही है कि उन्होने इस गाने में वो सारे सुख-दुख के  रंग डाले है जिन्हे पीकर इंसान सिर्फ़ और सिर्फ़ झुम ही सकता है.....पुरा गाना वायलिन के पुरे हुजुम पर ही तैरता रहता है..., मेंडोलिन के पिसेस जीने 
की आस को थामे रहते है.... रिदम सेक्शन और परक्युजन का अदभुत तालमेल पांव की थिरकन को बनाए रखता है-वही ट्र्म्पेट एक सकारात्मक सोच का आगाज करता रहता है.....इन साजों की ये ही तो खासियत है.....किशोर दा के साथ इस गाने की अंतिम बुंद तक आप पुरा मजा ले सकते है......बस...तु पी और जी.....
टीप: ठंड है -तो मौका और दस्तुर दोनो.... केम्फ़ायर कीजिये इस गाने का आडियो लगाइए....झुम जाइए.......(झुमने के लिए मदिरा नहीं....इन फ़िजाओं में ही नशा भरपुर है......)
 Film: Desh pardesh 1978
http://ww.smashits.com/des-pardes/tu-pee-aur-jee/song-35173.html

गीत जिन्हे मन गाये:(आठवीं किश्त):......तो प्यार में दिल पर गोली खा लिजिए ना....प्लीज.........


मन बहुत बडबडाता है जब ऊ..ला..ला..गाना बजता है....फ़िर सोचता हुं कि आवारा-गर्दी वाला ऐसा कौन सा गाना जो मेरे समय बजता था.......
और बजता क्या था ...आज भी उसी जोश ओ-शान से हाई-वाट स्पीकर पर आज के गानो को तगडी टक्कर देता है......भागते वक्त में अगर थोडा भी मौका मिले तो हर वो शख्स  थोडी मस्ती-चुहलबाजी अवारगर्दी करना चाहता है जो कभी जिंदगी में कहीं बहुत पीछे छुट गयी थी.....पंचम,आशा और किशोर दा के साथ अगर थोडी अवारगी जीना हो तो ये गाना झुमने पर मजबुर करता है......"प्यार में दिल पे मार दे गोली....(महान१९८३)" आप भी कहेंगे कि ये क्या है भाई -अरे जब झंडु बाम,जलेबी बाई,ऊ..ला..ला जैसे गाने कानों पड ही रहे है तो क्यो ना पंचम दा के इस तडके का लुफ़्त लिया जाए जिसमें थुंबा,कांगो,ड्रम बीट आपको छकाते हुए इलेक्ट्रिक गिटार की स्ट्रिंग पर फ़िसलने के लिए छोड देते है.....यदि हेड फ़ोन पर ये गाना सुन रहे है तो रिवाल्वर की गोली एक कान से घुस कर दुसरे से बाहर जाती मालुम पडेगी.....करीब साढे पांच मिनट में स्ट्रिंग और रिदम का अदभुत ताल-मेल आशा-जी और किशोर दा के साथ इस कदर भागता है और " पंचम इन सब पर सवारी किए गाने के अंत में भोले बनते हुए कहेंगे अरे ये क्या मैंने बनाया है...." ये ऐसी ही शैतानी है जो बच्चा अपने पिता से छुप कर करता है. जब ये गाना आप "ध्यान" से सुनेंगे तो लगेगा कि अगर ये गाना वन-शाट में रिकार्ड हुआ होगा तो क्या नजारा होगा,ये वाकई साजिंदो का कमाल है......तो प्यार में दिल पर गोली खा लिजिए ना....प्लीज.........
टीप: ठंड और विकेण्ड का बेहतर स्वाद लेना हो तो अपने पसंदीदा गानो को साथ में रखिए,थोडा स्नेक्स,थर्मस में कोफ़ी डालिये और निकल पडिये अपने किसी चहेते के साथ लांग ड्राईव पर....गानो के साथ सफ़र का रोमांच और रोमांस लंबे समय तक याद रहेगा........(इंदौर-उज्जैन फ़ोर लेन से बेहतर रोमांटिक रोड फ़िलहाल नहीं है....हमारे शहर में)

http://ww.smashits.com/mahaan/pyar-mein-dil-pe-maar-de-goli/song-10916.html

गीत जिन्हे मन गाये (सातवीं किश्त):आशा जी की....जनम यात्रा सुरो में बहती रहे बस......और क्या कहे!!!!!!!!


