Saturday, January 19, 2013

रुपहला सफ़र-इस रविवार-मौसम जाड़ो की नर्म धुप और आंगन में लॆट कर......मौसम

जाड़ो की नर्म धुप और आंगन में लॆट कर......मौसम

गुलजार के मुलायम शब्द वादियों में कभी जाड़ो  की नर्म धुप सा अहसास तो कभी गर्मीयों की रातो की पुरवाईयों सा अहसास देते है।ऐसा लगता है कि वादी में गुंजती खामोशी कुछ कहना चाहती है अतित का वो लम्हा पकडना चाहती है जिसकी आंखों में भीगे-भीगे से छुपे लम्हे सिसकियां भर रहे है।तभी तो भुपेन्दर के सुर तन्हाईतो पर उतरकर घाटी में गुंज पैदा कर देते है और गाते है- "दिल ढुंढता है फ़िर वही फ़ुरसत के रात दिन"।
गुलजार फ़िल्म को एक कविता की तरह प्रस्तुत करते है जिसमें हम भरपुर लय,ताल,थिरकन,कंपन,भावनाओं का सैलाब,खामोशी,निजता और खुशीयों का अदभुत तालमेल पाते है।अतीत की गलतियों को वर्तमान में स्वीकारने का साहस हो तो असल कहानियां पैदा होती है। गुलजार के निर्देशन की खासियत है कि वे फ़ैन्सी किरदार नहीं गढते,वे अपने किरदारो को भावनात्मक रुप से इतनी मजबुती देते है कि शर्मिला टैगोर कब चंदा और कजली में ढल जाती है पता ही नहीं चलता।
डॉ.अमरनाथ गिल(संजीव कुमार) बरसॊ बाद फ़िर दार्जिंलिंग लौटता है और लौटता क्या है बल्कि अतीत में लौटता है जहां वो एक मेडिकल स्टुडेंट के रुप में पढने आया था लेकिन रास्ते की ठोकर उसे वैद्य थापा(ओम शिवपुरी) के पास पहुंचा देती है,जहां उसकी मोच तो ठीक हो जाती है लेकिन एक छ्डी उसे वैद्य की बेटी चंदा(शर्मिला टैगोर) के नजदीक ले आती है।फ़्लेश बेक का इस्तेमाल कमाल का है वर्तमान से अतित कि सैर कर लौटना और हर बार उस लम्हे में उसकी पुरी गहराई के साथ उतरकर कुछ मोती चुन लाना और कहना कि "लगता है सांसो में टुटा है कांच कोई चुभती है सिने में भीनी सी आंच कोई"।लेकिन चंदा अब कहां है उसे तो अमरनाथ ये वादा कर गए थे कि जल्द ही लौट आऊंगा डाक्टर बन कर।लेकिन इंतेजार की सडक इतनी लम्बी होगी कि आंखे हांफ़ने लगे और दिल फ़ट कर दौड लगा दे उन राहो पर....लेकिन भंक सी जिंदगी और एक बेटी का साथ।डा. अमरनाथ आत्मग्लानि से भर जाते है जब उन्हे ये पता लगता है कि चंदा पागल हो कर मर गई और जवान बेटी कजरी को नियती ने कोठे पर पहुंचा दिया।अपनी बेटी ढुंढ्ते हुए कोठे पर पहुंचते है शक्ल हुबहु चंदा जैसी लेकिन जबान पर गाली और बेहुदगी अपनी जिंदगी पर लानत और अपने डाक्टर पिता से नफ़रत।अमरनाथ अपनी बेटी कजरी को अपने साथ कीमत देकर ले आता है जबकि कजरी उसे अपना ग्राहक समझ रही होती है,ये कश्मकश देखने लायक है ।अमरनाथ जब उसे शराफ़त की नसीहते दे रहे होते है तो बहुत ही अच्छा संवाद कजरी कहती है "इज्जत और आदमी के साथ ’अपनी’ बडी बेइज्जती होती है"।संजीव कुमार और शर्मिला टैगोर के सशक्त अभिनय को दर्शको की आंखे बस पीती जाती है लेकिन अंतिम दृश्य में आंखे झरझर कर सलाम करती है। सुबह ना आई कई बार निंद से जागे के एक रात की ये जिंदगी गुजार चले....मौसम है तो बदलेंगे भी और इसी तरह  जिंदगी में हालात भी बदलते है।फ़िल्म में मदन मोहन के संगीत का स्पंदन पुरे समय छाया रहता है दुखद बात ये रही कि इस फ़िल्म के रिलिज होने के पहले मदनमोहन खामोश हो गए और सुरीला पन हमारे लिए छोड गए। इस वर्ष "कभी-कभी" फ़िल्म भी रिलिज हुयी लेकिन कहते है ना कि चांद जब पुरे शबाब पर था तो एक"मौसम"नामक सितारा भी पुरी तेजी से चमक फ़ेंक रहा था।तो देखे एक बार मौसम.......
विशेष:ये फ़िल्म ऐ.जे. क्रोनिन के उपन्यास "द जुडास ट्री"से प्रेरित है।इस फ़िल्म का बेक ग्राउंड संगीत "सलील चौधरी" ने तैयार किया।ये गुलजार-मदनमोहन की पहली और आखिरी फ़िल्म रही।

