Friday, October 12, 2012

हमने दो बुंदो से मन भर लिया (hit here for Link)

हमने दो बुंदो से मन भर लिया
प्यार को परिभाषित करना उतना ही कठिन है जितना प्यार को जानना व समझना,फ़िर भी कम शब्दों में इसे समझना हो तो ये कहा जा सकता है कि-"बिना किसी प्रयासों से हुआ भावनात्मक लगाव ही प्यार है"बहुत ही दबे पांव ये आता है और जब अचानक जब छुट कर फ़िसल जाता है तो ऐसा लगता है मानो आनंदित तैरती मछली को किसी ने किनारे पर पटक दिया हो।
ऐसी ही एक कहानी फ़िल्म "सदमा" जिसमें कि -एक सह्रदय इंसान के जज्बातो से खेलती जिंदगी उसे एक हाथ से खुशी देती है और दुसरे हाथ से दर्द का वो तकिया देती है जिस पर ना तो सिर रखा जाता है ना ही नींद आती है-"सच्चा कोई सपना होता,मेरा कोई अपना होता...सुरमई अंखियों में एक नन्हा मुन्ना सपना दे जा रे..."
महेन्द्र बालु दक्षिण के एक ऐसे प्रतिभासंपन्न निर्देशक है जिन्होने तमिल फ़िल्म"मुंडरम पिरई"का निर्देशन किया और जस का तस हिन्दी रिमेक फ़िल्म "सदमा"का निर्देशन किया।एक निर्देशक की प्रतिभा वही है कि फ़िल्म में दर्शक अपने आपको किरदारो के इतने नजदीक महसुस करे कि उनके सुख और दुख का मफ़लर खुद ही ओढा महसुस करें और कलाकरो की अदाकारी ऐसी कि  देखने वाला अंत में उन्हे अपनी डबडबाई आंखो में छुपा कर अपने साथ ले जाए।
युवा सुंदर आधुनिक ख्यालात लडकी नेहलता(श्रीदेवी) का कार का एक्सीडेंट हो जाता है जिसमें उसकी याददाश्त सिर्फ़ उसके बचपन तक ही सिमट जाती है यानि शरीर से जवान दिमाग से एकदम बच्ची।अपनी मासुमियत के चलते नेहलता धोखे से वेश्यालय पहुंच जाती है जहां से सोमु(कमलहसन) उसे छुडा कर अपने साथ अपने गांव ऊंटी ले जाता है।सोमु उसे रेशमी के नाम से जानता है सोमु निच्छल भाव से उसकी शरारतों,शैतानियो को सहता है तथा कब उससे लगाव महसुस करने लगता है पता ही नहीं चलता वो चाहता है कि रेशमी ठीक हो जाए और उसकी अकेली जिंदगी में कुछ रंग भर जाए। वो रेशमी को इलाज के लिए एक वैद्य के पास ले जाता है जहां वो एकदम ठीक हो जाती है उसके मां बाप उसे लेने आ जाते है अब उसे सोमु के साथ बिताए पलो में एक पल भी याद नहीं।यही वो सीन है जहां कमल हासन सोमु किरदार को उस शिखर पर ले जाते है जहां कमल हासन नहीं बल्कि सिर्फ़ हताश,बदहवास सोमु ही नजर आते है जिसके हाथ से जिंदगी का हंसता खेलता टुकडा फ़िसलकर ट्रेन की पटरियों पर जाता दिखता है...ये दृश्य लिखा नहीं जा सकता सिर्फ़ देख कर ही उस दर्द के अहसास को महसुस किया जा सकता है। इसी दृश्य के लिए कमल हसन को मुंडरम पिरई  फ़िल्म में नेशनल आवार्ड और महेन्द्र बालु को सर्वश्रेष्ट सिनेमेटोग्राफ़र आवार्ड मिला लेकिन हिन्दी रिमेक में सिर्फ़ नामिनेशन ही प्राप्त हुए।
लेकिन क्या करें..जिंदगी से शिकायत करे या प्यार तो फ़िर ये गाना सुने "ऐ जिंदगी गले लगा ले..."जिंदगी के काफ़ी नजदीक ये गाना गीतकार की कलम से शब्द ढुलक कर संगीतकार इल्याराजा के नोटेशन पर स्पंदित हो कर वायलिन की स्ट्रींग,फ़िर संतुर पर जम्प लेते हुए बांसुरी के अधरो पर बस लॆट से जाते है, फ़िर सुरेश वाडेकर अपनी रुहानी आवाज से निकल पडते है जिंदगी को गले लगाने।गुलजार सा. तो ऐसे फ़नकार है कि दो बुंदो में भी किनारा ढुंढ लेते है। एक गाने में अपने साजो से जिंदगी की पुरी सैर करा देना कोई मामुली काम तो नहीं वो ही काम इल्याराजा ने 5 मिनट 20 से. में कर दिखाया.
मात्र दो अंतरे वाले इस गाने में आप जिंदगी के साथ कुलांचे मारते नजर आएंगे,जब गाना खत्म होगा तो आप यही पाएंगे कि हमने दो बुंदो से मन भर लिया।यदि किसी को छोटा-मोटा दुख या परेशानी है तो वो डुब कर इस गाने को सुन भर ले आप किनारे पर जिंदगी को गले लगाते मिलेंगे।
विशेष:पंचम के बाद इल्याराजा ही ऐसे संगीतकार है जिन्होने वेस्टर्न,जाज को हिन्दुस्तानी फ़ोक के साथ गुंथ कर कई बेजोड संगीत रचनाएं दी है.

फ़िल्म: सदमा
वर्ष: 8 जुलाई 1983
निर्माता:राज एन.सिप्पी,रोमु एन.सिप्पी
निर्देशक एवं लेखक : बालु महेन्द्र
गीतकार: गुलजार
संगीत: इल्याराजा
गीत:
ऐ जिंदगी गले लगा ले....सुरेश वाडेकर
ओ बबुआ ये महुआ -आशा भोंसले
सुरमई अंखियों में...यसुदास
एक दफ़ा एक जंगल था.....कमल हासन श्रीदेवी
ये हवा ये फ़िजा..आशा भोंसले,सुरेश वाडेकर
 

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