आशा जी के सुरो की थाह पाना बहुत ही मुश्किल है, उनकी आवाज में जो उर्जा बहती है कई बार उनके साथ गाने वाले स्तब्ध प्राय:हो जाते है अब इस कव्वाली को ही लि्जिए (हम किसी से कम नही १९७७)"है अगर दुश्मन......." इस कव्वाली में स्वयं मो.रफ़ी सा. अवाक से नजर आते है, मध्यम गति के ठेके से मो.रफ़ी इस कव्वाली की शुरुआत करते है जिसमें उन्होने आलाप भी लिये है...लेकिन ज्यो ही आशा जी ५.१० वे सेकण्ड से अपने आलाप और बारीक मुरकियों से प्रवेश लेती है पुरे गाने की रंगत ही बदल जाती है पुरा गाना उर्जा से भर जाता है पुरे माहौल में अजीब सी हलचल मच जाती है ,साजिंदो में एक जोश सा भरा नजर आता है और एक विजयी नाद के साथ आशा जी इस गाने को चरम तक ले जाती है......यदि आप आंख बंद कर यदि आशा जी की आवाज को केन्द्रित  कर ये गाना सुन रहे हो तो वाकई ऐसा लगता है मानो स्वयं रफ़ी सा.कह रहे हो "आशा वाकई तुम किसी से कम नहीं".महौल अगर बोझिल हो तो ये गाना सुन भर लें.....फ़िर बतायें....
टीप: पंचम दा के हार्मोनियम के नोट्स शुरु में सुनने काबिल है और कव्वाली में ढोलक की थाप सीधे दिल पर महसुस होती है.
http://youtu.be/AOQKD32BB0Y

गीत जिन्हे मन गाये (छ्ठी किश्त):दिल ने पुकारा तुम्हे........ यादों के परदेस से........"


जब कोई आलाप की कशिश हवाओ पर तैरती हुयी आपके कानो में ये कहे कि सावन आ गया है और ये बुंदे थामे नहीं थम रही अब तो आ जाओं......कि-"दिल ने पुकारा तुम्हे यादों के परदेस से........" गाना खत्म होते-होते सुनने वाले खुद विरह पीडा को अपने अंदर महसुस करने लगे तो ये कमाल उस आवाज का ही होगा जो बरसो बरस हमारे दिल में युं ही बरसती रहेगी.बारिश की द्स्तक है और मन बैचेन अपने मन को इस गीत की फ़ुहरो से त्रप्त कीजिए और खो जाइए ....राग पहाडी में स्वर बध्द पंचम की धुन,लताजी की मिठास और आनंद बक्ख्शीजी की कलम जादुगरी....सितार - संतुर साज का लुभावन तालमेल  एवं रुपक ताल का सीधा-सीधा ठेका, आखरी अंतरे में वायलिन का विरह टुकडा इस गीत की मीठास को दुगना कर जाता है....तो लगाइये हेड-फ़ोन आंख बंद कीजिए और डुब जाइए "सावन के झुले पडे.......तुम चले आओ".
टीप:एल.पी. रेकार्ड पर सरसराती निडिल जब प्लेयर डीश को चुमती है और जो आवाज फ़ुटती है सच मानिये एल.पी. रेकार्ड पर गाना सुनना ठीक वैसा ही है जैसे कुल्हड में चाय पीना........"अब वो दिन कहां"........
जुर्माना(१९७९)
Link -http://youtu.be/JCywlvM4Ark

गीत जिन्हे मन गाये (पांचवी किश्त) :गम जहां सोये...... और खुशी जागे


एक बार पुन: -बाल-दिवस पर ये गाना हम सभी बच्चों के लिए...........