फ़िल्म:मौसम(29 दिसंबर 1975)
निर्माता-पी.मल्लिकार्जुन राव
निर्देशक: गुलजार
लेखक: कमलेश्वर
पटकथा: भुषण बनमाली,गुलजार
गीत:गुलजार
संगीत:मदन मोहन
गीत
1. दिल ढुंढता है- भुपेन्द्र
2. छ्डी रे छडी-मो.रफ़ी,लता मंगेशकर
3. दिल ढुंढता है- भुपेन्द्र,लता मंगेशकर
4.मेरे इश्क मैं-आशा भोंसले
5. रुके रुके से कदम-लता मंगेशकर
अवार्ड
*नेशनल अवार्ड्स
 बेस्ट एक्ट्रेस-शर्मिला टैगोर
  सेकण्ड बेस्ट फ़ीचर फ़िल्म-मौसम
*फ़िल्म फ़ेयरअवार्ड्स -
 बेस्ट फ़िल्म-मौसम
 बेस्ट डायरेक्टर -गुलजार

Sunday, January 13, 2013

बीती बातों पे धुल उडाता चला........:झुमरु

http://www.epaperdainikdabangdunia.com/Details.aspx?id=4930&boxid=17237468
कुछ लोगो को याद करने का कोई दिन मुकर्रर नहीं होता दिल में जब उदासी हो या मन कुछ अच्छा ना हो तो "रशोकि रमाकु"को याद फ़रमा लीजिए...दार्जिलिंग की वादियों में गुंजती युडलिंग उदास दिल को भरपुर तसल्ली देगी और चेहरे पर मुस्कान डिसकाउंट में मिलेगी।
झुमरु किरदार और किशोर कुमार के व्यक्तित्व में एक ही समानता है फ़क्कडपन और ये स्वभाव बिरले ही लोगो को नसीब होता है तभी तो किशोर कुमार लिखते है "प्यार सीने में है हर किसी के लिए,मुझको प्यारा हर इंसान दिल वालो पे हुं कुरबान जिंदगी है मेरी जिंदगी के लिए"...फ़क्कड बन के घुमरु....."
मधुबाला और किशोर कुमार प्रेम पुर्ण संबंधो की एक भरी पुरी रील है फ़िल्म "झुमरु"।
कहानी एक बंजारे झुमरु(किशोर कुमार) और अंजना(मधुबाला) की है जिनका प्यार उंच नीच की सरहदो को पार करता है। अंजना संपन्न परिवार की बेटी है और शहर से गांव अपने पिता के पास कई सालो बाद अती है।वो अपने पिता को काफ़ी बदला महसुस करती है जिनका कि गांव वालों के प्रति रवैया काफ़ी सख्त और क्रुरता भरा है।हालांकि फ़िल्म की प्रस्तुती इतनी प्रभावशाली नहीं है लेकिन किशोर-मधुबाला की रोमांटिक जोडी ,किशोर दा की निर्माता,अदाकार,संगीतकार और गीतकार के रुप में उपस्थिति इस फ़िल्म में जान डाल देती है।जब किशोर दा गाते है ठंडी हवा ये चांदनी सुहानी ए मेरे दिल सुना कोई कहानी .......बरबस ठंड के वो दिन याद आ जाते है जब रेडियों सिलोन पर ये गाना ट्युन कर सुनने की कोशिश करते थे। असल में एक और जिंदगी ट्युन हो रही थी जब मधुबाला और किशोर कुमार की नजदीकिया बढ रही थी तब ही मधुबाला गंभीर दिल की बीमारी की चपेट में आ गई दोनो के घर वाले इस अंर्तजातिय विवाह के लिए तैयार नहीं थे,आखिरकार दोनो विवाह संस्कार में बंधे और ये साथ 1969 तक रहा और मधुबाला ने अलविदा कहा।