रुपहला सफ़र इस रविवार :"आंखे है पर दिखता नहीं": जागते रहोssss...sss
इंसान की चेतना पर सांसारिक परते इतनी गहरी चढ गयी है कि वह सिर्फ़ शारीरिक रुप से ही जागता है और सोता है।गहरी मुर्छा इस कदर छाई है कि आंखे है पर दिखता नहीं, आत्मा है पर संवेदना नहीं,आंख है पर आंसु नहीं,समृध्दि है पर सुख नहीं,बुध्दि है पर विवेक नहीं।बहुत कम ऐसे व्यवसायिक फ़िल्मकार होते है जो अपने नफ़ा नुकसान से परे उद्देश्य परक फ़िल्म बनाते है उनमें से राजकपुर का नाम बरबस याद आता है।
"सुबह होने के बाद दरवाजे खोलना चाहिए नहीं तो रोशनी कैसे आएगी"ऐसी प्रतिकात्मक बातो से भरी फ़िल्म "जागते रहो" जिसमें पात्र राजकपुर की मासुम आंखे दरवाजो में बंद समाज के लोगो का असली चेहरा उजागर करती है और ये फ़िल्म निर्देशकीय अनुभव का उत्कृष्ट उदाहरण है।
रात के अंधेरे में किस्मत का मारा फ़टॆहाल व्यक्ति(राजकपुर) अपनी बदनसीब किस्मत के साथ बंबई आ जाता है। उसे सिर्फ़ पानी की प्यास किन किन मुसीबतो से रुबरु कराती है।पहले रास्ते में उसे मिलता है आशिक मिजाज धनी शराबी मोतीलाल जिनकी आमद शैलेन्द्र के लिखे एक उम्दा गाने से होती है"जिंदगी ख्वाब है,ख्वाब में झुठ क्या और भला सच है क्या" मोतीलाल की आदाकारी को दाद देने का मन करता है। मोतीलाल प्यासे को शराब से प्यास बुझाने की सलाह देता है और जब तक ये प्यासा व्यक्ति आने वाली मुसिबतो से लडता है तब तक दर्शक भी पुरे समय अपने आपको प्यासा महसुस करता है।
पुरी फ़िल्म एक विशाल अपार्टमेंट में घुमती है जहां गलती से ये फ़टेहाल व्यक्ति पानी पीने चला जाता है और उसे चोर समझ लिया जाता है,जान बचाने के लिए ये एक फ़्लेट से दुसरे फ़्लेट छुपता फ़िरता है और बंद दरवाजो के पीछे के वो राज देखता है जहां सफ़ेदपोश व्यक्ति का अवैध शराब खाना है और उसकी बेटी का चोरी छुपे प्रदीप कुमार से रोमांस करना,फ़िर भाग कर उस फ़्लेट में जा छुपता है जहां पति घोडॊ की रेस में पैसा लगाने के लिए अपनी पत्नि के जेवरा चुराता मिलता है।एक के बाद एक लोगो के नकाब के पीछे की हकीकत खुलती जाती है। अंतत: वो जिस फ़्लेट में छुपता है वहां रामनारायण नाम का व्यक्ति नकली नोट बनाने का छापा खाना चलाता है ।इधर बिल्डिंग के लोग बदहवासे से चोर को फ़्लेट दर फ़्लेट ढुंढते है।जब मुसिबत सिर पर ही आ पडे तो भागने के बजाय उसका ड्ट कर मुकाबला कर लेना चाहिए और राजकपुर लठ्ठ लेकर भीड के सामने हो जाता है और जो कहता है "मैं कोई चोर नहीं मैं एक गरीब किसान का बेटा हूं नौकरी करने आपके शहर आया हुं,पानी की प्यास मुझे आपके यहां ले आई। असल चोर आपके घरॊ में कैद है-कोई औरतो की इज्जत आबरु का चोर तो कोई नकली नोट बनाने वाला चोर तो कॊई अवैध शराब वाला चोर तो कॊई अपनी पत्नि के जेवर चुराने वाल चोर,मुझ गंवार को यही शिक्षा दी कि बिना चोर बने कोई बडा आदमी नहीं बन सकता"।बात बहुत ही गहरी है अपने अवचेतन के चोर को छोड कर सब बाहर के चोर को ढुंढते है और ये इसलिए भी होता है कि हम अपनी आत्माओं को खुरचते तक नहीं।यही कारण है कि हमारी आत्माएं नि:स्तेज खोखले शरीर को
छोड कर दबे पांव कहीं अनंत की ओर निकल गई है।संपुर्ण फ़िल्म नायक नायिका विहिन होने के बावजुद पुरे समय बांधे रखती है।केन्द्रिय पात्र के रुप में राजकपुर ने बहुत कम संवाद बोले लेकिन अपनी अदाकारी से काफ़ी कुछ कह गए।
फ़िल्म के आखरी क्षण में नरगिस का एक उजली भोर के रुप में आना और गाना" जब उजियारा छाए,मन का अंधेरा जाए, किरणो की रानी गाए, जागो है मेरे मन मोहन प्यारे"और राजकपुर नरगिस के पवित्र हाथो से पानी पी कर अपनी प्यास को बुझाकर एक आशा की किरण लेकर विदा होता है।
ये फ़िल्म ये संदेश दे जाती है "जागते रहो वर्ना आने वाले समय ऐसा ना हो कि सवेरा देखने की भी कीमत चुकानी पडे।
विशेष: ये फ़िल्म राजकपुर और नरगिस की रुपहले पर्दे पर आखिरी फ़िल्म थी। भारतीय सिनेमा में सलील चौधरी ने कोरस सिंगिग को इसी फ़िल्म से स्थापित किया और ये फ़िल्म हिन्दी/बंगाली भाषा में भी बनी।
फ़िल्म: जागते रहो
वर्ष:1956
निर्माता: राजकपुर
निर्देशक: अमित मित्रा,सोम्बु मित्रा
लेखक :ख्वाजा अहमद अब्बास
संगीत:सलिल चौधरी
गीत:शैलेन्द्र,प्रेम धवन
गीत:
1 जिंदगी ख्वाब है,ख्वाब में झुठ क्या-मुकेश(गीत-शैलेन्द्र)
2 जब उजियारा छाए मन का अंधेरा जाए-लता मंगेशकर(गीत-शैलेन्द्र)
3 तेकी मे झुठ बोलिया-मो. रफ़ी,बलबीर(गीत-प्रेम धवन)
4 ठंडॆ ठंडे सावन की फ़ुहार-आशा भोंसले (गीत-शैलेन्द्र)
5 जागो मोहन प्यारे-लता मंगेशकर(गीत-शैलेन्द्र)
6 मैने जो ली अंगडाई-संध्या मुखर्जी,हरिधन(गीत-शैलेन्द्र)
अवार्ड:
अंर्तराष्ट्रीय फ़िल्म फ़ेस्टीवल चेकोस्लोवाकिया क्रिस्ट्ल ग्लोब ग्रांड प्रिक्स अवार्ड
चौथा नेशनल फ़िल्म अवार्ड
-योगेन्द्र व्यास
Monday, December 24, 2012
Sunday, December 16, 2012
रुपहला सफ़र -सीने में सुलगते है अरमान: तराना
सीने में सुलगते है अरमान: तराना
कुछ फ़िल्मों की ब्लाक बस्टर के तुफ़ान में कम चर्चा होती है। दिलीप कुमार जब एक्टिंग का अपना स्कुल रच रहे थे और उनकी तबियत में रोमांस का एक मीठा चक्करदार तुफ़ान उठने की तैयारी में था तब उनकी ये फ़िल्म "तराना" मधुबाला के साथ पर्दे पर उतरी। कहानी अल्हड प्रेम व उसे पाने की एक मदहोश भरी दास्तान है।बाद में इसी से मिलती जुलती कहानी को लेकर कई फ़िल्में भी बनी।
डा.मोतीलाल(दिलीप कुमार) जो कि लंदन से अपनी पढाई कर हवाई जहाज से लौट रहा होता है लेकिन हवाई जहाज में खराबी आ जाने की वजह से उसे आपात स्थिति में एक गांव में उतरना पडता है।धरती पर रहने वाले को ये नहीं पता कि आसमान आने वाली चीज उसकी जिंदगी में कयामत लाएगी या बहार। डा. मोतीलाल एक बीमार महिला के साथ एक अंधे व्यक्ति के यहां मेहमान बनकर रुकता है लेकिन उसे पता नहीं कि जिंदगी उसकी परिक्षा लेने वाली है और भिडंत तराना (मधुबाला) से होती है।तराना बेहद खुबसुरत लेकिन मुंहफ़ट गवंई लडकी है।मोतीलाल और तराना के बीच तीखी नोंक झोंक गुदगुदाने वाली है।उधर मोतीलाल के पिता दिवान(जीवन) उसके आने का रास्ता देखते है और उसकी शादी अपने दोस्त की बेटी से तय भी कर देते है।लेकिन प्यार की लौ जल चुकी थी मोतीलाल कुछ दिन और गांव में रुक जाता है और तराना के अंधे पिता का इलाज कर आंखे लौटा देता है।गांव वाले उनके रिश्ते को बदनामी लिबास पहना कर बदनाम कर देते है और तराना के पिता का रहना मुश्किल कर देते है इसी ग्लानि में वो अपने घर को आग लगाकर खुद भी मर जाता है। मोतीलाल ये समझता है कि तराना भी आग में जल चुकी है वो हताशा के भंवर में डुबने लगता है। लेकिन दिल की लगी कहां बुझने वाली है तराना किसी तरह शहर आती है और अपने प्यार को विरले अंदाज में पा लेती है।अनिल बिस्वास के संगीत निर्देशन में इस फ़िल्म में लता जी ने कुल नौ गाने गाए है जिन्हे सुनना तो अलौकिक अनुभव है ही साथ तलत महमुद के साथ सीने में सुलगते है अरमा..."को सुनना..बस...आह! सी निकल जाती है.....वो दिन याद आते जब चारपाई पर खुले में सिरहाने रेडियो पर गुंजती ये कशीश भरी आवाज और आसमान में टिमटिमाते तारे....
हांलाकि फ़िल्म की कहानी सन 1951 के लिहाज से काफ़ी रोमांटिक है और दिलीप कुमार और मधुबाला को अपने पुरे अस्तित्व के साथ अभिनय करते देखना काफ़ी सुखद अहसास देता है।यदि आज की तकनीक के साथ अगर इन कलाकारो को काम करने का मौका मिला होता तो शायद ही कोई कलाकार इनके तराशे हुए परिपक्व अभिनय की बराबरी में खडा हो पाता।दिलीप कुमार अपने भावो को अभिनय के द्वारा तह-दर-तह खोलते जाते है देखने वाला अपने को उन तहो में अपने आप को लिपटा महसुस कर धन्य होता रहता है।दिलीप कुमार ने सन चालीस से इन्ठानवें तक हर दशक में अपने अभिनय की अलग-अलग शिल्पकारी कर आने वाली पीढी के लिए जीता जागता स्कुल दे दिया है।भारतीय फ़िल्म इतिहास के १०० बरस के साथ दिलीप साहब की उम्र के सौ बरस देखने की शुभेच्छा उनके सभी प्रशंसको को है।
विशेष:ख्यात साहित्यकार श्री भगवती चरण वर्मा ने मो.युसुफ़ खान को दिलीप कुमार नाम दिया और सत्यजित राय ने उन्हे अल्टीमेट मेथड एक्टर का खिताब दिया।
फ़िल्म: तराना
वर्ष:1951
निर्माता: राम दरयानी
निर्देशक: के.एस. दरयानी
लेखक :के.एस. दरयानी
डायलाग एवं गीत: डी.एन.मधोक
संगीत:अनिल बिस्वास
गीत:
1 नैन मिले नैन हुए बावरे-लता मंगेशकर, तलत महमुद (गीत-प्रेम धवन)
2 बोल पपीहे बोल-लता मंगेशकर,संध्या मुखर्जी (गीत-प्रेम धवन)
3 मोहसे रुठ गए मोरा सांवरियां -लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
4 युं छुप छुप के मेरा आना-लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
5 बेईमान तोहरे नैनवा-लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
6 सीने में सुलगते है अरमान-लता मंगेशकर, तलत महमुद (गीत-प्रेम धवन)
7 वापस लेले ये जवानी-लता मंगेशकर(गीत-प्रेम धवन)
8 एक मैं हुं एक मेरी-तलत महमुद (गीत-डी.एन.मधोक)
9 वो दिन कहां गए बता-लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
-योगेन्द्र व्यास
कुछ फ़िल्मों की ब्लाक बस्टर के तुफ़ान में कम चर्चा होती है। दिलीप कुमार जब एक्टिंग का अपना स्कुल रच रहे थे और उनकी तबियत में रोमांस का एक मीठा चक्करदार तुफ़ान उठने की तैयारी में था तब उनकी ये फ़िल्म "तराना" मधुबाला के साथ पर्दे पर उतरी। कहानी अल्हड प्रेम व उसे पाने की एक मदहोश भरी दास्तान है।बाद में इसी से मिलती जुलती कहानी को लेकर कई फ़िल्में भी बनी।
डा.मोतीलाल(दिलीप कुमार) जो कि लंदन से अपनी पढाई कर हवाई जहाज से लौट रहा होता है लेकिन हवाई जहाज में खराबी आ जाने की वजह से उसे आपात स्थिति में एक गांव में उतरना पडता है।धरती पर रहने वाले को ये नहीं पता कि आसमान आने वाली चीज उसकी जिंदगी में कयामत लाएगी या बहार। डा. मोतीलाल एक बीमार महिला के साथ एक अंधे व्यक्ति के यहां मेहमान बनकर रुकता है लेकिन उसे पता नहीं कि जिंदगी उसकी परिक्षा लेने वाली है और भिडंत तराना (मधुबाला) से होती है।तराना बेहद खुबसुरत लेकिन मुंहफ़ट गवंई लडकी है।मोतीलाल और तराना के बीच तीखी नोंक झोंक गुदगुदाने वाली है।उधर मोतीलाल के पिता दिवान(जीवन) उसके आने का रास्ता देखते है और उसकी शादी अपने दोस्त की बेटी से तय भी कर देते है।लेकिन प्यार की लौ जल चुकी थी मोतीलाल कुछ दिन और गांव में रुक जाता है और तराना के अंधे पिता का इलाज कर आंखे लौटा देता है।गांव वाले उनके रिश्ते को बदनामी लिबास पहना कर बदनाम कर देते है और तराना के पिता का रहना मुश्किल कर देते है इसी ग्लानि में वो अपने घर को आग लगाकर खुद भी मर जाता है। मोतीलाल ये समझता है कि तराना भी आग में जल चुकी है वो हताशा के भंवर में डुबने लगता है। लेकिन दिल की लगी कहां बुझने वाली है तराना किसी तरह शहर आती है और अपने प्यार को विरले अंदाज में पा लेती है।अनिल बिस्वास के संगीत निर्देशन में इस फ़िल्म में लता जी ने कुल नौ गाने गाए है जिन्हे सुनना तो अलौकिक अनुभव है ही साथ तलत महमुद के साथ सीने में सुलगते है अरमा..."को सुनना..बस...आह! सी निकल जाती है.....वो दिन याद आते जब चारपाई पर खुले में सिरहाने रेडियो पर गुंजती ये कशीश भरी आवाज और आसमान में टिमटिमाते तारे....
हांलाकि फ़िल्म की कहानी सन 1951 के लिहाज से काफ़ी रोमांटिक है और दिलीप कुमार और मधुबाला को अपने पुरे अस्तित्व के साथ अभिनय करते देखना काफ़ी सुखद अहसास देता है।यदि आज की तकनीक के साथ अगर इन कलाकारो को काम करने का मौका मिला होता तो शायद ही कोई कलाकार इनके तराशे हुए परिपक्व अभिनय की बराबरी में खडा हो पाता।दिलीप कुमार अपने भावो को अभिनय के द्वारा तह-दर-तह खोलते जाते है देखने वाला अपने को उन तहो में अपने आप को लिपटा महसुस कर धन्य होता रहता है।दिलीप कुमार ने सन चालीस से इन्ठानवें तक हर दशक में अपने अभिनय की अलग-अलग शिल्पकारी कर आने वाली पीढी के लिए जीता जागता स्कुल दे दिया है।भारतीय फ़िल्म इतिहास के १०० बरस के साथ दिलीप साहब की उम्र के सौ बरस देखने की शुभेच्छा उनके सभी प्रशंसको को है।
विशेष:ख्यात साहित्यकार श्री भगवती चरण वर्मा ने मो.युसुफ़ खान को दिलीप कुमार नाम दिया और सत्यजित राय ने उन्हे अल्टीमेट मेथड एक्टर का खिताब दिया।
फ़िल्म: तराना
वर्ष:1951
निर्माता: राम दरयानी
निर्देशक: के.एस. दरयानी
लेखक :के.एस. दरयानी
डायलाग एवं गीत: डी.एन.मधोक
संगीत:अनिल बिस्वास
गीत:
1 नैन मिले नैन हुए बावरे-लता मंगेशकर, तलत महमुद (गीत-प्रेम धवन)
2 बोल पपीहे बोल-लता मंगेशकर,संध्या मुखर्जी (गीत-प्रेम धवन)
3 मोहसे रुठ गए मोरा सांवरियां -लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
4 युं छुप छुप के मेरा आना-लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
5 बेईमान तोहरे नैनवा-लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
6 सीने में सुलगते है अरमान-लता मंगेशकर, तलत महमुद (गीत-प्रेम धवन)
7 वापस लेले ये जवानी-लता मंगेशकर(गीत-प्रेम धवन)
8 एक मैं हुं एक मेरी-तलत महमुद (गीत-डी.एन.मधोक)
9 वो दिन कहां गए बता-लता मंगेशकर(गीत-डी.एन.मधोक)
-योगेन्द्र व्यास
Sunday, December 9, 2012
रुपहला सफ़र:क्या हवा चली बाबु ऋतु बदली: परख
रुपहला सफ़र:क्या हवा चली बाबु ऋतु बदली: परख
हमारा प्रजातंत्र वो गरम तंदुर की मानिंद है जिसमें कई धुर्त लोग मजे से लोभ,प्रलोभन,झुठी सेवा,योजानाओं का पापड़ सेंकते है और फ़िर मजे से खुद ही सत्ता का मसाला लगा कर चखते रहते है।आजादी के बाद ये स्वाद उन्हे ऐसा मुंह चढ़ा कि कोशिश यही रहती है कि ये तंदुर ठंडा ना होने पाए।
इसे और सरल ढंग से समझे तो सन साठ के द्शक का एक गांव है और गांव तभी बनता है जब वहां बड़ी संख्या में गरीब,एक साहुकार,एक जमींदार,पैसे की नब्ज जानने वाला डॉक्टर,जात-पाती खुर्राट संत और सीधा-सरल स्कुल मास्टर हो। गांव में एक पोस्टमास्टर है जो कर्ज में डुबा हुआ आर्थिक रुप से कमजोर इंसान है जो अपनी बीमार पत्नि,एक जवान बेटी के साथ गुजर बसर करता है। जी हां आज हम बात कर रहे है बिमल राय और सलील चौधरी के उस चलचित्र "परख" की जिसकी रील आज बावन साल लम्बी हो चुकी है और इसका प्रोजेक्शन दायरा इतना बड़ा हो चुका है कि ये फ़िल्म हमें पुरे देश में रोजाना जस की तस नजर आती है।कुछ फ़िल्में इतिहास बन कर हमें ये बताती है कि अतित से वर्तमान तक हम कितने बदलें।
एक दिन गांव का पोस्टमेन (मोतीलाल) पोस्ट मास्टर निवारन(नासिर हुसैन) के नाम से एक लिफ़ाफ़ा देता है जिसमें पांच लाख रुपये के चेक के साथ पत्र होता है जिसमें यह लिखा होता है कि गांव के विकास के लिए ये पांच लाख रुपये उस व्यक्ति को दे दिए जाए जो सबसे ईमानदार एवं योग्य हो।हक्का बक्का पोस्टमास्टर इतनी बड़ी रकम का बोझ कैसे सम्हाले, चाहे तो वो ये रकम खुद ही रख ले बिमार पत्नि के इलाज के लिए या अपना कर्ज उतारने के लिए।लेकिन खुद्दार पोस्टमास्टर पत्र लेकर गांव के उन पांच बड़े लोगो के बीच जाता है जिन्हे वो ईमानदार समझता है और समझे भी क्यो ना जब इंसान खुद आर्थिक रुप से अक्षम और दबा हुआ हो वो प्रभुत्व वाले लोगो की ही शरण में जाता है। वो एक मिटिंग में साहुकार,जमींदार,डॉक्टर,मंदिर का संत और स्कुल मास्टर को पत्र पढ़ कर सुनाता है।जाहिर है स्कुल मास्टर को छोड़ कर सभी के जहन में पांच लाख रुपये का जादु सिर चढ़ कर बोलता है। अंतत: ये फ़ैसला होता है कि इसके लिए गांव में चुनाव कराएं जाए जो जितेगा वो ही पांच लाख रुपये का हकदार होगा।जहां उद्देश्य सेवा भाव ना होकर लक्ष्य सिर्फ़ पैसा प्राप्त करना हो वहां लालच फ़ेंक कर बस चुनाव जीतने का जुनुन पैदा हो जाता है। आज भी कई राजनितिक पार्टियां वही दांव पेंच इस्तेमाल कर रही है।गांव में जमींदार लगान माफ़ करने की घोषणा करता है तो डाक्टर मुफ़्त इलाज करना शुरु करता है,वही मंदिर का पुजारी ढोंग ढकोसलों से गांव वालो को फ़ुसलाने का काम करता है,साहुकार अपने दांवपेंच खेलता है और व्यंग्यत्मक लहजे में मन्ना डे की आवाज गुंजती है "क्या हवा चली बाबु ऋत बदली"।इसी बीच पोस्टमास्टर की बेटी (साधना) और स्कुल मास्टर के बीच प्यार की सुगबुगाहट बढ़ने लगती है और सलील दा का राग हंसध्वनि में ये गाना"ओ सजना बरखा बहार आई’ दरअसल ये गाना बांग्ला गीत "ना जेओ ना,राजोनो एखोनी बाकी"कीधुन पर तैयार हुआ लेकिन लता जी को छोड कर कोई भी इस गाने से संतुष्ट नहीं था।लताजी की तबियत खराब थी और सलील दा भी बेमन से रिकार्डिंग पर आए,पंन्द्रह मिनट में अंतरा लिखा और आर्केस्ट्रा को सरगम देकर गीत रिकार्ड किया।वो दिन है और आज का दिन है लता जी की आवाज में आज भी ये गाना रेडियो पर गुंजता है तो लगता है कविता की रुह आवाज में उतर आई हो। लता जी का एक और गाना"मेरे मन के दिये" जो कि साइलेंट रिदम पर है, कम सुना गया लेकिन इसे सुनना आपने आप में एक अदभुत अनुभव है। चुनाव में जमकर जुतम-पैर होती है,तब अंत में इस चेक को भेजने वाले जे.सी.राय गांव आते है सफ़ेद पोश लोगो का असली चेहरा सामने लाते है और गांव में सबके सामने योग्य व्यक्ति पोस्टमास्टर को पांच लाख रु की राशि सौंपतें है।बिमल राय चाहते तो इस फ़िल्म में जे.सी.राय कौन है सस्पेंस में रख सकते थे कि लेकिन उन्होने सोद्देश्य फ़िल्म बनाई और ये बताने का पुरजोर प्रयास किया कि प्रजातंत्र की चोपड़ में पासा मोहरे और खिलाडी कौन-कौन होते है।ये खेल आज भी वैसा ही चल रहा है लेकिन एक विस्तृत रुप में फ़ैल चुका है लेकिन हम यहां नहीं बताएंगे कि जे.सी.राय कौन है।यदि आपको बिमल राय,सलील चौधरी,लतामंगेशकर,शैलेन्द्र जैसे गुणी लोगो को एक जगह महसुस करना हो तो "परख" जरुर देखिए।
विशेष: परख फ़िल्म बिमल राय की उन सात फ़िल्मो में से एक है जिसमें उन्हे बेस्ट डायरेक्टर फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड प्राप्त हुआ।
फ़िल्म: परख
वर्ष: 5 अगस्त 1960
निर्माता: बिमल राय
निर्देशक: बिमल राय
लेखक एवं संगीत: सलील चौधरी
गीतकार एवं संवाद :शैलेन्द्र
अवार्ड:
फ़िल्म फ़ेयर आवार्ड-
बेस्ट डायरेक्टर-बिमल राय
बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर -मोतीलाल
बेस्ट साउंड-ज्योर्ज डिक्रुज
गीत:
1. ओ सजना बरखा बहार आई -लता मंगेशकर
2. मिला है किसी का झुमका-लता मंगेशकर
3. ये बंसी क्यु गाये-लता मंगेशकर
4. मेरे मन के दिये-लता मंगेशकर
5. क्या हवा चली बाबु ऋत बदली-मन्ना डे
-योगेन्द्र व्यास
इसे और सरल ढंग से समझे तो सन साठ के द्शक का एक गांव है और गांव तभी बनता है जब वहां बड़ी संख्या में गरीब,एक साहुकार,एक जमींदार,पैसे की नब्ज जानने वाला डॉक्टर,जात-पाती खुर्राट संत और सीधा-सरल स्कुल मास्टर हो। गांव में एक पोस्टमास्टर है जो कर्ज में डुबा हुआ आर्थिक रुप से कमजोर इंसान है जो अपनी बीमार पत्नि,एक जवान बेटी के साथ गुजर बसर करता है। जी हां आज हम बात कर रहे है बिमल राय और सलील चौधरी के उस चलचित्र "परख" की जिसकी रील आज बावन साल लम्बी हो चुकी है और इसका प्रोजेक्शन दायरा इतना बड़ा हो चुका है कि ये फ़िल्म हमें पुरे देश में रोजाना जस की तस नजर आती है।कुछ फ़िल्में इतिहास बन कर हमें ये बताती है कि अतित से वर्तमान तक हम कितने बदलें।
एक दिन गांव का पोस्टमेन (मोतीलाल) पोस्ट मास्टर निवारन(नासिर हुसैन) के नाम से एक लिफ़ाफ़ा देता है जिसमें पांच लाख रुपये के चेक के साथ पत्र होता है जिसमें यह लिखा होता है कि गांव के विकास के लिए ये पांच लाख रुपये उस व्यक्ति को दे दिए जाए जो सबसे ईमानदार एवं योग्य हो।हक्का बक्का पोस्टमास्टर इतनी बड़ी रकम का बोझ कैसे सम्हाले, चाहे तो वो ये रकम खुद ही रख ले बिमार पत्नि के इलाज के लिए या अपना कर्ज उतारने के लिए।लेकिन खुद्दार पोस्टमास्टर पत्र लेकर गांव के उन पांच बड़े लोगो के बीच जाता है जिन्हे वो ईमानदार समझता है और समझे भी क्यो ना जब इंसान खुद आर्थिक रुप से अक्षम और दबा हुआ हो वो प्रभुत्व वाले लोगो की ही शरण में जाता है। वो एक मिटिंग में साहुकार,जमींदार,डॉक्टर,मंदिर का संत और स्कुल मास्टर को पत्र पढ़ कर सुनाता है।जाहिर है स्कुल मास्टर को छोड़ कर सभी के जहन में पांच लाख रुपये का जादु सिर चढ़ कर बोलता है। अंतत: ये फ़ैसला होता है कि इसके लिए गांव में चुनाव कराएं जाए जो जितेगा वो ही पांच लाख रुपये का हकदार होगा।जहां उद्देश्य सेवा भाव ना होकर लक्ष्य सिर्फ़ पैसा प्राप्त करना हो वहां लालच फ़ेंक कर बस चुनाव जीतने का जुनुन पैदा हो जाता है। आज भी कई राजनितिक पार्टियां वही दांव पेंच इस्तेमाल कर रही है।गांव में जमींदार लगान माफ़ करने की घोषणा करता है तो डाक्टर मुफ़्त इलाज करना शुरु करता है,वही मंदिर का पुजारी ढोंग ढकोसलों से गांव वालो को फ़ुसलाने का काम करता है,साहुकार अपने दांवपेंच खेलता है और व्यंग्यत्मक लहजे में मन्ना डे की आवाज गुंजती है "क्या हवा चली बाबु ऋत बदली"।इसी बीच पोस्टमास्टर की बेटी (साधना) और स्कुल मास्टर के बीच प्यार की सुगबुगाहट बढ़ने लगती है और सलील दा का राग हंसध्वनि में ये गाना"ओ सजना बरखा बहार आई’ दरअसल ये गाना बांग्ला गीत "ना जेओ ना,राजोनो एखोनी बाकी"कीधुन पर तैयार हुआ लेकिन लता जी को छोड कर कोई भी इस गाने से संतुष्ट नहीं था।लताजी की तबियत खराब थी और सलील दा भी बेमन से रिकार्डिंग पर आए,पंन्द्रह मिनट में अंतरा लिखा और आर्केस्ट्रा को सरगम देकर गीत रिकार्ड किया।वो दिन है और आज का दिन है लता जी की आवाज में आज भी ये गाना रेडियो पर गुंजता है तो लगता है कविता की रुह आवाज में उतर आई हो। लता जी का एक और गाना"मेरे मन के दिये" जो कि साइलेंट रिदम पर है, कम सुना गया लेकिन इसे सुनना आपने आप में एक अदभुत अनुभव है। चुनाव में जमकर जुतम-पैर होती है,तब अंत में इस चेक को भेजने वाले जे.सी.राय गांव आते है सफ़ेद पोश लोगो का असली चेहरा सामने लाते है और गांव में सबके सामने योग्य व्यक्ति पोस्टमास्टर को पांच लाख रु की राशि सौंपतें है।बिमल राय चाहते तो इस फ़िल्म में जे.सी.राय कौन है सस्पेंस में रख सकते थे कि लेकिन उन्होने सोद्देश्य फ़िल्म बनाई और ये बताने का पुरजोर प्रयास किया कि प्रजातंत्र की चोपड़ में पासा मोहरे और खिलाडी कौन-कौन होते है।ये खेल आज भी वैसा ही चल रहा है लेकिन एक विस्तृत रुप में फ़ैल चुका है लेकिन हम यहां नहीं बताएंगे कि जे.सी.राय कौन है।यदि आपको बिमल राय,सलील चौधरी,लतामंगेशकर,शैलेन्द्र जैसे गुणी लोगो को एक जगह महसुस करना हो तो "परख" जरुर देखिए।
विशेष: परख फ़िल्म बिमल राय की उन सात फ़िल्मो में से एक है जिसमें उन्हे बेस्ट डायरेक्टर फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड प्राप्त हुआ।
फ़िल्म: परख
वर्ष: 5 अगस्त 1960
निर्माता: बिमल राय
निर्देशक: बिमल राय
लेखक एवं संगीत: सलील चौधरी
गीतकार एवं संवाद :शैलेन्द्र
अवार्ड:
फ़िल्म फ़ेयर आवार्ड-
बेस्ट डायरेक्टर-बिमल राय
बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर -मोतीलाल
बेस्ट साउंड-ज्योर्ज डिक्रुज
गीत:
1. ओ सजना बरखा बहार आई -लता मंगेशकर
2. मिला है किसी का झुमका-लता मंगेशकर
3. ये बंसी क्यु गाये-लता मंगेशकर
4. मेरे मन के दिये-लता मंगेशकर
5. क्या हवा चली बाबु ऋत बदली-मन्ना डे
-योगेन्द्र व्यास
Saturday, December 1, 2012
रुपहला सफ़र :दिल से निकलने वाले रस्ते का शुक्रिया
दिल से निकलने वाले रस्ते का शुक्रिया
http://www.epaperdainikdabangdunia.com/Details.aspx?id=3842&boxid=174620125
ये बेसबरी उम्र कब फ़िसल कर सोलवें बरस में पहुंच जाती है और सोलवें बरस में पहुंचने पर प्यार का एहसास तो ऐसा कि कब ओंस की बुंद पत्ते से फ़िसलकर दुब में समा जाए और ऐसे नाजुक समय यदि कोई इस दुब को छिल दे तो- उस सोलह बरस के यौवन का डंक लता की आवाज में ऐसा घुलता है कि- ये तपीश भरी आवाज जहां से भी गुजरती है एक स्तब्धता सा माहौल खींच देती है...."जब वो ये कहती है कि- जिसने हमें मिलाया-जिसने जुदा किया उस वक्त, उस घडी,उस गजर को सलाम..." जिस प्यार के महीन धागे खींच दिए गये हो फ़िर भी वो प्यार जीवन,समाज के प्रति कृतज्ञता अर्पित कर भौचक कर दे ऐसे कलम कार आनंद बक्क्षी सा.को सलाम।
ये फ़िल्म सपना (रतिअग्निहोत्री) उत्तर भारतीय और वासु(कमल हासन) दक्षिण भारतीय नवयुगल के प्यार की दास्तान है। उनके जीवन में प्यार जात-पात को धता बताता हुआ तेजी से दस्तक देता उनके दिलो दिमाग को जकड लेता है।दोनो के पारंपरिक परिवार इनके प्यार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं। इसी बीच दोनो की उच्छृंखलता दोनो परिवारो की कटुता को और बढा देती है।दोनो के परिवार उनके प्यार को वासना का नाम देकर उन्हे एक साल के लिए कडी शर्तो के बीच अलग-अलग रहने के लिए राजी कर लेते है,अगर इस एक साल के बाद भी अगर दोनो का एक दुसरे के लिए प्यार बना रहता है तब वे शादी कर सकते है।प्यार जितना तपता है उतना ही निखरता भी है।वे शिद्दत से एक साल का इंतजार करते है लेकिन दोनो के बीच पैदा की गयी गलतफ़हमी अंत में दोनो की जान ले लेती है।
एक दुजे के लिए फ़िल्म उस समय आई जब समाज बदलाव की नई करवट ले रहा था और तब नवयुगलों ने घर की चौखटो को पार कर खुले दालानों में कुदने का साहस पैदा कर लिया था। लेकिन फ़िल्मे केवल दृष्टि देती है दिशा नहीं तो ऐसे में कई युगल इस दृष्टि भ्रम का शिकार हो कर फ़िल्म और वास्तविकता के अंतर को समझ नहीं पाते और अनुपयुक्त कदम उठा लेते है।फ़िल्म के आखिर में एक संदेश जिसे बिल्कुल उचित नहीं कहा जा सकता जिसमें कहा गया है कि "प्यार में जो हार जाते है वे एक दुजे के लिए जान देकर सदा के लिए अमर हो जाते है"हांलाकि ये फ़िल्मकार की स्वतंत्रता है लेकिन सच्चा प्यार तो वो ही है जो जीने की बात करता है।प्यार में कोशिश ये ही होनी चाहिए कि ये होश पुर्वक हो,आत्मनिर्भरता हो,एक दुसरे का सम्मान हो और परिवार एवं समाज भी अपनी वैश्विक सोच रखे।यदि आशावादी दृष्टीकोण से देखे तो आने वाला समय सत्तर के द्शक और उसके बाद की पीढी का आ रहा है जिसकी खुली सोच ना सिर्फ़ धर्म और जाति के समीकरण को नेस्तानाबुत करेगी बल्कि आनरकिलिंग जैसे घृणित कार्यो से हमेशा के लिए निजात भी पा लेगी।
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी ने अपने सभी गानो में अपने साजो को भावनाओं के ज्वर में लता जी की करुण तान के साथ बहुत बडा संबल बना कर छोड दिया है....साज क्या बजते है मानो वे अपनी थाप और तानो पर झर-झर आंसु बन कर ऊछल रहे हो..... और सुनने वाले को ये कहते है कि वापिस जाओ अपने उस सोलहवें बरस में जहां तुम कुछ टपकती बुंदो को प्यासा छोड आए थे.केवल कुछ समय ले लिए सोलहवां बरस फ़िर अपने जिस्म पर चिपका लिजिए तय है बाहर आने का मन नहीं करेगा....."घुंघट को छोड के जो सर से सरक गयी...ऐसी निगोडी धानी चुनर को सलाम....."ये फ़िल्म कमलहासन रतिअग्निहोत्री के दमदार अभिनय, के.बालचंदर की कसी हुई स्क्रिप्ट, उम्दा संगीत,लता जी और एस.पी.बाल सुब्रमण्यम,अनुराधा पोंडवाल की आवाजॊ में हमेशा याद की जाएगी।
विशेष: जब लता जी प्रेम,दर्द,उल्लास-उमंग को गाती है तो निश्चय ही सप्त सुरो का अमृत घोल उनकी आत्मा से झर कर कंठ पर बैठी मां शारदे हमें आचमन करा रही होती है।
फ़िल्म: एक दुजे के लिए
वर्ष: 5 जुन 1981
निर्माता: एल.वी. प्रसाद
निर्देशक: के.बालचंदर
संगीत: लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल
गीतकार:आनंद बक्क्षी
अवार्ड:फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड में दस नामीनेशन प्राप्त हुए।
नेशनल फ़िल्म आवार्ड-
सर्वश्रेष्ट गायक-एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड-
सर्वश्रेष्ट गीतकार-आनंद बक्क्षी(तेरे मेरे बीच में)
सर्वश्रेष्ट संपादन-के.आर.किट्टो.
