Saturday, February 23, 2013

रुपहला सफ़र -36 चौरंगी लेन-एकाकी जीवन का केनवास

36 चौरंगी लेन-एकाकी जीवन का केनवास
समाज में रहकर एकाकी जीवन व्यतित करने पर मजबुर होना ये किसी अभिशाप से कम नहीं तब ये और भयावह लगता है जब उम्र ढलान पर खडी हो।अतीत उन बडती झुर्रियो में तेजी से समाने लगता है।यह एक तरह से एक व्यक्ति की एकाकी पन से लडाई ही कही जाएगी जिसमें निरंकुश भंक सा माहौल,एकाकी जिंदगी में कोई ताजी आवाजे ना हो तो वे आवाजे स्थान ले लेती है जो किसी और को ना सुनाई देती हो ,कमरे में सजी वस्तुओं तक में उदासी पसरी पडी हो उस स्थिति की कल्पना कर के ही मन उचाट हो उठता है। क्या इस दुनिया में ऐसे भी लोग है जिन्हे भावनाओं की थाप की दरकार है।ऐसे में कुछ कदम उस ओर भी उठ जाए तो ढलती शामें भी मुस्करा सकती है।
"36 चौरंगी लेन" कोलकाता की गलियों का वो पता है जहां पर वायोलेट स्टोनहेम(जेनिफ़र केंडल) रहती है।वायोलेट स्टोनहेम एक मध्यमवर्गीय एंग्लो-इंडियन स्कुल टीचर है जिसके जीवन में दो कमरो का पुराना सा फ़्लेट,एक बिल्ली,एक बीमार भाई एडी स्टोनहेम(ज्योफ़री केंडल) जो हेल्प-एज होम में है और एक लेटर बाक्स जिसमें कभी-कभी कोई चिठ्ठी उसकी भतीजी रोजमेरी(सोनी राजदान) की आ जाती है जो थोडी मुस्कराहट की वजह बन जाती है और साथ में अतित की यादे बस।स्वतंत्रता के बाद भारत में कुछ एंग्लो-इंडियन परिवार बचे थे उनमें से कुछ बाहर जाकर बस गए और कुछ यही भारत में रह गए।ये फ़िल्म उन्ही में से एक एकाकी महिला की कहानी है जिसका अतित ही उसका परिवार है।वायोलेट हर रोज फ़ुल लेकर अपने परिजनो की कब्र पर चढाती है जहां वो अपनो के होने का एहसास करती है (उनमें से एक कब्र उस व्यक्ति की भी है जो शादी के पहले ही चल बसा) और फ़िर अपने स्कुल में जाती है जहां से वापिस थके और बोझिल कदमो से अपने घर आती है। निर्देशक अपर्णा सेन की तारीफ़ करना होगी कि उन्होने वायोलेट स्टोनहेम के किरदार के लिए जेनिफ़र केंडल को एक कृति के रुप में पेश किया है,फ़्रेम दर फ़्रेम जीवन की शांतता,उचाट मन,चेहरे और आंखो से बुझी सी जिंदगी ओढे -संवेदनशीलता को जिस तरह उकेरा है इसे एक फ़िल्मकार की गहन अंर्तद्र्ष्टी ही कहा जाएगा।अशोक मेहता की सिनेमेटॊग्राफ़ी इसे और अधिक जीवंत बनाती है जो वाकई वो महौल रचती है जिसमें ऐसा लगता है कि क्यो ना हम कुछ रंग डाल दे स्टोनहेम की जिंदगी में।
लेकिन दो किरदार और जुडते है वायोलेट स्टोनहेम की जिंदगी में नंदिता राय( देबाश्री राय ) जो वायोलेट स्टेनहोम की पुर्व छात्रा रही है और समरेश(ध्रितीमन चटर्जी) जो कि नंदिता का बाय फ़्रेड है ।इनके अचानक आने से वायोलेट स्टेनहोम जिंदगी में बहार सी आ जाती है उसका निश्चल स्नेह,पवित्र मन से दोनो का स्वागत करता है।एक नीरस घर को खुशियों की चाबी मिल जाती है।अचानक एकाकी जिंदगी से बाहर आने की खुशी स्टोनहेम के चेहरे पर देखी जा सकती है।बातो ही बातॊ में ये दोनो स्टोनहेम को इस बात के लिए राजी कर लेते है कि समरेश को नावेल लिखने के लिए एक निजता की जरुरत है और स्टेनहोम उन्हे अपना फ़्लेट दिन में उपयोग करने के लिए दे देती है।लेकिन ये दोनो फ़्लेट का उपयोग रोमांस के लिए करते है और काफ़ी अंतरंग दृश्य अपर्णा सेन ने डाले है जो अपर्णा सेन की फ़िल्मो का टेग है।दोनो की शादी हो जाती है।जब भावुकता एकाकीपन के अतिरेक से बाहर आती है तो वो अतिसंवेदनशील भी हो जाती है।स्टोनहेम समरेश को अपना पुराना ग्रामोफ़ोन और उसके रिकार्ड भी दे देती है। संवेदनशीलता तब छली जाती है जब स्टोनहेम उन्हे क्रिसमस साथ में मनाने का न्यौता देती है लेकिन वे लोग शहर से बाहर होने का बहाना बनाकर टाल देते है।स्टेनहोम सरप्राइज के तौर पर खुद केक बनाकर उनके घर देने आती है तो देखती है पुरे शबाब में पार्टी चल रही है.... टुट जाती है कपडे में लिपटा हुआ केक लेकर वापिस लौट जाती है....एकाकीपन फ़िर चादर ओढ लेता है।पुरी फ़िल्म में जेनिफ़र केंडल की अदाकारी देखने लायक है। उस समय के फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड में रेखा ने उमराव जान फ़िल्म के लिए अवार्ड लेते समय ये स्वीकारोक्ति की थी ये अवार्ड की हकदार सिर्फ़ जेनिफ़र केंडल है।फ़िल्म के निर्माता शशिकपुर जिन्हे इस फ़िल्म के शो भी अपने पैसे से करने पडे थे कुल मिलाकर ये फ़िल्म व्यवसायिक तौर पर पुरी तरह असफ़ल रही थी लेकिन अंर्तराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में इसे काफ़ी सराहना मिली एवं अवार्ड भी प्राप्त हुए।भले ही ये फ़िल्म अंगरेजी में है लेकिन एक संवेदनशील इंसान को ये फ़िल्म भाषाओ के चंगुल से बाहर खींच कर एकाकी लोगो की जिंदगी में खुशिया बिखेरने के लिए जरुर धकेलती है।
विशेष:इस फ़िल्म में जेनिफ़र केंडल के पिता ज्योफ़री केंडल ने उनके भाई एडी स्टेनहोम की भुमिका निभाई थी।

