Friday, October 12, 2012

तीसरी मंजिल बनाम पंचम (hit here for Link)

तीसरी मंजिल बनाम पंचम
जिस समय नासिर हुसैन और विजय आनंद तीसरी मंजिल की पटकथा पर खडॆ हो कर सस्पेंस थ्रिलर रच रहे थे वही राहुल देव बर्मन- बोसानोवा,लेटिनो,राक,जाज का वो बेहतरीन घोल तैयार कर रहे थे जो आने वाले दशको तक संगीत के रसिको को मदहोश करने वाला था।
गीतकार गुलशन बावरा ने उस समय के ख्यात संगीतकार जयकिशन जी (शंकर-जयकिशन) से पुछा कि आपको आज के दौर के संगीतकारो में किससे ज्यादा प्रतिस्पर्धात्मक भय लगता है,तब उन्होने कहा था "आज के दौर में मुझे एस.डी.बर्मन के बेटे राहुल देव बर्मन से ज्यादा से भय लगता है, ये लडका इतनी खुबसुरती से साउंड मिक्सिंग करता है कि ये आने वाले समय में म्युजिक ट्रेंड सेटर होगा और नए जमाने के संगीत के साथ लम्बे समय तक राज करेगा"।
ये बात गौर तलब है कि उस दौर में शम्मीकपुर के पसंदीदा संगीतकार शंकर-जयकिशन एवं ओ.पी. नैयर थे और तीसरी मंजिल फ़िल्म के लिए जयकिशन जी,सचिन भौमिक और मजरुह सुल्तान पुरी ने आर.डी. के नाम की सिफ़ारिश की और बकायदा आर.डी. ने शम्मीकपुर को धुनों का आडीशन दिया था,और सम्मोहित करने वाली धुन को सुनकर शम्मी ने कहा था-तुम ही मेरे संगीतकार हो पंचम।
नासिर हुसैन पहले ये फ़िल्म  देवाआनंद के साथ करने वाले थे लेकिन गाईड फ़िल्म की तैयारी के चलते वे रोल नहीं कर सके. नासिर हुसैन ने शम्मी कपुर को एच.एस.रवैल के घर से ताश की बीच बाजी में से उठाकर उन्हे तीसरी मंजिल के लिए राजी किया।
तीसरी मंजिल फ़िल्म की कहानी पर बात करने का ज्यादा मन नहीं है,क्योकि ये एक सस्पेंस,मर्डर थ्रिलर फ़िल्म है फ़िर भी -संक्षेप में - राकी(शम्मी कपुर ) एक होटल में राक सिंगर एवं ड्र्मर है और वो एक लडकी रुपा को होटल की तीसरी मंजिल से कुदते हुए देखता है, जो कि पहले राकी को सबके सामने अपने प्यार का इजहार कर चुकी है।रुपा की छोटी बहन सुनिता(आशापारेख ) राकी को ही अपनी बहन की मौत का जिम्मेदार मानती है। लेकिन राकी अपनी पहचान छुपा कर सुनिता को अपनी मोहब्बत के आगोश में ले लेता है...और इन सबके बीच रुपा की मौत हत्या है या आत्महत्या इसकी खुफ़िया पडताल और मुजरिम की चालों के बीच ये फ़िल्म अंत में असल मुजरिम को पकड्ने में कामयाब होती है।
इस फ़िल्म को हिट होने में मुख्य रुप से पंचम के संगीत का योगदान था,तो बेहतर यही होगा कि इस फ़िल्म से जुडे संगीत के दिलचस्प पहलुओ पर बाते की जाए।
इस फ़िल्म में पंचम ने पारंपरिक संगीत से हट कर अपने आर्केस्ट्रा में ब्रास सेक्शन को मुख्य धारा में जोडा जैसा कि-"ओ हसीना जुल्फ़ो वाली ...." में ड्र्म,ट्र्म्पेट,एकास्टिक्स गिटार,साक्स और वो "अंजाना ढूंढती हुं....." के बाद खली जगह को ट्राइऎंगल पर्क्युजन से बहुत ही खुबसुरती से भरा गया है। इस गाने में अस्सी वादको का पुरा हुजुम था और नोट्स और बीट को इतनी फ़ुर्ती से चेंज करना,वाकई जब रिकार्डिंग सुनते है तो अचंभा होता है, जबकि उस समय रिकार्डिंग तकनीकी इतनी उन्नत नहीं थी.. एक बार फ़िर से सुने ये गाना एक नए अंदाज में जाहिर है पंचम को दाद देने का तो मन करेगा ही......