गीत:
1.तेरे मेरे बीच में- लता मंगेशकर,एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
2.हम तुम दोनो जब मिल जाएंगें- लता मंगेशकर,एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
3.मेरे जीवन साथी-एस.पी.बाल सुब्रमण्यम ,अनुराधा पोंडवाल
4.हम बने तुम बने -लता मंगेशकर,एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
5.सोलह बरस की बाली उमर-लता मंगेशकर.अनुप जलोटा
-योगेन्द्र व्यास
http://www.epaperdainikdabangdunia.com/Details.aspx?id=3842&boxid=174620125
ये बेसबरी उम्र कब फ़िसल कर सोलवें बरस में पहुंच जाती है और सोलवें बरस में पहुंचने पर प्यार का एहसास तो ऐसा कि कब ओंस की बुंद पत्ते से फ़िसलकर दुब में समा जाए और ऐसे नाजुक समय यदि कोई इस दुब को छिल दे तो- उस सोलह बरस के यौवन का डंक लता की आवाज में ऐसा घुलता है कि- ये तपीश भरी आवाज जहां से भी गुजरती है एक स्तब्धता सा माहौल खींच देती है...."जब वो ये कहती है कि- जिसने हमें मिलाया-जिसने जुदा किया उस वक्त, उस घडी,उस गजर को सलाम..." जिस प्यार के महीन धागे खींच दिए गये हो फ़िर भी वो प्यार जीवन,समाज के प्रति कृतज्ञता अर्पित कर भौचक कर दे ऐसे कलम कार आनंद बक्क्षी सा.को सलाम।
ये फ़िल्म सपना (रतिअग्निहोत्री) उत्तर भारतीय और वासु(कमल हासन) दक्षिण भारतीय नवयुगल के प्यार की दास्तान है। उनके जीवन में प्यार जात-पात को धता बताता हुआ तेजी से दस्तक देता उनके दिलो दिमाग को जकड लेता है।दोनो के पारंपरिक परिवार इनके प्यार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं। इसी बीच दोनो की उच्छृंखलता दोनो परिवारो की कटुता को और बढा देती है।दोनो के परिवार उनके प्यार को वासना का नाम देकर उन्हे एक साल के लिए कडी शर्तो के बीच अलग-अलग रहने के लिए राजी कर लेते है,अगर इस एक साल के बाद भी अगर दोनो का एक दुसरे के लिए प्यार बना रहता है तब वे शादी कर सकते है।प्यार जितना तपता है उतना ही निखरता भी है।वे शिद्दत से एक साल का इंतजार करते है लेकिन दोनो के बीच पैदा की गयी गलतफ़हमी अंत में दोनो की जान ले लेती है।
एक दुजे के लिए फ़िल्म उस समय आई जब समाज बदलाव की नई करवट ले रहा था और तब नवयुगलों ने घर की चौखटो को पार कर खुले दालानों में कुदने का साहस पैदा कर लिया था। लेकिन फ़िल्मे केवल दृष्टि देती है दिशा नहीं तो ऐसे में कई युगल इस दृष्टि भ्रम का शिकार हो कर फ़िल्म और वास्तविकता के अंतर को समझ नहीं पाते और अनुपयुक्त कदम उठा लेते है।फ़िल्म के आखिर में एक संदेश जिसे बिल्कुल उचित नहीं कहा जा सकता जिसमें कहा गया है कि "प्यार में जो हार जाते है वे एक दुजे के लिए जान देकर सदा के लिए अमर हो जाते है"हांलाकि ये फ़िल्मकार की स्वतंत्रता है लेकिन सच्चा प्यार तो वो ही है जो जीने की बात करता है।प्यार में कोशिश ये ही होनी चाहिए कि ये होश पुर्वक हो,आत्मनिर्भरता हो,एक दुसरे का सम्मान हो और परिवार एवं समाज भी अपनी वैश्विक सोच रखे।यदि आशावादी दृष्टीकोण से देखे तो आने वाला समय सत्तर के द्शक और उसके बाद की पीढी का आ रहा है जिसकी खुली सोच ना सिर्फ़ धर्म और जाति के समीकरण को नेस्तानाबुत करेगी बल्कि आनरकिलिंग जैसे घृणित कार्यो से हमेशा के लिए निजात भी पा लेगी।
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी ने अपने सभी गानो में अपने साजो को भावनाओं के ज्वर में लता जी की करुण तान के साथ बहुत बडा संबल बना कर छोड दिया है....साज क्या बजते है मानो वे अपनी थाप और तानो पर झर-झर आंसु बन कर ऊछल रहे हो..... और सुनने वाले को ये कहते है कि वापिस जाओ अपने उस सोलहवें बरस में जहां तुम कुछ टपकती बुंदो को प्यासा छोड आए थे.केवल कुछ समय ले लिए सोलहवां बरस फ़िर अपने जिस्म पर चिपका लिजिए तय है बाहर आने का मन नहीं करेगा....."घुंघट को छोड के जो सर से सरक गयी...ऐसी निगोडी धानी चुनर को सलाम....."ये फ़िल्म कमलहासन रतिअग्निहोत्री के दमदार अभिनय, के.बालचंदर की कसी हुई स्क्रिप्ट, उम्दा संगीत,लता जी और एस.पी.बाल सुब्रमण्यम,अनुराधा पोंडवाल की आवाजॊ में हमेशा याद की जाएगी।
विशेष: जब लता जी प्रेम,दर्द,उल्लास-उमंग को गाती है तो निश्चय ही सप्त सुरो का अमृत घोल उनकी आत्मा से झर कर कंठ पर बैठी मां शारदे हमें आचमन करा रही होती है।
फ़िल्म: एक दुजे के लिए
वर्ष: 5 जुन 1981
निर्माता: एल.वी. प्रसाद
निर्देशक: के.बालचंदर
संगीत: लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल
गीतकार:आनंद बक्क्षी
अवार्ड:फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड में दस नामीनेशन प्राप्त हुए।
नेशनल फ़िल्म आवार्ड-
सर्वश्रेष्ट गायक-एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड-
सर्वश्रेष्ट गीतकार-आनंद बक्क्षी(तेरे मेरे बीच में)
सर्वश्रेष्ट संपादन-के.आर.किट्टो.
गीत:
1.तेरे मेरे बीच में- लता मंगेशकर,एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
2.हम तुम दोनो जब मिल जाएंगें- लता मंगेशकर,एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
3.मेरे जीवन साथी-एस.पी.बाल सुब्रमण्यम ,अनुराधा पोंडवाल
4.हम बने तुम बने -लता मंगेशकर,एस.पी.बाल सुब्रमण्यम
5.सोलह बरस की बाली उमर-लता मंगेशकर.अनुप जलोटा
-योगेन्द्र व्यास
Sunday, November 25, 2012
रुपहला सफ़र: रामचंद पाकिस्तानी
रुपहला सफ़र: रामचंद पाकिस्तानी
पंच तत्वों में से इंसान सिर्फ़ धरती और आकाश को ही बांट पाया और ये शायद इंसान की सबसे बडी गलतफ़हमी है कि उसने इस ब्रम्हाण्ड के सबसे महीन टुकडे पर अधिकार कर लिया। चुल्हे सरहदों के इस पार भी जलते है उस पार भी,पानी का सैलाब इधर भी है उधर भी,सरहदॊ की हवाओं में दर्द और सिसकियां इधर भी है उधर भी।सियासी और मजहबी ताकतो को बारुद की गंध में इंसानियत की सुगंध महसुस ही नहीं होती और ये ही एक हारे हुए इंसान की सबसे बडी हार है।
रामचंद पाकिस्तानी एक सत्य घटना पर आधारित कहानी है। चम्पा(नंदिता दास) उन अभागी स्त्रियों में से एक है जिसका आठ साल बच्चा रामचंद(सैयद फ़जल हुसैन/नावेद जब्बार) व पति शंकर (राशिद फ़ारुकी) अनजाने में भारतीय सीमा में चले जाते है और भारतीय़ आर्मी उन्हे जासुस समझ कर हिरासत में ले लेती है ये सब उस समय हुआ जब वर्ष 2002 में भारतीय संसद पर हमला हुआ था और उस समय भारत और पाकिस्तान की सरहदों पर काफ़ी तनाव भी उत्पन्न हो गया था। पाकिस्तान की सटी हुयी सरहदों पर कुछ दलित जातियां बसती है।उसी गरीब हिन्दु दलित जाति का बच्चा रामचंद अपनी मां से खफ़ा होकर दौडते हुए अनजाने में भारतीय सीमा में चला आता है और उसे ढुंढते हुए उस का पिता शंकर भारतीय सीमा में प्रवेश कर जाता है। यहां से शुरु होता है पिता पुत्र का जेल का सफ़र और एक हताश मां और पत्नि सरहद पर टकटकी लगाए उनके आवन की बाट जोह रही होती है।जेल किसी भी देश की हो वहां रहना एक भयावह अनुभव से कम नहीं होता जबकि आपको ये मालुम हो कि यहां आपकी पुरी की पुरी उम्र भी गुजर सकती है।आज भी ऐसे कई सौ कैदी होंगे जो दोनो देशो की जेलो में बिना किसी जुर्म के सजा भुगत रहे हो और अपनी ख्वाहिशे और सपने अनजान जेल की चाहर दिवारी में दफ़न होते देखते है।जुर्म सिर्फ़ इतना की सफ़ेद पुते पत्थरों की सीमा को लांघ कर कदम बढा देना।
चम्पा अकेले अपनी गरीबी और साहुकारी से लडती हुयी जीने की आस को थामे रखती है।पाकिस्तानी फ़िल्मकार और डायरेक्टर मेहरीन जब्बार ने एक सकारत्मक नजरिये से व्यक्तिगत स्वतंत्रता,उसके अधिकार और जातिगत असमानता को इस फ़िल्म में उठाया है।एक बच्चा जेल में भी सामाजिक असमानता पर तंज बात अपनी महिला जेलर को कहता है जो छु जाने वाली है।मेहरीन जब्बार ने जेल में सडती गलती जिंदगी को बिना कोई सनसनी पैदा किए जस का तस रखा है बल्कि असल हालातों को थोडा नरम रुप में ही प्रस्तुत किया है। रामचंद और उसके पिता अपनी जिंदगी के चार साल जेल में कडवे अनुभवो के सहारे गुजारते है।इंसान की आस तब और टुट जाती है जब उसे ये पता लगे वो अब रिहा किया जाने वाला है लेकिन फ़िर उसे जेल में डाल दिया जाए।
ये फ़िल्म पाकिस्तान और भारत के कलाकारों की साझा फ़िल्म है।जिसे कई अंर्तराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए है। इस फ़िल्म का संगीत भारतीय संगीतकार देबोजीत मिश्रा ने तैयार किया और स्वर दिए शुभा मुद्दगल और शफ़ाकत अमानत अली ने।एक आभासी संगीत और सोद्देश्य बोलो से गुजरते हुए हम सरहदॊं पर चहल कदमी करते हुए उसकी संवेदनशीलता को महसुस करते है।इस फ़िल्म के को-एडीटर असीम सिन्हा रहे है जिन्होने सत्यजीत रे के साथ काफ़ी काम किया। सरहदो की दिवानगी को खत्म करना हो तो इस फ़िल्म को देखा जाना चाहिए।
विशेष:पाकिस्तानी फ़िल्मों में शायद ये पहली फ़िल्म है जिसमें पाकिस्तानी हिन्दु को केन्द्रिय पात्र रखकर फ़िल्म बनाई गई है। नंदिता दास को छोड कर सारे कलाकार पाकिस्तानी ही है।
फ़िल्म: रामचंद पाकिस्तानी
वर्ष: 2 अक्टुबर, 2008
निर्माता:जावेद जब्बार
निर्देशक:मेहरीन जब्बार
संगीत:देबोजीत मिश्रा
गीतकार: अनवर मकसुद
गीत:
01 तेरी मेरी प्रीत -शुभा मुद्दगल
02 अल्लाह मेघ दे-शुभा मुद्दगल और शफ़ाकत अमानत अली
03 फ़िर वही रास्ते-शफ़ाकत अमानत अली
04 खारी नीम के नीचे -माईभागी
05 तेरीन पौंडा-अलन फ़कीर
-योगेन्द्र व्यास
पंच तत्वों में से इंसान सिर्फ़ धरती और आकाश को ही बांट पाया और ये शायद इंसान की सबसे बडी गलतफ़हमी है कि उसने इस ब्रम्हाण्ड के सबसे महीन टुकडे पर अधिकार कर लिया। चुल्हे सरहदों के इस पार भी जलते है उस पार भी,पानी का सैलाब इधर भी है उधर भी,सरहदॊ की हवाओं में दर्द और सिसकियां इधर भी है उधर भी।सियासी और मजहबी ताकतो को बारुद की गंध में इंसानियत की सुगंध महसुस ही नहीं होती और ये ही एक हारे हुए इंसान की सबसे बडी हार है।
रामचंद पाकिस्तानी एक सत्य घटना पर आधारित कहानी है। चम्पा(नंदिता दास) उन अभागी स्त्रियों में से एक है जिसका आठ साल बच्चा रामचंद(सैयद फ़जल हुसैन/नावेद जब्बार) व पति शंकर (राशिद फ़ारुकी) अनजाने में भारतीय सीमा में चले जाते है और भारतीय़ आर्मी उन्हे जासुस समझ कर हिरासत में ले लेती है ये सब उस समय हुआ जब वर्ष 2002 में भारतीय संसद पर हमला हुआ था और उस समय भारत और पाकिस्तान की सरहदों पर काफ़ी तनाव भी उत्पन्न हो गया था। पाकिस्तान की सटी हुयी सरहदों पर कुछ दलित जातियां बसती है।उसी गरीब हिन्दु दलित जाति का बच्चा रामचंद अपनी मां से खफ़ा होकर दौडते हुए अनजाने में भारतीय सीमा में चला आता है और उसे ढुंढते हुए उस का पिता शंकर भारतीय सीमा में प्रवेश कर जाता है। यहां से शुरु होता है पिता पुत्र का जेल का सफ़र और एक हताश मां और पत्नि सरहद पर टकटकी लगाए उनके आवन की बाट जोह रही होती है।जेल किसी भी देश की हो वहां रहना एक भयावह अनुभव से कम नहीं होता जबकि आपको ये मालुम हो कि यहां आपकी पुरी की पुरी उम्र भी गुजर सकती है।आज भी ऐसे कई सौ कैदी होंगे जो दोनो देशो की जेलो में बिना किसी जुर्म के सजा भुगत रहे हो और अपनी ख्वाहिशे और सपने अनजान जेल की चाहर दिवारी में दफ़न होते देखते है।जुर्म सिर्फ़ इतना की सफ़ेद पुते पत्थरों की सीमा को लांघ कर कदम बढा देना।
चम्पा अकेले अपनी गरीबी और साहुकारी से लडती हुयी जीने की आस को थामे रखती है।पाकिस्तानी फ़िल्मकार और डायरेक्टर मेहरीन जब्बार ने एक सकारत्मक नजरिये से व्यक्तिगत स्वतंत्रता,उसके अधिकार और जातिगत असमानता को इस फ़िल्म में उठाया है।एक बच्चा जेल में भी सामाजिक असमानता पर तंज बात अपनी महिला जेलर को कहता है जो छु जाने वाली है।मेहरीन जब्बार ने जेल में सडती गलती जिंदगी को बिना कोई सनसनी पैदा किए जस का तस रखा है बल्कि असल हालातों को थोडा नरम रुप में ही प्रस्तुत किया है। रामचंद और उसके पिता अपनी जिंदगी के चार साल जेल में कडवे अनुभवो के सहारे गुजारते है।इंसान की आस तब और टुट जाती है जब उसे ये पता लगे वो अब रिहा किया जाने वाला है लेकिन फ़िर उसे जेल में डाल दिया जाए।
ये फ़िल्म पाकिस्तान और भारत के कलाकारों की साझा फ़िल्म है।जिसे कई अंर्तराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए है। इस फ़िल्म का संगीत भारतीय संगीतकार देबोजीत मिश्रा ने तैयार किया और स्वर दिए शुभा मुद्दगल और शफ़ाकत अमानत अली ने।एक आभासी संगीत और सोद्देश्य बोलो से गुजरते हुए हम सरहदॊं पर चहल कदमी करते हुए उसकी संवेदनशीलता को महसुस करते है।इस फ़िल्म के को-एडीटर असीम सिन्हा रहे है जिन्होने सत्यजीत रे के साथ काफ़ी काम किया। सरहदो की दिवानगी को खत्म करना हो तो इस फ़िल्म को देखा जाना चाहिए।
विशेष:पाकिस्तानी फ़िल्मों में शायद ये पहली फ़िल्म है जिसमें पाकिस्तानी हिन्दु को केन्द्रिय पात्र रखकर फ़िल्म बनाई गई है। नंदिता दास को छोड कर सारे कलाकार पाकिस्तानी ही है।
फ़िल्म: रामचंद पाकिस्तानी
वर्ष: 2 अक्टुबर, 2008
निर्माता:जावेद जब्बार
निर्देशक:मेहरीन जब्बार
संगीत:देबोजीत मिश्रा
गीतकार: अनवर मकसुद
गीत:
01 तेरी मेरी प्रीत -शुभा मुद्दगल
02 अल्लाह मेघ दे-शुभा मुद्दगल और शफ़ाकत अमानत अली
03 फ़िर वही रास्ते-शफ़ाकत अमानत अली
04 खारी नीम के नीचे -माईभागी
05 तेरीन पौंडा-अलन फ़कीर
-योगेन्द्र व्यास
Sunday, November 18, 2012
गुलजार की "किताब"
मास्टर जी की आ गई चिठ्ठी: किताब
बच्चों का मन बहुत कोमल होता है और हम सब उस कोमल मन पर अपने हिसाब से इबारत लिखने की कोशिश में लगे रहते है। बच्चॊं के मनोविज्ञान को समझना है तो थोडा हमें भी बच्चा हो जाने की जरुरत है जैसे कि गुलजार साहब खुद फ़िल्म "किताब" बनाते वक्त बच्चे के अंर्तमन में जा बैठते है और उनकी छोटी-छोटी इच्छाओं,जिज्ञासा और शैतानियों को हौले से निकाल कर किसी रुई के फ़ोए पर आहिस्ता से रख देते है।
समरेश बसु के उपन्यास "पथिक" पर आधारित फ़िल्म "किताब" एक बिल्कुल अलग नजरिये से बनाई गयी फ़िल्म जिसमें एक बच्चा बाबला(मास्टर राजु) जिंदगी को अपने ढंग से देखना चाहता और उस नजरिये में वो खट्टे-मीठे अनुभवो से गुजरता हुआ जिंदगी की सच्चाईयों से सामना करता है जो उसके मन पर गहरा प्रभाव डालती है।बाबला की मां(दीना पाठक) उसे गांव से शहर उसकी दीदी एवं जिजाजी(विध्या सिन्हा,उत्तम कुमार) के पास पढ़ने भेजती है ताकि पढ़ लिख कर वो बड़ा बन सके।यहां बाल मन जो कहता है वो हंसी पैदा करता है-बाबला अपनी मां से कहता है"तुम भी अजीब हो मां कभी कहती हो बच्चे दुध पीने से बड़े होते है,और कभी कहती हो पड़ने लिखने से"।शुरुआती तौर पर बाबला को स्कुल व दीदी का घर दोनो अच्छे लगते है लेकिन धीरे धीरे उसे बाहरी दुनिया लुभाने लगती है।स्कुल में मास्टर जी की दुनिया उसे उब पैदा करती है।फ़िर शुरु होता है शरारतॊ का दौर स्कुल में मास्टर जी मजाक बनाना,अपने दोस्त पप्पु(मा.टीटो) के साथ सड़को पर घुमना,मदारी का जादु,दुनिया को अपने नजरिये से देखना उसे अच्छा लगने लगता है।इधर घर पर शिकायती चिठ्ठीयाँ स्कुल से आने लगती है।फ़िर स्कुल में धमाचौकड़ी मचाते बच्चे गाना गाते है"आ..आ..इ.ई.मास्टर जी की आ गई चिठ्ठी"।इस गाने में पंचम दा ने क्लास की मेज को ही रिदम के रुप में इस्तेमाल किया था।इसी बीच बाबला बीमार हो जाता है तब डाक्टर कहता है "बच्चो के टेंशन बहुत सख्त होते बच्चों को हम जिंदगी से बहुत डरा कर रखते है,हमेशा ये कहते है कि पड़ोगे नहीं तो क्या भाड़ झोंकोगे।ये नहीं बताते कि जिंदगी कितनी खुबसुरत भी है।"स्कुल और मां बाप इसी उलझन में रहते है कि आखिर बच्चॊ को संस्कारित करने की जिम्मेवारी किस की है।शायद हमारा समाज बच्चों के मामलो में उतना संवेदनशील नहीं है जितना उसे होना चाहिए।
बाबला जहां भी जाता है लोग उसे नसीहते देने लगते है एक मर्तबा वो रास्ते में हलवाई की दुकान पर जाता है उससे कहता है हमें जलेबी बनाना सीखा दो ना..हलवाई बोलता है तुम अच्छे घर के हो तो बाबला कहता है तो क्या हलवाई अच्छे घर के नहीं होते।बाबला को ये समझ नहीं आता कि सितार बजाने के लिए ज्योग्राफ़ी सिखना क्यो जरुरी है,मदारी भी बिना पढ़े लिखे क्या गजब का जादु दिखाता है।इन सब मजे मस्ती के बीच वो स्कुल और घर पर डांट डपट का शिकार होता रहता है और कहता है बड़ो की सबको जरुरत होती है,लेकिन बड़ो को किसी की नहीं। इसी के चलते वो एक रात वापस अपनी मां के पास जाने के लिए घर से अकेला निकल जाता है।ट्रेन में बिना टिकट रास्ते में उतार दिया जाता है फ़िर बालमन जीवन की कड़वी हकीकत का सामना करता है,जिसमें अंधे भिखारी से मुलाकात,इंजिन ड्रायवर से मुलाकात और एक रात ठंड में ठिठुरते हुए एक प्लेटफ़र्म पर एक बुढी भिखारिन के पास उसके कंबल में सो जाता है।सुबह जब उसे पता चलता है कि रात भर वो एक मृत भिखारिन के पास सोया रहा।तब वो दुखी हो जाता है और उसने जो सिक्का उसके डब्बे से निकाला था वो वापस डाल देता है।एक सीख लेकर घर पहुंचता है और फ़िर अच्छे से पढ़ाई लिखाई करने का वादा करता है।
गुलजार सा.ने पुरी फ़िल्म में फ़्लेश बेक को बहुत ही उम्दा तरीके प्रस्तुत किया है साथ ही साथ कुछ डायलाग को दार्शनिक पुट भी दिया, एक प्रसंग जहां भिखारी(श्रीराम लागु)बाबला को कहते है-"गाडी छुटने का गम नहीं स्टेशन नहीं छुटना चाहिए"।
बाल दिवस सिर्फ़ बच्चो के लिए ही नहीं बडो के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है कि- एक दिन तो बच्चो के साथ बच्चा बन कर देखा जाए..।"बाल दिवस" पर "किताब" ही हो जाए......
