Sunday, January 6, 2013

दामिनी को आदरांजली, रुपहला सफ़र:फ़िर वही रात है...:घर

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नित्शे ने सही कहा था कि दुनिया के सारे धर्मो ने सेक्स को जहरीला करार देकर खत्म करने की कोशिश कि,यद्यपि वे उसे खत्म तो नहीं कर सके बल्कि वो और जहरीला होकर समाज में फ़ैल गया। प्रकृति ने स्त्री-पुरुष को समान अधिकार देकर इस पृथ्वी पर विकसित किया बल्कि स्त्री को अधिक उर्जावान,धैर्यवान,आकर्षक देहयष्टि और प्रजनन शक्ति के साथ असीमित खुबियां प्रद्त्त की जबकि पुरुष को बलशाली और स्त्री का संरक्षक बनाया ताकि ये सृष्टि एक अदभुत तालमेल के साथ गतिमान हो सके।लेकिन बलशाली पुरुष ने शारीरिक प्रीत जैसे पवित्र कर्म को ना जाने किस भय से अपने बल का पहला प्रयोग स्त्री पर कर अपने वीर्यवान होने की हुंकार भर ली और ये कालांतर में शारीरिक दुष्क्रृत्य और सामुहिक दुष्कृत्य तक की हद तक आ पहुंचा।
एक सुर्ख गुलाब अपना चरम यौवन अपनी डाल पर अपने माली के संरक्षण पा कर आनंदित होता है और यदि उसे कोई तोड कर मसल दे तो उसका क्रंदन उसकी कुचली हुई पंखुडिया बयां करती है। एक "घर" जहां एक नवयुगल जोडा अपनी शादी के बाद एक हसीन जिंदगी के सपने बुनता है लेकिन अनहोनी कभी पांजेब बजा कर सतर्क नहीं करती और आ धमकती है।विकास(विनोद मेहरा) और आरती(रेखा) अपनी नई-नई शादी के बाद खुशनुमा लम्हों को यादगार बना कर संजो लेना चाहते है और आंखो में आंखे डाल कर गाते है "आपकी आंखो में कुछ महके हुए से राज है" इन युगल प्रेमियो के रोमांटिक पलो को शब्द दिए गुलजार ने और संगीत से सजाया पंचम ने और लता और किशोर की आवाज ने इन पलों को वो निजता दी है कि जो युगल उसे सुनता है उसे नितांत एकात्मकता का एहसास होता है। इस गाने के पहले अंतरे में "लब हिले तो मोगरे के फ़ुल खिलते है कहीं"गुलजार के अनुसार किशोर दा को "जब हिले तो मोगरे...." गाना था लेकिन बार-बार टेक में किशोर दा ने "लब" ही बोला तो उसे जस का तस ही रिकार्ड किया गया फ़िर जो भी बना अदभुत बना। एक रात विकास और आरती लेट नाईट फ़िल्म देखकर लौट रहे होते है  लेकिन ये रास्ते कितने लम्बे व भारी पडने वाले है ये देखकर ही सिरहन दौड जाती है।सुनसान सडक पर उनका सामना चार विकृत मानसिकता वाले पुरुषो से होता है वे विकास को बुरी तरह घायल कर देते है और आरती के साथ सामुहिक दुष्कृत्य कर अतिबुरी अवस्था में फ़ेंक देते है।जो आरती एक आजाद पंछी की तरह उडान भरते हुए ये गाती थी कि "आज कल पांव जमी पर नहीं पडते मेरे"ऐसा लगता है उसे अचानक धडाम से फ़डफ़डाते पंखो के साथ जमी पे पटक दिया हो। उसका आत्मविश्वास तहस नहस हो जाता है आत्मा छलनी-छलनी हो जाती है।भयाक्रांत आरती बार बार उस भयानक हादसे को याद कर मनोवैग्यानिक रुप से टुट जाती है।ये रेखा के अभिनय की ताकत है कि-देखने वाले को भी वो दर्द और पीडा का एहसास होने लगता है जो वास्तव में किसी पीडिता को होता है।विकास आरती को उस हादसे से बाहर निकालने में पुरजोर मदद करता है लेकिन हमारा समाज सहानुभुति दिखाने में भी अपने तेवर में चटखारे लेना नहीं चुकता।जहां मिडिया इस खबर को रोचक बना कर पेश करता है,वहीं नेता चुनाव में इस मुद्दे को भुनाने से नहीं चुकता।ये फ़िल्म मुम्बई में घटित सत्य घटना पर आधारित है और इसे फ़िल्माते समय बनावटी पन परे बहुत ही बहुत ही सपाट तरीके से प्रस्तुत किया गया है।इन सबके बीच इन युगल जोडो का मन ये ही गाता है"तेरे बिना जिया जाये ना"।कई बार हम अनावश्यक सहानुभुति को दर्द की दवा समझ कर बांटने लगते है जबकि ऐसे हादसो के बाद समाज को पिडिता के साथ बिल्कुल सामान्य सा व्यवहार किया जाना चाहिए सब कुछ पहले जैसा अन्यथा वो जीवन भर इस हादसे उबर नहीं पाएगी।हांलाकि अब हम वो समय खो चुके है कि व्यक्तित्व विकास और उसके परिवर्तन की दिशा में कोई कार्य करें व्यवहारिक रुप से 125 करोड जनसंख्या के लिए ये संभव भी नहीं है अभी तो समय सिर्फ़ कडी सजा के निर्णय का है क्योकि अनैतिक कार्य के लिए कोई नैतिक निर्णय इस काल में संभव नहीं है।
ये फ़िल्म समाज को एक बार फ़िर चिंतन करने का मौका देती है, नहीं देखी हो तो देखिएगा...।ये फ़ुल फ़िर से खिल जाए बुझे चेहरे पर मुस्कान लौट आए और क्या चाहिए.....।

विशेष:फ़िल्म के निर्देशक मानिक चटर्जी की सडक दुर्घटना के कारण इस फ़िल्म को गुलजार ने पुरा किया।पंचम ने "तेरे बिना जिया जाए ना" गाने में अलग सुरो के मंडल वाद्य का बहुत खुबसुरती से प्रयोग किया जो कि एकास्टिक्स गिटार के साथ सुनने में बहुत ही मधुर आभास देता है।

फ़िल्म- घर (9 फ़रवरी 1978)
निर्माता-एन.एन, सिप्पी
निर्देशक: मानिक चटर्जी
लेखक: दिनेश ठाकुर
गीत: गुलजार
संगीत:आर.डी. बर्मन
अवार्ड:
फ़िल्म फ़ेयर बेस्ट स्टोरी-दिनेश ठाकुर
गीत:
1.आज कल पांव जमी पर -लता मंगेशकर
2. आप की आंखो में कुछ-किशोर कुमार,लता मंगेशकर   
3. बोतल से इक बात चली है-मो. रफ़ी,आशा भोंसले  
4. फ़िर वही रात है-किशोर कुमार  
5. तेरे बिना जिया जाए ना-लता मंगेशकर   
-योगेन्द्र व्यास


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