कई बार ऐसा होता है कि जिंदगी हमें जहां ले जाना चाहती है...हम उस ओर देखते भी नहीं और इस तरह कुछ कोमल लम्हे एक पत्ते की तरह आपकी राह तकते धीरे से अपनी शाख से टुट कर विदा हो जाते है.यदि कुछ पल आपसे कहे कि आओ 4मिनट.35 से.में चांद की सैर कर आते है तो हर्ज ही क्या है,अपने अति व्यस्त बडप्पन से छोटा समय बचपन के लिए निकाल लेना ये सही मायने में बडप्पन कहलाए शायद.पिछ्ले दिनो बेटी के साथ हास्पिटल में बिताए कुछ लम्हे मुझे उस बचपन तक ले गये जिन्हे बहुत पीछे भुल कर छोड आया था.ये खुबसुरत गाना बच्चो के साथ बच्चा बन कर सुने एक सकुन सा महसुस करेंगे आप.जब लता जी कह रही है कि "आओ तुम्हे चांद पर ले जाए"... तो जाने में कोई हर्ज नहीं है.बप्पी लहरी की कंपोजिशन है लेकिन जाने क्यो पंचम दा की महक आती है और इसी जख्मी (१९७५)  फ़िल्म से बप्पी दा को नई पहचान मिली.गौहर कानपुरी के सारे गीत उम्दा है.......लेकिन अभी तो सिर्फ़ ये गाना सुने.
टीप: लता जी को सुनना किसी आशीष से कम नहीं ..कोई बात नहीं गर आप बच्चे नहीं है तो.........

http://ww.smashits.com/zakhmee/aao-tumhen-chand-pe-le-jayen/song-79085.html

गीत जिन्हे मन गाये(चौथी किश्त):इस जिंदगी का शुक्रिया......सदके में उपर वाले.......


मजरुह सा. ने क्या खुब लिखा "ये जिंदगी दर्द भी है,ये जिंदगी है दवा भी.दिल तोडना ही ना जाने ,जाने ये दिल जोडना भी.इस जिंदगी का शुक्रिया......सदके में उपर वाले....
जिंदगी को सकारात्मक नजरिये से देखे तो ये गाना सीधा दिल में उतर जाता है....और पंचम दा ने तो पियानो का तकिया बना कर सिरहाने रख दिया है ऐसा लगता है मानो उगलिया पियानो पर नहीं जहन में दौड रही है,पियानो काड के साथ जब ड्र्म-ब्रास प्लेट(cymber)  पर हल्की-हल्की स्टीक की थाप लगती है और फ़िर सधा ड्र्म और कांगो की बीट के साथ किशोर दा गाने का युं आगाज करते है कि-" जीवन के दिन छोटे सही हम भी बडे दिल वाले....कल की हमें फ़ुरसत कहा......" पंचम दा कि खासियत है कि वे रिदमिक परक्युजन का इस्तेमाल  बहुत उम्दा तरीके से करते है....इसकी चर्चा आगे की किश्तो में हम करेगे....अभी तो बस आपको कुछ नहीं करना है बस आंखे बंद कर किशोर दा की आवाज का जादु छाने देना है बस.आप सभी ने मुझे जन्म दिन पर आत्मीय संदेश भेजे है मैं सभी के प्रति ह्रदयानव्त कृतज्ञ हुं और आप के लिए मेरी और से ये ईयर ड्राप भेंट......
टीप:किसी भी गाने में रिदमिक परक्युजन का लुत्फ़ लेना हो तो हेड्फ़ोन लगाकर या कम से कम 2000 वाट स्पीकर पर सुने और बस विडियो ना देखे वरना गाने का मजा जाता रहेगा.
(यह गाना लताजी के वर्जन में भी उम्दा बन पडा है.......)
http://youtu.be/GlrKedrn574

गीत जिन्हे मन गाये (तीसरी किश्त):बे-करारी में है करार ....क्या कीजे...