विशेष: प्रयोगधर्मी पंचम ने "धन्नो की आंखो में रात का सुरमा" गाने में एक बेसुरी सी आवाज वाला फ़्लेंजिंग गजेट को गिटार में जोड कर एक नायब धुन तैयार की और फ़िर बाद इसे कई प्रसिध्द गानो में उपयोग किया।
फ़िल्म: किताब
वर्ष: 31अगस्त 1977
निर्माता:प्राणलाल मेहता,गुलजार
निर्देशक: गुलजार
संगीत:आर.डी. बर्मन
गीतकार:गुलजार
गीत:
1. अआइई मास्टर जी की आ गई चिठ्ठी-शिवांगी कोल्हापुरे
2. धन्नो की आंखो में रात का सुरमा- आर. डी.
3. हरि दिन तो बिता- राजकुमारी
4. मेरे साथ चले ना साया- सपन चक्रवर्ती
-योगेन्द्र व्यास
बच्चों का मन बहुत कोमल होता है और हम सब उस कोमल मन पर अपने हिसाब से इबारत लिखने की कोशिश में लगे रहते है। बच्चॊं के मनोविज्ञान को समझना है तो थोडा हमें भी बच्चा हो जाने की जरुरत है जैसे कि गुलजार साहब खुद फ़िल्म "किताब" बनाते वक्त बच्चे के अंर्तमन में जा बैठते है और उनकी छोटी-छोटी इच्छाओं,जिज्ञासा और शैतानियों को हौले से निकाल कर किसी रुई के फ़ोए पर आहिस्ता से रख देते है।
समरेश बसु के उपन्यास "पथिक" पर आधारित फ़िल्म "किताब" एक बिल्कुल अलग नजरिये से बनाई गयी फ़िल्म जिसमें एक बच्चा बाबला(मास्टर राजु) जिंदगी को अपने ढंग से देखना चाहता और उस नजरिये में वो खट्टे-मीठे अनुभवो से गुजरता हुआ जिंदगी की सच्चाईयों से सामना करता है जो उसके मन पर गहरा प्रभाव डालती है।बाबला की मां(दीना पाठक) उसे गांव से शहर उसकी दीदी एवं जिजाजी(विध्या सिन्हा,उत्तम कुमार) के पास पढ़ने भेजती है ताकि पढ़ लिख कर वो बड़ा बन सके।यहां बाल मन जो कहता है वो हंसी पैदा करता है-बाबला अपनी मां से कहता है"तुम भी अजीब हो मां कभी कहती हो बच्चे दुध पीने से बड़े होते है,और कभी कहती हो पड़ने लिखने से"।शुरुआती तौर पर बाबला को स्कुल व दीदी का घर दोनो अच्छे लगते है लेकिन धीरे धीरे उसे बाहरी दुनिया लुभाने लगती है।स्कुल में मास्टर जी की दुनिया उसे उब पैदा करती है।फ़िर शुरु होता है शरारतॊ का दौर स्कुल में मास्टर जी मजाक बनाना,अपने दोस्त पप्पु(मा.टीटो) के साथ सड़को पर घुमना,मदारी का जादु,दुनिया को अपने नजरिये से देखना उसे अच्छा लगने लगता है।इधर घर पर शिकायती चिठ्ठीयाँ स्कुल से आने लगती है।फ़िर स्कुल में धमाचौकड़ी मचाते बच्चे गाना गाते है"आ..आ..इ.ई.मास्टर जी की आ गई चिठ्ठी"।इस गाने में पंचम दा ने क्लास की मेज को ही रिदम के रुप में इस्तेमाल किया था।इसी बीच बाबला बीमार हो जाता है तब डाक्टर कहता है "बच्चो के टेंशन बहुत सख्त होते बच्चों को हम जिंदगी से बहुत डरा कर रखते है,हमेशा ये कहते है कि पड़ोगे नहीं तो क्या भाड़ झोंकोगे।ये नहीं बताते कि जिंदगी कितनी खुबसुरत भी है।"स्कुल और मां बाप इसी उलझन में रहते है कि आखिर बच्चॊ को संस्कारित करने की जिम्मेवारी किस की है।शायद हमारा समाज बच्चों के मामलो में उतना संवेदनशील नहीं है जितना उसे होना चाहिए।
बाबला जहां भी जाता है लोग उसे नसीहते देने लगते है एक मर्तबा वो रास्ते में हलवाई की दुकान पर जाता है उससे कहता है हमें जलेबी बनाना सीखा दो ना..हलवाई बोलता है तुम अच्छे घर के हो तो बाबला कहता है तो क्या हलवाई अच्छे घर के नहीं होते।बाबला को ये समझ नहीं आता कि सितार बजाने के लिए ज्योग्राफ़ी सिखना क्यो जरुरी है,मदारी भी बिना पढ़े लिखे क्या गजब का जादु दिखाता है।इन सब मजे मस्ती के बीच वो स्कुल और घर पर डांट डपट का शिकार होता रहता है और कहता है बड़ो की सबको जरुरत होती है,लेकिन बड़ो को किसी की नहीं। इसी के चलते वो एक रात वापस अपनी मां के पास जाने के लिए घर से अकेला निकल जाता है।ट्रेन में बिना टिकट रास्ते में उतार दिया जाता है फ़िर बालमन जीवन की कड़वी हकीकत का सामना करता है,जिसमें अंधे भिखारी से मुलाकात,इंजिन ड्रायवर से मुलाकात और एक रात ठंड में ठिठुरते हुए एक प्लेटफ़र्म पर एक बुढी भिखारिन के पास उसके कंबल में सो जाता है।सुबह जब उसे पता चलता है कि रात भर वो एक मृत भिखारिन के पास सोया रहा।तब वो दुखी हो जाता है और उसने जो सिक्का उसके डब्बे से निकाला था वो वापस डाल देता है।एक सीख लेकर घर पहुंचता है और फ़िर अच्छे से पढ़ाई लिखाई करने का वादा करता है।
गुलजार सा.ने पुरी फ़िल्म में फ़्लेश बेक को बहुत ही उम्दा तरीके प्रस्तुत किया है साथ ही साथ कुछ डायलाग को दार्शनिक पुट भी दिया, एक प्रसंग जहां भिखारी(श्रीराम लागु)बाबला को कहते है-"गाडी छुटने का गम नहीं स्टेशन नहीं छुटना चाहिए"।
बाल दिवस सिर्फ़ बच्चो के लिए ही नहीं बडो के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है कि- एक दिन तो बच्चो के साथ बच्चा बन कर देखा जाए..।"बाल दिवस" पर "किताब" ही हो जाए......
विशेष: प्रयोगधर्मी पंचम ने "धन्नो की आंखो में रात का सुरमा" गाने में एक बेसुरी सी आवाज वाला फ़्लेंजिंग गजेट को गिटार में जोड कर एक नायब धुन तैयार की और फ़िर बाद इसे कई प्रसिध्द गानो में उपयोग किया।
फ़िल्म: किताब
वर्ष: 31अगस्त 1977
निर्माता:प्राणलाल मेहता,गुलजार
निर्देशक: गुलजार
संगीत:आर.डी. बर्मन
गीतकार:गुलजार
गीत:
1. अआइई मास्टर जी की आ गई चिठ्ठी-शिवांगी कोल्हापुरे
2. धन्नो की आंखो में रात का सुरमा- आर. डी.
3. हरि दिन तो बिता- राजकुमारी
4. मेरे साथ चले ना साया- सपन चक्रवर्ती
-योगेन्द्र व्यास
"रुपहला सफ़र": लीक से हटकर कथा कहने की कला-"चीनी कम"
"रुपहला सफ़र": लीक से हटकर कथा कहने की कला-"चीनी कम"
जिंदगी की मिठास इसी में है कि आपके व्यक्तित्व में मिठास की संभावना उम्र के पढाव से तय ना हो बल्कि आंतरिक सुघडता उम्र तो धता बताती हुई आपके व्यक्तित्व पर बिछ जाए।
समाज ने अपना एक नजरिया नामक चश्मा बना रखा है और हर व्यक्ति उसी चश्में से अपनी नजरों को पैनी करने की कोशिश में लगा रहता है। लेकिन कई लोग ऐसे भी है जो जिंदगी को खुद के नजरिये से देखते है और अपनी जोखिम पर रोमांच रचते है।
फ़िल्म चीनी कम ६४ वर्ष और ३४ वर्ष के उम्र के फ़ासले पर बनी मनोरंजक फ़िल्म है जिसमें नि:स्तेज उम्र में प्यार की कपोले फ़ुटना और ३० वर्ष के फ़ासले पर खडी लडकी से प्यार का इजहार,इजहार में इकरार पुरे प्रकरण को बहुत ही हास्य-विनोद से भरपुर बनाता हुआ एक फ़िल्मी ड्रामा है।
बुद्धदेव गुप्ता(अमिताभ बच्चन)सख्त मिजाज शेफ़ और लंदन में नामचीन स्पाइस-६ इंडियन रेस्टोरेंट का मालिक है। जिसके मुताबिक उसके किचन से खाना सिर्फ़ बाहर आता है अंदर नहीं जाता।लेकिन एक कस्टमर नेहा वर्मा(तब्बु) हैदराबादी जाफ़रानी पुलाव ये कह कर लौटा देती है ये पुलाव मीठा नहीं होता ये कैसा इंडियन फ़्राड रेस्टारेंट है। ये जाफ़रानी पुलाव बातचीत में कडवाहट के साथ कुछ-कुछ इश्क की जमीन तैयार करता है।बुध्ददेव की जिंदगी में ८५ वर्षीय़ मां(जोहरा सहगल) और पडोस में ही रहने वाली ९ वर्षीय़ बच्ची है जो कैंसर से पीडित है।नामचीन शेफ़ होने के बावजुद बुध्ददेव अपने घर में ही अपने मां के हाथ की बनी रबर जैसी रोटी और सुख करेला और बेस्वादु खाना ही खाता है ये मां बेटे के प्यार की नोंक-झोंक बहुत आत्मीय और विनोदी माहौल पैदा करती है।इसी बीच एक और मजेदार केरेक्टर ओमप्रकाश वर्मा(परेश रावल) जो नेहा वर्मा के पिता है और बुध्ददेव से ६ साल छोटॆ।अपने से छ: साल छोटे व्यक्ति से उसकी लडकी हाथ मांगना और फ़िर कुछ गंभीर और हास्यापद सीन देखने काबिल है,कुछ टेस्ट चेंज करना हो तो ये फ़िल्म देखने काबिल है।
समाज में ये बहस होना कि एक बेटी की उम्र की लडकी से शादी तो समाज के सवाल समाज में ही मिलेंगे कि दो परिपक्व शरीर यदि मानसिक रुप से एक दुसरे के साथ रहने को तैयार है तो इसमें सवाल जवाब की गुंजाईश ना के बराबर होना चाहिए।प्यार उम्र के फ़ासले को नजर अंदाज करता है और जो नैसर्गिक है तो फ़िर स्वीकारोक्ति से परहेज कैसा।इल्याराज का संगीत ताजगी देता है कभी सुने तो कानों को सुकुन देता सरसराहट से निकल जाता है।
विशेष: फ़िल्म में सारे गीत अलग अलग तमिल फ़िल्मों से उठाए गए है तो अच्छे बन पडे है।
फ़िल्म: चीनी कम
वर्ष: 25 मई 2007
निर्माता:सुनील मनचंदा
निर्देशक: आर.बाल्की
संगीत:इल्याराजा
गीत:
1 चीनी कम-श्रेया घोषाल
2 सुनी सुनी -विजय प्रकाश
3 बातें हवा -अमिताभ बच्चन,श्रेया घोषाल
4 जाने दो -श्रेया घोषाल
-योगेन्द्र व्यास
समाज ने अपना एक नजरिया नामक चश्मा बना रखा है और हर व्यक्ति उसी चश्में से अपनी नजरों को पैनी करने की कोशिश में लगा रहता है। लेकिन कई लोग ऐसे भी है जो जिंदगी को खुद के नजरिये से देखते है और अपनी जोखिम पर रोमांच रचते है।
फ़िल्म चीनी कम ६४ वर्ष और ३४ वर्ष के उम्र के फ़ासले पर बनी मनोरंजक फ़िल्म है जिसमें नि:स्तेज उम्र में प्यार की कपोले फ़ुटना और ३० वर्ष के फ़ासले पर खडी लडकी से प्यार का इजहार,इजहार में इकरार पुरे प्रकरण को बहुत ही हास्य-विनोद से भरपुर बनाता हुआ एक फ़िल्मी ड्रामा है।
बुद्धदेव गुप्ता(अमिताभ बच्चन)सख्त मिजाज शेफ़ और लंदन में नामचीन स्पाइस-६ इंडियन रेस्टोरेंट का मालिक है। जिसके मुताबिक उसके किचन से खाना सिर्फ़ बाहर आता है अंदर नहीं जाता।लेकिन एक कस्टमर नेहा वर्मा(तब्बु) हैदराबादी जाफ़रानी पुलाव ये कह कर लौटा देती है ये पुलाव मीठा नहीं होता ये कैसा इंडियन फ़्राड रेस्टारेंट है। ये जाफ़रानी पुलाव बातचीत में कडवाहट के साथ कुछ-कुछ इश्क की जमीन तैयार करता है।बुध्ददेव की जिंदगी में ८५ वर्षीय़ मां(जोहरा सहगल) और पडोस में ही रहने वाली ९ वर्षीय़ बच्ची है जो कैंसर से पीडित है।नामचीन शेफ़ होने के बावजुद बुध्ददेव अपने घर में ही अपने मां के हाथ की बनी रबर जैसी रोटी और सुख करेला और बेस्वादु खाना ही खाता है ये मां बेटे के प्यार की नोंक-झोंक बहुत आत्मीय और विनोदी माहौल पैदा करती है।इसी बीच एक और मजेदार केरेक्टर ओमप्रकाश वर्मा(परेश रावल) जो नेहा वर्मा के पिता है और बुध्ददेव से ६ साल छोटॆ।अपने से छ: साल छोटे व्यक्ति से उसकी लडकी हाथ मांगना और फ़िर कुछ गंभीर और हास्यापद सीन देखने काबिल है,कुछ टेस्ट चेंज करना हो तो ये फ़िल्म देखने काबिल है।
समाज में ये बहस होना कि एक बेटी की उम्र की लडकी से शादी तो समाज के सवाल समाज में ही मिलेंगे कि दो परिपक्व शरीर यदि मानसिक रुप से एक दुसरे के साथ रहने को तैयार है तो इसमें सवाल जवाब की गुंजाईश ना के बराबर होना चाहिए।प्यार उम्र के फ़ासले को नजर अंदाज करता है और जो नैसर्गिक है तो फ़िर स्वीकारोक्ति से परहेज कैसा।इल्याराज का संगीत ताजगी देता है कभी सुने तो कानों को सुकुन देता सरसराहट से निकल जाता है।
विशेष: फ़िल्म में सारे गीत अलग अलग तमिल फ़िल्मों से उठाए गए है तो अच्छे बन पडे है।
फ़िल्म: चीनी कम
वर्ष: 25 मई 2007
निर्माता:सुनील मनचंदा
निर्देशक: आर.बाल्की
संगीत:इल्याराजा
गीत:
1 चीनी कम-श्रेया घोषाल
2 सुनी सुनी -विजय प्रकाश
3 बातें हवा -अमिताभ बच्चन,श्रेया घोषाल
4 जाने दो -श्रेया घोषाल
-योगेन्द्र व्यास
Monday, November 5, 2012
गीत जिन्हे मन गाये (ग्यारहवीं किश्त):दिल से निकलने वाले रस्ते का शुक्रिया....दिल तक पहुंचने वाली डगर को सलाम....
ये बेसबरी उमर कब फ़िसल कर सोलवें बरस में पहुंच जाती है... सोलहवे बरस की दस्तक का एहसास ठीक वैसा ही है जैसे कली का चटकना, भौंरो का गुनगुन करना, शाखो पर कपोले फ़ुटना... और सोलवें बरस में पहुंचने पर प्यार का एहसास तो ऐसा कि कब ओंस की बुंद पत्ते से फ़िसलकर दुब में समा जाए और वो गीले पन का एहसासssss- जब दुब पर हाथ घुमाएं तो महसुस होगा कि कोई यहां प्यार में अभी-अभी तरबतर होकर अपनी मदहोशी का जश्न मना रहा है.......और ऐसे नाजुक समय यदि कोई इस दुब को छिल दे तो- उस सोलह बरस के यौवन का डंक लता की आवाज में ऐसा घुलता है कि- ये तपीश भरी आवाज जहां से भी गुजरती है एक स्तब्धता सा माहौल खींच देती है...."जब वो ये कहती है कि- जिसने हमें मिलाया-जिसने जुदा किया उस वक्त, उस घडी,उस गजर को सलाम..." जिस प्यार के महीन धागे खींच दिए गये हो फ़िर भी वो प्यार जीवन,समाज के प्रति कृतग्यता अर्पित कर भौचक कर दे ऐसे कलम कार आनंद बक्क्षी सा.को सलाम। इन सब के बीच लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी ने पुरे गाने में अपने साजो को भावनाओं के ज्वर में लता जी की करुण तान के साथ बहुत बडा संबल बना कर छोड दिया है....साज क्या बजते है मानो वे अपनी थाप और तानो पर झर-झर आंसु बन कर ऊछल रहे हो.....राग अहीर भैरव में लक्ष्मी-प्यारे का बेजोड संगीत- रूआब,मेंडोलिन,सारंगी,बांसुरी,डोलक, का प्रभावी उपयोग इस गाने को अपने चरम तक लेकर जाता है और सुनने वाले को ये कहता है कि वापिस जाओ अपने उस सोलहवें बरस में जहां तुम कुछ टपकती बुंदो को प्यासा छोड आए थे.केवल 6 मिनिट 35 सेकन्ड के लिए सोलहवां बरस फ़िर अपने जिस्म पर चिपका लिजिए तय है बाहर आने का मन नहीं करेगा....."घुंघट को छोड के जो सर से सरक गयी...ऐसी निगोडी धानी चुनर को सलाम....."
टीप: जब लता जी प्रेम,प्यास,दर्द,उल्लास,उमंग को गाती है तो निश्चय ही नव रसो का अमृत घोल उनकी आत्मा से झर कर कंठ पर बैठी मां शारदे हमें सुर का आचमन करा रही होती है.......
गीत जिन्हे मन गाये (दसवीं किश्त) :सताएगा क्या गम उसे जिन्दगी का.....मोहब्बत में जो हो गया हो किसी का
http://youtu.be/-RF-A6lPK2A
गीतकार के शब्दों का नशा तभी चढता है जब उसके दिल में मोहब्बत का फ़रमेंटेशन इस कदर हो कि गाने वाला खुद नशे में हो जाए और उसकी केवल आवाज के सुरुर में सुनने वाल बेसुध हो जाए....जी हां इस बेहतरीन वाइनेरी के शिल्प कार है-लिजेंड ओ.पी. नैय्यर और काश्मीर की कली (१९६४)का संगीत डल-झील की तरंगो पर ओ.पी.साहब के हस्ताक्षर है.
"है दुनिया उसी की..जमाना उसी का........" यह गाना सच्ची मोहब्बत करने वालो के प्रति एच.एस, बिहारी का प्रतिसंवेदन प्रमाण-पत्र है.जब भी ये गाना रिकार्ड हुआ होगा वहां माइक्रोफ़ोन और रफ़ी साहब की आवाज के बीच मोहब्बत आपनी रुहानियत लिए तीन अंतरो तक अपनी प्यास बुझाती रही होगी.और इस जश्नने मोहब्ब्त में मनोहारी दा ने सेक्साफ़ोन पर अपनी सांसे को इस कदर धक्का दिया मानो बोतल में लगी कार्क पुरे वेग से उछल कर पुरे माहौल की संजीदगी को बयां कर रही हो.ओ.पी. साहब की खासियत है कि वे बहुत कम इंस्ट्रुमेंट का उपयोग करते है. इस गाने में मुख्य रुप से सेक्साफ़ोन,बांगो बीट्स और साइड रिदम मार्कस ने पुरे गाने का तिलस्म रचा है.
यदि गाना गाने की अदायगी है तो सुनने के भी रस्मो रिवाज है इस गाने को बहुत करीने से सुनिए ठीक उसी तरह जिस तरह वाईन सीप को जबान के नीचे रख कर धीरे-धीरे आनंद पुर्वक गले से नीचे ले जाते है......
लूटा जो मुसाफिर, दिल के सफ़र में..........है जन्नत ये दुनियाँ उसकी नजर में....
मजा ले फ़िर कहें....!!!!!!!!!!!!
टीप: मोहब्बत करना स्वाथ्य के लिए हानिकारक है या नही मालुम नहीं लेकिन हां संगीत इसकी दर्दे दवा जरुर है तो संगीत सुनिये और मोहब्बत के एहसास को महसुस किजिए......
गीत जिन्हे मन गाये(नौंवी किश्त):सर्दी में जब पियोगे यारोssss.....
गरम कोट बन जाएगा".....एक नायाब गीत हाथ लगा है, एक आम आदमी जीवन की फ़िलोसाफ़ी को "मधुशाला" पढ कर समझ ही नहीं सकता उसे तो बस देशी भाषा में जिंदगी का वो फ़साना सुनाना जो सीधे दिल में धंस कर ड्बड्बाई आंखो से झुमने पर मजबुर कर दे.....ये गाना एक निपट आम आदमी की मधुशाला है और अमित खन्ना ने महज ६ मिनिट १९ सेकण्ड में पुरी मधुशाला को एक ग्लास में उतार कर फ़िर से जी लेने के लिए झुमा देता है......इस गाने का आडियो जब सुना तो लगा बहुत दम है इस गाने में लेकिन मलाल सिर्फ़ ये है कि इसका पिक्चराइजेशन गाने की आत्मा को नहीं छु सका.
ये राजेश रोशन और किशोर दा के बस में ही है कि उन्होने इस गाने में वो सारे सुख-दुख के रंग डाले है जिन्हे पीकर इंसान सिर्फ़ और सिर्फ़ झुम ही सकता है.....पुरा गाना वायलिन के पुरे हुजुम पर ही तैरता रहता है..., मेंडोलिन के पिसेस जीने
की आस को थामे रहते है.... रिदम सेक्शन और परक्युजन का अदभुत तालमेल पांव की थिरकन को बनाए रखता है-वही ट्र्म्पेट एक सकारात्मक सोच का आगाज करता रहता है.....इन साजों की ये ही तो खासियत है.....किशोर दा के साथ इस गाने की अंतिम बुंद तक आप पुरा मजा ले सकते है......बस...तु पी और जी.....
टीप: ठंड है -तो मौका और दस्तुर दोनो.... केम्फ़ायर कीजिये इस गाने का आडियो लगाइए....झुम जाइए.......(झुमने के लिए मदिरा नहीं....इन फ़िजाओं में ही नशा भरपुर है......)
Film: Desh pardesh 1978
http://ww.smashits.com/des-pardes/tu-pee-aur-jee/song-35173.html
गीत जिन्हे मन गाये:(आठवीं किश्त):......तो प्यार में दिल पर गोली खा लिजिए ना....प्लीज.........
मन बहुत बडबडाता है जब ऊ..ला..ला..गाना बजता है....फ़िर सोचता हुं कि आवारा-गर्दी वाला ऐसा कौन सा गाना जो मेरे समय बजता था.......
और बजता क्या था ...आज भी उसी जोश ओ-शान से हाई-वाट स्पीकर पर आज के गानो को तगडी टक्कर देता है......भागते वक्त में अगर थोडा भी मौका मिले तो हर वो शख्स थोडी मस्ती-चुहलबाजी अवारगर्दी करना चाहता है जो कभी जिंदगी में कहीं बहुत पीछे छुट गयी थी.....पंचम,आशा और किशोर दा के साथ अगर थोडी अवारगी जीना हो तो ये गाना झुमने पर मजबुर करता है......"प्यार में दिल पे मार दे गोली....(महान१९८३)" आप भी कहेंगे कि ये क्या है भाई -अरे जब झंडु बाम,जलेबी बाई,ऊ..ला..ला जैसे गाने कानों पड ही रहे है तो क्यो ना पंचम दा के इस तडके का लुफ़्त लिया जाए जिसमें थुंबा,कांगो,ड्रम बीट आपको छकाते हुए इलेक्ट्रिक गिटार की स्ट्रिंग पर फ़िसलने के लिए छोड देते है.....यदि हेड फ़ोन पर ये गाना सुन रहे है तो रिवाल्वर की गोली एक कान से घुस कर दुसरे से बाहर जाती मालुम पडेगी.....करीब साढे पांच मिनट में स्ट्रिंग और रिदम का अदभुत ताल-मेल आशा-जी और किशोर दा के साथ इस कदर भागता है और " पंचम इन सब पर सवारी किए गाने के अंत में भोले बनते हुए कहेंगे अरे ये क्या मैंने बनाया है...." ये ऐसी ही शैतानी है जो बच्चा अपने पिता से छुप कर करता है. जब ये गाना आप "ध्यान" से सुनेंगे तो लगेगा कि अगर ये गाना वन-शाट में रिकार्ड हुआ होगा तो क्या नजारा होगा,ये वाकई साजिंदो का कमाल है......तो प्यार में दिल पर गोली खा लिजिए ना....प्लीज.........
टीप: ठंड और विकेण्ड का बेहतर स्वाद लेना हो तो अपने पसंदीदा गानो को साथ में रखिए,थोडा स्नेक्स,थर्मस में कोफ़ी डालिये और निकल पडिये अपने किसी चहेते के साथ लांग ड्राईव पर....गानो के साथ सफ़र का रोमांच और रोमांस लंबे समय तक याद रहेगा........(इंदौर-उज्जैन फ़ोर लेन से बेहतर रोमांटिक रोड फ़िलहाल नहीं है....हमारे शहर में)
http://ww.smashits.com/mahaan/pyar-mein-dil-pe-maar-de-goli/song-10916.html
गीत जिन्हे मन गाये (सातवीं किश्त):आशा जी की....जनम यात्रा सुरो में बहती रहे बस......और क्या कहे!!!!!!!!
आशा जी के सुरो की थाह पाना बहुत ही मुश्किल है, उनकी आवाज में जो उर्जा बहती है कई बार उनके साथ गाने वाले स्तब्ध प्राय:हो जाते है अब इस कव्वाली को ही लि्जिए (हम किसी से कम नही १९७७)"है अगर दुश्मन......." इस कव्वाली में स्वयं मो.रफ़ी सा. अवाक से नजर आते है, मध्यम गति के ठेके से मो.रफ़ी इस कव्वाली की शुरुआत करते है जिसमें उन्होने आलाप भी लिये है...लेकिन ज्यो ही आशा जी ५.१० वे सेकण्ड से अपने आलाप और बारीक मुरकियों से प्रवेश लेती है पुरे गाने की रंगत ही बदल जाती है पुरा गाना उर्जा से भर जाता है पुरे माहौल में अजीब सी हलचल मच जाती है ,साजिंदो में एक जोश सा भरा नजर आता है और एक विजयी नाद के साथ आशा जी इस गाने को चरम तक ले जाती है......यदि आप आंख बंद कर यदि आशा जी की आवाज को केन्द्रित कर ये गाना सुन रहे हो तो वाकई ऐसा लगता है मानो स्वयं रफ़ी सा.कह रहे हो "आशा वाकई तुम किसी से कम नहीं".महौल अगर बोझिल हो तो ये गाना सुन भर लें.....फ़िर बतायें....
टीप: पंचम दा के हार्मोनियम के नोट्स शुरु में सुनने काबिल है और कव्वाली में ढोलक की थाप सीधे दिल पर महसुस होती है.
http://youtu.be/AOQKD32BB0Y
गीत जिन्हे मन गाये (छ्ठी किश्त):दिल ने पुकारा तुम्हे........ यादों के परदेस से........"