फ़िल्म:36 चौरंगी लेन(२९ अगस्त १९८१)
निर्माता: शशिकपुर
निर्देशक एवं लेखक : अपर्णा सेन
संगीत:वनराज भाटिया
सिनेमेटोग्राफ़ी-अशोक मेहता
अवार्ड:
नेशनल फ़िल्म अवार्ड-
सिल्वर लोटस आवार्ड-बेस्ट फ़िल्म(अंगरेजी)
गोल्डन लोटस आवार्ड-बेस्ट डायरेक्टर-अपर्णा सेन
सिल्वर लोटस आवार्ड-बेस्ट सिनेमेटो ग्राफ़ी- अशोक मेहता
ब्रिटिश फ़िल्म अवार्ड-बेस्ट एक्ट्रेस -जेनिफ़र केंडल
गोल्डन एज अवार्ड-बेस्ट फ़िचर फ़िल्म-अपर्णा सेन


Saturday, February 16, 2013

रुपहला सफ़र इस रविवार :नरम नरम रात में-गरम गरम चांद पर

नरम नरम रात में-गरम गरम चांद पर
इस संसार में इंसान ही एक ऐसा प्राणी है जो हंस सकता है और जिस पर हंसा जा सकता है।आज के कलुषित भरे वातावरण में जहां कुटिल हंसी का बोलबाला है वहां स्वस्थ्य हास्य सहज उपलब्ध हो जाए तो क्या बात है। ऋषिकेश मुखर्जी फ़िल्मो में हास्य प्रस्तुतिकरण के मामले में अव्वल कहे जा सकते है।गोलमाल(1979) की सफ़लता के बाद उसी तर्ज पर उन्होने नरम-गरम(1981) नाम की हास्य प्रधान फ़िल्म का निर्माण किया जिसमें उन्होने ये सिध्द किया कि एक फ़िल्मकार को अपने दर्शको को गुदगुदाने के लिए कोई बहुत बडे तामझाम की जरुरत नहीं जैसा कि आजकल की कथित हास्यप्रधान फ़िल्मो में होता है-"सहज रुप से अंर्तमन से हास्य बोध हो वो ही असल हास्य है।"
भवानी शंकर(उत्पल द्त्त)जो कि कंजुस अमीर विधुर है लेकिन साथ ही अति अंधविश्वासी भी है जब एक किरदार में इतने गुण है और अगर वो उत्पल द्त्त है तो निश्चित तौर समझिए कि हास्य का पुरा पुरा इंतजाम है ।भवानी शंकर एकदम खुर्राट किस्म का इंसान है जो अपनी सास(दीना पाठक) के अलावा किसी से नहीं डरता। एक किरदार है रामप्रसाद(अमोल पालेकर) जो कि भावानी शंकर के यहां मामुली नौकरी करता है पर काम बडॆ-बडे करता है।सिर्फ़ शर्ट-पैजामे में पुरी फ़िल्म के किरदार को जी जाना और सहज रुप से हंसी का पात्र बन जाना ये ही आमोल पालेकर की खासियत रही है।ये ही काम आज अच्छे से अच्छे हास्य कलाकार अपने चेहरे,आंखो शरीर को पुरा तोडमरोड ना ले तब तक दर्शको की हंसी नहीं निकाल पाते।कुसुम(स्वरुप सम्पत) एक गरीब विष्णु प्रसाद(ए.के.हंगल) की बेटी है और रामप्रसाद से प्यार करती है।लेकिन रामप्रसाद की इतनी तनख्वाह नहीं है कि वो कुसुम से शादी कर सके।गरीब विष्णु प्रसाद के घर को गांव का महाजन कुर्क कर लेता है और वो कुसुम को लेकर रामप्रसाद के पास भावानी शंकर के मकान में रहने आ जाता है।