Saturday, February 2, 2013

कहानी:जो न कही गयी न सुनी गई-सिर्फ़ देखी गई

रुपहला सफ़र :एक झकझॊर देने वाली दास्तां -1971
१९७१ का बाग्लादेश युध्द पाकिस्तान के साथ लडा गया जिसकी टीस आज भी उन ५४ परिवारों के जहन में मौजुद है जिसमें किसी का पति,बेटा,भाई आज तक लौट कर नहीं आया,जिन्हे युध्द बंदी के तौर पर पाकिस्तान ने नहीं लौटाया। जिन्हे आखिरी बार १९८८ में देखा गया ऐसा बताया जाता है। वही युध्द समाप्ति पर भारत ने ९० हजार सैनिको को उदारता पुर्वक लौटा दिया था।जबकि एक संधी के तहत युद्ध बंदी सैनिको को लौटाना एक अनिवार्य प्रक्रिया है।
इसी संदर्भ पर आधारित फ़िल्म १९७१ उन बेहतरीन फ़िल्मो में शुमार है जो कि भारत में अब तक बनी फ़िल्मों में श्रेष्टतम प्र्स्तुती कही जा सकती है लेकिन ना जाने क्यो इस फ़िल्म पर बहुत ज्यादा चर्चा नहीं की गय़ी।अमृत सागर और पियुष मिश्रा की ये अति ईमानदार कोशिश एवं उन युध्द बंदियों के प्रति अश्रुपुरित आदरांजली है जिसमें उन्होने संपुर्ण फ़िल्म को सच्चाई से रख कर अतिरंजना से बचाया।
सन १९७७ चकलाला केंप पाकिस्तान जहां पर देशभर की जेलों से हिन्दुस्तानी युध्द बंदी सैनिको को लाकर एक अनजान जगह पर रखा जाता है जिसमें १९६५ की जंग और १९७१ की जंग के सैनिक है।इनमें से कई सैनिक ऐसे है जिनकी मानसिक स्थिति ऐसी है कि उन्हे अपना देश तो क्या खुद का नाम पता तक नहीं पता।इन्ही में से ६ सैनिक दुस्साहस और जोखिम से भरा निर्णय लेते है कि वे इस केम्प से भाग कर अपने देश हिन्दुस्तान जाएंगे।लेकिन फ़िल्म देखते समय हमें यही लगता है कि ये छ: नहीं सात है क्योकि देखने वाला खुद सातवां बनकर उनके साथ जुड जाता है और ये ही स्क्रीन प्ले लिखने वाले का कमाल है कि हम अपनेआप को किरदार के साथ जॊड ले और अंत तक उसी मनस्थिति में रहे जब तक फ़िल्म अंत ना हो जाए। इसकेलिए पियुष मिश्रा और अमृत सागर को सलाम करने को जी चाहता है।
मेजर सुरज सिंह-राजपुताना बटालियन(मनोज बाजपेयी) से है जिन्हे उडी सेक्टर से पकडा जाता है और जो पहले तीन बार पाकिस्तान से भागने की कोशिश कर चुके है।के.जैकब(रवि किशन),फ़्ला.लेटि.गुर्टु(दीपक डोबरियाल),जवान एहमद(चितरंजन दास),फ़्ला.लेटि. राम (मानव कौल),केप्टन कबीर(कुमुद मिश्रा) ये सभी मिल कर केम्प से भागने का प्लान उस समय करते है जब इन्हे पाकिस्तान की कुटिल चाल का पता लगता है कि इंटरनेशनल रेडाक्रास और पाकिस्तान मानव अधिकार आयोग की आंखो में धुल झोंकने के लिए सारे युध्द बंदियो को गोपनीय रुप से सारी जेलो से निकाल कर एक जगह इकठ्ठा किया जाता है और ये आश्वासन दिया जाता है कि उन्हे जल्द ही पाकिस्तान सरकार रिहा करेगी और धोखे से रेड्क्रास और मानवाधिकार आयोग को सरकार और सेना ने नुमाइंदे अश्वस्त कर देते है देश की किसी भी जेल में युध्द बंदी नहीं है।
किस तरह से ये छ: सैनिक अपने कौशल का इस्तेमाल कर केम्प से भाग निकलते है अपने वतन हिन्दुस्तान की ओर सिर्फ़ ये सोच कर कि  यहां तिल-तिल कर मरने से तो अच्छा है एक कोशिश अपने वतन जाने की की जाए।ये फ़िल्म देखते वक्त बार बार ये ही वेदना मन में उठती है कि सरकारो के अगर ईमानदार प्रयास होते तो आज इन युध्द बंदियो के परिवारो के चेहरे पर मुस्काने होती।मन द्रवित हो उठता है जब किरदार ये कहता है"हिन्दुस्तान ने हमें क्यो भुला दिया और पाकिस्तान हमें क्यो भुला देना चाहता है"।मनोज बाजपेयी के अब तक का श्रेष्ठतम अभिनय में कहा जा सकता है।रविकिशन,दीपक डोबरियाल मानव कौल ने अपने अभिनय की वो छाप छोडी है कि अंत में हम अपने आप को सुन्न सा पाते है और आंखो में अश्रुधारा।इस फ़िल्म की समीक्षा लिखते हुए मन बहुत उदास है आज कोई मनोरंजन नहीं,किस हाल में होंगे हमारे युध्द बंदी वीर सैनिक ,हमारे हुक्मरानो को अब तो ये बात समझ आनी चाहिए कि हमें कटे सिरों के बदले उन जिंदा सिरो को लाने का प्रण करना चाहिए जो अपनी मातृ भूमी को चुमने के लिए तडप रहे है। इन छ: अदम्य साहसी सैनिको की कहानी उस वास्तविकता के नजदीक है जिसे हर हिन्दुस्तानी और हुक्मरानों को अवश्य देखना चाहिए ताकि उस दर्द के एहसास को कम से कम २ घंटे के लिए तो महसुस कर सके।
क्या ये छ: सैनिक हिन्दुस्तान पहुंच पाते है ये लिखने की ताकत नहीं है आप खुद देखिए......."
फ़िल्म:१९७१ वर्ष: 9 March 2007
निर्माता: अमृत सागर,मोती सागर
निर्देशक: अमृत सागर
लेखक: पीयुष मिश्रा,अमृत सागर
संगीत: आकाश सागर
सिनेमेटोग्राफ़ी-चितरंजन दास
अवार्ड:नेशनल फ़िल्म अवार्ड -बेस्ट फ़िल्म
गीत:
१.भांगडा पौना-कैलाश खैर (गीत-देव कोहली)
२.साजना-हर्ष दीप कौर(गीत-देव कोहली)
३.काल के अंतिम पलो तक-कोरस एरिक पिल्लई(गीत-गोपालदास निरज)
४.सह लेंगे हम-शिबानी कश्यप(गीत-जहीर अनवर)
विशेष:फ़िल्म के निर्देशक अमृत सागर -रामानंद सागर के पुत्र है।

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