जब कोई आलाप की कशिश हवाओ पर तैरती हुयी आपके कानो में ये कहे कि सावन आ गया है और ये बुंदे थामे नहीं थम रही अब तो आ जाओं......कि-"दिल ने पुकारा तुम्हे यादों के परदेस से........" गाना खत्म होते-होते सुनने वाले खुद विरह पीडा को अपने अंदर महसुस करने लगे तो ये कमाल उस आवाज का ही होगा जो बरसो बरस हमारे दिल में युं ही बरसती रहेगी.बारिश की द्स्तक है और मन बैचेन अपने मन को इस गीत की फ़ुहरो से त्रप्त कीजिए और खो जाइए ....राग पहाडी में स्वर बध्द पंचम की धुन,लताजी की मिठास और आनंद बक्ख्शीजी की कलम जादुगरी....सितार - संतुर साज का लुभावन तालमेल एवं रुपक ताल का सीधा-सीधा ठेका, आखरी अंतरे में वायलिन का विरह टुकडा इस गीत की मीठास को दुगना कर जाता है....तो लगाइये हेड-फ़ोन आंख बंद कीजिए और डुब जाइए "सावन के झुले पडे.......तुम चले आओ".
टीप:एल.पी. रेकार्ड पर सरसराती निडिल जब प्लेयर डीश को चुमती है और जो आवाज फ़ुटती है सच मानिये एल.पी. रेकार्ड पर गाना सुनना ठीक वैसा ही है जैसे कुल्हड में चाय पीना........"अब वो दिन कहां"........
जुर्माना(१९७९)
Link -http://youtu.be/JCywlvM4Ark
गीत जिन्हे मन गाये (पांचवी किश्त) :गम जहां सोये...... और खुशी जागे
एक बार पुन: -बाल-दिवस पर ये गाना हम सभी बच्चों के लिए...........
कई बार ऐसा होता है कि जिंदगी हमें जहां ले जाना चाहती है...हम उस ओर देखते भी नहीं और इस तरह कुछ कोमल लम्हे एक पत्ते की तरह आपकी राह तकते धीरे से अपनी शाख से टुट कर विदा हो जाते है.यदि कुछ पल आपसे कहे कि आओ 4मिनट.35 से.में चांद की सैर कर आते है तो हर्ज ही क्या है,अपने अति व्यस्त बडप्पन से छोटा समय बचपन के लिए निकाल लेना ये सही मायने में बडप्पन कहलाए शायद.पिछ्ले दिनो बेटी के साथ हास्पिटल में बिताए कुछ लम्हे मुझे उस बचपन तक ले गये जिन्हे बहुत पीछे भुल कर छोड आया था.ये खुबसुरत गाना बच्चो के साथ बच्चा बन कर सुने एक सकुन सा महसुस करेंगे आप.जब लता जी कह रही है कि "आओ तुम्हे चांद पर ले जाए"... तो जाने में कोई हर्ज नहीं है.बप्पी लहरी की कंपोजिशन है लेकिन जाने क्यो पंचम दा की महक आती है और इसी जख्मी (१९७५) फ़िल्म से बप्पी दा को नई पहचान मिली.गौहर कानपुरी के सारे गीत उम्दा है.......लेकिन अभी तो सिर्फ़ ये गाना सुने.
टीप: लता जी को सुनना किसी आशीष से कम नहीं ..कोई बात नहीं गर आप बच्चे नहीं है तो.........
http://ww.smashits.com/zakhmee/aao-tumhen-chand-pe-le-jayen/song-79085.html
गीत जिन्हे मन गाये(चौथी किश्त):इस जिंदगी का शुक्रिया......सदके में उपर वाले.......
मजरुह सा. ने क्या खुब लिखा "ये जिंदगी दर्द भी है,ये जिंदगी है दवा भी.दिल तोडना ही ना जाने ,जाने ये दिल जोडना भी.इस जिंदगी का शुक्रिया......सदके में उपर वाले....
जिंदगी को सकारात्मक नजरिये से देखे तो ये गाना सीधा दिल में उतर जाता है....और पंचम दा ने तो पियानो का तकिया बना कर सिरहाने रख दिया है ऐसा लगता है मानो उगलिया पियानो पर नहीं जहन में दौड रही है,पियानो काड के साथ जब ड्र्म-ब्रास प्लेट(cymber) पर हल्की-हल्की स्टीक की थाप लगती है और फ़िर सधा ड्र्म और कांगो की बीट के साथ किशोर दा गाने का युं आगाज करते है कि-" जीवन के दिन छोटे सही हम भी बडे दिल वाले....कल की हमें फ़ुरसत कहा......" पंचम दा कि खासियत है कि वे रिदमिक परक्युजन का इस्तेमाल बहुत उम्दा तरीके से करते है....इसकी चर्चा आगे की किश्तो में हम करेगे....अभी तो बस आपको कुछ नहीं करना है बस आंखे बंद कर किशोर दा की आवाज का जादु छाने देना है बस.आप सभी ने मुझे जन्म दिन पर आत्मीय संदेश भेजे है मैं सभी के प्रति ह्रदयानव्त कृतज्ञ हुं और आप के लिए मेरी और से ये ईयर ड्राप भेंट......
टीप:किसी भी गाने में रिदमिक परक्युजन का लुत्फ़ लेना हो तो हेड्फ़ोन लगाकर या कम से कम 2000 वाट स्पीकर पर सुने और बस विडियो ना देखे वरना गाने का मजा जाता रहेगा.
(यह गाना लताजी के वर्जन में भी उम्दा बन पडा है.......)
http://youtu.be/GlrKedrn574
गीत जिन्हे मन गाये (तीसरी किश्त):बे-करारी में है करार ....क्या कीजे...
आ गया जो किसी पे प्यार क्या कीजे....प्रथम 9 सेकण्ड में ही आप इस गाने की गिरफ़्त में हो चुके होते हैं ....इसे गायिका और संगीतकार की खुबसुरत साजिश करार दे सकते है.पियानो की काड के साथ ही लताजी का मात्र नौ सेकण्ड का आलाप और फ़िर अंजान के शब्दो का रोमांटिक सफ़र......,जो गीतकार शब्दों के साथ प्रणय करना जानता हो....और शब्दो को लपॆट कर रातो को सोता हो वो ही ये बात कह सकता है -"दिल तो है दिल...दिल का एतबार क्या कीजे"वैसे तो इस गाने का बेस पियानो है लेकिन कल्याण जी-आनंद जी ने इसे कही भी लाउड नहीं होने दिया है-कही कोई कलात्मक पीसेस नहीं है.शायद ऐसा इसलिए कि-जब प्यार का डंक जब पहली बार लगता है तो उसे साफ़ मन से सीधा-सीधा कैसे कहा जाए इसलिए संगीतकार ने पुरा मैदान लता जी के लिए छोड दिया है,मात्र दो अंतरे वाले इस गाने में सारा नवजात प्यार "कीजे" शब्द पर लुटा दिया है और ये ही पुरे गाने की जान है.गाने की हर लाईन पर लता जी को स्ट्रींग मिलती है और बेक ग्राउंड में सधी हुयी रिदम जो गाने की नजाकत और बढा देती है.गाने की ताकत ही वही है जिसमें सुनने वाला अकस्मात फ़िसलकर अपने आप को उसी धारा के हवाले कर दे......गाना खत्म होने के बाद सचमुच में दिल के किसी कोने में कहीं कसक सी महसुस होती है .....क्योsss जी... इसीलिए तो रिवाइंड कर गाना फ़िर से सुन रहे है ना.....सच बताइयेगा.....काश लाइफ़ में भी ऐसा कोई रिवाइंड बटन होता....हम उन लम्हो को फ़िर से जी लेते.....कोई बात नहीं ये गाने है न हमारी जिंदगी में जो उन पलों को सामने ले आते है जिन्हे हमने वक्त की गर्त में कहीं छोड दिया होता है........"बस ना चले रे शाम सवेरे लेके तेरा नाम....."
टीप:गाने की आत्मा में उतरने के लिए विडियो ना देखे तो बेहतर होगा....बस आंखे बंद कर अपनी इमेजेस खुद गडे....ये ही आपका उम्दा छायांकन होगा...... अगले गाने के साथ शीघ्र ही.......
http://youtu.be/b_DYY5zZdvs
गीत जिन्हे मन गाये- 2 :"छुप के जमाने से..... पलको के परदे में घर भर लिया......"
"छुप के जमाने से..... पलको के परदे में घर भर लिया......"
by Yogendra Vyas on Friday, April 29, 2011 at 6:34pm ·
जिंदगी
के काफ़ी नजदीक ये गाना .....गीतकार की कलम से ढुलक कर शब्द .. इल्याराजा
के नोटेशन पर स्पंदित हो कर वायलिन की स्ट्रींग..... फ़िर संतुर पर जम्प
लेते हुए... बांसुरी के अधरो पर....बस लॆट से जाते है......फ़िर सुरेश जी
अपनी रुहानी आवाज से .......निकल पडते है जिंदगी को गले लगाने.......
गुलजार सा. तो ऐसे फ़नकार है कि दो बुंदो में भी किनारा ढुंढ लेते है. किसी भी गाने की रुह उसके शब्दो के साथ उसका संगीत भी होती है....अब बताईये 5 मिनट 20 से. में एक गाने को अपने साजो से जिंदगी की पुरी सैर करा देना कोई मामुली काम तो नहीं......गिटार के नॊट्स पहले अंतरे पर और 3 मि. 10 से. पर सितार का पीस ..............बेकग्राउंड में पानी की सी हिलोरे मारता वायलिन का हुजुम पुरे समय साथ-साथ......संगीत में आनंद की कोई सीमा नहीं........
मात्र दो अंतरे वाले इस गाने में आप जिंदगी के साथ कुलांचे मारते नजर आएंगे.......जब गाना खत्म होगा तो आप यही पाएंगे कि........हमने दो बुंदो से मन भर लिया.......यदि किसी को छोटा-मोटा भी दुख या परेशानी है वो डुब कर इस गाने को सुन भर ले........आप किनारे पर जिंदगी को गले लगाते मिलेंगे........"
(पंचम के बाद इल्याराजा ही ऐसे संगीतकार है जिन्होने वेस्टर्न,जाज को हिन्दुस्तानी फ़ोक के साथ गुंथ कर कई बेजोड संगीत रचनाएं दी है.....और उसी मे से एक बेजोड गाना "सदमा"(१९८१) ऐ जिन्दगी गले लगा ले............)
Link:http://youtu.be/ecmn6i7h7ow
yogendra
गुलजार सा. तो ऐसे फ़नकार है कि दो बुंदो में भी किनारा ढुंढ लेते है. किसी भी गाने की रुह उसके शब्दो के साथ उसका संगीत भी होती है....अब बताईये 5 मिनट 20 से. में एक गाने को अपने साजो से जिंदगी की पुरी सैर करा देना कोई मामुली काम तो नहीं......गिटार के नॊट्स पहले अंतरे पर और 3 मि. 10 से. पर सितार का पीस ..............बेकग्राउंड में पानी की सी हिलोरे मारता वायलिन का हुजुम पुरे समय साथ-साथ......संगीत में आनंद की कोई सीमा नहीं........
मात्र दो अंतरे वाले इस गाने में आप जिंदगी के साथ कुलांचे मारते नजर आएंगे.......जब गाना खत्म होगा तो आप यही पाएंगे कि........हमने दो बुंदो से मन भर लिया.......यदि किसी को छोटा-मोटा भी दुख या परेशानी है वो डुब कर इस गाने को सुन भर ले........आप किनारे पर जिंदगी को गले लगाते मिलेंगे........"
(पंचम के बाद इल्याराजा ही ऐसे संगीतकार है जिन्होने वेस्टर्न,जाज को हिन्दुस्तानी फ़ोक के साथ गुंथ कर कई बेजोड संगीत रचनाएं दी है.....और उसी मे से एक बेजोड गाना "सदमा"(१९८१) ऐ जिन्दगी गले लगा ले............)
Link:http://youtu.be/ecmn6i7h7ow
yogendra
गीत जिन्हे मन गाये 1:जब से तुम्हारे नाम की मिसरी ओंठ लगाई है...........
जब से तुम्हारे नाम की मिसरी ओंठ लगाई है...........
by Yogendra Vyas on Friday, April 22, 2011 at 3:49pm ·
"जब
गुलजार,पंचम और आशा जी एक जगह पर जमा हो जाए तो इनकी सुर धारा को पिये
बिना आप तृप्त नहीं हो सकते.....ऐसा ही एक कमाल २५ साल पहले इनकी एक
कंपोजिशन में हुआ....."रोज-रोज आंखो तले एक ही सपना पले........"तीन अंतरे
वाले इस गाने में पंचम के उम्दा संगत कारो ने अपने हुनर से अजब किस्म का
तन्हा माहौल पैदा किया है.....गुलजार सा. का शब्दो के साथ रोमांस करना और
फ़िर इसे मिठास के साथ आशा जी से सुनना एक अदभुत अनुभव है..........साईड
रिदम मार्कस का पुरे समय गाने पर पहरा और बांसुरी का पुरे समय आशा जी आवाज
का पीछा करना......पंचम दा की ये खासियत है कि वे अंतरे के खाली पन को
सेकण्डस में अपनी धुनॊ का एक पुरा पोर्टेट खिच कर फ़िर से सम पर ले आते
है.......पार्श्व में वायलिन का कारवां और बीच-बीच में आपको गिटार के उम्दा
नोट भी सुनने को मिलेगें,आशा जी के दो अंतरो के बाद अमित कुमार की आवाज को
बडे ही वात्सल्य भाव से आशा जी ने सहारा दिया है चूंकि ये गाना राग पर
आधारित है और ये अमित कुमार का सौभाग्य ही है.........उन्होने इसे अच्छा
निभाया........इतने सालों बाद भी ये गाना तरोताजा लगता है......वैसे तो
आपने कई बार इसे सुना होगा लेकिन संगीत की बारिकियों के साथ सुनने का मजा
ही कुछ और है तो आओ सुने.......रोज....रोज.....(रोज..रोज - सिरिज का अगला
गाना शीघ्र ही...)http://youtu.be/zuImW55jNJUगीत जिन्हे मन गाये:
गीत जिन्हे मन गाये:
Sunday, November 4, 2012
रुपहला सफ़र:हम होंगे कामयाब?:जाने भी दो यारो
आज भी देश के नैतिक हाला्तो पर स्तब्धता बरकरार है,बिते सालो से अब तक कुछ नहींबदला।नौकरशाही,राजनिति,व्ययसायी,मिडिया गठजोड ने लोकतंत्र के स्तंभॊ का एक दुसरा प्रतिरुप तैयार कर लिया है।उन्नत्तीस साल पहले निर्देशक कुंदन शाह ने "जाने भी दो यारो" फ़िल्म का निर्माण किया और आज जब अखबार उठा कर देखते है तो ये फ़िल्म उतनी ही प्रासंगिक लगती है।पुरी तरह हास्य-बोध से सारोबार ये फ़िल्म एक बार पुन: रिलिज की गयी है इसका कारण ही ये है कि भले हास्य रुप में ही सही लेकिन हमारी व्यवस्थाओं पर बहुत तीखा कटाक्ष है।
फ़िल्म का मजमुन कुछ युं है कि विनोद चॊपडा(नासिर उद्दीन शाह) और सुधीर मिश्रा (रवि वासवनी) बेरोजगार युवक है और अपनी एक फ़ोटो ग्राफ़ी की शाप खोलते है लेकिन एक षडयंत्र का शिकार हो जाते है।फ़िल्म में खबरदार पत्रिका की एडिटर शोभा सेन (भक्ति बर्वे), दो प्रतिद्वंदी बिल्डर तनेजा(पंकज कपुर) और आहुजा(ओम पुरी), म्युनिसिपल कमिश्नर डी’मेलो(सतीश शाह) और श्रीवास्तव(दीपक काजिर) के गठजोड की हास्य में लिपटी हुयी कहानी है जो आज के चरित्र को जीवंत करती है। तनेजा के हाथो डी’मेलो की हत्या हो जाती है और ये दृश्य एक गार्डन में उनकी फ़ोटो ग्राफ़ी में कैद हो जाता है।इस दृश्य के माध्यम से कुंदन शाह ने फ़िल्म ब्लो अप(1966) के निर्देशक माइकल ऐटॊंनियोन को अपनी आदरांजली दी है जिसमें ऐटॊंनियोन गार्डन में बंदर के खेल के दौरान हत्या का दृश्य एक कांच में फ़्लेश हो जाता है।
किसी को जिवित व्यक्ति का रोल करते तो हमने कई बार देखा है लेकिन सतीश शाह ने एक लाश का रोल बहुत ही दमदार तरीके निभाते हुए गुदगुदाया है।कई जगह तंज बात डायलाग के माध्यम से कही गयी है जब पत्रकार तनेजा से पुछता है आप उंची बिल्डिंग बनाते जा रहे है और आम आदमी उतना निचे धंसता जा रहा है"।
ओम पुरी संघर्ष के उन दिनो को याद करते हुए कहते है कि शुटिंग के दौरान हमें नीचे फ़र्श ही सो जाना पडता था और खाने में केवल लौकी की सब्जी और दाल मिलती थी,चाय का कहो तो कंट्रोलर की तेज आवाज आती थी अरे..एक घंटे पहले ही तो पी थी। ये फ़िल्म कुल सात लाख के बजट में एन.एफ़.डी.सी. के बैनर तले तैयार हुयी थी।एक लाश को लेकर की गयी भागा दौडी में ये सारे पात्र एक महाभारत पर हो रहे मंचन में पहुंच जाते है और बस हास्य का फ़व्वारा सतत बह निकलता है।बाहरी पात्रो का मंच के किरदारॊ में घुस जाना धुर्योधन द्वारा चीरहरण से मना कर देना बस आप सबको लोटपोट कर देने के लिए काफ़ी है।लेकिन इसी बीच धृतराष्ट्र के पात्र को देखकर अनायास हमारे आज के राजकाजी चरित्र की याद आ जाती है जो सिर्फ़ ये कहता है "ये क्या हो रहा है" पर करता कुछ नहीं।कुल मिला कर कुंदन शाह के निर्देशन में सभी कलालारो ने वो रसोई बनाई है जिसकी खुशबु फ़िर से मल्टीफ़्लेक्स थियेटर में जीवंत हो रही है।इस फ़िल्म में विधुविनोद चोपडा ने दुशासन का रोल किया है और सबसे ज्यादा हंसाया भी उन्होने ही है।अंत में बुराई की जीत होती है और न्याय की मौत।विनोद और सुधीर पर सारा दोष मढ दिया जाता है लेकिन ये नौजवान फ़िर भी गाते है हम होंगे कामयाब एक दिन..।काश कि ऐसा दिन आए कि हमें ये गाना पडे "हम हो गए कामयाब"।
विशेष:नासिरउद्दीन शाह को इस फ़िल्म के लिए केवल 15000 रुपये मिले और उन्हे साथ में शुटिंग के लिए खुद का कैमेरा भी लाना होता था लेकिन शुटिंग के दौरान वो भी चोरी हो गया।
फ़िल्म: जाने भी दो यारों
वर्ष: 12 अगस्त 1984
निर्माता:नेशनल फ़िल्म डेव्हलपमेंट कार्पोरेशन
निर्देशक: कुंदन शाह
संगीत:वनराज भाटिया
स्टोरी एवं स्क्रिन प्ले:कुंदन शाह,सुधीर मिश्रा
डायलाग: सतीश कौशिक,रणजीत कपुर
अवार्ड:
1984 इंदिरा गांधी अवार्ड-बेस्ट फ़िल्म डायरेक्टर -कुंदन शाह
1984: फ़िल्म फ़ेयर बेस्ट कामेडियन-रवि बासवानी
-योगेन्द्र व्यास
आज भी देश के नैतिक हाला्तो पर स्तब्धता बरकरार है,बिते सालो से अब तक कुछ नहींबदला।नौकरशाही,राजनिति,व्ययसायी,मिडिया गठजोड ने लोकतंत्र के स्तंभॊ का एक दुसरा प्रतिरुप तैयार कर लिया है।उन्नत्तीस साल पहले निर्देशक कुंदन शाह ने "जाने भी दो यारो" फ़िल्म का निर्माण किया और आज जब अखबार उठा कर देखते है तो ये फ़िल्म उतनी ही प्रासंगिक लगती है।पुरी तरह हास्य-बोध से सारोबार ये फ़िल्म एक बार पुन: रिलिज की गयी है इसका कारण ही ये है कि भले हास्य रुप में ही सही लेकिन हमारी व्यवस्थाओं पर बहुत तीखा कटाक्ष है।
फ़िल्म का मजमुन कुछ युं है कि विनोद चॊपडा(नासिर उद्दीन शाह) और सुधीर मिश्रा (रवि वासवनी) बेरोजगार युवक है और अपनी एक फ़ोटो ग्राफ़ी की शाप खोलते है लेकिन एक षडयंत्र का शिकार हो जाते है।फ़िल्म में खबरदार पत्रिका की एडिटर शोभा सेन (भक्ति बर्वे), दो प्रतिद्वंदी बिल्डर तनेजा(पंकज कपुर) और आहुजा(ओम पुरी), म्युनिसिपल कमिश्नर डी’मेलो(सतीश शाह) और श्रीवास्तव(दीपक काजिर) के गठजोड की हास्य में लिपटी हुयी कहानी है जो आज के चरित्र को जीवंत करती है। तनेजा के हाथो डी’मेलो की हत्या हो जाती है और ये दृश्य एक गार्डन में उनकी फ़ोटो ग्राफ़ी में कैद हो जाता है।इस दृश्य के माध्यम से कुंदन शाह ने फ़िल्म ब्लो अप(1966) के निर्देशक माइकल ऐटॊंनियोन को अपनी आदरांजली दी है जिसमें ऐटॊंनियोन गार्डन में बंदर के खेल के दौरान हत्या का दृश्य एक कांच में फ़्लेश हो जाता है।
किसी को जिवित व्यक्ति का रोल करते तो हमने कई बार देखा है लेकिन सतीश शाह ने एक लाश का रोल बहुत ही दमदार तरीके निभाते हुए गुदगुदाया है।कई जगह तंज बात डायलाग के माध्यम से कही गयी है जब पत्रकार तनेजा से पुछता है आप उंची बिल्डिंग बनाते जा रहे है और आम आदमी उतना निचे धंसता जा रहा है"।
ओम पुरी संघर्ष के उन दिनो को याद करते हुए कहते है कि शुटिंग के दौरान हमें नीचे फ़र्श ही सो जाना पडता था और खाने में केवल लौकी की सब्जी और दाल मिलती थी,चाय का कहो तो कंट्रोलर की तेज आवाज आती थी अरे..एक घंटे पहले ही तो पी थी। ये फ़िल्म कुल सात लाख के बजट में एन.एफ़.डी.सी. के बैनर तले तैयार हुयी थी।एक लाश को लेकर की गयी भागा दौडी में ये सारे पात्र एक महाभारत पर हो रहे मंचन में पहुंच जाते है और बस हास्य का फ़व्वारा सतत बह निकलता है।बाहरी पात्रो का मंच के किरदारॊ में घुस जाना धुर्योधन द्वारा चीरहरण से मना कर देना बस आप सबको लोटपोट कर देने के लिए काफ़ी है।लेकिन इसी बीच धृतराष्ट्र के पात्र को देखकर अनायास हमारे आज के राजकाजी चरित्र की याद आ जाती है जो सिर्फ़ ये कहता है "ये क्या हो रहा है" पर करता कुछ नहीं।कुल मिला कर कुंदन शाह के निर्देशन में सभी कलालारो ने वो रसोई बनाई है जिसकी खुशबु फ़िर से मल्टीफ़्लेक्स थियेटर में जीवंत हो रही है।इस फ़िल्म में विधुविनोद चोपडा ने दुशासन का रोल किया है और सबसे ज्यादा हंसाया भी उन्होने ही है।अंत में बुराई की जीत होती है और न्याय की मौत।विनोद और सुधीर पर सारा दोष मढ दिया जाता है लेकिन ये नौजवान फ़िर भी गाते है हम होंगे कामयाब एक दिन..।काश कि ऐसा दिन आए कि हमें ये गाना पडे "हम हो गए कामयाब"।
विशेष:नासिरउद्दीन शाह को इस फ़िल्म के लिए केवल 15000 रुपये मिले और उन्हे साथ में शुटिंग के लिए खुद का कैमेरा भी लाना होता था लेकिन शुटिंग के दौरान वो भी चोरी हो गया।
फ़िल्म: जाने भी दो यारों
वर्ष: 12 अगस्त 1984
निर्माता:नेशनल फ़िल्म डेव्हलपमेंट कार्पोरेशन
निर्देशक: कुंदन शाह
संगीत:वनराज भाटिया
स्टोरी एवं स्क्रिन प्ले:कुंदन शाह,सुधीर मिश्रा
डायलाग: सतीश कौशिक,रणजीत कपुर
अवार्ड:
1984 इंदिरा गांधी अवार्ड-बेस्ट फ़िल्म डायरेक्टर -कुंदन शाह
1984: फ़िल्म फ़ेयर बेस्ट कामेडियन-रवि बासवानी
-योगेन्द्र व्यास
Sunday, October 28, 2012
Sunday, October 21, 2012
रुपहला सफ़र: "सफ़ल होगी तेरी अराधना"
"सफ़ल होगी तेरी अराधना"
सफ़ल होगी तेरी.....आराधना
"दिया टुटे तो है माटी जले तो ये ज्योति बने,आंसु बहे तो है पानी,रुके तो ये मोती बने,ये मोटी आंखो की पुंजी है ये ना खोए...काहे को रोए...."
जिंदगी को ये नहीं मालुम की सुख क्या है और दु:ख क्या है ये तो इन आंखो का तर्जुबा है कि गम और खुशी की इबारत आंसुओं में घोलकर गालों पर लुढ्का देती है.सचिन देव बर्मन की खासियत ही ये है कि वे पात्रों के दुख में एक बडे बुजुर्ग वार की भुमिका निभाने के लिए तैयार हो जाते है और अपनी गहरी आवाज से वो संबल देते है कि सुनने वाला भी निराशा के बादलो से राहत महसुस करता है।
आपको याद होगा फ़िल्म गाईड में भी सचिन देव बर्मन हताश निराश राजु गाईड को अपनी आवाज से पार ले जाते है "वहां कौन है तेरा मुसाफ़िर....".
शक्ति सामंत का मुख्य ब्रांड है रोमांटिक म्युजिकल हिट फ़िल्म और "आराधना" इस माइने में भी खास है कि इस फ़िल्म से राजेश खन्ना को सुपर स्टार का खिताब मिलने की सुगबुगाहट तेज हुयी,किशोर कुमार के स्वर्णिम भविष्य की पौ फ़टी और बर्मन घराने की फ़ेहरिस्त में एक और उम्दा संगीत का खिताब जुड गया।
अपने पुरे यौवन से दार्जिलिंग की वादियों में भागती टाय ट्रेन और हार्मोनिका का प्रिल्युड किशोर दा की आवाज को उकसाता हुआ"मेरे सपनो की रानी कब आएगी तु..." गुंजता है, और एकार्डियन,गिटार के रोमांटिक लोकोमेटिव इफ़ेक्ट के साथ जब अरुण(राजेशखन्ना) अपनी अदाओं से ट्रेन में बैठी हुयी वंदना(शर्मीला टैगोर) के दिल पर दस्तक देते हुए आने वाले प्यार के लम्हो की एक लम्बी पटरी बिछाते हुए साथ साथ गाते चलते है जिसे शायद उम्र के लम्बे फ़ासलो को तय करते जाना था।इसी गाने में बर्मन दा ने गिटारिस्ट के ठीक से नोट ना लगा पाने की वजह से इस गाने की रिकार्डिंग केंसल कर दी थी जबकि युनिट को शुटिंग के लिए दार्जिलिंग निकलना थ|पंचम ने नजाकत को भांपते हुए भानु गुप्ता के साथ एस.डी. के नोट पर तुरंत धुन तैयार की जिसका इफ़ेक्ट आज भी मधुर एहसास देता है।वंदना और एयरफ़ोर्स आफ़िसर अरुण की नजदीकियां परवान चढती है और यहां एस.डी. फ़िर एक धुन वादियो में बिखरा देते है-"कोरा कागज था मन मेरा"।पहले शक्ति सामंत को इस की धुन बिल्कुल पसंद नहीं थी लेकिन जब केरसी लार्ड ने इकोलेट मशीन से इको इफ़ेक्ट दिया तब वे संतुष्ट हुए।इधर तेज बारिश में वंदना-अरुण की टकराती हुयी सांसे आने वाले कल का पता दे रही थी।जलती आग को हवा देता एकार्डियन का जेस्चर पीस जैसे ही उठता है सेक्साफ़ोन उसी शिद्दत के साथ उसकी धुन से लिपट जाता है और किशोर को कहना पडता है-"रुप तेरा मस्ताना....." सच मानिए दो वाद्यो को रोमांस करते सुनना दिल धडकनों को थामना मुश्किल कर देता है।अरुण वंदना का दैहिक भाषा में बात करना वो भी उस वक्त जब ये सामाजिक मर्यादाओं के अनुरुप नहीं था लेकिन निर्देशक ने इसे फ़िल्माने का निश्चय किया और भारतीय सिनेमा में ये पहला प्रयोग था जिसमें कैमेरा को लगातार घुमाते हुए सिंगल शाट में ये गाना फ़िल्मांकन किया था और इस गाने को एफ़टीआईआई में स्टडी मटेरियल के तौर पर आज भी पढाया जाता है।ये ही नहीं किशोर कुमार को पहला फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड इसी गाने पर मिला।अरुण की अचानक मौत और वदंना की देह में पलता बच्चा,समाज के नियम में बंधी वंदना अपना बच्चा पास होते भी उसे अपना नहीं कह सकती,एक घटना में बच्चे की खतिर 14 साल की जेल और फ़िर 22 साल के हुबहु एयर फ़ोर्स पायलेट सुरज(राजेश खन्ना) खुद के बेटे के रुप में मुलाकात। एक पत्नि- मां, के त्याग,धैर्य,और नियति की कहानी अपने बॆटॆ से सुखद मिलन के रुप में समाप्त होती है और फ़िर आंखो का तर्जुबा कि खुशी के आंसु बह निकलते है। कहानी तो फ़िल्म में देखी जा सकती है लेकिन क्या ये मजेदार बात नहीं कि "रुप तेरा मस्ताना" का तिलस्म मनोहारी सिंग और केरसी लार्ड ने रचा था और चार घंटे में रिकार्डिंग कर वो धुन दे गए कि आज भी मन बिना बारिश के झुम उठता है।क्या ये मजेदार नहीं कि पंचम ने किशोर दा को "रुप तेरा मस्ताना" की धुन में तब्दीली के लिए बर्मन दादा से बात करने के लिए कहा था। क्या ये मजेदार बात नहीं कि सुभाष घई ने इस फ़िल्म में प्रकाश नाम का एक छोटा सा किरदार किया और आज शो मेन सुभाष घई को देखना अदभुत है।क्या ये मजेदार बात नहीं कि शक्तिसामंत ने संगीत देने के लिए पहले शंकर-जयकिशन से संपर्क किया था लेकिन आराधना तो एस.डी.की ही थी ना।वाकई एक सफ़ल फ़िल्म बनाना भी किसी आराधना से कम नहीं।
विशेष: आराधना फ़िल्म मुल रुप से हालीवुड फ़िल्म "टु इच हिज ओन"(1946) से प्रेरित है और दोनो ही फ़िल्म में अभिनेत्री को बेस्ट अवार्ड प्राप्त हुआ।
फ़िल्म: आराधना
वर्ष: 7 नवंबर, 1969
निर्माता:शक्तिसामंत
निर्देशक: शक्ति सामंत
लेखक: सचिन भौमिक
संगीत: एस.डी.बर्मन
गीतकार: आनंद बख्शी
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड-
बेस्ट फ़िल्म अवार्ड-शक्ति सामंत
बेस्ट नायिका अवार्ड-शर्मिला टैगोर
बेस्ट मेल प्ले बेक सिंगर-किशोर कुमार"रुप तेरा मस्ताना"
गीत:
"रुप तेरा मस्ताना" किशोर कुमार
"बागों में बहार है" मो.रफ़ी, लता मंगेशकर
"चंदा है तु मेरा सुरज है तु" लता मंगेशकर
"मेरे सपनों की रानी" किशोर कुमार
"गुनगुना रहे है भंवरे" मो.रफ़ी, आशा भॊंसले
"कोरा कगज था ये मन मेरा" लता मंगेशकर, किशोर कुमार
"सफ़ल होगी तेरी अराधना" एस.डी.बर्मन
-योगेन्द्र व्यास
सफ़ल होगी तेरी.....आराधना
"दिया टुटे तो है माटी जले तो ये ज्योति बने,आंसु बहे तो है पानी,रुके तो ये मोती बने,ये मोटी आंखो की पुंजी है ये ना खोए...काहे को रोए...."