बहरहाल जब अंजना के पिता को झुमरु से प्रेम संबंधो का पता चलता है तो वो उसकी शादी अपने मैनेजर रमेश(अनुप कुमार) से करने की घोषणा कर देते है।किशोर दा की गंभीरता को नजदीक से महसुस करना हो तो ये  गाना सुनिये"कोई हमदम ना रहा कोई सहारा ना रहा.."कमाल की बात तो ये है कि उनके बडे भाई अशोक कुमार ने उन्हे ये गाना गाने के लिए मना किया था कि ये गाना उंचे सुर में है और तुम्हारे बस की बात नहीं,लेकिन आखिर थे तो वे किशोर कुमार। उन्होने ने राग झिंझोटी में ये गाना गाया और ऐसा गाया कि आज भी गुनगुनाया जाता है।लेकिन इस गाने के पीछे की कहानी ये है कि मुलत:ये गाना भारतीय फ़िल्म की पहली महिला संगीतकार सरस्वती देवी(खोर्शीद मिनोचर होमजी) ने बाम्बे टाकिज की फ़िल्म जीवन नैया(1934) के लिए बनाया था जिसे अशोक कुमार ने अपनी आवाज में गाया था उस समय किशोर कुमार महज ६ वर्ष के रहे होंगे।लेकिन इतने सालो बाद कही ये गाना अवचेतन में रहा और उन्होने इसका मुखडा जस का तस उठाकर अपनी अदा में इसे गाया।लेकिन फ़िल्म इंडस्ट्रीज में ये अक्सर होता है इसका क्रेडिट सरस्वती देवी को कभी नहीं मिला। लेकिन झुमरु फ़िल्म खुब चली और गाने भी,जैसा कि फ़िल्म में होता है कि अंजना को पता चलता है कि झुमरु की मां उसकी असल मां है तो फ़िर झुमरु कौन है.....अब ये तो फ़िल्म देखने पर ही पता चलेगा ना....।

विशेष:किशोर कुमार ने गाने में "युडलिंग" का प्रयोग कर सीधे सपाट गानो के दौर में एक नई उर्जा भर दी लेकिन आज तक उनके गले की  हरकत को कोई पकड नहीं पाया।
फ़िल्म- झुमरु 1961
निर्माता-अनुप शर्मा
निर्देशक:शंकर मुखर्जी
गीत: मजरुह सुल्तानपुरी,किशोर कुमार
संगीत:किशोर कुमार
गीत:
ठंडी हवा ये चांदनी सुहानी-किशोर कुमार
मैं हुं झुम झुम झुमरु...-किशोर कुमार(गीत-किशोर कुमार)
कोई हमदम ना रहा कोई सहारा ना रहा-किशोर कुमार
मतवाले हम मतवाले तुम-किशोर कुमार
बाबु आना सुनाते जाना-किशोर कुमार,आशा भॊंसले
हे झुमे रे झुमे रे दिल मेरा-किशोर कुमार,आशा भॊंसले
आजा तु आजा....किशोर कुमार,उषा मंगेशकर
ऐ भोला भाला मन मेरा-किशोर कुमार,आशा भॊंसले
ऐ बाबा लु बाबा लु-किशोर कुमार,आशा भॊंसले
टिंबक टु काठमांडु-किशोर कुमार(गीत-किशोर कुमार)
रुक रुक थाम थाम धीरे चल -आशा भोंसले(गीत-किशोर कुमार)
-योगेन्द्र व्यास