सुंदर कुसुम को देखकर भवानी शंकर का भ्रष्ट मैनेजर विष्णु प्रसाद के समक्ष कुसुम से शादी का प्रस्ताव रखता है अब यही से शुरु होता है असल ड्रामा,राम प्रसाद किस तरह से झुठ बोलकर ये शादी रुकवाता है और फ़िर एक किरदार के रुप से भवानी शंकर का भाई काली शंकर(शत्रुध्न सिन्हा) का प्रवेश होता है वो भी कुसुम से शादी करना चाहता है फ़िर भवानी शंकर खुद ये शादी करना चाहता है इन सब के बीच रामप्रसाद कैसे इन परिस्थितियो से निबटता है ये वाकई देखने लायक है।पुरी फ़िल्म में हंसी का सिलसिला जो शुरु होता है वो "द एन्ड" में जाकर ही खत्म होता है।एक बहुत ही सकुन भरी फ़िल्म आपको तनाव से दुर रखने का पुरा ख्याल रखती है।पुरी फ़िल्म फ़ुहडता से परे एक नितांत सात्विक और मौलिक हास्य के रुप में सामाजिक संदेश भी दे जाती है कि अंधविश्वास के जाल में इंसान का बडा नुकसान होने की पुर्ण संभावना रहती है।शत्रुध्न सिन्हा पहली बार एक हास्य फ़िल्म में एक उम्दा प्रस्तुती के साथ दाखिल हुए है रामलीला वाला दृश्य काफ़ी गुदगुदाता है, वही ओमप्रकाश ने पंडित के किरदार में अपनी छोटी सी भुमिका से हास्य की फ़ुहार छोडी है वो तारीफ़े काबिल है।
फ़िल्म का संगीत पंचम ने दिया है टाइटल गीत "नरम नरम रात में गरम गरम चांद पर" उम्दा बन पडा है, धुन गोलमाल से उठाई गयी है लेकिन कहीं कुछ कसर रह गई लगती है जहां गुलजार,ऋषिकेश मुखर्जी,पंचम जैसी तिकडी हो वहां लगता है संगीत के मामले में चावल कुछ अधपका सा रह गया लगता है।ऋषि दा ने एक मासुम से झुठ को हास्य का जामा पहना कर कई हिट फ़िल्म दी है मसलन चुपके-चुपके,गोलमाल,झुठ बोले कव्वा काटे इत्यादि।फ़ुरसत ना हो तो निकालकर थोडा "नरम-गरम" ठहाके हो जाए.....
फ़िल्म: नरम-गरम(1981)
निर्माता: सुभाष गुप्ता,उदय नारायण सिंह
निर्देशक:ऋषिकेश मुखर्जी
लेखकीय योगदान:शानु मुखर्जी,मनोज बसु,डी.एन.मुखर्जी,अशोक रावत,
संवाद:राही मासुम रजा
गीत:गुलजार
संगीत:आर.डी.बर्मन
गीत:
1     मेरे अंगना आए-आशा भोंसले
2     हमें रास्तो की जरुरत नहीं-आशा भोंसले
3     मेरे चेहरे में छुपा-आशा भोंसले
4     एक बात सुनी है -सुषमा श्रेष्ठ,शत्रुध्न सिन्हा
5     नरम नरम रात में -सपन चक्रवर्ती,आर.डी.बर्मन
विशेष: इस फ़िल्म में एक गाना"हमें रास्तो की जरुरत नहीं"जो कि उस समय तो हिट नही हुआ लेकिन पंचम ने इसी गाने की हुबहु धुन फ़िल्म सागर(1985) में "सागर किनारे..." में उपायोग की और देखिए उस गाने का तिलस्म आज भी कायम है।