जिंदगी को ये नहीं मालुम की सुख क्या है और दु:ख क्या है ये तो इन आंखो का तर्जुबा है कि गम और खुशी की इबारत आंसुओं में घोलकर गालों पर लुढ्का देती है.सचिन देव बर्मन की खासियत ही ये है कि वे पात्रों के दुख में एक बडे बुजुर्ग वार की भुमिका निभाने के लिए तैयार हो जाते है और अपनी गहरी आवाज से वो संबल देते है कि सुनने वाला भी निराशा के बादलो से राहत महसुस करता है।
आपको याद होगा फ़िल्म गाईड में भी सचिन देव बर्मन हताश निराश राजु गाईड को अपनी आवाज से पार ले जाते है "वहां कौन है तेरा मुसाफ़िर....".
शक्ति सामंत का मुख्य ब्रांड है रोमांटिक म्युजिकल हिट फ़िल्म और "आराधना" इस माइने में भी खास है कि इस फ़िल्म से राजेश खन्ना को सुपर स्टार का खिताब मिलने की सुगबुगाहट तेज हुयी,किशोर कुमार के स्वर्णिम भविष्य की पौ फ़टी और बर्मन घराने की फ़ेहरिस्त में एक और उम्दा संगीत का खिताब जुड गया।
अपने पुरे यौवन से दार्जिलिंग की वादियों में भागती टाय ट्रेन और हार्मोनिका का प्रिल्युड किशोर दा की आवाज को उकसाता हुआ"मेरे सपनो की रानी कब आएगी तु..." गुंजता है, और एकार्डियन,गिटार के रोमांटिक लोकोमेटिव इफ़ेक्ट के साथ जब अरुण(राजेशखन्ना) अपनी अदाओं से ट्रेन में बैठी हुयी वंदना(शर्मीला टैगोर) के दिल पर दस्तक देते हुए आने वाले प्यार के लम्हो की एक लम्बी पटरी बिछाते हुए साथ साथ गाते चलते है जिसे शायद उम्र के लम्बे फ़ासलो को तय करते जाना था।इसी गाने में बर्मन दा ने गिटारिस्ट के ठीक से नोट ना लगा पाने की वजह से इस गाने की रिकार्डिंग केंसल कर दी थी जबकि युनिट को शुटिंग के लिए दार्जिलिंग निकलना थ|पंचम ने नजाकत को भांपते हुए भानु गुप्ता के साथ एस.डी. के नोट पर तुरंत धुन तैयार की जिसका इफ़ेक्ट आज भी मधुर एहसास देता है।वंदना और एयरफ़ोर्स आफ़िसर अरुण की नजदीकियां परवान चढती है और यहां एस.डी. फ़िर एक धुन वादियो में बिखरा देते है-"कोरा कागज था मन मेरा"।पहले शक्ति सामंत को इस की धुन बिल्कुल पसंद नहीं थी लेकिन जब केरसी लार्ड ने इकोलेट मशीन से इको इफ़ेक्ट दिया तब वे संतुष्ट हुए।इधर तेज बारिश में वंदना-अरुण की टकराती हुयी सांसे आने वाले कल का पता दे रही थी।जलती आग को हवा देता एकार्डियन का जेस्चर पीस जैसे ही उठता है सेक्साफ़ोन उसी शिद्दत के साथ उसकी धुन से लिपट जाता है और किशोर को कहना पडता है-"रुप तेरा मस्ताना....." सच मानिए दो वाद्यो को रोमांस करते सुनना दिल धडकनों को थामना मुश्किल कर देता है।अरुण वंदना का दैहिक भाषा में बात करना वो भी उस वक्त जब ये सामाजिक मर्यादाओं के अनुरुप नहीं था लेकिन निर्देशक ने इसे फ़िल्माने का निश्चय किया और भारतीय सिनेमा में ये पहला प्रयोग था जिसमें कैमेरा को लगातार घुमाते हुए सिंगल शाट में ये गाना फ़िल्मांकन किया था और इस गाने को एफ़टीआईआई में स्टडी मटेरियल के तौर पर आज भी पढाया जाता है।ये ही नहीं किशोर कुमार को पहला फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड इसी गाने पर मिला।अरुण की अचानक मौत और वदंना की देह में पलता बच्चा,समाज के नियम में बंधी वंदना अपना बच्चा पास होते भी उसे अपना नहीं कह सकती,एक घटना में बच्चे की खतिर 14 साल की जेल और फ़िर 22 साल के हुबहु एयर फ़ोर्स पायलेट सुरज(राजेश खन्ना) खुद के बेटे के रुप में मुलाकात। एक पत्नि- मां, के त्याग,धैर्य,और नियति की कहानी अपने बॆटॆ से सुखद मिलन के रुप में समाप्त होती है और फ़िर आंखो का तर्जुबा कि खुशी के आंसु बह निकलते है। कहानी तो फ़िल्म में देखी जा सकती है लेकिन क्या ये मजेदार बात नहीं कि "रुप तेरा मस्ताना" का तिलस्म मनोहारी सिंग और केरसी लार्ड ने रचा था और चार घंटे में रिकार्डिंग कर वो धुन दे गए कि आज भी मन बिना बारिश के झुम उठता है।क्या ये मजेदार नहीं कि पंचम ने किशोर दा को "रुप तेरा मस्ताना" की धुन में तब्दीली के लिए बर्मन दादा से बात करने के लिए कहा था। क्या ये मजेदार बात नहीं कि सुभाष घई ने इस फ़िल्म में प्रकाश नाम का एक छोटा सा किरदार किया और आज शो मेन सुभाष घई को देखना अदभुत है।क्या ये मजेदार बात नहीं कि शक्तिसामंत ने संगीत देने के लिए पहले शंकर-जयकिशन से संपर्क किया था लेकिन आराधना तो एस.डी.की ही थी ना।वाकई एक सफ़ल फ़िल्म बनाना भी किसी आराधना से कम नहीं।
विशेष: आराधना फ़िल्म मुल रुप से हालीवुड फ़िल्म "टु इच हिज ओन"(1946) से प्रेरित है और दोनो ही फ़िल्म में अभिनेत्री को बेस्ट अवार्ड प्राप्त हुआ।
फ़िल्म: आराधना
वर्ष: 7 नवंबर, 1969
निर्माता:शक्तिसामंत
निर्देशक: शक्ति सामंत
लेखक: सचिन भौमिक
संगीत: एस.डी.बर्मन
गीतकार: आनंद बख्शी
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड-
बेस्ट फ़िल्म अवार्ड-शक्ति सामंत
बेस्ट नायिका अवार्ड-शर्मिला टैगोर
बेस्ट मेल प्ले बेक सिंगर-किशोर कुमार"रुप तेरा मस्ताना"
गीत:
"रुप तेरा मस्ताना" किशोर कुमार
"बागों में बहार है" मो.रफ़ी, लता मंगेशकर
"चंदा है तु मेरा सुरज है तु" लता मंगेशकर
"मेरे सपनों की रानी" किशोर कुमार
"गुनगुना रहे है भंवरे" मो.रफ़ी, आशा भॊंसले
"कोरा कगज था ये मन मेरा" लता मंगेशकर, किशोर कुमार
"सफ़ल होगी तेरी अराधना" एस.डी.बर्मन
-योगेन्द्र व्यास
Saturday, October 13, 2012
रुपहला सफ़र:अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यो आता है...
अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है.....
तुम आसमां पर बैठे हो तो सिर्फ़ इसलिए कि हम इस जमीं पर जड़ो तक धंसे है। ये मध्यमवर्गीय परिवार की एक अंदरुनी दास्तान है जो रोजाना जिंदगी के थपेड़ो से अपनी जड़ो में कंपन महसुस करती है।ये उनका आत्मबल ही है जो उन्हे उस मध्यम मार्ग में थामें रखता है।सईद मिर्जा ऐसे ही फ़िल्मकार है जिन्होने मध्यम वर्ग को अपनी फ़िल्मों में मुख्य किरदार की भुमिका दी और ये किरदार उनकी फ़िल्म में अपने आप बोलता है उसे कोई डायलाग कोई स्क्रिप्ट नहीं दी जाती बस जैसे-जैसे उसकी जिंदगी चलती है कैमेरा खुद-ब-खुद चल पड़ता है।
अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यो आता है.. दरअसल ये फ़िल्म ना हो कर सईद मिर्जा की नोट बुक के वे पन्ने है-जिसमें हर पात्र का एक पन्ना है और वो पात्र वैसा ही है जैसा आमतौर पर है।कोई पात्र हीरो नहीं ,किसी भी पात्र को वजनी डॉयलाग नहीं, कोई मेलोड्रामा नहीं बस एक मध्यमवर्गीय परिवार की एक तस्वीर जो देखी भाली सी लगती है। मि.पिंटो(अरविंद देशपांडे) एक मिल वर्कर है और वे अपने हक के लिए युनियन के साथ ह्डताल पर है उनका बेटा अल्बर्ट पिंटो (नासिरउद्दीन शाह) जो मोटर मैकेनिक है, इस हड़ताल को गैर जायज कहता है.अल्बर्ट अपनी धुन में और गलतफ़हमी में जीने वाला इंसान है लेकिन अपने परिवार को भी उसी शिद्दत से चाहता है।मोटर गैराज के कस्टमर उसे अपने दोस्त लगते है उसे लगता है उच्चवर्ग के लोग उसकी बात को महत्व देते है।स्टैला डिकोस्टा (शबाना आजमी) उसकी नजदीकी दोस्त है लेकिन अल्बर्ट ज्यादा पजेसिव होने से दोनो की खटपट चलती है।ये सब एक आम जिंदगी में होने वाले छोटे-छोटे वाकये है जो बडी ही संजीदगी से चलते है ऐसा लगता है जैसे हमारे किसी पड़ोसी के यहां ये सब चल रहा है और हम एक पड़ोसी होने के नाते साथ साथ चल रहे है।जुआन पिंटो (स्मिता पाटिल) अल्बर्ट की बहन जो कि सेल्स गर्ल है तथा एक पांव से असामान्य है लेकिन उसे आए दिन पुरुष ग्राहको से उनके अनुचित व्यवहार का सामना करना पडता है और वो उसका दृढता से सामना करती भी है।इसमे शबाना आजमी और स्मिता पाटिल के किरदार को बहुत ही सशक्त और मजबुत बनाकर पेश किया गया है। किरदारो के लिहाज से इसमें सारे कलाकार थियेटर,एनएसडी,एनएफ़टीटीआई के जानेमाने कलाकार है लेकिन बात वही कि सईद मिर्जा अपने किरदार का उपयोग उन रंगो की तरह करते है जो उनके कैनवास में भले कम मात्रा में उपयोग हो लेकिन उनका एक स्ट्रोक पुरी तस्वीर में जान फ़ुंक देता है।सईद मिर्जा ने मध्यमवर्गीय परिवार पर केन्द्रित और भी कई फ़िल्मे बनाई मसलन मोहनजोशी हाजिर हो,सलीम लंगडे पर मत रो और नसीम साथ ही प्रसिद्ध टीवी सिरियल नुक्कड नाटक और इंतजार का निर्देशन भी किया।
डोमिनिक पिंटो(दिलीप धवन) अल्बर्ट का भाई जो बिना कुछ किए जिंदगी में पाना चाहता है और चोरी के आरोप में जेल चला जाता है और मध्यमवर्गीय़ परिवार की चिंता ग्रस्त मां मिसेस पिंटॊ(सुलभादेश पांडॆ) अपने बेटे और पति की चिंता में हमेशा चर्च की शरण में रहती है।स्टैला डिकोस्टा के भाई एवं पिता को अपने देश को कोसते दिखाया गया जो कि विदेश में बसने की इच्छा रखते है। मि.पिंटॊ को हड़ताल के दौरान गुंडो से पिटाई का सामना करना पडता है तब वो अपने परिवार में कहता है क्या एक मजदुर का कोई आत्म सम्मान नहीं क्या उसे व उसके परिवार को एक बेहतर जिंदगी जिने का हक नहीं,अल्बर्ट अपनी आत्म मुग्धता से बाहर आता है,दुसरे मजदुरो की दयनीय हालातो से परिचित होता है....ये फ़िल्म आपको कोई मनोरंजन नहीं देती लेकिन बस उस मसकती जिंदगी की तस्वीर दिखाती है,जो इन बिते सालो में और ज्यादा बिगडे रुप में आज हमारे सामने है।
सईद मिर्जा सिर्फ़ सोई हुयी जनता की आत्मा पर दस्तक देते हुए निकल जाते है।आज भी स्थितियां नहीं बदली सामाजिक और आर्थिक असमानता के नए नए रह्स्यो से रोज परदे उठ रहे है लेकिन ना जाने क्यो इन व्यवस्थाओं के खिलाफ़ अल्बर्ट पिंटो,रहमत अली,बलविंदर सिंग और रामनारायण को गुस्सा ही नहीं आता........
विशेष: ये सईद मिर्जा वही है जिनके पिता अख्तर मिर्जा ने फ़िल्म वक्त(1965) में बतौर लेखक के फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड जीता था।
फ़िल्म: अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यो आता है.....
वर्ष: 1980
निर्माता,निर्देशक,लेखक :सईद अख्तर मिर्जा
संगीत:मानस मुखर्जी,भास्कर चंदावरकर
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड(1981):
बेस्ट फ़िल्म क्रिटिक अवार्ड-सईद अख्तर मिर्जा
-योगेन्द्र व्यास
अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है.....
तुम आसमां पर बैठे हो तो सिर्फ़ इसलिए कि हम इस जमीं पर जड़ो तक धंसे है। ये मध्यमवर्गीय परिवार की एक अंदरुनी दास्तान है जो रोजाना जिंदगी के थपेड़ो से अपनी जड़ो में कंपन महसुस करती है।ये उनका आत्मबल ही है जो उन्हे उस मध्यम मार्ग में थामें रखता है।सईद मिर्जा ऐसे ही फ़िल्मकार है जिन्होने मध्यम वर्ग को अपनी फ़िल्मों में मुख्य किरदार की भुमिका दी और ये किरदार उनकी फ़िल्म में अपने आप बोलता है उसे कोई डायलाग कोई स्क्रिप्ट नहीं दी जाती बस जैसे-जैसे उसकी जिंदगी चलती है कैमेरा खुद-ब-खुद चल पड़ता है।
अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यो आता है.. दरअसल ये फ़िल्म ना हो कर सईद मिर्जा की नोट बुक के वे पन्ने है-जिसमें हर पात्र का एक पन्ना है और वो पात्र वैसा ही है जैसा आमतौर पर है।कोई पात्र हीरो नहीं ,किसी भी पात्र को वजनी डॉयलाग नहीं, कोई मेलोड्रामा नहीं बस एक मध्यमवर्गीय परिवार की एक तस्वीर जो देखी भाली सी लगती है। मि.पिंटो(अरविंद देशपांडे) एक मिल वर्कर है और वे अपने हक के लिए युनियन के साथ ह्डताल पर है उनका बेटा अल्बर्ट पिंटो (नासिरउद्दीन शाह) जो मोटर मैकेनिक है, इस हड़ताल को गैर जायज कहता है.अल्बर्ट अपनी धुन में और गलतफ़हमी में जीने वाला इंसान है लेकिन अपने परिवार को भी उसी शिद्दत से चाहता है।मोटर गैराज के कस्टमर उसे अपने दोस्त लगते है उसे लगता है उच्चवर्ग के लोग उसकी बात को महत्व देते है।स्टैला डिकोस्टा (शबाना आजमी) उसकी नजदीकी दोस्त है लेकिन अल्बर्ट ज्यादा पजेसिव होने से दोनो की खटपट चलती है।ये सब एक आम जिंदगी में होने वाले छोटे-छोटे वाकये है जो बडी ही संजीदगी से चलते है ऐसा लगता है जैसे हमारे किसी पड़ोसी के यहां ये सब चल रहा है और हम एक पड़ोसी होने के नाते साथ साथ चल रहे है।जुआन पिंटो (स्मिता पाटिल) अल्बर्ट की बहन जो कि सेल्स गर्ल है तथा एक पांव से असामान्य है लेकिन उसे आए दिन पुरुष ग्राहको से उनके अनुचित व्यवहार का सामना करना पडता है और वो उसका दृढता से सामना करती भी है।इसमे शबाना आजमी और स्मिता पाटिल के किरदार को बहुत ही सशक्त और मजबुत बनाकर पेश किया गया है। किरदारो के लिहाज से इसमें सारे कलाकार थियेटर,एनएसडी,एनएफ़टीटीआई के जानेमाने कलाकार है लेकिन बात वही कि सईद मिर्जा अपने किरदार का उपयोग उन रंगो की तरह करते है जो उनके कैनवास में भले कम मात्रा में उपयोग हो लेकिन उनका एक स्ट्रोक पुरी तस्वीर में जान फ़ुंक देता है।सईद मिर्जा ने मध्यमवर्गीय परिवार पर केन्द्रित और भी कई फ़िल्मे बनाई मसलन मोहनजोशी हाजिर हो,सलीम लंगडे पर मत रो और नसीम साथ ही प्रसिद्ध टीवी सिरियल नुक्कड नाटक और इंतजार का निर्देशन भी किया।
डोमिनिक पिंटो(दिलीप धवन) अल्बर्ट का भाई जो बिना कुछ किए जिंदगी में पाना चाहता है और चोरी के आरोप में जेल चला जाता है और मध्यमवर्गीय़ परिवार की चिंता ग्रस्त मां मिसेस पिंटॊ(सुलभादेश पांडॆ) अपने बेटे और पति की चिंता में हमेशा चर्च की शरण में रहती है।स्टैला डिकोस्टा के भाई एवं पिता को अपने देश को कोसते दिखाया गया जो कि विदेश में बसने की इच्छा रखते है। मि.पिंटॊ को हड़ताल के दौरान गुंडो से पिटाई का सामना करना पडता है तब वो अपने परिवार में कहता है क्या एक मजदुर का कोई आत्म सम्मान नहीं क्या उसे व उसके परिवार को एक बेहतर जिंदगी जिने का हक नहीं,अल्बर्ट अपनी आत्म मुग्धता से बाहर आता है,दुसरे मजदुरो की दयनीय हालातो से परिचित होता है....ये फ़िल्म आपको कोई मनोरंजन नहीं देती लेकिन बस उस मसकती जिंदगी की तस्वीर दिखाती है,जो इन बिते सालो में और ज्यादा बिगडे रुप में आज हमारे सामने है।
सईद मिर्जा सिर्फ़ सोई हुयी जनता की आत्मा पर दस्तक देते हुए निकल जाते है।आज भी स्थितियां नहीं बदली सामाजिक और आर्थिक असमानता के नए नए रह्स्यो से रोज परदे उठ रहे है लेकिन ना जाने क्यो इन व्यवस्थाओं के खिलाफ़ अल्बर्ट पिंटो,रहमत अली,बलविंदर सिंग और रामनारायण को गुस्सा ही नहीं आता........
विशेष: ये सईद मिर्जा वही है जिनके पिता अख्तर मिर्जा ने फ़िल्म वक्त(1965) में बतौर लेखक के फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड जीता था।
फ़िल्म: अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यो आता है.....
वर्ष: 1980
निर्माता,निर्देशक,लेखक :सईद अख्तर मिर्जा
संगीत:मानस मुखर्जी,भास्कर चंदावरकर
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड(1981):
बेस्ट फ़िल्म क्रिटिक अवार्ड-सईद अख्तर मिर्जा
-योगेन्द्र व्यास
डी.के.बोस की व्यथा (व्यंग्य)
(व्यंग्य)
डी.के.बोस की व्यथा हर हफ़्ते दस दिन में कुछ खबरे सुर्खियो में रहती है और फ़िर नयी चटपटी खबर उनका स्थान ले लेती है इसी उधेड-बुन में सुबह-सुबह गाली पुराण की जुगाली करते हुए अखबार समेट ही रहा था कि दुरभाष की घंटी घन-घनाई.मैने रिसिवर उठाया पुछा कौन बोल रहे है...उधर से आवाज आई हम बोल रहे है....मैने पुछा भाई "हम" यानि और कितने लोग है......अबे मैं दीपांकर कुमार बोल रहा हुं....मैने पुछा कौन दीपांकर......अब तो झल्लाह्ट भरी आवाज में उधर से तडा तड गालियो के साथ आवाज आई अरे मैं बोस बोल रहा हुं साले अब पहचानते भी नहीं ....ओह....डी.के. बोस.....जस्ट शटअप अब मैं डी.के. नहीं सिर्फ़ दीपांकर कुमार हुं.ये महाशय हमारे कालेज के जमाने के मित्र हुआ करते थे जिन्हे हम डी.के. के नाम से बुलाते थे इनके असल नाम से तो कभी वास्ता ही नहीं पडा.इन महाशय का बात-बात में गालियो की बौझार करना इनकी हाबी में ही शामिल था अब ये उसी कालेज में प्रोफ़ेसर है जिस कालेज में हम पढा करते थे.बहरहाल पहले इनकी सुने -अरे मुझे एक वकील मांगता है,कोई अच्छा वकील हो तो बताओ और शाम को मिलो काफ़ी हाऊस में,इसके पहले कि- मैं कुछ पुछता खटाक!!! से रिसिवर पटकने की आवाज.मामला गंभीर लगा अब जाना तो पडेगा ही.लेकिन साथ साथ ही साथ सोचा ये गालियों का विग्यान भी बडा अजीब है जब मित्र दे तो गुदगुदी और यही गाली कोई और दे तो बात मरने मारने पर उतारु.खैर साहब शाम को डी.के. से मुलाकात हुई मुढ काफ़ी उखडा हुआ था बोले मुझे केस करना है ....मैने आश्चर्य से पुछा क्यो और किस पर....बोला आमीर खान पर.इसने मेरा जिंदगी हराम कर दिया है.....साला अच्छा भला जिंदगी चल रहा था इसने मेरा जिंदगी जहन्नुम कर दिया.....साले को मैं ही मिला था गाना बनाने के लिए.....मैने कहा डी.के. शांत हो जाओ....फ़िर साला तुम डी.के. बोला.....तुम को पता है कालेज में लडका लोग ब्लेक बोर्ड पर मेरा बडा-बडा नाम लिखता है,लडकिया लोग मुंह पर हाथ रखकर फ़ुसफ़ुसा के हंसता है.......और तो और कालोनी में लोगो ने अपने मकान का पता बताने के लिए मेरा घर को लेंड्मार्क बना दिया है.मेरा कमीना दुश्मन पडोसी रोज जोर-जोर से ये गाना बजाता है.मेरा बीबी बोलता है अपना नाम बदल डालो अब बोलो इस उम्र ऐसी फ़जिहत कि नाम बदलना पडे.मैं छोडुंगा नहीं उस आमीर को और साले तुम लेखक बने फ़िरते हो हमारी संस्कृति पर हमला हो रहा है तुम कुछ करते क्यो नहीं.मैने बोला भाई देखो केस दायर करने से कुछ नहीं होने वाला उसने अपनी फ़िल्म पर "ए" सर्टिफ़िकेट लिया है ज्यादा से ज्यादा तुम भी अपने नाम के आगे (ए) लिखवा लो.....ऐ..स्साला तुम भी हमारा हंसी उडाता है......सारी..सारी बाबु मोशाय....अच्छा एक काम करो अभी तो तुम अपना गुस्सा ठंडा करो और काफ़ी पियो इस पर हम थोडा विचार करते है फ़िर देखते है क्या करना है.जैसे तैसे विदा किया डी.के. बोस को.सोचा जिस व्यक्ति ने जिंदगी भर गाली को अपना ताकिया-कलाम बनाया वो आज उसी के गले ब्याज के साथ पड गयी..मेरे ख्याल में ये मन की कुंठा निकालने का एक तरीका हो सकता है जिसे हम आज से उपयोग नहीं कर रहे ये हर समय काल से उपयोग लाई जाती रही है,इसका उद्दभव उलाहना देने साथ-साथ शुरु हो कर आज प्रचलित गालियों में तब्दील हो गया है.कहां उपयोग नही होता इसके कई स्वरुप है -दोस्तो में,आफ़िस में,अफ़सर को गाली देने में,सिस्टम को गाली देने में,मोहल्ले के झगडे में,आंदोलनों में,राजनिति में.गाली एक यांत्रिक क्रिया की प्रतिक्रिया स्वरुप पैदा होने वाली संडाध है जिसे कई लोग आनंद पुर्वक लेते देते रहते है,मुख की तंग जबान से गोली की तरह निकल कर सुनने वाले के दिल में धंस जाए तो वो गाली है.सकारात्मक नजरिये से देखे भाई सा. तो ये बुलेट का सब्सटिट्युट है.फ़र्ज करो अगर गाली नहीं होती तो क्या होता.वो ही जिंदा होता जिसके हाथ में बंदुक होती.यदि हर आतंक वादी गाली बक कर अपनी कुंठा विसर्जित कर दे तो हो सकता है उसकी बंदुक से कुछ गोली कम चले. फ़िर भी ये एक असभ्यता की निशानी है इससे परहेज किया जा सकता है सभ्यता के गलियारे में इसका प्रयोग किसी भी लिहाज से उचित नहीं कहा जा सकता. .......गाली देना बुरी बात है बस ये मान लेना काफ़ी है.अब डी. के. बोस का जो होगा सो होगा इससे हमारी संस्कृति को कोई फ़र्क नहीं पडने वाला ये तय है.