Sunday, January 6, 2013

दामिनी को आदरांजली, रुपहला सफ़र:फ़िर वही रात है...:घर

http://www.epaperdainikdabangdunia.com/Details.aspx?id=4700&boxid=175330812
नित्शे ने सही कहा था कि दुनिया के सारे धर्मो ने सेक्स को जहरीला करार देकर खत्म करने की कोशिश कि,यद्यपि वे उसे खत्म तो नहीं कर सके बल्कि वो और जहरीला होकर समाज में फ़ैल गया। प्रकृति ने स्त्री-पुरुष को समान अधिकार देकर इस पृथ्वी पर विकसित किया बल्कि स्त्री को अधिक उर्जावान,धैर्यवान,आकर्षक देहयष्टि और प्रजनन शक्ति के साथ असीमित खुबियां प्रद्त्त की जबकि पुरुष को बलशाली और स्त्री का संरक्षक बनाया ताकि ये सृष्टि एक अदभुत तालमेल के साथ गतिमान हो सके।लेकिन बलशाली पुरुष ने शारीरिक प्रीत जैसे पवित्र कर्म को ना जाने किस भय से अपने बल का पहला प्रयोग स्त्री पर कर अपने वीर्यवान होने की हुंकार भर ली और ये कालांतर में शारीरिक दुष्क्रृत्य और सामुहिक दुष्कृत्य तक की हद तक आ पहुंचा।
एक सुर्ख गुलाब अपना चरम यौवन अपनी डाल पर अपने माली के संरक्षण पा कर आनंदित होता है और यदि उसे कोई तोड कर मसल दे तो उसका क्रंदन उसकी कुचली हुई पंखुडिया बयां करती है। एक "घर" जहां एक नवयुगल जोडा अपनी शादी के बाद एक हसीन जिंदगी के सपने बुनता है लेकिन अनहोनी कभी पांजेब बजा कर सतर्क नहीं करती और आ धमकती है।विकास(विनोद मेहरा) और आरती(रेखा) अपनी नई-नई शादी के बाद खुशनुमा लम्हों को यादगार बना कर संजो लेना चाहते है और आंखो में आंखे डाल कर गाते है "आपकी आंखो में कुछ महके हुए से राज है" इन युगल प्रेमियो के रोमांटिक पलो को शब्द दिए गुलजार ने और संगीत से सजाया पंचम ने और लता और किशोर की आवाज ने इन पलों को वो निजता दी है कि जो युगल उसे सुनता है उसे नितांत एकात्मकता का एहसास होता है। इस गाने के पहले अंतरे में "लब हिले तो मोगरे के फ़ुल खिलते है कहीं"गुलजार के अनुसार किशोर दा को "जब हिले तो मोगरे...." गाना था लेकिन बार-बार टेक में किशोर दा ने "लब" ही बोला तो उसे जस का तस ही रिकार्ड किया गया फ़िर जो भी बना अदभुत बना। एक रात विकास और आरती लेट नाईट फ़िल्म देखकर लौट रहे होते है  लेकिन ये रास्ते कितने लम्बे व भारी पडने वाले है ये देखकर ही सिरहन दौड जाती है।सुनसान सडक पर उनका सामना चार विकृत मानसिकता वाले पुरुषो से होता है वे विकास को बुरी तरह घायल कर देते है और आरती के साथ सामुहिक दुष्कृत्य कर अतिबुरी अवस्था में फ़ेंक देते है।