Sunday, February 10, 2013

बिना गानो की फ़िल्म 1960 में:कानुन

http://www.epaperdainikdabangdunia.com/Details.aspx?id=5737&boxid=181938250
समाज में धर्म एक जीवन शैली है जिसमें सामुहिक तौर रहने के तौर तरीके-मसलन सदाचार,नैतिकता,ईमानदारी,सहिष्णुता एवं दुसरो के हित की रक्षा इत्यादि की सीख दी जाती है।जब मनुष्य़ इन दायरो के बाहर जाता है तो कानुन उसकी समीक्षा कर दोषी को दंडित करता है।आज धर्म के पांडालो में भी उतनी भीड है जितनी की अदालतॊ में।अब ऐसे में चुनैतिया दोनो ही जगह बराबर की है।ऐसे में गुनाहगार और बेगुनाह के द्वंद को मथना वाकई एक विचारणीय मुद्दा है क्योकि कानुन को जो दिखाया जाता है वही देखता है ऐसे में अगर गवाही सच्ची है तो इंसाफ़ सच्चा और यदि गवाही झुठी तो इंसाफ़ भी झुठा। ऐसे में बेगुनाही साबित करना अति कठिन होता है और जब गुनाहगार कानुन की गलियों का फ़ायदा उठा कर बच निकलता है तो वो आने वाले मुकदमो की नजीर बन जाता है।कई मर्तबा कानुन भय पैदा करता है इसीलिए लोग ये संज्ञा  देने लगे है कि कानुन के पचडे में ना पडा जाए तो ही बेहतर है,ऐसा इसलिए कि कोर्ट कचहरी के अनुभव बहुत अच्छे नहीं कहे जा सकते।कानुन ने पचडे की शक्ल इसीलिए ली कि कानुन के पंडितो ने इसे एक चक्रव्युह के रुप में इजाद कर लिया और जो इस चक्रव्युह में फ़ंसा उसे अपनी जिंदगी को दाव पर लगाना पढा।
बी.आर. चोपडा ने फ़िल्म "कानुन" में उन तथ्यो को रखने की कोशीश की जिसमें किस तरह व्यक्ति हत्या के आरोप में गुनाही और बेगुनाही की जद्दोजहद के बीच झुलता है। उसे उन साक्ष्य और गवाहों के आधार पर दोषी साबित करने की कोशिश की जाती है जो कि परिस्थिति जन्य पैदा हुए है।ऐसे में अदालत के सामने इंसाफ़ एक चुनैती है कि फ़ैसला कानुन की किताबो से करें या इंसानियत के आधार पर करें।
फ़िल्म के आरंभ में कालिदास (जीवन) एक गणपत नाम के व्यक्ति की हत्या के अरोप में जज बद्रीप्रसाद(अशोक कुमार) की आदालत में पेश होता है वो ये दलील देता है इसी गणपत नाम के व्यक्ति की हत्या के आरोप में वो बेगुनाह होते हुए भी दस साल जेल में सजा काट चुका है इसलिए देश का कोई भी कानुन उसे सजा नहीं दे सकता।क्या एक आदमी का खुन दो बार किया जा सकता है।अगर गणपत खुन दस साल पहले हुआ तो मुझे आज यहां अदालत में क्यो लाया गया है और यदि गणपत का खुन आज हुआ है तो दस साल पहले मुझे किस बात की सजा दी गयी।जो वाकई चौकाने वाला तथ्य है ऐसे में अगर फ़ैसला गलत हो तो उसे वापिस लिया जा सकता है लेकिन अगर ऐसे में किसी को फ़ांसी होगयी तो उस दशा में कानुन क्या करेगा? आज इस तरह के कई घटना क्रम आए दिन होते है जिसमें  बेगुनाह को एक आरोपी तरह खडा कर दिया जाता है।