-योगेन्द्र व्यास
डी.के.बोस की व्यथा हर हफ़्ते दस दिन में कुछ खबरे सुर्खियो में रहती है और फ़िर नयी चटपटी खबर उनका स्थान ले लेती है इसी उधेड-बुन में सुबह-सुबह गाली पुराण की जुगाली करते हुए अखबार समेट ही रहा था कि दुरभाष की घंटी घन-घनाई.मैने रिसिवर उठाया पुछा कौन बोल रहे है...उधर से आवाज आई हम बोल रहे है....मैने पुछा भाई "हम" यानि और कितने लोग है......अबे मैं दीपांकर कुमार बोल रहा हुं....मैने पुछा कौन दीपांकर......अब तो झल्लाह्ट भरी आवाज में उधर से तडा तड गालियो के साथ आवाज आई अरे मैं बोस बोल रहा हुं साले अब पहचानते भी नहीं ....ओह....डी.के. बोस.....जस्ट शटअप अब मैं डी.के. नहीं सिर्फ़ दीपांकर कुमार हुं.ये महाशय हमारे कालेज के जमाने के मित्र हुआ करते थे जिन्हे हम डी.के. के नाम से बुलाते थे इनके असल नाम से तो कभी वास्ता ही नहीं पडा.इन महाशय का बात-बात में गालियो की बौझार करना इनकी हाबी में ही शामिल था अब ये उसी कालेज में प्रोफ़ेसर है जिस कालेज में हम पढा करते थे.बहरहाल पहले इनकी सुने -अरे मुझे एक वकील मांगता है,कोई अच्छा वकील हो तो बताओ और शाम को मिलो काफ़ी हाऊस में,इसके पहले कि- मैं कुछ पुछता खटाक!!! से रिसिवर पटकने की आवाज.मामला गंभीर लगा अब जाना तो पडेगा ही.लेकिन साथ साथ ही साथ सोचा ये गालियों का विग्यान भी बडा अजीब है जब मित्र दे तो गुदगुदी और यही गाली कोई और दे तो बात मरने मारने पर उतारु.खैर साहब शाम को डी.के. से मुलाकात हुई मुढ काफ़ी उखडा हुआ था बोले मुझे केस करना है ....मैने आश्चर्य से पुछा क्यो और किस पर....बोला आमीर खान पर.इसने मेरा जिंदगी हराम कर दिया है.....साला अच्छा भला जिंदगी चल रहा था इसने मेरा जिंदगी जहन्नुम कर दिया.....साले को मैं ही मिला था गाना बनाने के लिए.....मैने कहा डी.के. शांत हो जाओ....फ़िर साला तुम डी.के. बोला.....तुम को पता है कालेज में लडका लोग ब्लेक बोर्ड पर मेरा बडा-बडा नाम लिखता है,लडकिया लोग मुंह पर हाथ रखकर फ़ुसफ़ुसा के हंसता है.......और तो और कालोनी में लोगो ने अपने मकान का पता बताने के लिए मेरा घर को लेंड्मार्क बना दिया है.मेरा कमीना दुश्मन पडोसी रोज जोर-जोर से ये गाना बजाता है.मेरा बीबी बोलता है अपना नाम बदल डालो अब बोलो इस उम्र ऐसी फ़जिहत कि नाम बदलना पडे.मैं छोडुंगा नहीं उस आमीर को और साले तुम लेखक बने फ़िरते हो हमारी संस्कृति पर हमला हो रहा है तुम कुछ करते क्यो नहीं.मैने बोला भाई देखो केस दायर करने से कुछ नहीं होने वाला उसने अपनी फ़िल्म पर "ए" सर्टिफ़िकेट लिया है ज्यादा से ज्यादा तुम भी अपने नाम के आगे (ए) लिखवा लो.....ऐ..स्साला तुम भी हमारा हंसी उडाता है......सारी..सारी बाबु मोशाय....अच्छा एक काम करो अभी तो तुम अपना गुस्सा ठंडा करो और काफ़ी पियो इस पर हम थोडा विचार करते है फ़िर देखते है क्या करना है.जैसे तैसे विदा किया डी.के. बोस को.सोचा जिस व्यक्ति ने जिंदगी भर गाली को अपना ताकिया-कलाम बनाया वो आज उसी के गले ब्याज के साथ पड गयी..मेरे ख्याल में ये मन की कुंठा निकालने का एक तरीका हो सकता है जिसे हम आज से उपयोग नहीं कर रहे ये हर समय काल से उपयोग लाई जाती रही है,इसका उद्दभव उलाहना देने साथ-साथ शुरु हो कर आज प्रचलित गालियों में तब्दील हो गया है.कहां उपयोग नही होता इसके कई स्वरुप है -दोस्तो में,आफ़िस में,अफ़सर को गाली देने में,सिस्टम को गाली देने में,मोहल्ले के झगडे में,आंदोलनों में,राजनिति में.गाली एक यांत्रिक क्रिया की प्रतिक्रिया स्वरुप पैदा होने वाली संडाध है जिसे कई लोग आनंद पुर्वक लेते देते रहते है,मुख की तंग जबान से गोली की तरह निकल कर सुनने वाले के दिल में धंस जाए तो वो गाली है.सकारात्मक नजरिये से देखे भाई सा. तो ये बुलेट का सब्सटिट्युट है.फ़र्ज करो अगर गाली नहीं होती तो क्या होता.वो ही जिंदा होता जिसके हाथ में बंदुक होती.यदि हर आतंक वादी गाली बक कर अपनी कुंठा विसर्जित कर दे तो हो सकता है उसकी बंदुक से कुछ गोली कम चले. फ़िर भी ये एक असभ्यता की निशानी है इससे परहेज किया जा सकता है सभ्यता के गलियारे में इसका प्रयोग किसी भी लिहाज से उचित नहीं कहा जा सकता. .......गाली देना बुरी बात है बस ये मान लेना काफ़ी है.अब डी. के. बोस का जो होगा सो होगा इससे हमारी संस्कृति को कोई फ़र्क नहीं पडने वाला ये तय है.
-योगेन्द्र व्यास
पेलवान की शोक सभा ( व्यंग्य )
पेलवान की शोक सभा
जिंदगी में कभी ऐसा अवसर आए कि आपको ऐसी शवयात्रा में शरीक होना पडे और शोक सभा में कुछ बोलना भी पडे तो क्या नजारा बनता है आइए जरा देखे.....।शहर के नामी गिरामी पहलवान भिया असमय चल बसे.....अब भिया चल बसे तो पठ्ठे शवयात्रा की तैयारी में जुटे ..ऐ...गोली,पप्पु,टुड्डा चल एरिया की दुकाने बंद करा...मोहल्ले को भेला कर भिया को शमशान पोचाना है.कुछ तो दुकान बंद कर धीरे से कट लिए बाकी शवयात्रा में धकेल दिए गए.श्मशान पहुंचे पहलवान का अंतिम संस्कार हुआ,तभी भिया के खास पठ्ठे गोटी-डेंजर को कुछ याद आई वो चिल्ला के बोला..ऐ सब को घेर के शेड में लिया....पेलवान की शोक सभा करनी है........ और वो मास्टर को बोल पेलवान के बारे में बोलेगा...अब कुछ सफ़ेद पोश मन ही मन प्रार्थना कर रहे थे कि हमारा नाम ना ले तो अच्छा .....अब बेचारे मास्टर की आफ़त क्या बोले कैसे बोले.....अब मरता क्या न करता....मास्टर सा. बोले हमारे भैया जी से पहली मुलाकात जब हुयी जब वे अपने बच्चे को परीक्षा दिलाने स्कुल आए,तब उनके हाथ में चाकु और बच्चे के हाथ में कलम पुरी परीक्षा लिखवा के ही उठे....मैं उनके असामयिक निधन पर मैं दुख प्रकट करता हुं और ईश्वर उनके परिवार को दुख सहन करने की शक्ति दे...ओम शांति.अब श्री गोटी जी अपनी भावनाएं प्रकट करेंगे.....अब गोटी-डेंजर के चेहरे पर हवाईयां उड गई ...अभी क्या बोले...अब तक तो दादागिरी की अब भाषण....जैसे तैसे गोटी डेंजर हकलाते हुए बोले ....अब भिया के बारे में क्या बोले भिया तो भिया थे.पेली-पेली बार पेलवान से मुलाकात अंदर(जेल) हुई थी...तीन चार महीने भिया की सेवा की बस तभी से भिया का पठ्ठा बन गिया.पेलवान हमेशा कहते थे अपनी सोच उंची रखो,भिया कहते थे समय बदल रिया है अब अपन को चिंदी चोर जैसे काम नी करना है.भिया ने कित्तो को काम पे लगा दिया कित्ते रोजगार के अवसर खोल दिये पेलवान ने,.. आज सब अपनी रोजी रोटी बढिया कमा रिये है..कोई ह्फ़्ता वसुली में,तो कोई गाडी खडी कराई में,कोई पार्किंग में,कोई प्लाट- मकान कब्जे-खाली कराई में.पेलवान को भण्डारा भोत पसंद था, उनके नेतृत्व में कित्ते ही भण्डारे हमने करे.भिया की सेंटिग उपर से नीचे तक जोर दार थी.पेलवान दो दिन पेले ही केरिये थे कि इस बार पार्षद का चुनाव लडना है और फ़ुल फ़्लेश में पोलीटिस्क में आना है.अब पेलवान तो हमारे बीच नी रिये है पर उनके काम को आगे और बढाना है.पेलवान की स्मृति में उनके तेरवे पर एक विशाल भण्डारे का आयोजन माता रानी के मंदिर में किया जाएगा.अपनी पुरी टीम से निवेदन है कि सब लोग काम पे लग जाए और आप सभी लोग अधिक से अधिक सहयोग कर भण्डारे को सफ़ल बानाएं. अब मैं सोच रहा हुं..... शासन प्रशासन क्या रोजगार के इन कुत्सित अवसरो को कभी समाप्त कर पाएगा या ऐसे ही दादा-पहलवानों की शोक सभाओं में भी जबरजस्ती जाना पडेगा...........!
-योगेन्द्र व्यास
जिंदगी में कभी ऐसा अवसर आए कि आपको ऐसी शवयात्रा में शरीक होना पडे और शोक सभा में कुछ बोलना भी पडे तो क्या नजारा बनता है आइए जरा देखे.....।शहर के नामी गिरामी पहलवान भिया असमय चल बसे.....अब भिया चल बसे तो पठ्ठे शवयात्रा की तैयारी में जुटे ..ऐ...गोली,पप्पु,टुड्डा चल एरिया की दुकाने बंद करा...मोहल्ले को भेला कर भिया को शमशान पोचाना है.कुछ तो दुकान बंद कर धीरे से कट लिए बाकी शवयात्रा में धकेल दिए गए.श्मशान पहुंचे पहलवान का अंतिम संस्कार हुआ,तभी भिया के खास पठ्ठे गोटी-डेंजर को कुछ याद आई वो चिल्ला के बोला..ऐ सब को घेर के शेड में लिया....पेलवान की शोक सभा करनी है........ और वो मास्टर को बोल पेलवान के बारे में बोलेगा...अब कुछ सफ़ेद पोश मन ही मन प्रार्थना कर रहे थे कि हमारा नाम ना ले तो अच्छा .....अब बेचारे मास्टर की आफ़त क्या बोले कैसे बोले.....अब मरता क्या न करता....मास्टर सा. बोले हमारे भैया जी से पहली मुलाकात जब हुयी जब वे अपने बच्चे को परीक्षा दिलाने स्कुल आए,तब उनके हाथ में चाकु और बच्चे के हाथ में कलम पुरी परीक्षा लिखवा के ही उठे....मैं उनके असामयिक निधन पर मैं दुख प्रकट करता हुं और ईश्वर उनके परिवार को दुख सहन करने की शक्ति दे...ओम शांति.अब श्री गोटी जी अपनी भावनाएं प्रकट करेंगे.....अब गोटी-डेंजर के चेहरे पर हवाईयां उड गई ...अभी क्या बोले...अब तक तो दादागिरी की अब भाषण....जैसे तैसे गोटी डेंजर हकलाते हुए बोले ....अब भिया के बारे में क्या बोले भिया तो भिया थे.पेली-पेली बार पेलवान से मुलाकात अंदर(जेल) हुई थी...तीन चार महीने भिया की सेवा की बस तभी से भिया का पठ्ठा बन गिया.पेलवान हमेशा कहते थे अपनी सोच उंची रखो,भिया कहते थे समय बदल रिया है अब अपन को चिंदी चोर जैसे काम नी करना है.भिया ने कित्तो को काम पे लगा दिया कित्ते रोजगार के अवसर खोल दिये पेलवान ने,.. आज सब अपनी रोजी रोटी बढिया कमा रिये है..कोई ह्फ़्ता वसुली में,तो कोई गाडी खडी कराई में,कोई पार्किंग में,कोई प्लाट- मकान कब्जे-खाली कराई में.पेलवान को भण्डारा भोत पसंद था, उनके नेतृत्व में कित्ते ही भण्डारे हमने करे.भिया की सेंटिग उपर से नीचे तक जोर दार थी.पेलवान दो दिन पेले ही केरिये थे कि इस बार पार्षद का चुनाव लडना है और फ़ुल फ़्लेश में पोलीटिस्क में आना है.अब पेलवान तो हमारे बीच नी रिये है पर उनके काम को आगे और बढाना है.पेलवान की स्मृति में उनके तेरवे पर एक विशाल भण्डारे का आयोजन माता रानी के मंदिर में किया जाएगा.अपनी पुरी टीम से निवेदन है कि सब लोग काम पे लग जाए और आप सभी लोग अधिक से अधिक सहयोग कर भण्डारे को सफ़ल बानाएं. अब मैं सोच रहा हुं..... शासन प्रशासन क्या रोजगार के इन कुत्सित अवसरो को कभी समाप्त कर पाएगा या ऐसे ही दादा-पहलवानों की शोक सभाओं में भी जबरजस्ती जाना पडेगा...........!
-योगेन्द्र व्यास
स्वर जन्म: ताल या लता
बहुत ही विस्मय कारी घटना है कि इंन्दौर के सिक्ख मोहल्ले से निकली नवजात किलकारी आलाप ,तान और मुरकियों में बदल जाएगी और सात सुरो को अपनी आवाज की प्रत्यंचा पर चढा कर सुरों के एक से बढ कर एक सुरीले बाणॊ से इन हवाओं पर एक कवच सा खींच देगी.मेरे ख्याल में लताजी के जन्म को स्वरों का अवतार कहें तो ज्यादा तसल्ली महसुस होगी. राग-रागिनियो में डुबे एक एक शब्द गीत बनकर बडे ही अनुशासित भाव से लता आकण्ठ में गोते लगाने के लिए बडे ही अधीर देखे व महसुस किए जा सकते है......और हां गीत के मुखडे तो गर्वोक्ति भाव से अंतरे को ये बताते है कि देखो लता के गले में हमने कितनी बार जगह पाई है......कई बार ऐसा लिखना भी गर्वोक्ति का अनुभव देता है कि ऐसी जिवित किवदंती लताजी के रुप में हमारे बीच मौजुद है और जो संपदा उन्होने हमारे लिए छोडी है उस उपकार को चुका पाना हमारे बस में नहीं......लता जी की आवाज सिर्फ़ कानों तक नहीं वरन अवचेतन मन की गहरायों में परकाया की तरह प्रवेश करती है और आपको एक ध्यानस्थ बना कर हौले से बाहर निकल आती है.....यही तो है "सत्यम शिवम सुंदरम" का भाव.क्या ही ये बिल्कुल संभव हो कि शिवालय-देवालय की तरह कहीं "लतालय" आकार ले जहां उनके गीत अखण्ड रुप से किसी पिरामिड के अंदर इस कायनात के कायम रहने तक बजते रहे....तो चलिए अब आप क्या कर रहे है मैने तो........
लता जी के सुरॊ के अंतराल पर अपने दोनो घुटने मोड कर सवारी कर ली है बस अब उनके आलाप,तान,मुरकियो पर तैर रहा हुं.......बडा ही विस्मयकारी संसार है यहां कहीं कोई सितार की स्ट्रिंग पास से गुजरती है तो कहीं एकार्डियन गुदगुदी कर जाता है...तबले की तिहाई ,ढोलक की थाप चौंका देती है....बीच में हवाई गिटार का पीस ढकेल देता है....वही से वायलिन का कारवां तेजी से लता जी की आवाज के पास छोड आता है....ये सारे वाद्य उत्सवी नाद में रंगे है कि कैसे-कैसे लताजी का "स्वर-जन्म" मनाया जाए....अब ऐसे में कौन उतरे इन सुरो की सवारी से.....बस उनिंदा सा हूं.......
-योगेन्द्र व्यास
yvyas2010@gmail.com
Friday, October 12, 2012
आंखो ही आंखो में दर्द बांटने की कोशिश (Hit here for Link)
भागती जिंदगी में बेलगाम हांफ़ते लब्ज कई बार उन मासुस तालुओ को अपना शिकार बना लेते है जहां वे शांति की आस में कानों तक पैर पसार कर हमेशा के लिए सो जाते है।कोई शब्द नहीं ,कोई आवाज नहीं गहरे सन्नाटे में शब्द हमेशा के लिए दफ़न...दिमाग दस्तक देता है....हे..उठो..बोलो कुछ..तो सुनो..सुनो ना...कोई जवाब नहीं।आंखे है ना सब समझती है,ममतामयी पलके झपकती है,बोली मैं हुं ना तुम्हारी जबान और मैं सब सुनकर समझादुंगी..भावुक आंखो से ढुलका एक मोती गुलजार के पन्नों पर फ़ैल गया और लिख गया "कोशिश"!
गुलजार जैसे निष्णांत निर्देशक अपनी पटकथा मेज पर बैठ कर नहीं लिखते वे किरदारों के भीतर छुप कर अपनी कलम और कैमेरा फ़ोकस करते है कि-देखने वाला इन किरदारों से संवाद स्थापित करने की चेष्टा करता है।दर्शको की आंखो को सकुन देने लिए गुलजार का कैमेरा दार्जिंलिंग की वादियों या नीली रोशनी में गिरती बर्फ़ का रोमांच नहीं रचता वो हरीचरण (संजीव कुमार)एवं आरती(जयाभादुडी-बच्चन) की खामोश अंर्तमन गहराईयों से लांग शाट लेता हुआ उनकी आने वाली जिंदगी पर फ़ोकस करता है।
हरीचरण और आरती को जिंदगी एक चौराहे पर मिलाती है और होता है न कि दो व्यक्ति एक ही जबान के एक अनजान देश में मिल जाएं तो उनमें जो तसल्ली का भाव आता है वही भाव हरीचरण और आरती को महसुस होता है जब उन्हे ये पता लगता है कि वे दोनो ही मुक एवं बधीर है।दोनो ही गरीब है,हरीचरण हाकर है और आरती अपनी मां (दीनापाठक) और निकम्मे भाई(असरानी) के साथ रहती है।हरीचरण आरती का दाखिला मुकबधीर स्कुल में करा देता है और उनका मेल-जोल बाहर के शोर-गुल से बेखबर अपने दिल की आवाजें सुनने लगता है,प्रेम के भाव उमड रहे है कह नहीं पा रहे लेकिन जो आखों से छलक रहे है छोटी-छोटी चिठ्ठियों में बह रहे है और फ़िर दोनो की शादी "प्यार अंधा होता है ये तो सुना था लेकिन गुंगा बहरा हो तब भी प्यार ही होता है"ये बात अंधे नारायण अंकल (ओमशिवपुरी) कहते है जब ये दोनो अनायास ही उन्हे राह में मिल जाते है और फ़िर उनके अपने हो जाते है. गुलजार ने उन व्यवहारिक दिक्कतो को बहुत ही संजीदा तरीके से फ़्रेम दर फ़्रेम उकेरा है जो एक मुक बधिर दम्पत्ति के सामने आती है।बहुत ही मार्मिक सीन है जब वे रात में अपने बच्चे की रोने की आवाज नहीं सुन पाते और बच्चा तेज बारिश में घर के बाहर दम तोड देता है। बहुत टुट जाते है दोनो..पुरी फ़िल्म में संजीव कुमार कहीं नजर नहीं आए हरीचरण पात्र ने स्टार संजीव कुमार को कहीं पीछे छोड दिया। संजीव कुमार ने अंदरुनी खामोशी के इतने सारे रंग उडेले कि एक आंसु का हाल पुछ्ने दुसरा चला आता है। हैलो..बर्फ़ी काश कि तुमने थोडी सी कोशिश करके "कोशिश" देख ली होती।समझ नहीं आता हमें इंसपायर होने के लिए देश के बाहर अभिनय क्यो तलाशना पडता है जबकि हरीचरण पात्र भी अपने देश में उपलब्ध है।
खैर..आरती एवं हरीचरण के दुसरा बच्चा होता है।कुछ सीन दिल को छु लेने वाले है, जब एक मां को ये पता नहीं हो कि लोरी क्या होती है जब नारायण अंकल बच्चे को लोरी गा कर सुनाते है ये जया बच्चन कि अभिनय क्षमता का चरम है कि कैसे चेहरे भावों को अभिनय से प्रकट करना,फ़िर बच्चा सुन-बोल पाता है या नहीं इसकी कसमसाहट को देखना फ़िर डॉक्टर को लेकर आना और तसल्ली करना, हल्का-फ़ुल्का विनोद सुखद है।संघर्ष करते करते हरीचरण नौकरी में अच्छे ओहदे पर पहुंच जाता है लेकिन आरती खामोशी से साथ छोड़ कर चिर निंद्रा में चली जाती है....हरीचरण आज भी आखों से आरती को आवाज देने की कोशिश करता है..
कई आलोचको को फ़िल्म का अंतिम सीन पसंद नहीं जिसमें हरीचरण अपने जवान बेटे की शादी एक मुक बधीर लडकी से करने का निर्णय लेता है लेकिन बेटा इससे इंकार कर देता है। जैसा कि गुलजार पात्रो के अंदर बैठ कर कहानी कहते है इसलिए इसे एक पिता के नजरिए से देखा जाना चाहिए जो अपने बच्चे के लिए स्वार्थी नहीं हो सकता वो उसे बेहतर इंसान के रुप में देखना चाहता है ताकि वो एक मुक बधिर लडकी के लब्ज बन कर उसके मुरझाए चेहरे पर मुस्कान लौटा सके।
इस फ़िल्म ने करोडो तो नहीं कमाएं लेकिन आज भी ये फ़िल्म करोडो में एक है.."एक बार हरीचरण से मिल तो लिजिए"
विशेष:गुलजार साहब का उनकी फ़िल्मों में गीत और संगीत का नाता जग जाहिर है,लेकिन इस फ़िल्म में उन्होने संगीत को दुर रखा कारण विषय की संजीदगी या कुछ और इसका खुलासा शायद उन्होने नहीं किया.....
फ़िल्म: कोशिश
वर्ष: 1972
निर्देशन :गुलजार
निर्माता:रोमु एन.सिप्पी,राज एन. सिप्पी
लेखक एवं गीतकार: गुलजार
संगीत:मदनमोहन
गीत:
1. "सो जा बाबा मेरे" - मो.रफ़ी
2. "हमसे है वतन हमारा" - सुषमा श्रेष्ठ
अवार्ड:
नेशनल फ़िल्म अवार्ड (1973)
-बेस्ट स्क्रिन प्ले -गुलजार
-बेस्ट एक्टर-संजीव कुमार
योगेन्द्र व्यास
भागती जिंदगी में बेलगाम हांफ़ते लब्ज कई बार उन मासुस तालुओ को अपना शिकार बना लेते है जहां वे शांति की आस में कानों तक पैर पसार कर हमेशा के लिए सो जाते है।कोई शब्द नहीं ,कोई आवाज नहीं गहरे सन्नाटे में शब्द हमेशा के लिए दफ़न...दिमाग दस्तक देता है....हे..उठो..बोलो कुछ..तो सुनो..सुनो ना...कोई जवाब नहीं।आंखे है ना सब समझती है,ममतामयी पलके झपकती है,बोली मैं हुं ना तुम्हारी जबान और मैं सब सुनकर समझादुंगी..भावुक आंखो से ढुलका एक मोती गुलजार के पन्नों पर फ़ैल गया और लिख गया "कोशिश"!
गुलजार जैसे निष्णांत निर्देशक अपनी पटकथा मेज पर बैठ कर नहीं लिखते वे किरदारों के भीतर छुप कर अपनी कलम और कैमेरा फ़ोकस करते है कि-देखने वाला इन किरदारों से संवाद स्थापित करने की चेष्टा करता है।दर्शको की आंखो को सकुन देने लिए गुलजार का कैमेरा दार्जिंलिंग की वादियों या नीली रोशनी में गिरती बर्फ़ का रोमांच नहीं रचता वो हरीचरण (संजीव कुमार)एवं आरती(जयाभादुडी-बच्चन) की खामोश अंर्तमन गहराईयों से लांग शाट लेता हुआ उनकी आने वाली जिंदगी पर फ़ोकस करता है।
हरीचरण और आरती को जिंदगी एक चौराहे पर मिलाती है और होता है न कि दो व्यक्ति एक ही जबान के एक अनजान देश में मिल जाएं तो उनमें जो तसल्ली का भाव आता है वही भाव हरीचरण और आरती को महसुस होता है जब उन्हे ये पता लगता है कि वे दोनो ही मुक एवं बधीर है।दोनो ही गरीब है,हरीचरण हाकर है और आरती अपनी मां (दीनापाठक) और निकम्मे भाई(असरानी) के साथ रहती है।हरीचरण आरती का दाखिला मुकबधीर स्कुल में करा देता है और उनका मेल-जोल बाहर के शोर-गुल से बेखबर अपने दिल की आवाजें सुनने लगता है,प्रेम के भाव उमड रहे है कह नहीं पा रहे लेकिन जो आखों से छलक रहे है छोटी-छोटी चिठ्ठियों में बह रहे है और फ़िर दोनो की शादी "प्यार अंधा होता है ये तो सुना था लेकिन गुंगा बहरा हो तब भी प्यार ही होता है"ये बात अंधे नारायण अंकल (ओमशिवपुरी) कहते है जब ये दोनो अनायास ही उन्हे राह में मिल जाते है और फ़िर उनके अपने हो जाते है. गुलजार ने उन व्यवहारिक दिक्कतो को बहुत ही संजीदा तरीके से फ़्रेम दर फ़्रेम उकेरा है जो एक मुक बधिर दम्पत्ति के सामने आती है।बहुत ही मार्मिक सीन है जब वे रात में अपने बच्चे की रोने की आवाज नहीं सुन पाते और बच्चा तेज बारिश में घर के बाहर दम तोड देता है। बहुत टुट जाते है दोनो..पुरी फ़िल्म में संजीव कुमार कहीं नजर नहीं आए हरीचरण पात्र ने स्टार संजीव कुमार को कहीं पीछे छोड दिया। संजीव कुमार ने अंदरुनी खामोशी के इतने सारे रंग उडेले कि एक आंसु का हाल पुछ्ने दुसरा चला आता है। हैलो..बर्फ़ी काश कि तुमने थोडी सी कोशिश करके "कोशिश" देख ली होती।समझ नहीं आता हमें इंसपायर होने के लिए देश के बाहर अभिनय क्यो तलाशना पडता है जबकि हरीचरण पात्र भी अपने देश में उपलब्ध है।
खैर..आरती एवं हरीचरण के दुसरा बच्चा होता है।कुछ सीन दिल को छु लेने वाले है, जब एक मां को ये पता नहीं हो कि लोरी क्या होती है जब नारायण अंकल बच्चे को लोरी गा कर सुनाते है ये जया बच्चन कि अभिनय क्षमता का चरम है कि कैसे चेहरे भावों को अभिनय से प्रकट करना,फ़िर बच्चा सुन-बोल पाता है या नहीं इसकी कसमसाहट को देखना फ़िर डॉक्टर को लेकर आना और तसल्ली करना, हल्का-फ़ुल्का विनोद सुखद है।संघर्ष करते करते हरीचरण नौकरी में अच्छे ओहदे पर पहुंच जाता है लेकिन आरती खामोशी से साथ छोड़ कर चिर निंद्रा में चली जाती है....हरीचरण आज भी आखों से आरती को आवाज देने की कोशिश करता है..
कई आलोचको को फ़िल्म का अंतिम सीन पसंद नहीं जिसमें हरीचरण अपने जवान बेटे की शादी एक मुक बधीर लडकी से करने का निर्णय लेता है लेकिन बेटा इससे इंकार कर देता है। जैसा कि गुलजार पात्रो के अंदर बैठ कर कहानी कहते है इसलिए इसे एक पिता के नजरिए से देखा जाना चाहिए जो अपने बच्चे के लिए स्वार्थी नहीं हो सकता वो उसे बेहतर इंसान के रुप में देखना चाहता है ताकि वो एक मुक बधिर लडकी के लब्ज बन कर उसके मुरझाए चेहरे पर मुस्कान लौटा सके।
इस फ़िल्म ने करोडो तो नहीं कमाएं लेकिन आज भी ये फ़िल्म करोडो में एक है.."एक बार हरीचरण से मिल तो लिजिए"
विशेष:गुलजार साहब का उनकी फ़िल्मों में गीत और संगीत का नाता जग जाहिर है,लेकिन इस फ़िल्म में उन्होने संगीत को दुर रखा कारण विषय की संजीदगी या कुछ और इसका खुलासा शायद उन्होने नहीं किया.....