आ गया जो किसी पे प्यार क्या कीजे....प्रथम 9 सेकण्ड में ही आप इस गाने की गिरफ़्त में हो चुके होते हैं ....इसे गायिका और संगीतकार की खुबसुरत साजिश करार दे सकते है.पियानो की काड के साथ ही लताजी का मात्र नौ सेकण्ड का आलाप और फ़िर अंजान के शब्दो का रोमांटिक सफ़र......,जो गीतकार शब्दों के साथ प्रणय करना जानता हो....और शब्दो को लपॆट कर रातो को सोता हो वो ही ये बात कह सकता है -"दिल तो है दिल...दिल का एतबार क्या कीजे"वैसे तो इस गाने का बेस पियानो है लेकिन कल्याण जी-आनंद जी ने इसे कही भी लाउड नहीं होने दिया है-कही कोई कलात्मक पीसेस नहीं है.शायद ऐसा इसलिए कि-जब प्यार का डंक जब पहली बार लगता है तो उसे साफ़ मन से सीधा-सीधा कैसे कहा जाए इसलिए संगीतकार ने पुरा मैदान लता जी के लिए छोड दिया है,मात्र दो अंतरे वाले इस गाने में सारा नवजात प्यार "कीजे" शब्द पर लुटा दिया है और ये ही पुरे गाने की जान है.गाने की हर लाईन पर लता जी को स्ट्रींग मिलती है और बेक ग्राउंड में सधी हुयी रिदम जो गाने की नजाकत और बढा देती है.गाने की ताकत ही वही है जिसमें सुनने वाला अकस्मात फ़िसलकर अपने आप को उसी धारा के हवाले कर दे......गाना खत्म होने के बाद सचमुच में दिल के किसी कोने में कहीं कसक सी महसुस होती है .....क्योsss जी... इसीलिए तो रिवाइंड कर गाना फ़िर से सुन रहे है ना.....सच बताइयेगा.....काश लाइफ़ में भी ऐसा कोई रिवाइंड बटन होता....हम उन लम्हो को फ़िर से जी लेते.....कोई बात नहीं ये गाने है न हमारी जिंदगी में जो उन पलों को सामने ले आते है जिन्हे हमने वक्त की गर्त में कहीं छोड दिया होता है........"बस ना चले रे शाम सवेरे लेके तेरा नाम....."
टीप:गाने की आत्मा में उतरने के लिए विडियो ना देखे तो बेहतर होगा....बस आंखे बंद कर अपनी इमेजेस खुद गडे....ये ही आपका उम्दा छायांकन होगा...... अगले गाने के साथ शीघ्र ही.......
http://youtu.be/b_DYY5zZdvs

गीत जिन्हे मन गाये- 2 :"छुप के जमाने से..... पलको के परदे में घर भर लिया......"

"छुप के जमाने से..... पलको के परदे में घर भर लिया......"

by Yogendra Vyas on Friday, April 29, 2011 at 6:34pm ·
जिंदगी के काफ़ी नजदीक ये गाना .....गीतकार की कलम से ढुलक कर शब्द .. इल्याराजा के नोटेशन पर स्पंदित हो कर वायलिन की स्ट्रींग..... फ़िर संतुर पर जम्प लेते हुए... बांसुरी के अधरो पर....बस लॆट से जाते है......फ़िर सुरेश जी अपनी रुहानी आवाज से .......निकल पडते है जिंदगी को गले लगाने.......
गुलजार सा. तो ऐसे फ़नकार है कि दो बुंदो में भी किनारा ढुंढ लेते है. किसी भी गाने की रुह उसके शब्दो के साथ उसका संगीत भी होती है....अब बताईये 5 मिनट 20 से. में एक गाने को अपने साजो से जिंदगी की पुरी सैर करा देना कोई मामुली काम तो नहीं......गिटार के नॊट्स पहले अंतरे पर और 3 मि. 10 से. पर सितार का पीस ..............बेकग्राउंड में पानी की सी हिलोरे मारता वायलिन का हुजुम पुरे समय साथ-साथ......संगीत में आनंद की कोई सीमा नहीं........
मात्र दो अंतरे वाले इस गाने में आप जिंदगी के साथ कुलांचे मारते नजर आएंगे.......जब गाना खत्म होगा तो आप यही पाएंगे कि........हमने दो बुंदो से मन भर लिया.......यदि किसी को छोटा-मोटा भी दुख या परेशानी है वो डुब कर इस गाने को सुन भर ले........आप किनारे पर जिंदगी को गले लगाते मिलेंगे........"
(पंचम के बाद इल्याराजा ही ऐसे संगीतकार है जिन्होने वेस्टर्न,जाज को हिन्दुस्तानी फ़ोक के साथ गुंथ कर कई बेजोड संगीत रचनाएं दी है.....और उसी मे से एक बेजोड गाना "सदमा"(१९८१) ऐ जिन्दगी गले लगा ले............)
Link:http://youtu.be/ecmn6i7h7ow
yogendra

गीत जिन्हे मन गाये 1:जब से तुम्हारे नाम की मिसरी ओंठ लगाई है...........