मसलन यदि कोई एक्सीडेंट हो गया है और आरोपी की गाडी का नंबर नहीं होने की दशा में इंश्योरेंस क्लेम के लिए कोई नंबर छांट कर लिखवा दिया जाता है और उस बेगुनाह व्यक्ति को आरोपी बना कर खडा कर दिया जाता है जो एक्सीडेंट उसने किया ही नहीं।ऐसे में अदालत के सामने झुठ का पुलिंदा सच के रुप दिखाया जाता है।बहरहाल फ़िल्म में आगे के घटना क्रम में एक बार फ़िर ऐसे हालात बनते है कि कैलाश खन्ना(राजेन्द्र कुमार) जो कि एक सरकारी वकील है और जज बद्रीनाथ का होने वाला दामाद भी।वो जज बद्रीनाथ को शहर के साहुकार धनीराम(ओमप्रकाश) का खुन करते हुए देख लेता है।बद्रीप्रसाद का बेटा विजय(मेहमुद) जो कि आवारा किस्म की फ़ितरत रखता है और धनीराम से काफ़ी कर्ज ले लेता है उसी सिलसिले में विजय की बहन मीना (नंदा) कैलाश को धनीराम से बात करने के के लिए कहती है और उसी समय उसका खुन हो जाता है।इसी खुन के आरोप में एक चोर कालिया(नाना पलसीकर) पकडा जाता है जो महज चोरी करने के इरादे से धनीराम के घर में घुसता है।बस यही से शुरु होता है अदालती ड्रामा मीना समझती है कि कैलाश आरोपी है इसलिए चुप रहती है ,कैलाश चुप रहता है तो कालिया गुनाहगार साबित होता है।आखिरकार कैलाश जज बद्रीप्रसाद पर आरोप लगाता है तो मीना कालिया को गुनाह कबुल करने के लिए राजी कर लेती है।अब फ़िल्म देखनी ही चाहिए कि आखिर सच्चाई क्या है।अशोक कुमार नाना पलसीकर अभिनय तारिफ़े काबिल है।सलील चौधरी का बेक ग्राऊंड म्युजिक काफ़ी हुनर मंद और सधा हुआ लगता है।
बी.आ.चोपडा की तारीफ़ करना होगी उन्होने सन साठ के दशक में एक ऐसी फ़िल्म बनाने जोखिम लिया जिसमें एक भी गाना नहीं जबकि उस समय के दौर में एक फ़िल्म में आठ से दस गानो की भरमार रहती थी। ये फ़िल्म अंत में वही विषय उठती है कि मृत्युदंड दिया जाना चाहिए या नहीं। हालात की मजबुरी किस तरह गवाहों को सच को झुठ और झुठ को सच बनाने में मजबुर कर देते है।क्योकि जान के बदले जान इंसाफ़ नहीं इंतेकाम ही कहलाएगा।
फ़िल्म :कानुन(१९६०)
निर्माता: बी.आर.चोपडा,स्वरुप सिंग
निर्देशक:बी.आर.चोपडा
लेखक: अख्तर-उल-इमान,सी.जे. परवी
संगीत: सलील चौधरी
अवार्ड:
नेशनल फ़िल्म अवार्ड-बेस्ट फ़ीचर फ़िल्म(सर्टिफ़िकेट आफ़ मेरिट)
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड-
बेस्ट डायरेक्टर-बी.आर. चोपडा
बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर-नाना पलसीकर