फ़िल्म: कोशिश
वर्ष: 1972
निर्देशन :गुलजार
निर्माता:रोमु एन.सिप्पी,राज एन. सिप्पी
लेखक एवं गीतकार: गुलजार
संगीत:मदनमोहन
गीत:
1. "सो जा बाबा मेरे" - मो.रफ़ी
2. "हमसे है वतन हमारा" - सुषमा श्रेष्ठ
अवार्ड:
नेशनल फ़िल्म अवार्ड (1973)
-बेस्ट स्क्रिन प्ले -गुलजार
-बेस्ट एक्टर-संजीव कुमार
योगेन्द्र व्यास
एक डॉक्टर की मौत (hit her for Link)http://www.epaperdainikdabangdunia.com/Details.aspx?id=7748&boxid=11573312
एक डॉक्टर की मौत
इंसान की औसत उम्र यदि सत्तर साल मान ले और उसमें से बीस वर्ष निकाल दे तो भी पचास वर्ष साइंस पर काम करने के लिए काफ़ी कम है। दुनिया भर के लाखों वैज्ञानिक अपने अपने क्षेत्र में रिसर्च कार्यो में लगे है और इनमें से कई ऐसे है जो पारंपरिक वैज्ञानिक नहीं है यानि पीएचडी डिग्री हांसिल किए हुए नही है फ़िर भी वे इस ब्रम्हाण्ड के असिमित दायरे में अपनी खुली सोच को उन गुढ रहस्यों के निकट ले जाते है जहां एक नए विज्ञान का जन्म होता है। कई बार पारंपरिक शोधार्थी एक लीक पर चलते हुए वो परिणाम प्राप्त नहीं कर पाता जो कि एक साधारण शोधार्थी लीक से हटकर समग्रता में नए आयामों को ढुंढता है एवं वांछित परिणाम प्राप्त कर जाता है। ये ठीक वैसा ही है जैसे कबीर की आध्यात्मिक उपलब्धता की तुलना किसी पॊथी पुराण कंठस्थ पंडित से की जाए।जितनी भी वैज्ञानिक खोजे हुयी है उनमें से काफ़ी खोजे गैर पारंपरिक वैज्ञानिकों द्वारा ही की गयी है।
कोलकाता के फ़िजिशियन सुभाष मुखोपाध्याय जिन्होने भारत का पहला और विश्व का दुसरा टेस्ट ट्युब बेबी "दुर्गा" को अस्तित्व में लाने में सफ़लता हांसिल की,लेकिन दुर्भाग्य- सरकार ने इस उपलब्धी को इसे अंर्तराष्ट्रीय साईंटिफ़ीक कम्युनिटी में रखने की इजाजत तक नहीं दी,मानसिक प्रताडना,उपेक्षा,नौकरशाही रवैये से क्षुब्ध हो कर सुभाष मुखोपाध्याय ने आत्महत्या कर ली।जो व्यक्ति इस देश को बहुत कुछ दे सकता था उसे इस हश्र तक पहुंचना पडा,कई पारंपरिक वैज्ञानिकों को भी इस गैर पारंपरिक वैज्ञानिक व्यक्ति की सफ़लता पची नहीं।
निर्देशक तपन सिन्हा ने इसी घटना से प्रेरित होकर फ़िल्म "एक डॉक्टर की मौत" को बहुत ही प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है।
दीपांकर रॉय (पंकज कपुर) जो एक साधारण एम.बी.बी.एस.डॉक्टर है और एक सरकारी अस्पताल में नौकरी करता है।लेकिन साथ ही साथ उसका एक ही जुनुन है लेप्रोसी नामक बिमारी को इस पृथ्वी से जड से मिटा देना और इसके लिए वो अपने घर में ही बनी लेब में दिन रात मेहनत कर लेप्रोसी का सफ़ल वैक्सीन तैयार कर लेता है तथा ये संभावना भी प्रकट करता है कि ये वेक्सीन मातृत्व विहिन स्त्री को मातृत्व सुख भी दे सकता है।ये खबर समाचार पत्रो,एवं टेलिविजन पर भी फ़्लेश हो जाती है।इधर हेल्थ सेक्रेटरी डॉ.दीपांकर को बुला कर काफ़ी लताड लगाता है,वही ईष्यावश डॉक्टर्स का एक कुनबा डॉ. दीपांकर के विरोध में उठ खडा होता है उन्हे सार्वजनिक तौर पर काफ़ी प्रताडित किया जाता है कि एक साधारण एम.बी.बी.एस.डॉक्टर लेप्रोसी जैसे घृणित रोग का वैक्सिन कैसे बना सकता है।इसी के चलते डॉ. दीपांकर का ट्रांसफ़र एक गांव में कर दिया जाता है।लेकिन इस ज्यादती की खबर अखबार के मालिक छापने से मना कर देते है कि-हमें सरकार से विज्ञापन नहीं मिलेंगे और अखबार विज्ञापन से चलते है वैज्ञानिक से नहीं।वही ये खबर अमेरिका के जान एंडरसन फ़ाउंडेशन को लगती है।इसी फ़ाउंडेश की एक महिला सदस्य डॉ.दीपांकर से मिलने गांव आती है तथा वे डॉ. दीपांकर को जल्द से जल्द अपने रिसर्च पेपर तैयार करने को कहती है।लेकिन एक ईमानदार डॉ.को नौकरशाही पेपर बनाने का मौका तक नहीं देती है और जांच आयोग बैठा देती है,जांच कमेटी में ऐसे लोग है जिन्हे आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली दवाईयों के नाम तक नहीं पता। अतंत:एक हताश,निराश डॉ. दीपांकर नाकारॊ की कमेटी से हार मान लेता है।दुसरी और अमेरिका में लेप्रोसी के वैक्सिन तैयार करने वाले दो अमेरिकी वैज्ञानिको के नामो की घोषणा हो जाती है। ये उपलब्धि हमारे देश का गौरव बनने के बजाय अन्य देश की उपलब्धी बन जाती है। ये हमारे देश की हकीकत के काफ़ी नजदीक है। हमारे देश में आज भी कई ऐसे सुभाष मुखोपाध्याय और दीपांकर है जो अपने ही लोगो के बीच अपनी ही कु-व्यवस्थाओं से जुझ रहे है।
ये पंकज कपुर के बस में ही था कि एक किरदार को पुरी तरह आत्मसात कर ले। एक ध्यानस्थ मुनी अवस्था और पंकज कपुर के किरदार को निभाने की अवस्था लगभग एक सी ही है।शबाना आजमी ने डॉ.दीपांकर की पत्नि के किरदार को इस तरह जिया वाकई लगा कि एक जुनुनी इंसान की पत्नि अपनी सांसारिक इच्छाओं के दमन के साथ एक एकांत में कैसे रहती होगी।और हां दुबले पतले इरफ़ान खान जो कि समाचार पत्र के साइंस एडिटर के किरदार के रुप में है देखना ऐसा लगा मानो सही में अभिनय में उनकी दौड पान सिंह तोमर तक सार्थक रही. अब क्या डॉ.दीपांकर राय आत्महत्या करते है? ये देखना हो तो तपन सिन्हा की निर्देशकीय कला में तहकीकात करना होगी बस थोडा समय इस फ़िल्म के साथ गुजारिए,आपको ये एहसास नहीं होगा कि आप फ़िल्म देख रहे है,अपने आप को इन व्यवस्थाओं के बीच छ्टपटाते पाएंगे।
विशेष:डां.सुभाष मुखोपाध्याय जिन्हे उनकी मृत्यु के 5 वर्ष बाद एक अविष्कारक के रुप में अधिकारिक पहचान मिली।ये फ़िल्म उन असाधारण प्रतिभाओं के प्रति आदरांजली है जिन्हे हम अपने आसपास होते हुए भी नजर अंदाज कर देते है।
फ़िल्म: एक डॉक्टर की मौत
वर्ष: 31 अगस्त 1990
निर्देशन एवं स्क्रिन प्ले:तपन सिन्हा
निर्माता: नेशनल फ़िल्म्स डेव्हलपमेंट कर्पोरेशन
लेखक: रामापदा चौधरी
संगीत:वनराज भाटिया
अवार्ड:
38 वां नेशनल फ़िल्म अवार्ड(1991)
-द्वितीय बेस्ट फ़िचर फ़िल्म
-बेस्ट डायरेक्टर -तपन सिन्हा
-स्पेशल ज्युरी अवार्ड-पंकज कपुर
बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन आवार्ड (1991)
-बेस्ट फ़िल्म
-बेस्ट डायरेक्टर
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड(1992)
-बेस्ट स्क्रिन प्ले अवार्ड-तपन सिन्हा
-योगेन्द्र व्यास
एक डॉक्टर की मौत
इंसान की औसत उम्र यदि सत्तर साल मान ले और उसमें से बीस वर्ष निकाल दे तो भी पचास वर्ष साइंस पर काम करने के लिए काफ़ी कम है। दुनिया भर के लाखों वैज्ञानिक अपने अपने क्षेत्र में रिसर्च कार्यो में लगे है और इनमें से कई ऐसे है जो पारंपरिक वैज्ञानिक नहीं है यानि पीएचडी डिग्री हांसिल किए हुए नही है फ़िर भी वे इस ब्रम्हाण्ड के असिमित दायरे में अपनी खुली सोच को उन गुढ रहस्यों के निकट ले जाते है जहां एक नए विज्ञान का जन्म होता है। कई बार पारंपरिक शोधार्थी एक लीक पर चलते हुए वो परिणाम प्राप्त नहीं कर पाता जो कि एक साधारण शोधार्थी लीक से हटकर समग्रता में नए आयामों को ढुंढता है एवं वांछित परिणाम प्राप्त कर जाता है। ये ठीक वैसा ही है जैसे कबीर की आध्यात्मिक उपलब्धता की तुलना किसी पॊथी पुराण कंठस्थ पंडित से की जाए।जितनी भी वैज्ञानिक खोजे हुयी है उनमें से काफ़ी खोजे गैर पारंपरिक वैज्ञानिकों द्वारा ही की गयी है।
कोलकाता के फ़िजिशियन सुभाष मुखोपाध्याय जिन्होने भारत का पहला और विश्व का दुसरा टेस्ट ट्युब बेबी "दुर्गा" को अस्तित्व में लाने में सफ़लता हांसिल की,लेकिन दुर्भाग्य- सरकार ने इस उपलब्धी को इसे अंर्तराष्ट्रीय साईंटिफ़ीक कम्युनिटी में रखने की इजाजत तक नहीं दी,मानसिक प्रताडना,उपेक्षा,नौकरशाही रवैये से क्षुब्ध हो कर सुभाष मुखोपाध्याय ने आत्महत्या कर ली।जो व्यक्ति इस देश को बहुत कुछ दे सकता था उसे इस हश्र तक पहुंचना पडा,कई पारंपरिक वैज्ञानिकों को भी इस गैर पारंपरिक वैज्ञानिक व्यक्ति की सफ़लता पची नहीं।
निर्देशक तपन सिन्हा ने इसी घटना से प्रेरित होकर फ़िल्म "एक डॉक्टर की मौत" को बहुत ही प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है।
दीपांकर रॉय (पंकज कपुर) जो एक साधारण एम.बी.बी.एस.डॉक्टर है और एक सरकारी अस्पताल में नौकरी करता है।लेकिन साथ ही साथ उसका एक ही जुनुन है लेप्रोसी नामक बिमारी को इस पृथ्वी से जड से मिटा देना और इसके लिए वो अपने घर में ही बनी लेब में दिन रात मेहनत कर लेप्रोसी का सफ़ल वैक्सीन तैयार कर लेता है तथा ये संभावना भी प्रकट करता है कि ये वेक्सीन मातृत्व विहिन स्त्री को मातृत्व सुख भी दे सकता है।ये खबर समाचार पत्रो,एवं टेलिविजन पर भी फ़्लेश हो जाती है।इधर हेल्थ सेक्रेटरी डॉ.दीपांकर को बुला कर काफ़ी लताड लगाता है,वही ईष्यावश डॉक्टर्स का एक कुनबा डॉ. दीपांकर के विरोध में उठ खडा होता है उन्हे सार्वजनिक तौर पर काफ़ी प्रताडित किया जाता है कि एक साधारण एम.बी.बी.एस.डॉक्टर लेप्रोसी जैसे घृणित रोग का वैक्सिन कैसे बना सकता है।इसी के चलते डॉ. दीपांकर का ट्रांसफ़र एक गांव में कर दिया जाता है।लेकिन इस ज्यादती की खबर अखबार के मालिक छापने से मना कर देते है कि-हमें सरकार से विज्ञापन नहीं मिलेंगे और अखबार विज्ञापन से चलते है वैज्ञानिक से नहीं।वही ये खबर अमेरिका के जान एंडरसन फ़ाउंडेशन को लगती है।इसी फ़ाउंडेश की एक महिला सदस्य डॉ.दीपांकर से मिलने गांव आती है तथा वे डॉ. दीपांकर को जल्द से जल्द अपने रिसर्च पेपर तैयार करने को कहती है।लेकिन एक ईमानदार डॉ.को नौकरशाही पेपर बनाने का मौका तक नहीं देती है और जांच आयोग बैठा देती है,जांच कमेटी में ऐसे लोग है जिन्हे आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली दवाईयों के नाम तक नहीं पता। अतंत:एक हताश,निराश डॉ. दीपांकर नाकारॊ की कमेटी से हार मान लेता है।दुसरी और अमेरिका में लेप्रोसी के वैक्सिन तैयार करने वाले दो अमेरिकी वैज्ञानिको के नामो की घोषणा हो जाती है। ये उपलब्धि हमारे देश का गौरव बनने के बजाय अन्य देश की उपलब्धी बन जाती है। ये हमारे देश की हकीकत के काफ़ी नजदीक है। हमारे देश में आज भी कई ऐसे सुभाष मुखोपाध्याय और दीपांकर है जो अपने ही लोगो के बीच अपनी ही कु-व्यवस्थाओं से जुझ रहे है।
ये पंकज कपुर के बस में ही था कि एक किरदार को पुरी तरह आत्मसात कर ले। एक ध्यानस्थ मुनी अवस्था और पंकज कपुर के किरदार को निभाने की अवस्था लगभग एक सी ही है।शबाना आजमी ने डॉ.दीपांकर की पत्नि के किरदार को इस तरह जिया वाकई लगा कि एक जुनुनी इंसान की पत्नि अपनी सांसारिक इच्छाओं के दमन के साथ एक एकांत में कैसे रहती होगी।और हां दुबले पतले इरफ़ान खान जो कि समाचार पत्र के साइंस एडिटर के किरदार के रुप में है देखना ऐसा लगा मानो सही में अभिनय में उनकी दौड पान सिंह तोमर तक सार्थक रही. अब क्या डॉ.दीपांकर राय आत्महत्या करते है? ये देखना हो तो तपन सिन्हा की निर्देशकीय कला में तहकीकात करना होगी बस थोडा समय इस फ़िल्म के साथ गुजारिए,आपको ये एहसास नहीं होगा कि आप फ़िल्म देख रहे है,अपने आप को इन व्यवस्थाओं के बीच छ्टपटाते पाएंगे।
विशेष:डां.सुभाष मुखोपाध्याय जिन्हे उनकी मृत्यु के 5 वर्ष बाद एक अविष्कारक के रुप में अधिकारिक पहचान मिली।ये फ़िल्म उन असाधारण प्रतिभाओं के प्रति आदरांजली है जिन्हे हम अपने आसपास होते हुए भी नजर अंदाज कर देते है।
फ़िल्म: एक डॉक्टर की मौत
वर्ष: 31 अगस्त 1990
निर्देशन एवं स्क्रिन प्ले:तपन सिन्हा
निर्माता: नेशनल फ़िल्म्स डेव्हलपमेंट कर्पोरेशन
लेखक: रामापदा चौधरी
संगीत:वनराज भाटिया
अवार्ड:
38 वां नेशनल फ़िल्म अवार्ड(1991)
-द्वितीय बेस्ट फ़िचर फ़िल्म
-बेस्ट डायरेक्टर -तपन सिन्हा
-स्पेशल ज्युरी अवार्ड-पंकज कपुर
बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन आवार्ड (1991)
-बेस्ट फ़िल्म
-बेस्ट डायरेक्टर
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड(1992)
-बेस्ट स्क्रिन प्ले अवार्ड-तपन सिन्हा
-योगेन्द्र व्यास
हमने दो बुंदो से मन भर लिया (hit here for Link)
हमने दो बुंदो से मन भर लिया
प्यार को परिभाषित करना उतना ही कठिन है जितना प्यार को जानना व समझना,फ़िर भी कम शब्दों में इसे समझना हो तो ये कहा जा सकता है कि-"बिना किसी प्रयासों से हुआ भावनात्मक लगाव ही प्यार है"बहुत ही दबे पांव ये आता है और जब अचानक जब छुट कर फ़िसल जाता है तो ऐसा लगता है मानो आनंदित तैरती मछली को किसी ने किनारे पर पटक दिया हो।
ऐसी ही एक कहानी फ़िल्म "सदमा" जिसमें कि -एक सह्रदय इंसान के जज्बातो से खेलती जिंदगी उसे एक हाथ से खुशी देती है और दुसरे हाथ से दर्द का वो तकिया देती है जिस पर ना तो सिर रखा जाता है ना ही नींद आती है-"सच्चा कोई सपना होता,मेरा कोई अपना होता...सुरमई अंखियों में एक नन्हा मुन्ना सपना दे जा रे..."
महेन्द्र बालु दक्षिण के एक ऐसे प्रतिभासंपन्न निर्देशक है जिन्होने तमिल फ़िल्म"मुंडरम पिरई"का निर्देशन किया और जस का तस हिन्दी रिमेक फ़िल्म "सदमा"का निर्देशन किया।एक निर्देशक की प्रतिभा वही है कि फ़िल्म में दर्शक अपने आपको किरदारो के इतने नजदीक महसुस करे कि उनके सुख और दुख का मफ़लर खुद ही ओढा महसुस करें और कलाकरो की अदाकारी ऐसी कि देखने वाला अंत में उन्हे अपनी डबडबाई आंखो में छुपा कर अपने साथ ले जाए।
युवा सुंदर आधुनिक ख्यालात लडकी नेहलता(श्रीदेवी) का कार का एक्सीडेंट हो जाता है जिसमें उसकी याददाश्त सिर्फ़ उसके बचपन तक ही सिमट जाती है यानि शरीर से जवान दिमाग से एकदम बच्ची।अपनी मासुमियत के चलते नेहलता धोखे से वेश्यालय पहुंच जाती है जहां से सोमु(कमलहसन) उसे छुडा कर अपने साथ अपने गांव ऊंटी ले जाता है।सोमु उसे रेशमी के नाम से जानता है सोमु निच्छल भाव से उसकी शरारतों,शैतानियो को सहता है तथा कब उससे लगाव महसुस करने लगता है पता ही नहीं चलता वो चाहता है कि रेशमी ठीक हो जाए और उसकी अकेली जिंदगी में कुछ रंग भर जाए। वो रेशमी को इलाज के लिए एक वैद्य के पास ले जाता है जहां वो एकदम ठीक हो जाती है उसके मां बाप उसे लेने आ जाते है अब उसे सोमु के साथ बिताए पलो में एक पल भी याद नहीं।यही वो सीन है जहां कमल हासन सोमु किरदार को उस शिखर पर ले जाते है जहां कमल हासन नहीं बल्कि सिर्फ़ हताश,बदहवास सोमु ही नजर आते है जिसके हाथ से जिंदगी का हंसता खेलता टुकडा फ़िसलकर ट्रेन की पटरियों पर जाता दिखता है...ये दृश्य लिखा नहीं जा सकता सिर्फ़ देख कर ही उस दर्द के अहसास को महसुस किया जा सकता है। इसी दृश्य के लिए कमल हसन को मुंडरम पिरई फ़िल्म में नेशनल आवार्ड और महेन्द्र बालु को सर्वश्रेष्ट सिनेमेटोग्राफ़र आवार्ड मिला लेकिन हिन्दी रिमेक में सिर्फ़ नामिनेशन ही प्राप्त हुए।
लेकिन क्या करें..जिंदगी से शिकायत करे या प्यार तो फ़िर ये गाना सुने "ऐ जिंदगी गले लगा ले..."जिंदगी के काफ़ी नजदीक ये गाना गीतकार की कलम से शब्द ढुलक कर संगीतकार इल्याराजा के नोटेशन पर स्पंदित हो कर वायलिन की स्ट्रींग,फ़िर संतुर पर जम्प लेते हुए बांसुरी के अधरो पर बस लॆट से जाते है, फ़िर सुरेश वाडेकर अपनी रुहानी आवाज से निकल पडते है जिंदगी को गले लगाने।गुलजार सा. तो ऐसे फ़नकार है कि दो बुंदो में भी किनारा ढुंढ लेते है। एक गाने में अपने साजो से जिंदगी की पुरी सैर करा देना कोई मामुली काम तो नहीं वो ही काम इल्याराजा ने 5 मिनट 20 से. में कर दिखाया.
मात्र दो अंतरे वाले इस गाने में आप जिंदगी के साथ कुलांचे मारते नजर आएंगे,जब गाना खत्म होगा तो आप यही पाएंगे कि हमने दो बुंदो से मन भर लिया।यदि किसी को छोटा-मोटा दुख या परेशानी है तो वो डुब कर इस गाने को सुन भर ले आप किनारे पर जिंदगी को गले लगाते मिलेंगे।
विशेष:पंचम के बाद इल्याराजा ही ऐसे संगीतकार है जिन्होने वेस्टर्न,जाज को हिन्दुस्तानी फ़ोक के साथ गुंथ कर कई बेजोड संगीत रचनाएं दी है.
फ़िल्म: सदमा
वर्ष: 8 जुलाई 1983
निर्माता:राज एन.सिप्पी,रोमु एन.सिप्पी
निर्देशक एवं लेखक : बालु महेन्द्र
गीतकार: गुलजार
संगीत: इल्याराजा
गीत:
ऐ जिंदगी गले लगा ले....सुरेश वाडेकर
ओ बबुआ ये महुआ -आशा भोंसले
सुरमई अंखियों में...यसुदास
एक दफ़ा एक जंगल था.....कमल हासन श्रीदेवी
ये हवा ये फ़िजा..आशा भोंसले,सुरेश वाडेकर
हमने दो बुंदो से मन भर लिया
प्यार को परिभाषित करना उतना ही कठिन है जितना प्यार को जानना व समझना,फ़िर भी कम शब्दों में इसे समझना हो तो ये कहा जा सकता है कि-"बिना किसी प्रयासों से हुआ भावनात्मक लगाव ही प्यार है"बहुत ही दबे पांव ये आता है और जब अचानक जब छुट कर फ़िसल जाता है तो ऐसा लगता है मानो आनंदित तैरती मछली को किसी ने किनारे पर पटक दिया हो।
ऐसी ही एक कहानी फ़िल्म "सदमा" जिसमें कि -एक सह्रदय इंसान के जज्बातो से खेलती जिंदगी उसे एक हाथ से खुशी देती है और दुसरे हाथ से दर्द का वो तकिया देती है जिस पर ना तो सिर रखा जाता है ना ही नींद आती है-"सच्चा कोई सपना होता,मेरा कोई अपना होता...सुरमई अंखियों में एक नन्हा मुन्ना सपना दे जा रे..."
महेन्द्र बालु दक्षिण के एक ऐसे प्रतिभासंपन्न निर्देशक है जिन्होने तमिल फ़िल्म"मुंडरम पिरई"का निर्देशन किया और जस का तस हिन्दी रिमेक फ़िल्म "सदमा"का निर्देशन किया।एक निर्देशक की प्रतिभा वही है कि फ़िल्म में दर्शक अपने आपको किरदारो के इतने नजदीक महसुस करे कि उनके सुख और दुख का मफ़लर खुद ही ओढा महसुस करें और कलाकरो की अदाकारी ऐसी कि देखने वाला अंत में उन्हे अपनी डबडबाई आंखो में छुपा कर अपने साथ ले जाए।
युवा सुंदर आधुनिक ख्यालात लडकी नेहलता(श्रीदेवी) का कार का एक्सीडेंट हो जाता है जिसमें उसकी याददाश्त सिर्फ़ उसके बचपन तक ही सिमट जाती है यानि शरीर से जवान दिमाग से एकदम बच्ची।अपनी मासुमियत के चलते नेहलता धोखे से वेश्यालय पहुंच जाती है जहां से सोमु(कमलहसन) उसे छुडा कर अपने साथ अपने गांव ऊंटी ले जाता है।सोमु उसे रेशमी के नाम से जानता है सोमु निच्छल भाव से उसकी शरारतों,शैतानियो को सहता है तथा कब उससे लगाव महसुस करने लगता है पता ही नहीं चलता वो चाहता है कि रेशमी ठीक हो जाए और उसकी अकेली जिंदगी में कुछ रंग भर जाए। वो रेशमी को इलाज के लिए एक वैद्य के पास ले जाता है जहां वो एकदम ठीक हो जाती है उसके मां बाप उसे लेने आ जाते है अब उसे सोमु के साथ बिताए पलो में एक पल भी याद नहीं।यही वो सीन है जहां कमल हासन सोमु किरदार को उस शिखर पर ले जाते है जहां कमल हासन नहीं बल्कि सिर्फ़ हताश,बदहवास सोमु ही नजर आते है जिसके हाथ से जिंदगी का हंसता खेलता टुकडा फ़िसलकर ट्रेन की पटरियों पर जाता दिखता है...ये दृश्य लिखा नहीं जा सकता सिर्फ़ देख कर ही उस दर्द के अहसास को महसुस किया जा सकता है। इसी दृश्य के लिए कमल हसन को मुंडरम पिरई फ़िल्म में नेशनल आवार्ड और महेन्द्र बालु को सर्वश्रेष्ट सिनेमेटोग्राफ़र आवार्ड मिला लेकिन हिन्दी रिमेक में सिर्फ़ नामिनेशन ही प्राप्त हुए।
लेकिन क्या करें..जिंदगी से शिकायत करे या प्यार तो फ़िर ये गाना सुने "ऐ जिंदगी गले लगा ले..."जिंदगी के काफ़ी नजदीक ये गाना गीतकार की कलम से शब्द ढुलक कर संगीतकार इल्याराजा के नोटेशन पर स्पंदित हो कर वायलिन की स्ट्रींग,फ़िर संतुर पर जम्प लेते हुए बांसुरी के अधरो पर बस लॆट से जाते है, फ़िर सुरेश वाडेकर अपनी रुहानी आवाज से निकल पडते है जिंदगी को गले लगाने।गुलजार सा. तो ऐसे फ़नकार है कि दो बुंदो में भी किनारा ढुंढ लेते है। एक गाने में अपने साजो से जिंदगी की पुरी सैर करा देना कोई मामुली काम तो नहीं वो ही काम इल्याराजा ने 5 मिनट 20 से. में कर दिखाया.
मात्र दो अंतरे वाले इस गाने में आप जिंदगी के साथ कुलांचे मारते नजर आएंगे,जब गाना खत्म होगा तो आप यही पाएंगे कि हमने दो बुंदो से मन भर लिया।यदि किसी को छोटा-मोटा दुख या परेशानी है तो वो डुब कर इस गाने को सुन भर ले आप किनारे पर जिंदगी को गले लगाते मिलेंगे।
विशेष:पंचम के बाद इल्याराजा ही ऐसे संगीतकार है जिन्होने वेस्टर्न,जाज को हिन्दुस्तानी फ़ोक के साथ गुंथ कर कई बेजोड संगीत रचनाएं दी है.
