Friday, October 12, 2012

आज फिर जीने की तमन्ना है:गाईड (Hit here for Link)

आज फिर जीने की तमन्ना है:गाईड
जिंदगी का फ़लसफ़ा गीतकार शैलेन्द्र ने बहुत ही आसान शब्दॊं में बयां करते हुए कहा है कि-"कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है पानी, पानी पे लिखी लिखाई, है सबकी देखी, है सबकी जानी, हाथ किसी के ना आनी"।वही देव आनंद साहब ने जिंदगी के केनवास से कुछ रंग लेकर अपनी फ़िल्म "गाईड" में बडी ही खुबसुरती से भरे है,जो आज भी उतनी ही ताजगी के साथ कायम है।आर.के. नारायण के उपन्यास पर आधारित इस फ़िल्म में विजय आनंद की निर्देशकीय कला फ़्रेम दर फ़्रेम आज भी भारतीय़ फ़िल्म के 100 वर्ष के इतिहास में एक दस्तावेज के रुप में कायम है।
साठ के दशक में गैर-पारंपरिक फ़िल्म का निर्माण वाकई साहसिक कदम था,जब नायिका अपने पति को छोड कर अपने नौजवान प्रेमी के साथ रहने चली जाती है इसे उस समय के हिसाब से लिव-इन रिलेशन कह सकते है।ये फ़िल्म प्रेम,आसक्ति,मद-फ़रेब,दर्शन और आत्म साक्षात्कार के साथ अपने चरम तक जाती है।राजु गाईड(देव आनंद) अपने शहर का प्रसिध्द गाईड है,उसी शहर में मार्को(किशोर साहु) अपनी पत्नि रोजी(वहीदा रहमान) के साथ आता है,चुंकि मार्को एक पुरातत्व विशेषज्ञ है तथा वहां एक प्राचीन गुफ़ा को खोजना उसका मकसद है।मार्को राजु को अपना गाईड बनाता है,वो अपने काम से लगाव के चलते रोजी को भी नजरअंदाज करता है,इसके चलते रोजी कई बार आत्महत्या का प्रयास करती है,राजु कई बार उसे बचाता है और समझाता है- बेहतर है- तुम अपने सपनो को हकीकत में बदलों और यही से रोजी एक उन्मुक्तता की उडान भरती है और अपने शौक नृत्य को पांवो में घुंघरु पहन कर पुर्नजिवित करती है और गाती है "कल के अंधेरों से निकल के देखा है आँखें मलते-मलते.....आज फ़िर जीने की तमन्ना है"।इधर राजु की महत्वाकांक्षा को पर मिल जाते है और रोजी को सफ़लता के मुकाम पर ले जाते कदम डगमगा जाते है जुए और शराब में डुब जाता है। राजु अंदर ही अंदर मार्को से असुरक्षा महसुस करता है और इसी के चलते रोजी के जाली दस्तखत करने के अपराध में दो साल की कैद में चला जाता है।तीन घंटे की यह फ़िल्म फ़्लेश बेक से शुरु होती है। राजु जेल से छुटता है लेकिन आत्मग्लानि और बदनामी के कारण किसी दुसरे शहर का रास्ता पकड लेता है और बेक ड्राप में एस.डी. बर्मन की आवाज "यहां कौन है तेरा मुसाफ़िर जाएगा कहां....."चलते चलते एक गांव में पहुंचता है जहां गांव में उसे संत समझ लिया जाता है। चुंकि पढा लिखा होने की वजह से वो उनकी समस्याएं हल कर देता है.यही से शुरु होता है राजु का तीसरा जीवन। राजु अपने बचपन की कहानी उन्हे सुनाता है जो उसकी मां ने उसे सुनाई थी एक गांव में अकाल पडता है और बारिश के लिए एक संत ने १२ दिन का उपवास रखा था और फ़िर बारिश से उस गांव का अकाल दुर होता है।संयोग से उसी गांव में अकाल पडता है और गांव के लोग राजु को ही संत के रुप में इस उपवास के लिए विनती करते है,राजु घबरा कर भागने का उपक्रम करता है लेकिन लोगो की आस्था उसे ऐसा करने नहीं देती।वो बारह दिन उसे आत्म साक्षात्कार के करीब ले जाते है वो ईश्वरीय अनुभुती को महसुस करता है"ना सुख है ना दुख है ना दिन ना दुनिया,ना इंसा ना भगवान..मैं हुं बस मैं.।बारिश होती है गांव के लोग झुम उठते है उधर राजु अनंत यात्रा की ओर निकल पडता है।