Saturday, February 2, 2013

कहानी:जो न कही गयी न सुनी गई-सिर्फ़ देखी गई

रुपहला सफ़र :एक झकझॊर देने वाली दास्तां -1971
१९७१ का बाग्लादेश युध्द पाकिस्तान के साथ लडा गया जिसकी टीस आज भी उन ५४ परिवारों के जहन में मौजुद है जिसमें किसी का पति,बेटा,भाई आज तक लौट कर नहीं आया,जिन्हे युध्द बंदी के तौर पर पाकिस्तान ने नहीं लौटाया। जिन्हे आखिरी बार १९८८ में देखा गया ऐसा बताया जाता है। वही युध्द समाप्ति पर भारत ने ९० हजार सैनिको को उदारता पुर्वक लौटा दिया था।जबकि एक संधी के तहत युद्ध बंदी सैनिको को लौटाना एक अनिवार्य प्रक्रिया है।
इसी संदर्भ पर आधारित फ़िल्म १९७१ उन बेहतरीन फ़िल्मो में शुमार है जो कि भारत में अब तक बनी फ़िल्मों में श्रेष्टतम प्र्स्तुती कही जा सकती है लेकिन ना जाने क्यो इस फ़िल्म पर बहुत ज्यादा चर्चा नहीं की गय़ी।अमृत सागर और पियुष मिश्रा की ये अति ईमानदार कोशिश एवं उन युध्द बंदियों के प्रति अश्रुपुरित आदरांजली है जिसमें उन्होने संपुर्ण फ़िल्म को सच्चाई से रख कर अतिरंजना से बचाया।
सन १९७७ चकलाला केंप पाकिस्तान जहां पर देशभर की जेलों से हिन्दुस्तानी युध्द बंदी सैनिको को लाकर एक अनजान जगह पर रखा जाता है जिसमें १९६५ की जंग और १९७१ की जंग के सैनिक है।इनमें से कई सैनिक ऐसे है जिनकी मानसिक स्थिति ऐसी है कि उन्हे अपना देश तो क्या खुद का नाम पता तक नहीं पता।इन्ही में से ६ सैनिक दुस्साहस और जोखिम से भरा निर्णय लेते है कि वे इस केम्प से भाग कर अपने देश हिन्दुस्तान जाएंगे।लेकिन फ़िल्म देखते समय हमें यही लगता है कि ये छ: नहीं सात है क्योकि देखने वाला खुद सातवां बनकर उनके साथ जुड जाता है और ये ही स्क्रीन प्ले लिखने वाले का कमाल है कि हम अपनेआप को किरदार के साथ जॊड ले और अंत तक उसी मनस्थिति में रहे जब तक फ़िल्म अंत ना हो जाए। इसकेलिए पियुष मिश्रा और अमृत सागर को सलाम करने को जी चाहता है।
मेजर सुरज सिंह-राजपुताना बटालियन(मनोज बाजपेयी) से है जिन्हे उडी सेक्टर से पकडा जाता है और जो पहले तीन बार पाकिस्तान से भागने की कोशिश कर चुके है।के.जैकब(रवि किशन),फ़्ला.लेटि.गुर्टु(दीपक डोबरियाल),जवान एहमद(चितरंजन दास),फ़्ला.