फ़िल्म: सदमा
वर्ष: 8 जुलाई 1983
निर्माता:राज एन.सिप्पी,रोमु एन.सिप्पी
निर्देशक एवं लेखक : बालु महेन्द्र
गीतकार: गुलजार
संगीत: इल्याराजा
गीत:
ऐ जिंदगी गले लगा ले....सुरेश वाडेकर
ओ बबुआ ये महुआ -आशा भोंसले
सुरमई अंखियों में...यसुदास
एक दफ़ा एक जंगल था.....कमल हासन श्रीदेवी
ये हवा ये फ़िजा..आशा भोंसले,सुरेश वाडेकर
मौसम आएगा जाएगा प्यार सदा मुसकाएगा(फ़िल्म-शायद) Hit here for Link
मौसम आएगा जाएगा प्यार सदा मुसकाएगा
दिन भर धुप का परबत काटा,शाम को पीने निकले हम, इन गलियो में मौत लिखी थी उनमें जीने निकले हम"निदा फ़ाजली ने फ़िल्म "शायद"(1979) के लिए ये गाना उस दृश्य के लिए लिखा जब इस फ़िल्म में गरीब तबके के कई सौ लोग जहरीली शराब पीने से मर जाते है,उनमें से एक सरोज कुमार"सरोज"(नासिरुद्दीन शाह) का एक शायर मित्र भी होता है।
हालांकि कई फ़िल्में अपनी लचर पटकथा और कमजोर कथा सुत्र की वजह से नाकाम फ़िल्मों की श्रेणी में आ जाती है।कई बार ऐसा होता है कि हमारे पास साधन की समपन्नता होते हुए भी हम खुबसुरत घर नहीं बना पाते ठीक वैसे ही फ़िल्म में उच्चकोटी के कलाकार,गीतकार,संगीतकार,गायक,गायिका होने बावजुद फ़िल्म सफ़ल नहीं हो पाती क्योकि कथा-पटकथा की गंभीरता एवं वाजिब होम-वर्क ना होना।फ़िर भी आज इस फ़िल्म पर बात करने का मन कुछ कारणॊं से है-एक तो यह कि इस फ़िल्म की शुटिंग इंदौर शहर में होना, दुसरा फ़िल्म का संगीत बेहतर होना,तीसरा फ़िल्म में कलाकार के तौर पर नासिरुद्दीन शाह,ओमपुरी,विजयेन्द्र घाटगे,नीता मेहता,फ़रीदाजलाल,इफ़्तेखार,सिम्मी गरेवाल इत्यादि का होना, एवं अवाज के तौर पर मो.रफ़ी,मन्नाडे,आशा भोंसले,उषा मंगेशकर,नितिन मुकेश का होना,गीतकार के तौर पर निदा फ़ाजली,विठ्ठ्ल भाई पटेल का होना। पुरी फ़िल्म का उम्दा पहलु इसके गाने है जिसे संगीत निर्देशक मानस मुखर्जी ने सजाया है, आपको लगेगा कि अरे हां ये तो हमने सुने है-जब मन्नाडे और आशा भोसले की आवाज आकाशवाणी पर गुंजती थी कि"मौसम आएगा जाएगा.प्यार सदा मुसकाएगा"एकार्डियन पर भागती तेज ऊगलियां आपको गाने की याद ताजा करा देती है,आपको याद आया होगा-"मैं सुरज की रोशनी मैं चंदा की चांदनी..".मो.रफ़ी और आशाजी, गौर करे- "खुशबु हुं मैं फ़ुल नहीं जो मुरझाउंगा.. मॊ, रफ़ी सा. बेहतरीन नगमा जो कि निदाफ़ाजली ने लिखा था। ये कुछ बेहतरीन कृति संगीत निर्देशक मानस मुखर्जी ने दी जो कि एक प्रतिभावान संगीतकार थे।उन्होने पुर्व में संगीतकार सलील चौधरी के सहायक के रुप में काम किया। वे सफ़लता के लिए हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्रीज में संघर्ष करते रहे और कुछ चंद सफ़लता उनके हाथ लगी। जब शान 14 वर्ष और सागरिका 16 वर्ष के थे तब उनका निधन हो गया था, आज लोग उन्हे प्रसिध्द गायक "शान" के पिता के नाम से पहचानते है।
अब बताईये इस सब के बावजुद ये फ़िल्म कही गुमनामी की गर्त में पडी रहे तो इसे निर्माता का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा।
राकेश(विजयेन्द्र घाटगे) और सुधा(नीता मेहता) कालेज के सहपाठी है और एक दुसरे को पसंद भी करते है लेकिन सुधा नाचने गाने वाले परिवार से होने से इनकी शादी मुकम्मल नहीं हो पाती है.राकेश मेडिकल की पढाई के लिए शहर छोड देता है और सुधा की शादी कवि एवं लेखक सरोज कुमार "सरोज"(नासिरुद्दीन शाह) से हो जाती है।राकेश कुछ सालो बाद शहर में डाक्टर बन कर आता है,सुधा एवं सरोज कुमार से मुलाकात होती है,इसी घटना क्रम में सरोज कुमार को कैंसर हो जाता है राकेश उसे हास्पिटल में भर्ती करता है। फ़िल्म में इंदौर के एम.वाय. हास्पिटल की शुटिंग की गई है,तथा सन 70 के दशक में इंदौर में हुए जहरीली शराब त्रासदी का जिक्र भी फ़िल्मांकन के रुप में किया गया है,जिसमें सरोज के शायर मित्र की भी शराब पीने से मौत हो जाती है।हकीकत में भी कई लोग शराब पीने से अपनी जान गवां बैठे थे जिन्हे एम.व्हाय हास्पिटल में ही भर्ती किया गया था जहां पलंग भी कम पड गये थे।सुत्रो की माने तो शवों को जलाने के लिए लकडियों की कमी के चलते एक ही चिता पर कई शवों का अंतिम संस्कार किया गया था।
बहरहाल-कैंसर कि असहनीय पीडा के बीच सरोज डां.राकेश से अपनी इच्छा मृत्यु की मांग करता है और एक रात वो खुद ही इंजेक्शन ले कर अपनी जान दे देता है।सुधा राकेश पर शक करती है एवं पुलिस उसे गिरफ़्तार कर लेती है।वही हास्पिटल में भर्ती नंदलाल(ओमपुरी) को सरोज का लिखा सुसाईड नोट मिल जाता है और राकेश बरी होजाता है।ओम पुरी के अभिनय की धार तब समझ आती है जब वे में इंदौरी भाषा एवं इंदौरी लटके झटके को पकड कर अपना किरदार पेश करते है। ये फ़िल्म नासिरुद्दीन शाह और ओमपुरी के अभिनय यात्रा की आरंभिक सीढियों में से एक थी जिसमें साफ़ नजर आता है कि ये किसी अभिनय स्कुल के प्रतिभावान विद्यार्थी रहे होंगे।इस फ़िल्म में सत्तर के दशक का इंदौर जिसमें लालबाग,पिपल्यापाला,रविन्द्र नाट्य गृह,नेहरु स्टेडियम देखना अच्छा लगता है। विशेष कर हमारे शहर के प्रतिभावान कलाकार विजयेन्द्र घाटगे को अपने ही शहर में अभिनय करते देखना।बस पुरे आलेख में एक नाम नही आया तो "शायद" वो निर्देशक का ही है जिन्होने नगीने तो इकठठे कर लिए लेकिन वे एक सुंदर हार ना बना सके।खैर आप मन्ना दा और रफ़ी सा.को सुने कुछ अलहदा अहसास देगा...
विशेष:इस फ़िल्म में बेबी सागरिका मुखर्जी ने (गायक शान की बहन) "खुशबु हुं मैं...अपनी मासुम आवाज दी है।"
फ़िल्म: शायद
वर्ष: 20 मार्च 1979
निर्माता:एस.जेठवानी
निर्देशक: मदन बावरिया
संगीत: मानस मुखर्जी
गीत:
मौसम आएगा जाएगा-मन्नाडे,आशा भोंसले(गीत-विठ्ठ्ल भाई पटेल)
मैं सुरज की रोशनी....मो. रफ़ी,आशा भोंसले(गीत-विठ्ठ्ल भाई पटेल)
दिन भर धुप का परबत ...मन्नाडे,(गीत-निदा फ़ाजली )
युं जुबा हमसे सी नहीं जाती...उषा मंगेशकर(गीत-दुष्य़ंत कुमार त्यागी)
दि दिलो को ऐसे मिला लो...नितिन मुकेश प्रिति सागर(गीत-विठ्ठ्ल भाई पटेल)
खुशबु हुं मैं फ़ुल नहीं....मो.रफ़ी,बेबी सागरिका(गीत-निदा फ़ाजली )
-योगेन्द्र व्यास
yvyas2010@gmail.com
मौसम आएगा जाएगा प्यार सदा मुसकाएगा
दिन भर धुप का परबत काटा,शाम को पीने निकले हम, इन गलियो में मौत लिखी थी उनमें जीने निकले हम"निदा फ़ाजली ने फ़िल्म "शायद"(1979) के लिए ये गाना उस दृश्य के लिए लिखा जब इस फ़िल्म में गरीब तबके के कई सौ लोग जहरीली शराब पीने से मर जाते है,उनमें से एक सरोज कुमार"सरोज"(नासिरुद्दीन शाह) का एक शायर मित्र भी होता है।
हालांकि कई फ़िल्में अपनी लचर पटकथा और कमजोर कथा सुत्र की वजह से नाकाम फ़िल्मों की श्रेणी में आ जाती है।कई बार ऐसा होता है कि हमारे पास साधन की समपन्नता होते हुए भी हम खुबसुरत घर नहीं बना पाते ठीक वैसे ही फ़िल्म में उच्चकोटी के कलाकार,गीतकार,संगीतकार,गायक,गायिका होने बावजुद फ़िल्म सफ़ल नहीं हो पाती क्योकि कथा-पटकथा की गंभीरता एवं वाजिब होम-वर्क ना होना।फ़िर भी आज इस फ़िल्म पर बात करने का मन कुछ कारणॊं से है-एक तो यह कि इस फ़िल्म की शुटिंग इंदौर शहर में होना, दुसरा फ़िल्म का संगीत बेहतर होना,तीसरा फ़िल्म में कलाकार के तौर पर नासिरुद्दीन शाह,ओमपुरी,विजयेन्द्र घाटगे,नीता मेहता,फ़रीदाजलाल,इफ़्तेखार,सिम्मी गरेवाल इत्यादि का होना, एवं अवाज के तौर पर मो.रफ़ी,मन्नाडे,आशा भोंसले,उषा मंगेशकर,नितिन मुकेश का होना,गीतकार के तौर पर निदा फ़ाजली,विठ्ठ्ल भाई पटेल का होना। पुरी फ़िल्म का उम्दा पहलु इसके गाने है जिसे संगीत निर्देशक मानस मुखर्जी ने सजाया है, आपको लगेगा कि अरे हां ये तो हमने सुने है-जब मन्नाडे और आशा भोसले की आवाज आकाशवाणी पर गुंजती थी कि"मौसम आएगा जाएगा.प्यार सदा मुसकाएगा"एकार्डियन पर भागती तेज ऊगलियां आपको गाने की याद ताजा करा देती है,आपको याद आया होगा-"मैं सुरज की रोशनी मैं चंदा की चांदनी..".मो.रफ़ी और आशाजी, गौर करे- "खुशबु हुं मैं फ़ुल नहीं जो मुरझाउंगा.. मॊ, रफ़ी सा. बेहतरीन नगमा जो कि निदाफ़ाजली ने लिखा था। ये कुछ बेहतरीन कृति संगीत निर्देशक मानस मुखर्जी ने दी जो कि एक प्रतिभावान संगीतकार थे।उन्होने पुर्व में संगीतकार सलील चौधरी के सहायक के रुप में काम किया। वे सफ़लता के लिए हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्रीज में संघर्ष करते रहे और कुछ चंद सफ़लता उनके हाथ लगी। जब शान 14 वर्ष और सागरिका 16 वर्ष के थे तब उनका निधन हो गया था, आज लोग उन्हे प्रसिध्द गायक "शान" के पिता के नाम से पहचानते है।
अब बताईये इस सब के बावजुद ये फ़िल्म कही गुमनामी की गर्त में पडी रहे तो इसे निर्माता का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा।
राकेश(विजयेन्द्र घाटगे) और सुधा(नीता मेहता) कालेज के सहपाठी है और एक दुसरे को पसंद भी करते है लेकिन सुधा नाचने गाने वाले परिवार से होने से इनकी शादी मुकम्मल नहीं हो पाती है.राकेश मेडिकल की पढाई के लिए शहर छोड देता है और सुधा की शादी कवि एवं लेखक सरोज कुमार "सरोज"(नासिरुद्दीन शाह) से हो जाती है।राकेश कुछ सालो बाद शहर में डाक्टर बन कर आता है,सुधा एवं सरोज कुमार से मुलाकात होती है,इसी घटना क्रम में सरोज कुमार को कैंसर हो जाता है राकेश उसे हास्पिटल में भर्ती करता है। फ़िल्म में इंदौर के एम.वाय. हास्पिटल की शुटिंग की गई है,तथा सन 70 के दशक में इंदौर में हुए जहरीली शराब त्रासदी का जिक्र भी फ़िल्मांकन के रुप में किया गया है,जिसमें सरोज के शायर मित्र की भी शराब पीने से मौत हो जाती है।हकीकत में भी कई लोग शराब पीने से अपनी जान गवां बैठे थे जिन्हे एम.व्हाय हास्पिटल में ही भर्ती किया गया था जहां पलंग भी कम पड गये थे।सुत्रो की माने तो शवों को जलाने के लिए लकडियों की कमी के चलते एक ही चिता पर कई शवों का अंतिम संस्कार किया गया था।
बहरहाल-कैंसर कि असहनीय पीडा के बीच सरोज डां.राकेश से अपनी इच्छा मृत्यु की मांग करता है और एक रात वो खुद ही इंजेक्शन ले कर अपनी जान दे देता है।सुधा राकेश पर शक करती है एवं पुलिस उसे गिरफ़्तार कर लेती है।वही हास्पिटल में भर्ती नंदलाल(ओमपुरी) को सरोज का लिखा सुसाईड नोट मिल जाता है और राकेश बरी होजाता है।ओम पुरी के अभिनय की धार तब समझ आती है जब वे में इंदौरी भाषा एवं इंदौरी लटके झटके को पकड कर अपना किरदार पेश करते है। ये फ़िल्म नासिरुद्दीन शाह और ओमपुरी के अभिनय यात्रा की आरंभिक सीढियों में से एक थी जिसमें साफ़ नजर आता है कि ये किसी अभिनय स्कुल के प्रतिभावान विद्यार्थी रहे होंगे।इस फ़िल्म में सत्तर के दशक का इंदौर जिसमें लालबाग,पिपल्यापाला,रविन्द्र नाट्य गृह,नेहरु स्टेडियम देखना अच्छा लगता है। विशेष कर हमारे शहर के प्रतिभावान कलाकार विजयेन्द्र घाटगे को अपने ही शहर में अभिनय करते देखना।बस पुरे आलेख में एक नाम नही आया तो "शायद" वो निर्देशक का ही है जिन्होने नगीने तो इकठठे कर लिए लेकिन वे एक सुंदर हार ना बना सके।खैर आप मन्ना दा और रफ़ी सा.को सुने कुछ अलहदा अहसास देगा...
विशेष:इस फ़िल्म में बेबी सागरिका मुखर्जी ने (गायक शान की बहन) "खुशबु हुं मैं...अपनी मासुम आवाज दी है।"
फ़िल्म: शायद
वर्ष: 20 मार्च 1979
निर्माता:एस.जेठवानी
निर्देशक: मदन बावरिया
संगीत: मानस मुखर्जी
गीत:
मौसम आएगा जाएगा-मन्नाडे,आशा भोंसले(गीत-विठ्ठ्ल भाई पटेल)
मैं सुरज की रोशनी....मो. रफ़ी,आशा भोंसले(गीत-विठ्ठ्ल भाई पटेल)
दिन भर धुप का परबत ...मन्नाडे,(गीत-निदा फ़ाजली )
युं जुबा हमसे सी नहीं जाती...उषा मंगेशकर(गीत-दुष्य़ंत कुमार त्यागी)
दि दिलो को ऐसे मिला लो...नितिन मुकेश प्रिति सागर(गीत-विठ्ठ्ल भाई पटेल)
खुशबु हुं मैं फ़ुल नहीं....मो.रफ़ी,बेबी सागरिका(गीत-निदा फ़ाजली )
-योगेन्द्र व्यास
yvyas2010@gmail.com
आज फिर जीने की तमन्ना है:गाईड (Hit here for Link)
आज फिर जीने की तमन्ना है:गाईड
जिंदगी का फ़लसफ़ा गीतकार शैलेन्द्र ने बहुत ही आसान शब्दॊं में बयां करते हुए कहा है कि-"कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है पानी, पानी पे लिखी लिखाई, है सबकी देखी, है सबकी जानी, हाथ किसी के ना आनी"।वही देव आनंद साहब ने जिंदगी के केनवास से कुछ रंग लेकर अपनी फ़िल्म "गाईड" में बडी ही खुबसुरती से भरे है,जो आज भी उतनी ही ताजगी के साथ कायम है।आर.के. नारायण के उपन्यास पर आधारित इस फ़िल्म में विजय आनंद की निर्देशकीय कला फ़्रेम दर फ़्रेम आज भी भारतीय़ फ़िल्म के 100 वर्ष के इतिहास में एक दस्तावेज के रुप में कायम है।
साठ के दशक में गैर-पारंपरिक फ़िल्म का निर्माण वाकई साहसिक कदम था,जब नायिका अपने पति को छोड कर अपने नौजवान प्रेमी के साथ रहने चली जाती है इसे उस समय के हिसाब से लिव-इन रिलेशन कह सकते है।ये फ़िल्म प्रेम,आसक्ति,मद-फ़रेब,दर्शन और आत्म साक्षात्कार के साथ अपने चरम तक जाती है।राजु गाईड(देव आनंद) अपने शहर का प्रसिध्द गाईड है,उसी शहर में मार्को(किशोर साहु) अपनी पत्नि रोजी(वहीदा रहमान) के साथ आता है,चुंकि मार्को एक पुरातत्व विशेषज्ञ है तथा वहां एक प्राचीन गुफ़ा को खोजना उसका मकसद है।मार्को राजु को अपना गाईड बनाता है,वो अपने काम से लगाव के चलते रोजी को भी नजरअंदाज करता है,इसके चलते रोजी कई बार आत्महत्या का प्रयास करती है,राजु कई बार उसे बचाता है और समझाता है- बेहतर है- तुम अपने सपनो को हकीकत में बदलों और यही से रोजी एक उन्मुक्तता की उडान भरती है और अपने शौक नृत्य को पांवो में घुंघरु पहन कर पुर्नजिवित करती है और गाती है "कल के अंधेरों से निकल के देखा है आँखें मलते-मलते.....आज फ़िर जीने की तमन्ना है"।इधर राजु की महत्वाकांक्षा को पर मिल जाते है और रोजी को सफ़लता के मुकाम पर ले जाते कदम डगमगा जाते है जुए और शराब में डुब जाता है। राजु अंदर ही अंदर मार्को से असुरक्षा महसुस करता है और इसी के चलते रोजी के जाली दस्तखत करने के अपराध में दो साल की कैद में चला जाता है।तीन घंटे की यह फ़िल्म फ़्लेश बेक से शुरु होती है। राजु जेल से छुटता है लेकिन आत्मग्लानि और बदनामी के कारण किसी दुसरे शहर का रास्ता पकड लेता है और बेक ड्राप में एस.डी. बर्मन की आवाज "यहां कौन है तेरा मुसाफ़िर जाएगा कहां....."चलते चलते एक गांव में पहुंचता है जहां गांव में उसे संत समझ लिया जाता है। चुंकि पढा लिखा होने की वजह से वो उनकी समस्याएं हल कर देता है.यही से शुरु होता है राजु का तीसरा जीवन। राजु अपने बचपन की कहानी उन्हे सुनाता है जो उसकी मां ने उसे सुनाई थी एक गांव में अकाल पडता है और बारिश के लिए एक संत ने १२ दिन का उपवास रखा था और फ़िर बारिश से उस गांव का अकाल दुर होता है।संयोग से उसी गांव में अकाल पडता है और गांव के लोग राजु को ही संत के रुप में इस उपवास के लिए विनती करते है,राजु घबरा कर भागने का उपक्रम करता है लेकिन लोगो की आस्था उसे ऐसा करने नहीं देती।वो बारह दिन उसे आत्म साक्षात्कार के करीब ले जाते है वो ईश्वरीय अनुभुती को महसुस करता है"ना सुख है ना दुख है ना दिन ना दुनिया,ना इंसा ना भगवान..मैं हुं बस मैं.।बारिश होती है गांव के लोग झुम उठते है उधर राजु अनंत यात्रा की ओर निकल पडता है।
एस.डी.बर्मन ने पुरी फ़िल्म के केनवास को बहुत खुबसुरती से अपने दस गानों से सजाया है.तीन घंटे कि फ़िल्म में चालीस मिनट बर्मन दा ने संगीतिय प्रतिभा बिखेरी है।जब एक गाने की रिकार्डिंग के बाद बर्मन दा बिमार हो गए तो उन्होने देव सा. को फ़िल्म छॊडने की पेशकश की थी तब देव सा.ने कहा था दादा आपका इंतजार करूगा या एक ही गाना फ़िल्म में होगा। बर्मन दा ने वो रंग उढेले कि आज भी ये गाने कानो से ज्यादा दिल से सुने जाते है। जैसे-"तेरे मेरे सपने" और "दिन ढल जाए"में मनोहारी दादा का आल्टो साक्स पुरे गाने में मुख्य साज के रुप एक ओरा सा खींच देता है जिसे सुनना एक सुखद अनुभुति से कम नहीं.एक अलहदा बात ये कि "मोसे छल किए जाए" और "पिया तोसे नैना"में पं.शिवकुमार शर्मा ने तबले पर अपनी उंगलियो का जादु बिखेरा था."वही तेरे मेरे सपने"गाने को जयदेव साहब ने कम्पोज किया था जो कि उस समय बर्मन दा के सहायक के तौर पर थे।
"गाईड"-फ़िल्म के अलावा वो दस्तावेज है जो वहीदा रहमान की नृत्य भंगिमाएं,देव सा. की अदाकारी,बर्मन दा का संगीत,विजय आनंद की दृश्य संयोजन निपुणता कहानी के मर्म को समझने के कई आयाम देती है।
विशेष: इस फ़िल्म का क्लाईमेक्स अहमदाबाद से 90 किमी. लिमडी गांव में फ़िल्माया गया,जहां एक सीन में देव सा. को एक सुंदर विदेशी महिला पत्रकार के रोल की आवश्यकता थी वो भी पांच घंटे में,उनके मित्र भरतशीन जी ने अहमदाबाद में राह चलते विदेशी कपल को इसके लिए तैयार किया और विदेशी महिला पर सीन फ़िल्माया.
फ़िल्म: गाईड
वर्ष: 6 फ़रवरी 1965
निर्माता:देव आनंद
निर्देशक: विजय आनंद
लेखक: आर.के.नारायण
संगीत: एस.डी.बर्मन
गीतकार: शैलेन्द्र
अंग्रेजी संस्करण द्वारा:टेड डेनियलवस्की और पर्लबक
अवार्ड:
१३वां नेशनल फ़िल्म अवार्ड
फ़िल्म फ़ेयर -बेस्ट फ़िल्म अवार्ड
१४ वां फ़िल्म फ़ेयर -
बेस्ट फ़िल्म अवार्ड
बेस्ट एक्टर अवार्ड-देव आनंद
बेस्ट डायरेक्टर अवार्ड-विजय आनंद
बेस्ट नायिका अवार्ड-वहीदा रहमान
बेस्ट स्टोरी अवार्ड-आर.के.नारायण
बेस्ट डायलोग अवार्ड-विजय आनंद
बेस्ट सिनेमेटोग्राफ़ी अवार्ड-फ़ली मिस्त्री
गीत:
कांटो से खींच के लता मंगेशकर
पिया तोसे नैना लागे रे लता मंगेशकर
मोसे छ्ल किए जाए लता मंगेशकर
गाता रहे मेरा दिल लता मंगेशकर, किशोर कुमार
दिन ढल जाए मो.रफ़ी
तेरे मेरे सपने मो.रफ़ी
हे राम मन्ना डॆ
मेघ दे एस.डी.बर्मन
वहां कौन है तेरा. एस.डी.बर्मन
क्या से क्या हो गया मो.रफ़ी
आज फिर जीने की तमन्ना है:गाईड
जिंदगी का फ़लसफ़ा गीतकार शैलेन्द्र ने बहुत ही आसान शब्दॊं में बयां करते हुए कहा है कि-"कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है पानी, पानी पे लिखी लिखाई, है सबकी देखी, है सबकी जानी, हाथ किसी के ना आनी"।वही देव आनंद साहब ने जिंदगी के केनवास से कुछ रंग लेकर अपनी फ़िल्म "गाईड" में बडी ही खुबसुरती से भरे है,जो आज भी उतनी ही ताजगी के साथ कायम है।आर.के. नारायण के उपन्यास पर आधारित इस फ़िल्म में विजय आनंद की निर्देशकीय कला फ़्रेम दर फ़्रेम आज भी भारतीय़ फ़िल्म के 100 वर्ष के इतिहास में एक दस्तावेज के रुप में कायम है।
साठ के दशक में गैर-पारंपरिक फ़िल्म का निर्माण वाकई साहसिक कदम था,जब नायिका अपने पति को छोड कर अपने नौजवान प्रेमी के साथ रहने चली जाती है इसे उस समय के हिसाब से लिव-इन रिलेशन कह सकते है।ये फ़िल्म प्रेम,आसक्ति,मद-फ़रेब,दर्शन और आत्म साक्षात्कार के साथ अपने चरम तक जाती है।राजु गाईड(देव आनंद) अपने शहर का प्रसिध्द गाईड है,उसी शहर में मार्को(किशोर साहु) अपनी पत्नि रोजी(वहीदा रहमान) के साथ आता है,चुंकि मार्को एक पुरातत्व विशेषज्ञ है तथा वहां एक प्राचीन गुफ़ा को खोजना उसका मकसद है।मार्को राजु को अपना गाईड बनाता है,वो अपने काम से लगाव के चलते रोजी को भी नजरअंदाज करता है,इसके चलते रोजी कई बार आत्महत्या का प्रयास करती है,राजु कई बार उसे बचाता है और समझाता है- बेहतर है- तुम अपने सपनो को हकीकत में बदलों और यही से रोजी एक उन्मुक्तता की उडान भरती है और अपने शौक नृत्य को पांवो में घुंघरु पहन कर पुर्नजिवित करती है और गाती है "कल के अंधेरों से निकल के देखा है आँखें मलते-मलते.....आज फ़िर जीने की तमन्ना है"।इधर राजु की महत्वाकांक्षा को पर मिल जाते है और रोजी को सफ़लता के मुकाम पर ले जाते कदम डगमगा जाते है जुए और शराब में डुब जाता है। राजु अंदर ही अंदर मार्को से असुरक्षा महसुस करता है और इसी के चलते रोजी के जाली दस्तखत करने के अपराध में दो साल की कैद में चला जाता है।तीन घंटे की यह फ़िल्म फ़्लेश बेक से शुरु होती है। राजु जेल से छुटता है लेकिन आत्मग्लानि और बदनामी के कारण किसी दुसरे शहर का रास्ता पकड लेता है और बेक ड्राप में एस.डी. बर्मन की आवाज "यहां कौन है तेरा मुसाफ़िर जाएगा कहां....."चलते चलते एक गांव में पहुंचता है जहां गांव में उसे संत समझ लिया जाता है। चुंकि पढा लिखा होने की वजह से वो उनकी समस्याएं हल कर देता है.यही से शुरु होता है राजु का तीसरा जीवन। राजु अपने बचपन की कहानी उन्हे सुनाता है जो उसकी मां ने उसे सुनाई थी एक गांव में अकाल पडता है और बारिश के लिए एक संत ने १२ दिन का उपवास रखा था और फ़िर बारिश से उस गांव का अकाल दुर होता है।संयोग से उसी गांव में अकाल पडता है और गांव के लोग राजु को ही संत के रुप में इस उपवास के लिए विनती करते है,राजु घबरा कर भागने का उपक्रम करता है लेकिन लोगो की आस्था उसे ऐसा करने नहीं देती।वो बारह दिन उसे आत्म साक्षात्कार के करीब ले जाते है वो ईश्वरीय अनुभुती को महसुस करता है"ना सुख है ना दुख है ना दिन ना दुनिया,ना इंसा ना भगवान..मैं हुं बस मैं.।बारिश होती है गांव के लोग झुम उठते है उधर राजु अनंत यात्रा की ओर निकल पडता है।
एस.डी.बर्मन ने पुरी फ़िल्म के केनवास को बहुत खुबसुरती से अपने दस गानों से सजाया है.तीन घंटे कि फ़िल्म में चालीस मिनट बर्मन दा ने संगीतिय प्रतिभा बिखेरी है।जब एक गाने की रिकार्डिंग के बाद बर्मन दा बिमार हो गए तो उन्होने देव सा. को फ़िल्म छॊडने की पेशकश की थी तब देव सा.ने कहा था दादा आपका इंतजार करूगा या एक ही गाना फ़िल्म में होगा। बर्मन दा ने वो रंग उढेले कि आज भी ये गाने कानो से ज्यादा दिल से सुने जाते है। जैसे-"तेरे मेरे सपने" और "दिन ढल जाए"में मनोहारी दादा का आल्टो साक्स पुरे गाने में मुख्य साज के रुप एक ओरा सा खींच देता है जिसे सुनना एक सुखद अनुभुति से कम नहीं.एक अलहदा बात ये कि "मोसे छल किए जाए" और "पिया तोसे नैना"में पं.शिवकुमार शर्मा ने तबले पर अपनी उंगलियो का जादु बिखेरा था."वही तेरे मेरे सपने"गाने को जयदेव साहब ने कम्पोज किया था जो कि उस समय बर्मन दा के सहायक के तौर पर थे।
"गाईड"-फ़िल्म के अलावा वो दस्तावेज है जो वहीदा रहमान की नृत्य भंगिमाएं,देव सा. की अदाकारी,बर्मन दा का संगीत,विजय आनंद की दृश्य संयोजन निपुणता कहानी के मर्म को समझने के कई आयाम देती है।
विशेष: इस फ़िल्म का क्लाईमेक्स अहमदाबाद से 90 किमी. लिमडी गांव में फ़िल्माया गया,जहां एक सीन में देव सा. को एक सुंदर विदेशी महिला पत्रकार के रोल की आवश्यकता थी वो भी पांच घंटे में,उनके मित्र भरतशीन जी ने अहमदाबाद में राह चलते विदेशी कपल को इसके लिए तैयार किया और विदेशी महिला पर सीन फ़िल्माया.
फ़िल्म: गाईड
वर्ष: 6 फ़रवरी 1965
निर्माता:देव आनंद
निर्देशक: विजय आनंद
लेखक: आर.के.नारायण
संगीत: एस.डी.बर्मन
गीतकार: शैलेन्द्र
अंग्रेजी संस्करण द्वारा:टेड डेनियलवस्की और पर्लबक
अवार्ड:
१३वां नेशनल फ़िल्म अवार्ड
फ़िल्म फ़ेयर -बेस्ट फ़िल्म अवार्ड
१४ वां फ़िल्म फ़ेयर -
बेस्ट फ़िल्म अवार्ड
बेस्ट एक्टर अवार्ड-देव आनंद
बेस्ट डायरेक्टर अवार्ड-विजय आनंद
बेस्ट नायिका अवार्ड-वहीदा रहमान
बेस्ट स्टोरी अवार्ड-आर.के.नारायण
बेस्ट डायलोग अवार्ड-विजय आनंद
बेस्ट सिनेमेटोग्राफ़ी अवार्ड-फ़ली मिस्त्री
गीत:
कांटो से खींच के लता मंगेशकर
पिया तोसे नैना लागे रे लता मंगेशकर
मोसे छ्ल किए जाए लता मंगेशकर
गाता रहे मेरा दिल लता मंगेशकर, किशोर कुमार
दिन ढल जाए मो.रफ़ी
तेरे मेरे सपने मो.रफ़ी
हे राम मन्ना डॆ
मेघ दे एस.डी.बर्मन
वहां कौन है तेरा. एस.डी.बर्मन
क्या से क्या हो गया मो.रफ़ी
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