मंदिर का चरणामृत फिर भी हम बहुत थोड़ा लेते है ,लेकिन किशोर कर्णामृत ऐसा है कि प्यास दर प्यास बढ़ाता जाता हैं। इन्दीवर के बेहद खुबसुरत बोलो को किशोर दा ने बहुत ही शिद्दत के साथ परवाज़ दी हैं ,किशोर दा इस गाने के साथ इतना आत्म बल दे जाते हैं कि मन बस झुम उठता हैं .शुरू में 26 सेकण्ड का गिटार का प्रील्युड और मुखडे की ढ्लान पर वायलिन एक पुरा हुजुम ऐसा बजता हैं मानो आकाश में पंछियों का एक पुरा झुंड एक साथ अपने पंखों से हवाओ को चिरते हुए उन्मुक्त उड़ान भरता हुआ कभी ऊपर तो कभी नीचे चलता हैं और गिटार का क्लोजिन्ग स्ट्रिंग ऐसा कि मानो सारे पंछियों ने के साथ अपने पंख समेट लिए हो.
गिटार, सेक्साफ़ोन और बान्सुरी के मोहक नोट्स और रिदम सेक्शन बहुत ही अदब के साथ पुरे गाने में हेड फोन के दोनों छोर से कानो में रिसता रहता है किशोर दा हमारी साँस के पोर पोर में अपनी आवाज के अमृत घोल को पिला पिला के इस एहसास को पक्का कर देते हैं कि "कभी होती नहीं जिसकी हार वो है प्यार " .
बाबला का संगीत थोडा हैरत में डालता हैं उन्होंने गिटार का इस्तेमाल बहुत ही उम्दा तरीके से किया हैं . 1981 की फ़िल्म खराखोटा जिसे राजकिरण और सारिका पिक्चराईज किया गया. ये गाना आशा की आवाज में एक अलग ही एहसास देता हैं. ये ही गाना फ़िल्म मीठा जहर 1985 में इस्तेमाल किया गया.
हमारे किशोर प्रेमी परम मित्र श्री नवीन खंडेलवाल ने ये गाना सुझाया और उनसे बात करते हुए ये ही हमारे मन से निकला कि -
''ये गाना किशोर दा के जिगर की मीठी डली हैं कानो में रख लिजिए या जुबा पर रख लिजिए....''
-'योगी' योगेंद्र
https://youtu.be/971BpgvAw1Y- किशोर वर्ज़न
https://youtu.be/dGcEtrQhTLw - आशा वर्ज़न
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