Friday, October 12, 2012

दुख अपने लिए रख- "आनंद" सब के लिए-(फ़िल्म -आनंद) (hit here for Link)
दुख अपने लिए रख- "आनंद" सब के लिए

जीवन किसी कांपते हुए पत्ते पर पडी ओंस की बुंद के समान है, कुछ जीवन पत्ते पर ज्यादा समय ठहर जाते है और कुछ जल्दी अपनी चमक बिखेर कर जल्दी ही ओझल हो जाते है..."जिंदगी कैसी है पहेली ये हाए ...कभी तो हंसाए कभी ये रुलाए........राजेश खन्ना की उन सभी अदाओं और अदाकारी को श्रध्दांजली- जो उनके चाहने वालो के जहन में जिंदादिल बन कर स्फ़ुर्त होती है।रीषिकेश मुखर्जी को "दर्द में मुस्कराहट ढुंढ्ने की महारत उन मध्यम-वर्गीय परिवारों से मिली जहां उन्हे जिंदगी के रंग एक खरदरे केनवास की मानिंद महसुस होते थे तभी तो उनकी फ़िल्मों में सुपरस्टारियत एक आम आदमी के किरदार में खो सी जाती है, २.८९५ किमी. लम्बी फ़िल्म "आनंद" जिसकी हर फ़्रेम में हम अपने आप को जुडा पाते है और किरदार के साथ हंसते -हंसते अचानक आंखों में नमी महसुस करने लगते है और अंत में यही ख्याल आता है कि जिंदगी लम्बाई से ज्यादा गहरी भी हो तो शायद ज्यादा खुशनुमा हो सकती है।कुछ किरदार निभाने के बाद वो हमेशा के लिए अमर हो जाते है जैसे कि आनंद सहगल(राजेश खन्ना) एक ऐसे जिंदादिल इंसान की कहानी है जो कि कैंसर(लिंफ़ोसरकोमा आफ़ इंटेस्टाइन) पिडीत होते हुए भी जिंदादिली से हंसकर उसका सामना करता है।जिंदगी में उसका कॊई नजदिकी रिश्तेदार नहीं है इसीलिए वो एक जगह कहता है कि "काश इंसान दोस्तो की तरह अपने रिश्तेदार भी चुन सकता.।" वही दुसरी ओर डा.भास्कर बेनर्जी-’बाबु-मोशाय’(अमिताभ बच्चन) जो कि खुद एक डाक्टर है लेकिन लोगो की गरीबी तंगहाली की वजह से हताश है-जो अपनी डायरी में लिखते हुए कहता है कि "दुख,बिमारी,गरीबी से लडा जा सकता है लेकिन भुख से कैसे लडा जा सकता है,जिनके पास खाने को नहीं उनको विटामिन देने से क्या फ़ायदा,लोगो के पास नमक खरीदने के लिए पैसे नहीं दवा खरीदने के लिए कैसे कहुं......"सचमुच इन बीते सालो में समय बदल गया लेकिन ये सच्चाई आज भी उतनी ही कढवी है। इसी दौरान डा.भास्कर की मुलाकात डा.प्रकाश(रमेश देव) के मार्फ़त आनंद सहगल से होती है और ये मुलाकात डा. भास्कर के जीवन में वो रंग भरती है कि वो आनंद को मरते हुए नही देखना चाहता और फ़िल्म का हर वो किरदार जो फ़्रेम में आता है आनंद सहगल से जुडता चला जाता है।महत्वपुर्ण बात ये कि यदि ये पता हो कि परिवार का कोई सदस्य अब ज्यादा दिन इस दुनिया में नहीं रहने वाला है तो वो अपनी मौत को अपने ही लोगो के चेहरे पर देखकर हताशा सी महसुस करता है-" हम आने वाले गम को खींच-तान कर आज की खुशी पर ले आते है।"आनंद किरदार का एक मजेदार पहलु ये कि वो राह चलते अजनबी शख्स को पीठ पर धौल जमा कर मुरारीलाल कहकर अपना दोस्त बना लेने की अदा के चलते उसकी मुलाकात ईसा-भाई(जानी वाकर) से हो जाती है और इसे कहते है अदाकारी- जानी वाकर मेहमान कलाकार के तौर पर दर्शकों के आंसु चुराकर ले जाते है और अपने छोटे से रोल से ईसा-भाई के पात्र को हमेशा के लिए यादगार बना कर छोड गए."...कह गए- दुख अपने लिए रख आनंद सब के लिए...."
आनंद फ़िल्म की एक विशेषता इसका बेक ग्राउंड स्कोर जो कि पात्र की आदाकारी को उसके चरम तक ले जाता है जहां सेक्साफ़ोन को बहुत ही उम्दा तौर पर इस्तेमाल किया है ,कहते है ना कि सलील चौधरी का संगीत केवल कानो में नहीं शरीर पर मुलायम थपकी देता है......डा. भास्कर और आनंद के बीच का भावातिरेक ही उनके अभिनय की जान है,ये राजेश खन्ना की पकी हुयी उम्दा अदाकारी और अमिताभबच्च्न की परिपक्व होती अदाकारी को देखना बहुत सुखद अनुभव है। गुलजार साहब के उम्दा संवाद पुरी फ़िल्म को एक आभामंडल देते है मसलन-"भगवान से सुख नहीं शांति मांगना चाहिए.."हर एक पात्र को इस फ़िल्म में बहुत करीने से गढा गया लगता है......इन आंखो को थोडा डबडबाने दे.....भावातिरेक के चरम पर थोडी देर ठहर कर देखिए बहुत हल्का महसुस करेंगे आप............यही राजेश खन्ना को सच्ची श्रध्दांजली होगी......
विशेष: "पहले रिषिकेश मुखर्जी ये रोल किशोर कुमार और मेहमुद को देने वाले थे लेकिन किसी गलत फ़हमी के चलते ये पात्र राजेश खन्ना और अमिताभ की जिंदगी की पटकथा लिख गए....."
फ़िल्म: आनंद
वर्ष: १९७१
निर्माता: रिषिकेश मुखर्जी,एन.सी. सिप्पी     
निर्देशक:रिषिकेश मुखर्जी,एन.सी. सिप्पी
लेखक: बिमल दत्ता,गुलजार
संगीत: सलील चौधरी
गीतकार: गुलजार,योगेश
गीत:
जिंदगी कैसी है पहेली .......मन्ना डे/गीत-योगेश
कहीं दुर जब दिन ढल जाए....मुकेश/गीत-योगेश
मैने तेरे लिए ही सात रंग के सपने.....मुकेश/गीत-गुलजार
ना जिया लागे ना.......लता/गीत-गुलजार
फ़िल्म अवार्ड:
 1971: नेशनल फ़िल्म अवार्ड -बेस्ट फ़िल्म
 1972: फ़िल्म फ़ेयर -बेस्ट फ़िल्म अवार्ड
1972:  फ़िल्म फ़ेयर -बेस्ट एक्टर अवार्ड-राजेश खन्ना.
1972:  फ़िल्म फ़ेयर -बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर अवार्ड-अमिताभ बच्चन.
1972:  फ़िल्म फ़ेयर -बेस्ट डायलाग अवार्ड -गुलजार
1972:  फ़िल्म फ़ेयर -बेस्ट एडिटींग अवार्ड-रिषिकेश मुखर्जी.
1972:  फ़िल्म फ़ेयर -बेस्ट स्टोरी अवार्ड-रिषिकेश मुखर्जी.

-योगेन्द्र व्यास
yvyas2010@gmail.com
 

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