कुछ लोग परदे के पीछे रह कर वो काम करते है कि हमें उनका नाम तक पता नहीं चल पाता जैसे कि "ओ हसीना" और "तुमने मुझे देखा" गाने में "लेसली गोडीन्हॊ ने" ड्र्म पर अपनी स्टीक का जादु चलाया था और वही परदे पर "सलीम खान" ने हेलन के साथ इसे अदा किया था जो आगे चलकर उनकी बेगम बनी. "आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा .." में लिड गिटार दिलीप नायक ने सम्हाला था जो टुकडा उन्होने बजाया था-शायद उसे जस का तस उठाना उतना ही कठिन है।"ओ मेरे सोना रे..." वो पहला गाना था जिसमें पहली बार इलेक्ट्रिक आर्गन का उपयोग हुआ और जिसे केरसी लार्ड ने बजाया था और ये गाना पहाडी धुन पर आधारित था।  तीसरी मंजिल ने पंचम को उन कलाकारों का साथ दे दिया जो पंचम को सफ़लता के सातवें आसमान तक पहुंचाने में साथ खडे रहे,उनमें से है...मनोहारी सिंग,लार्ड फ़ेमेली-केरसी,कवास,बिजुर,भानुगुप्ता,बासुदेव चक्रवर्ती,मारुतीराव कीर,देवीचंद चौहान,होमीमुलीन इत्यादि।
ये फ़िल्म बाक्स-आफ़िस पर एक म्युजिकल हिट के रुप में हमेशा याद की जाएगी लेकिन अफ़सोस इसे फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड में फ़ेयर नामिनेशन नहीं मिल सका.....लेकिन बात तो वही है जो आवाज और साज लोगो के दिल पर चढ कर बोले वो ही तो सच्चा अवार्ड है।
पंचम ने मुख्य रुप से उन सब धाराओं को तोडा है और एक ऐसा मेलोडी संगीत संसार रच कर दिया है जिसमे बस सुनने वाला  हौले से कभी गिटार स्ट्रिंग पर फ़िसलता है तो कभी ट्रंपेट के उठाव को अपने दिल पर महसुस करता है और वहीं ड्र्म स्टीक पुरे शरीर में एक मीठा सा कंपन पैदा करती है। अब ये पंचम की शिराओं में बहने वाले नोटेशन ही तो है जो आज भी साजो में दौडते है।फ़िल्म भी देखिए और इन गानो को पंचम के अंदाज में सुनिए एक नया आयाम संगीत में पाएंगे फ़िर चाहे आप संगीत के जानकार हो या ना हो।
विशेष: आशा जी ने विशेष जयमाला रेडियो शो में बताया था कि मो. रफ़ी सा. का "आजा आजा" गाना.... तीसरे टेक में रिकार्ड हुआ क्योकि पंचम उसके उठाव से संतुष्ट नहीं हो पा रहे थे।
फ़िल्म: तीसरी मंजिल
वर्ष: १९६६
निर्माता: नासिर हुसैन
निर्देशक:विजय आनंद
लेखक: नासिर हुसैन
संगीत: आर.डी. बर्मन
गीतकार: मजरुह सुल्तानपुरी
गीत:
"तुमने मुझे देखा हो कर....मो. रफ़ी.
"ओ मेरे सोना रे सोना .....मो. रफ़ी/आशा भोंसले.
"ओ हसीना जुल्फ़ों वाली जाने जहां.......मो. रफ़ी/आशा भोंसले.
"आजा आजा मैं हुं प्यार तेरा .......मो. रफ़ी/आशा भोंसले
"देखिए साहिबान वो कोई और थी.......मो. रफ़ी/आशा भोंसले
"दीवाना मुझसा नहीं इस अंबर के नीचे......मो. रफ़ी

-योगेन्द्र व्यास
 

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