जो आरती एक आजाद पंछी की तरह उडान भरते हुए ये गाती थी कि "आज कल पांव जमी पर नहीं पडते मेरे"ऐसा लगता है उसे अचानक धडाम से फ़डफ़डाते पंखो के साथ जमी पे पटक दिया हो। उसका आत्मविश्वास तहस नहस हो जाता है आत्मा छलनी-छलनी हो जाती है।भयाक्रांत आरती बार बार उस भयानक हादसे को याद कर मनोवैग्यानिक रुप से टुट जाती है।ये रेखा के अभिनय की ताकत है कि-देखने वाले को भी वो दर्द और पीडा का एहसास होने लगता है जो वास्तव में किसी पीडिता को होता है।विकास आरती को उस हादसे से बाहर निकालने में पुरजोर मदद करता है लेकिन हमारा समाज सहानुभुति दिखाने में भी अपने तेवर में चटखारे लेना नहीं चुकता।जहां मिडिया इस खबर को रोचक बना कर पेश करता है,वहीं नेता चुनाव में इस मुद्दे को भुनाने से नहीं चुकता।ये फ़िल्म मुम्बई में घटित सत्य घटना पर आधारित है और इसे फ़िल्माते समय बनावटी पन परे बहुत ही बहुत ही सपाट तरीके से प्रस्तुत किया गया है।इन सबके बीच इन युगल जोडो का मन ये ही गाता है"तेरे बिना जिया जाये ना"।कई बार हम अनावश्यक सहानुभुति को दर्द की दवा समझ कर बांटने लगते है जबकि ऐसे हादसो के बाद समाज को पिडिता के साथ बिल्कुल सामान्य सा व्यवहार किया जाना चाहिए सब कुछ पहले जैसा अन्यथा वो जीवन भर इस हादसे उबर नहीं पाएगी।हांलाकि अब हम वो समय खो चुके है कि व्यक्तित्व विकास और उसके परिवर्तन की दिशा में कोई कार्य करें व्यवहारिक रुप से 125 करोड जनसंख्या के लिए ये संभव भी नहीं है अभी तो समय सिर्फ़ कडी सजा के निर्णय का है क्योकि अनैतिक कार्य के लिए कोई नैतिक निर्णय इस काल में संभव नहीं है।
ये फ़िल्म समाज को एक बार फ़िर चिंतन करने का मौका देती है, नहीं देखी हो तो देखिएगा...।ये फ़ुल फ़िर से खिल जाए बुझे चेहरे पर मुस्कान लौट आए और क्या चाहिए.....।

विशेष:फ़िल्म के निर्देशक मानिक चटर्जी की सडक दुर्घटना के कारण इस फ़िल्म को गुलजार ने पुरा किया।पंचम ने "तेरे बिना जिया जाए ना" गाने में अलग सुरो के मंडल वाद्य का बहुत खुबसुरती से प्रयोग किया जो कि एकास्टिक्स गिटार के साथ सुनने में बहुत ही मधुर आभास देता है।

फ़िल्म- घर (9 फ़रवरी 1978)
निर्माता-एन.एन, सिप्पी
निर्देशक: मानिक चटर्जी
लेखक: दिनेश ठाकुर
गीत: गुलजार
संगीत:आर.डी. बर्मन
अवार्ड:
फ़िल्म फ़ेयर बेस्ट स्टोरी-दिनेश ठाकुर
गीत:
1.आज कल पांव जमी पर -लता मंगेशकर
2. आप की आंखो में कुछ-किशोर कुमार,लता मंगेशकर   
3. बोतल से इक बात चली है-मो. रफ़ी,आशा भोंसले  
4. फ़िर वही रात है-किशोर कुमार  
5. तेरे बिना जिया जाए ना-लता मंगेशकर   
-योगेन्द्र व्यास


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