जब से तुम्हारे नाम की मिसरी ओंठ लगाई है...........

by Yogendra Vyas on Friday, April 22, 2011 at 3:49pm ·

"जब गुलजार,पंचम और आशा जी एक जगह पर जमा हो जाए तो इनकी सुर धारा को पिये बिना आप तृप्त नहीं हो सकते.....ऐसा ही एक कमाल २५ साल पहले इनकी एक कंपोजिशन में हुआ....."रोज-रोज आंखो तले एक ही सपना पले........"तीन अंतरे वाले इस गाने में पंचम के उम्दा संगत कारो ने अपने हुनर से अजब किस्म का तन्हा माहौल पैदा किया है.....गुलजार सा. का शब्दो के साथ रोमांस करना और फ़िर इसे मिठास के साथ आशा जी से सुनना एक अदभुत अनुभव है..........साईड रिदम मार्कस का पुरे समय गाने पर पहरा और बांसुरी का पुरे समय आशा जी आवाज का पीछा करना......पंचम दा की ये खासियत है कि वे अंतरे के खाली पन को सेकण्डस में अपनी धुनॊ का एक पुरा पोर्टेट खिच कर फ़िर से सम पर ले आते है.......पार्श्व में वायलिन का कारवां और बीच-बीच में आपको गिटार के उम्दा नोट भी सुनने को मिलेगें,आशा जी के दो अंतरो के बाद अमित कुमार की आवाज को बडे ही वात्सल्य भाव से आशा जी ने सहारा दिया है चूंकि ये गाना राग पर आधारित है और ये अमित कुमार का सौभाग्य ही है.........उन्होने इसे अच्छा निभाया........इतने सालों बाद भी ये गाना तरोताजा लगता है......वैसे तो आपने कई बार इसे सुना होगा लेकिन संगीत की बारिकियों के साथ सुनने का मजा ही कुछ और है तो आओ सुने.......रोज....रोज.....(रोज..रोज - सिरिज का अगला गाना शीघ्र ही...)http://youtu.be/zuImW55jNJUगीत जिन्हे मन गाये:
गीत जिन्हे मन गाये:

Sunday, November 4, 2012

रुपहला सफ़र:हम होंगे कामयाब?:जाने भी दो यारो

आज भी देश के नैतिक हाला्तो पर स्तब्धता बरकरार है,बिते सालो से अब तक कुछ    नहींबदला।नौकरशाही,राजनिति,व्ययसायी,मिडिया गठजोड ने लोकतंत्र के स्तंभॊ का एक दुसरा प्रतिरुप तैयार कर लिया है।उन्नत्तीस साल पहले निर्देशक कुंदन शाह ने "जाने भी दो यारो" फ़िल्म का निर्माण किया और आज जब अखबार उठा कर देखते है तो ये फ़िल्म उतनी ही प्रासंगिक लगती है।पुरी तरह हास्य-बोध से सारोबार ये फ़िल्म एक बार पुन: रिलिज की गयी है इसका कारण ही ये है कि भले हास्य रुप में ही सही लेकिन हमारी व्यवस्थाओं पर बहुत तीखा कटाक्ष है।
फ़िल्म का मजमुन कुछ युं है कि विनोद चॊपडा(नासिर उद्दीन शाह) और सुधीर मिश्रा (रवि वासवनी) बेरोजगार युवक है और अपनी एक फ़ोटो ग्राफ़ी की शाप खोलते है लेकिन एक षडयंत्र का शिकार हो जाते है।फ़िल्म में खबरदार पत्रिका की एडिटर शोभा सेन (भक्ति बर्वे), दो प्रतिद्वंदी बिल्डर तनेजा(पंकज कपुर) और आहुजा(ओम पुरी), म्युनिसिपल कमिश्नर डी’मेलो(सतीश शाह) और श्रीवास्तव(दीपक काजिर) के गठजोड की हास्य में लिपटी हुयी कहानी है जो आज के चरित्र को जीवंत करती है।  तनेजा के हाथो डी’मेलो की हत्या हो जाती है और ये दृश्य एक गार्डन में उनकी फ़ोटो ग्राफ़ी में कैद हो जाता है।इस दृश्य के माध्यम से कुंदन शाह ने फ़िल्म ब्लो अप(1966) के निर्देशक माइकल ऐटॊंनियोन को अपनी आदरांजली दी है जिसमें  ऐटॊंनियोन गार्डन में बंदर के खेल के दौरान हत्या का दृश्य एक कांच में फ़्लेश हो जाता है।
किसी को जिवित व्यक्ति का रोल करते तो हमने कई बार देखा है लेकिन सतीश शाह ने एक लाश का रोल बहुत ही दमदार तरीके निभाते हुए गुदगुदाया है।कई जगह तंज बात डायलाग के माध्यम से कही गयी है जब पत्रकार तनेजा से पुछता है आप उंची बिल्डिंग बनाते जा रहे है और आम आदमी उतना निचे धंसता जा रहा है"।
ओम पुरी संघर्ष के उन दिनो को याद करते हुए कहते है कि शुटिंग के दौरान हमें नीचे फ़र्श ही सो जाना पडता था और खाने में केवल लौकी की सब्जी और दाल मिलती थी,चाय का कहो तो कंट्रोलर की तेज आवाज आती थी अरे..एक घंटे पहले ही तो पी थी। ये फ़िल्म कुल सात लाख के बजट में एन.एफ़.डी.सी. के बैनर तले तैयार हुयी थी।एक लाश को लेकर की गयी भागा दौडी में ये सारे पात्र एक महाभारत पर हो रहे मंचन में पहुंच जाते है और बस हास्य का फ़व्वारा सतत बह निकलता है।बाहरी पात्रो का मंच के किरदारॊ में घुस जाना धुर्योधन द्वारा चीरहरण से मना कर देना बस आप सबको लोटपोट कर देने के लिए काफ़ी है।लेकिन इसी बीच धृतराष्ट्र के पात्र को देखकर अनायास हमारे आज के राजकाजी चरित्र की याद आ जाती है जो सिर्फ़ ये कहता है "ये क्या हो रहा है" पर करता कुछ नहीं।कुल मिला कर कुंदन शाह के निर्देशन में सभी कलालारो ने वो रसोई बनाई है जिसकी खुशबु फ़िर से मल्टीफ़्लेक्स थियेटर में जीवंत हो रही है।इस फ़िल्म में विधुविनोद चोपडा ने दुशासन का रोल किया है और सबसे ज्यादा हंसाया भी उन्होने ही है।अंत में बुराई की जीत होती है और न्याय की मौत।विनोद और सुधीर पर सारा दोष मढ दिया जाता है लेकिन ये नौजवान फ़िर भी गाते है हम होंगे कामयाब एक दिन..।काश कि ऐसा दिन आए कि हमें ये गाना पडे "हम हो गए कामयाब"।
विशेष:नासिरउद्दीन शाह को इस फ़िल्म के लिए केवल 15000 रुपये मिले और उन्हे साथ में शुटिंग के लिए खुद का कैमेरा भी लाना होता था लेकिन शुटिंग के दौरान वो भी चोरी हो गया।

फ़िल्म: जाने भी दो यारों
वर्ष: 12 अगस्त 1984
निर्माता:नेशनल फ़िल्म डेव्हलपमेंट कार्पोरेशन
निर्देशक: कुंदन शाह
संगीत:वनराज भाटिया
स्टोरी एवं स्क्रिन प्ले:कुंदन शाह,सुधीर मिश्रा
डायलाग: सतीश कौशिक,रणजीत कपुर
अवार्ड:
 1984 इंदिरा गांधी अवार्ड-बेस्ट फ़िल्म डायरेक्टर -कुंदन शाह
   1984: फ़िल्म फ़ेयर बेस्ट कामेडियन-रवि बासवानी
-योगेन्द्र व्यास


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