लेटि. राम (मानव कौल),केप्टन कबीर(कुमुद मिश्रा) ये सभी मिल कर केम्प से भागने का प्लान उस समय करते है जब इन्हे पाकिस्तान की कुटिल चाल का पता लगता है कि इंटरनेशनल रेडाक्रास और पाकिस्तान मानव अधिकार आयोग की आंखो में धुल झोंकने के लिए सारे युध्द बंदियो को गोपनीय रुप से सारी जेलो से निकाल कर एक जगह इकठ्ठा किया जाता है और ये आश्वासन दिया जाता है कि उन्हे जल्द ही पाकिस्तान सरकार रिहा करेगी और धोखे से रेड्क्रास और मानवाधिकार आयोग को सरकार और सेना ने नुमाइंदे अश्वस्त कर देते है देश की किसी भी जेल में युध्द बंदी नहीं है।
किस तरह से ये छ: सैनिक अपने कौशल का इस्तेमाल कर केम्प से भाग निकलते है अपने वतन हिन्दुस्तान की ओर सिर्फ़ ये सोच कर कि  यहां तिल-तिल कर मरने से तो अच्छा है एक कोशिश अपने वतन जाने की की जाए।ये फ़िल्म देखते वक्त बार बार ये ही वेदना मन में उठती है कि सरकारो के अगर ईमानदार प्रयास होते तो आज इन युध्द बंदियो के परिवारो के चेहरे पर मुस्काने होती।मन द्रवित हो उठता है जब किरदार ये कहता है"हिन्दुस्तान ने हमें क्यो भुला दिया और पाकिस्तान हमें क्यो भुला देना चाहता है"।मनोज बाजपेयी के अब तक का श्रेष्ठतम अभिनय में कहा जा सकता है।रविकिशन,दीपक डोबरियाल मानव कौल ने अपने अभिनय की वो छाप छोडी है कि अंत में हम अपने आप को सुन्न सा पाते है और आंखो में अश्रुधारा।इस फ़िल्म की समीक्षा लिखते हुए मन बहुत उदास है आज कोई मनोरंजन नहीं,किस हाल में होंगे हमारे युध्द बंदी वीर सैनिक ,हमारे हुक्मरानो को अब तो ये बात समझ आनी चाहिए कि हमें कटे सिरों के बदले उन जिंदा सिरो को लाने का प्रण करना चाहिए जो अपनी मातृ भूमी को चुमने के लिए तडप रहे है। इन छ: अदम्य साहसी सैनिको की कहानी उस वास्तविकता के नजदीक है जिसे हर हिन्दुस्तानी और हुक्मरानों को अवश्य देखना चाहिए ताकि उस दर्द के एहसास को कम से कम २ घंटे के लिए तो महसुस कर सके।
क्या ये छ: सैनिक हिन्दुस्तान पहुंच पाते है ये लिखने की ताकत नहीं है आप खुद देखिए......."
फ़िल्म:१९७१ वर्ष: 9 March 2007
निर्माता: अमृत सागर,मोती सागर
निर्देशक: अमृत सागर
लेखक: पीयुष मिश्रा,अमृत सागर
संगीत: आकाश सागर
सिनेमेटोग्राफ़ी-चितरंजन दास
अवार्ड:नेशनल फ़िल्म अवार्ड -बेस्ट फ़िल्म
गीत:
१.भांगडा पौना-कैलाश खैर (गीत-देव कोहली)
२.साजना-हर्ष दीप कौर(गीत-देव कोहली)
३.काल के अंतिम पलो तक-कोरस एरिक पिल्लई(गीत-गोपालदास निरज)
४.सह लेंगे हम-शिबानी कश्यप(गीत-जहीर अनवर)
विशेष:फ़िल्म के निर्देशक अमृत सागर -रामानंद सागर के पुत्र है।

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