Wednesday, April 26, 2017

कभी होs sती नहीं जिसकी हार......



मंदिर का चरणामृत फिर भी हम बहुत थोड़ा लेते है ,लेकिन किशोर कर्णामृत ऐसा है कि प्यास दर प्यास बढ़ाता जाता हैं। इन्दीवर के बेहद खुबसुरत बोलो को किशोर दा ने बहुत ही शिद्दत के साथ परवाज़ दी हैं ,किशोर दा इस गाने के साथ इतना आत्म बल दे जाते हैं कि मन बस झुम उठता हैं .शुरू में 26 सेकण्ड का गिटार का प्रील्युड और मुखडे की ढ्लान पर वायलिन एक पुरा हुजुम ऐसा बजता हैं मानो आकाश में पंछियों का एक पुरा झुंड एक साथ अपने पंखों से हवाओ को चिरते हुए उन्मुक्त उड़ान भरता हुआ कभी ऊपर तो कभी नीचे चलता हैं और गिटार का क्लोजिन्ग स्ट्रिंग ऐसा कि मानो सारे पंछियों ने के साथ अपने पंख समेट लिए हो.

गिटार, सेक्साफ़ोन और बान्सुरी के मोहक नोट्स और रिदम सेक्शन बहुत ही अदब के साथ पुरे गाने में हेड फोन के दोनों छोर से कानो में रिसता रहता है किशोर दा हमारी साँस के पोर पोर में अपनी आवाज के अमृत घोल को पिला पिला के इस एहसास को पक्का कर देते हैं कि "कभी होती नहीं जिसकी हार वो है प्यार " . 

बाबला का संगीत थोडा हैरत में डालता हैं उन्होंने गिटार का इस्तेमाल बहुत ही उम्दा तरीके से किया हैं . 1981 की फ़िल्म खराखोटा जिसे राजकिरण और सारिका पिक्चराईज किया गया. ये गाना आशा की आवाज में एक अलग ही एहसास देता हैं. ये ही गाना फ़िल्म मीठा जहर 1985 में इस्तेमाल किया गया. 

हमारे किशोर प्रेमी परम मित्र श्री नवीन खंडेलवाल ने ये गाना सुझाया और उनसे बात करते हुए ये ही हमारे मन से निकला कि -

''ये गाना किशोर दा के जिगर की मीठी डली हैं कानो में रख लिजिए या जुबा पर रख लिजिए....''

-'योगी' योगेंद्र 

https://youtu.be/971BpgvAw1Y- किशोर वर्ज़न 

https://youtu.be/dGcEtrQhTLw - आशा वर्ज़न

सुरो का स्पंदन-पंचम



पंचम सुरो का वो स्पंदन है ,वो पच्चीकारी है जो हर पल कहीं ना कहीं धड़कता है, कही ना कही दृश्य होता है।हांफ़ती पस्त होती जिन्दगी में वो कभी किशोरियत के रंगो से रंग भरता है तो कभी आशा की गुनगुनी किरणों से , और तो और कभी लताओं पर झुलती मंद हवाओं में गुलज़ारियत की सी खुशबु बिखेर देता है । पंचम सुर और साजो से ज़िंदगी के नूर बिखेरता चला गया जो जो इसकी जद मे आया वो माला माल होता चला गया ।


एक पूर्ण समावेशी संगीतकार सुरो कि बिछात का एक ऐसा तिलिस्म पैदा कर गया कि हर उम्र के मन की कपोलो से पंचम सुर फुट कर होठों पे आ टिकता है- चाहे “घर आजा घिर आए बदरा “ हो या “रैना बीती जाए “ या “ तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा “ हो या “जीवन के हर मोड़ पर मिल जाएंगे हम सफर “ या “जब भी कोई कंगना बोले पायल छनक जाए” या “पिया तू अब तो आजा या “ओ मांझी रे “ या “सातो बार बोले बंसी”।अनगिनत फेहरिस्त है पंचम के संगीत की - जिसमे जितना गहरे उतरो कुछ ना कुछ अचंभित करने वाला सूत्र हाथ लगता है। जब भी कार सड़क के किसी मोड से गुजरती है , स्टियरिंग टर्न करते समय ये ही लाइने याद आती है “ एक राह मुड़ गई तो और जुड़ गई ,मै मुड़ा तो साथ साथ राह मुड़ गई”........ ऐसा लगता है "स्टियरिंग कंट्रोल गिटार की स्ट्रिंग, एकार्डियन और रिदम ने सम्हाल लिया हो" और हम बस राह पे बहते जा रहे है।


किशोर दा ,पंचम और इन्स्ट्रुमेंट का रिश्ता वैसा ही है जैसे दिल दिमाग और श्वास का । जब दादा गाते है तो पंचम उनकीआवाज की गहराई का रास्ता दर रास्ता बनाते चलते है और उस वक्त रिदम एक चित्र बनाते दादा के साथ चलती है । ये अनोखा संगम ही संगीत की चारधाम यात्रा का सुख देता है । जब पंचम के नोटेशन्स पर इन्स्ट्रुमेंट बजते है तो विस्मयकारी बात ये है की साज स्वयं को आत्म मुग्धता की स्थिति में पाते है। हाँ ये संगीत का निजी सुख है जो बांटने से और बढ़ता है अपना अनुभव तो यही कहता है। -योगी योगेंद्र

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