Monday, December 24, 2012

रुपहला सफ़र इस रविवार :"आंखे है पर दिखता नहीं": जागते रहोssss...sss

रुपहला सफ़र इस रविवार :"आंखे है पर दिखता नहीं": जागते रहोssss...sss
इंसान की चेतना पर सांसारिक परते इतनी गहरी चढ गयी है कि वह सिर्फ़ शारीरिक रुप से ही जागता है और सोता है।गहरी मुर्छा इस कदर छाई है कि आंखे है पर दिखता नहीं, आत्मा है पर संवेदना नहीं,आंख है पर आंसु नहीं,समृध्दि है पर सुख नहीं,बुध्दि है पर विवेक नहीं।बहुत कम ऐसे व्यवसायिक फ़िल्मकार होते है जो अपने नफ़ा नुकसान से परे उद्देश्य परक फ़िल्म बनाते है उनमें से राजकपुर का नाम बरबस याद आता है।
"सुबह होने के बाद दरवाजे खोलना चाहिए नहीं तो रोशनी कैसे आएगी"ऐसी प्रतिकात्मक बातो से भरी फ़िल्म "जागते रहो" जिसमें पात्र राजकपुर की मासुम आंखे दरवाजो में बंद समाज के लोगो का असली चेहरा उजागर करती है और ये फ़िल्म निर्देशकीय अनुभव का उत्कृष्ट उदाहरण है।
रात के अंधेरे में किस्मत का मारा फ़टॆहाल व्यक्ति(राजकपुर) अपनी बदनसीब किस्मत के साथ बंबई आ जाता है। उसे सिर्फ़ पानी की प्यास किन किन मुसीबतो से रुबरु कराती है।पहले रास्ते में उसे मिलता है आशिक मिजाज धनी शराबी मोतीलाल जिनकी आमद शैलेन्द्र के लिखे एक उम्दा गाने से होती है"जिंदगी ख्वाब है,ख्वाब में झुठ क्या और भला सच है क्या" मोतीलाल की आदाकारी को दाद देने का मन करता है। मोतीलाल प्यासे को शराब से प्यास बुझाने की सलाह देता है और जब तक ये प्यासा व्यक्ति आने वाली मुसिबतो से लडता है तब तक दर्शक भी पुरे समय अपने आपको प्यासा महसुस करता है।
पुरी फ़िल्म एक विशाल अपार्टमेंट में घुमती है जहां गलती से ये फ़टेहाल व्यक्ति पानी पीने चला जाता है और उसे चोर समझ लिया जाता है,जान बचाने के लिए ये एक फ़्लेट से दुसरे फ़्लेट छुपता फ़िरता है और बंद दरवाजो के पीछे के वो राज देखता है जहां सफ़ेदपोश व्यक्ति का अवैध शराब खाना है और उसकी बेटी का चोरी छुपे प्रदीप कुमार से रोमांस करना,फ़िर भाग कर उस फ़्लेट में जा छुपता है जहां पति घोडॊ की रेस में पैसा लगाने के लिए अपनी पत्नि के जेवरा चुराता मिलता है।एक के बाद एक लोगो के नकाब के पीछे की हकीकत खुलती जाती है। अंतत: वो जिस फ़्लेट में छुपता है वहां रामनारायण नाम का व्यक्ति नकली नोट बनाने का छापा खाना चलाता है ।इधर बिल्डिंग के लोग बदहवासे से चोर को फ़्लेट दर फ़्लेट ढुंढते है।जब मुसिबत सिर पर ही आ पडे तो भागने के बजाय उसका ड्ट कर मुकाबला कर लेना चाहिए और राजकपुर लठ्ठ लेकर भीड के सामने हो जाता है और जो कहता है "मैं कोई चोर नहीं मैं एक गरीब किसान का बेटा हूं नौकरी करने आपके शहर आया हुं,पानी की प्यास मुझे आपके यहां ले आई। असल चोर आपके घरॊ में कैद है-कोई औरतो की इज्जत आबरु का चोर तो कोई नकली नोट बनाने वाला चोर तो कॊई अवैध शराब वाला चोर तो कॊई अपनी पत्नि के जेवर चुराने वाल चोर,मुझ गंवार को यही शिक्षा दी कि बिना चोर बने कोई बडा आदमी नहीं बन सकता"।बात बहुत ही गहरी है अपने अवचेतन के चोर को छोड कर सब बाहर के चोर को ढुंढते है और ये इसलिए भी होता है कि हम अपनी आत्माओं को खुरचते तक नहीं।यही कारण है कि हमारी आत्माएं नि:स्तेज खोखले शरीर को 
छोड कर दबे पांव कहीं अनंत की ओर निकल गई है।संपुर्ण फ़िल्म नायक नायिका विहिन होने के बावजुद पुरे समय बांधे रखती है।केन्द्रिय पात्र के रुप में राजकपुर ने बहुत कम संवाद बोले लेकिन अपनी अदाकारी से काफ़ी कुछ कह गए।
फ़िल्म के आखरी क्षण में नरगिस का एक उजली भोर के रुप में आना और गाना" जब उजियारा छाए,मन का अंधेरा जाए, किरणो की रानी गाए, जागो है मेरे मन मोहन प्यारे"और राजकपुर नरगिस के पवित्र हाथो से पानी पी कर अपनी प्यास को बुझाकर एक आशा की किरण लेकर विदा होता है।
ये फ़िल्म ये संदेश दे जाती है "जागते रहो वर्ना आने वाले समय ऐसा ना हो कि सवेरा देखने की भी कीमत चुकानी पडे।
विशेष: ये फ़िल्म राजकपुर और नरगिस की रुपहले पर्दे पर आखिरी फ़िल्म थी। भारतीय सिनेमा में सलील चौधरी ने कोरस सिंगिग को इसी फ़िल्म से स्थापित किया और ये फ़िल्म हिन्दी/बंगाली भाषा में भी बनी।

फ़िल्म: जागते रहो
वर्ष:1956
निर्माता: राजकपुर
निर्देशक: अमित मित्रा,सोम्बु मित्रा
लेखक :ख्वाजा अहमद अब्बास
संगीत:सलिल चौधरी
गीत:शैलेन्द्र,प्रेम धवन
गीत:
1     जिंदगी ख्वाब है,ख्वाब में झुठ क्या-मुकेश(गीत-शैलेन्द्र)
2     जब उजियारा छाए मन का अंधेरा जाए-लता मंगेशकर(गीत-शैलेन्द्र)
3         तेकी मे झुठ बोलिया-मो. रफ़ी,बलबीर(गीत-प्रेम धवन)
4     ठंडॆ ठंडे सावन की फ़ुहार-आशा भोंसले (गीत-शैलेन्द्र)
5     जागो मोहन प्यारे-लता मंगेशकर(गीत-शैलेन्द्र)
6     मैने जो ली अंगडाई-संध्या मुखर्जी,हरिधन(गीत-शैलेन्द्र)
अवार्ड:

अंर्तराष्ट्रीय फ़िल्म फ़ेस्टीवल चेकोस्लोवाकिया क्रिस्ट्ल ग्लोब ग्रांड प्रिक्स अवार्ड
चौथा नेशनल फ़िल्म अवार्ड

-योगेन्द्र व्यास

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