एस.डी.बर्मन ने पुरी फ़िल्म के केनवास को बहुत खुबसुरती से अपने दस गानों से सजाया है.तीन घंटे कि फ़िल्म में चालीस मिनट बर्मन दा ने संगीतिय प्रतिभा बिखेरी है।जब एक गाने की रिकार्डिंग के बाद बर्मन दा बिमार हो गए तो उन्होने देव सा. को फ़िल्म छॊडने की पेशकश की थी तब देव सा.ने कहा था दादा आपका इंतजार करूगा या एक ही गाना फ़िल्म में होगा। बर्मन दा ने वो रंग उढेले कि आज भी ये गाने कानो से ज्यादा दिल से सुने जाते है। जैसे-"तेरे मेरे सपने" और "दिन ढल जाए"में मनोहारी दादा का आल्टो साक्स पुरे गाने में मुख्य साज के रुप एक ओरा सा खींच देता है जिसे सुनना एक सुखद अनुभुति से कम नहीं.एक अलहदा बात ये कि "मोसे छल किए जाए" और "पिया तोसे नैना"में पं.शिवकुमार शर्मा ने तबले पर अपनी उंगलियो का जादु बिखेरा था."वही तेरे मेरे सपने"गाने को जयदेव साहब ने कम्पोज किया था जो कि उस समय बर्मन दा के सहायक के तौर पर थे।
"गाईड"-फ़िल्म के अलावा वो दस्तावेज है जो वहीदा रहमान की नृत्य भंगिमाएं,देव सा. की अदाकारी,बर्मन दा का संगीत,विजय आनंद की दृश्य संयोजन निपुणता कहानी के मर्म को समझने के कई आयाम देती है।
विशेष: इस फ़िल्म का क्लाईमेक्स अहमदाबाद से 90 किमी. लिमडी गांव में फ़िल्माया गया,जहां एक सीन में देव सा. को एक सुंदर विदेशी महिला पत्रकार के रोल की आवश्यकता थी वो भी पांच घंटे में,उनके मित्र भरतशीन जी ने अहमदाबाद में राह चलते विदेशी कपल को इसके लिए तैयार किया और विदेशी महिला पर सीन फ़िल्माया.
फ़िल्म: गाईड
वर्ष: 6 फ़रवरी 1965
निर्माता:देव आनंद
निर्देशक: विजय आनंद
लेखक: आर.के.नारायण
संगीत: एस.डी.बर्मन
गीतकार: शैलेन्द्र
अंग्रेजी संस्करण द्वारा:टेड डेनियलवस्की और पर्लबक
अवार्ड:
  १३वां नेशनल फ़िल्म अवार्ड
    फ़िल्म फ़ेयर -बेस्ट फ़िल्म अवार्ड
 १४ वां फ़िल्म फ़ेयर -
 बेस्ट फ़िल्म अवार्ड
  बेस्ट एक्टर अवार्ड-देव आनंद
 बेस्ट डायरेक्टर अवार्ड-विजय आनंद
  बेस्ट नायिका अवार्ड-वहीदा रहमान
 बेस्ट स्टोरी अवार्ड-आर.के.नारायण
 बेस्ट डायलोग अवार्ड-विजय आनंद
 बेस्ट सिनेमेटोग्राफ़ी अवार्ड-फ़ली मिस्त्री
गीत:

  कांटो से खींच के     लता मंगेशकर      
 पिया तोसे नैना लागे रे     लता मंगेशकर      
 मोसे छ्ल किए जाए     लता मंगेशकर      
 गाता रहे मेरा दिल     लता मंगेशकर, किशोर कुमार      
 दिन ढल जाए     मो.रफ़ी      
तेरे मेरे सपने     मो.रफ़ी      
 हे राम    मन्ना डॆ      
मेघ दे    एस.डी.बर्मन      
 वहां कौन है तेरा.     एस.डी.बर्मन   
क्या से क्या हो गया        मो.रफ़ी
 

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