Friday, October 12, 2012

आंखो ही आंखो में दर्द बांटने की कोशिश (Hit here for Link)

भागती जिंदगी में बेलगाम हांफ़ते लब्ज कई बार उन मासुस तालुओ को अपना शिकार बना लेते है जहां वे शांति की आस में कानों तक पैर पसार कर हमेशा के लिए सो जाते है।कोई शब्द नहीं ,कोई आवाज नहीं गहरे सन्नाटे में शब्द हमेशा के लिए दफ़न...दिमाग दस्तक देता है....हे..उठो..बोलो कुछ..तो सुनो..सुनो ना...कोई जवाब नहीं।आंखे है ना सब समझती है,ममतामयी पलके झपकती है,बोली मैं हुं ना तुम्हारी जबान और मैं सब सुनकर समझादुंगी..भावुक आंखो से ढुलका एक मोती गुलजार के पन्नों पर फ़ैल गया और लिख गया "कोशिश"!
गुलजार जैसे निष्णांत निर्देशक अपनी पटकथा मेज पर बैठ कर नहीं लिखते वे किरदारों के भीतर छुप कर अपनी कलम और कैमेरा फ़ोकस करते है कि-देखने वाला इन किरदारों से संवाद स्थापित करने की चेष्टा करता है।दर्शको की आंखो को सकुन देने लिए गुलजार का कैमेरा दार्जिंलिंग की वादियों या नीली रोशनी में गिरती बर्फ़ का रोमांच नहीं रचता वो हरीचरण (संजीव कुमार)एवं आरती(जयाभादुडी-बच्चन) की खामोश अंर्तमन गहराईयों से लांग शाट लेता हुआ उनकी आने वाली जिंदगी पर फ़ोकस करता है।
हरीचरण और आरती को जिंदगी एक चौराहे पर मिलाती है और होता है न कि दो व्यक्ति एक ही जबान के एक अनजान देश में मिल जाएं तो उनमें जो तसल्ली का भाव आता है वही भाव हरीचरण और आरती को महसुस होता है जब उन्हे ये पता लगता है कि वे दोनो ही मुक एवं बधीर है।दोनो ही गरीब है,हरीचरण हाकर है और आरती अपनी मां (दीनापाठक) और निकम्मे भाई(असरानी) के साथ रहती है।हरीचरण आरती का दाखिला मुकबधीर स्कुल में करा देता है और उनका मेल-जोल बाहर के शोर-गुल से बेखबर अपने दिल की आवाजें सुनने लगता है,प्रेम के भाव उमड रहे है कह नहीं पा रहे लेकिन जो आखों से छलक रहे है छोटी-छोटी चिठ्ठियों में बह रहे है और फ़िर दोनो की शादी "प्यार अंधा होता है ये तो सुना था लेकिन गुंगा बहरा हो तब भी प्यार ही होता है"ये बात अंधे नारायण अंकल (ओमशिवपुरी) कहते है जब ये दोनो अनायास ही उन्हे राह में मिल जाते है और फ़िर उनके अपने हो जाते है. गुलजार ने उन व्यवहारिक दिक्कतो को बहुत ही संजीदा तरीके से फ़्रेम दर फ़्रेम उकेरा है जो एक मुक बधिर दम्पत्ति के सामने आती है।बहुत ही मार्मिक सीन है जब वे रात में अपने बच्चे की रोने की आवाज नहीं सुन पाते और बच्चा तेज बारिश में घर के बाहर दम तोड देता है। बहुत टुट जाते है दोनो..पुरी फ़िल्म में संजीव कुमार कहीं नजर नहीं आए हरीचरण पात्र ने स्टार संजीव कुमार को कहीं पीछे छोड दिया। संजीव कुमार ने अंदरुनी खामोशी के इतने सारे रंग उडेले कि एक आंसु का हाल पुछ्ने दुसरा चला आता है। हैलो..बर्फ़ी काश कि तुमने थोडी सी कोशिश करके "कोशिश" देख ली होती।समझ नहीं आता हमें इंसपायर होने के लिए देश के बाहर अभिनय क्यो तलाशना पडता है जबकि हरीचरण पात्र भी अपने देश में उपलब्ध है।
खैर..आरती एवं हरीचरण के दुसरा बच्चा होता है।कुछ सीन दिल को छु लेने वाले है, जब एक मां को ये पता नहीं हो कि लोरी क्या होती है जब नारायण अंकल बच्चे को लोरी गा कर सुनाते है ये जया बच्चन कि अभिनय क्षमता का चरम है कि कैसे चेहरे भावों को अभिनय से प्रकट करना,फ़िर बच्चा सुन-बोल पाता है या नहीं इसकी कसमसाहट को देखना फ़िर डॉक्टर को लेकर आना और तसल्ली करना, हल्का-फ़ुल्का विनोद सुखद है।संघर्ष करते करते हरीचरण नौकरी में अच्छे ओहदे पर पहुंच जाता है लेकिन आरती खामोशी से साथ छोड़ कर चिर निंद्रा में चली जाती है....हरीचरण आज भी आखों से आरती को आवाज देने की कोशिश करता है..
कई आलोचको को फ़िल्म का अंतिम सीन पसंद नहीं जिसमें हरीचरण अपने जवान बेटे की शादी एक मुक बधीर लडकी से करने का निर्णय लेता है लेकिन बेटा इससे इंकार कर देता है। जैसा कि गुलजार पात्रो के अंदर बैठ कर कहानी कहते है इसलिए इसे एक पिता के नजरिए से देखा जाना चाहिए जो अपने बच्चे के लिए स्वार्थी नहीं हो सकता वो उसे बेहतर इंसान के रुप में देखना चाहता है ताकि वो एक मुक बधिर लडकी के लब्ज बन कर उसके मुरझाए चेहरे पर मुस्कान लौटा सके।
इस फ़िल्म ने करोडो तो नहीं कमाएं लेकिन आज भी ये फ़िल्म करोडो में एक है.."एक बार हरीचरण से मिल तो लिजिए"

विशेष:गुलजार साहब का उनकी फ़िल्मों में गीत और संगीत का नाता जग जाहिर है,लेकिन इस फ़िल्म में उन्होने संगीत को दुर रखा कारण विषय की संजीदगी या कुछ और इसका खुलासा  शायद उन्होने नहीं किया.....

फ़िल्म: कोशिश
वर्ष: 1972
निर्देशन :गुलजार
निर्माता:रोमु एन.सिप्पी,राज एन. सिप्पी
लेखक एवं गीतकार: गुलजार
संगीत:मदनमोहन

गीत:
1. "सो जा बाबा मेरे"   -    मो.रफ़ी   
2. "हमसे है वतन हमारा" -  सुषमा श्रेष्ठ   
अवार्ड:
नेशनल फ़िल्म अवार्ड (1973)
-बेस्ट स्क्रिन प्ले -गुलजार
-बेस्ट एक्टर-संजीव कुमार

योगेन्द्र व्यास
 

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