रुपहला सफ़र:क्या हवा चली बाबु ऋतु बदली: परख
हमारा प्रजातंत्र वो गरम तंदुर की मानिंद है जिसमें कई धुर्त लोग मजे से लोभ,प्रलोभन,झुठी सेवा,योजानाओं का पापड़ सेंकते है और फ़िर मजे से खुद ही सत्ता का मसाला लगा कर चखते रहते है।आजादी के बाद ये स्वाद उन्हे ऐसा मुंह चढ़ा कि कोशिश यही रहती है कि ये तंदुर ठंडा ना होने पाए।
इसे और सरल ढंग से समझे तो सन साठ के द्शक का एक गांव है और गांव तभी बनता है जब वहां बड़ी संख्या में गरीब,एक साहुकार,एक जमींदार,पैसे की नब्ज जानने वाला डॉक्टर,जात-पाती खुर्राट संत और सीधा-सरल स्कुल मास्टर हो। गांव में एक पोस्टमास्टर है जो कर्ज में डुबा हुआ आर्थिक रुप से कमजोर इंसान है जो अपनी बीमार पत्नि,एक जवान बेटी के साथ गुजर बसर करता है। जी हां आज हम बात कर रहे है बिमल राय और सलील चौधरी के उस चलचित्र "परख" की जिसकी रील आज बावन साल लम्बी हो चुकी है और इसका प्रोजेक्शन दायरा इतना बड़ा हो चुका है कि ये फ़िल्म हमें पुरे देश में रोजाना जस की तस नजर आती है।कुछ फ़िल्में इतिहास बन कर हमें ये बताती है कि अतित से वर्तमान तक हम कितने बदलें।
एक दिन गांव का पोस्टमेन (मोतीलाल) पोस्ट मास्टर निवारन(नासिर हुसैन) के नाम से एक लिफ़ाफ़ा देता है जिसमें पांच लाख रुपये के चेक के साथ पत्र होता है जिसमें यह लिखा होता है कि गांव के विकास के लिए ये पांच लाख रुपये उस व्यक्ति को दे दिए जाए जो सबसे ईमानदार एवं योग्य हो।हक्का बक्का पोस्टमास्टर इतनी बड़ी रकम का बोझ कैसे सम्हाले, चाहे तो वो ये रकम खुद ही रख ले बिमार पत्नि के इलाज के लिए या अपना कर्ज उतारने के लिए।लेकिन खुद्दार पोस्टमास्टर पत्र लेकर गांव के उन पांच बड़े लोगो के बीच जाता है जिन्हे वो ईमानदार समझता है और समझे भी क्यो ना जब इंसान खुद आर्थिक रुप से अक्षम और दबा हुआ हो वो प्रभुत्व वाले लोगो की ही शरण में जाता है। वो एक मिटिंग में साहुकार,जमींदार,डॉक्टर,मंदिर का संत और स्कुल मास्टर को पत्र पढ़ कर सुनाता है।जाहिर है स्कुल मास्टर को छोड़ कर सभी के जहन में पांच लाख रुपये का जादु सिर चढ़ कर बोलता है। अंतत: ये फ़ैसला होता है कि इसके लिए गांव में चुनाव कराएं जाए जो जितेगा वो ही पांच लाख रुपये का हकदार होगा।जहां उद्देश्य सेवा भाव ना होकर लक्ष्य सिर्फ़ पैसा प्राप्त करना हो वहां लालच फ़ेंक कर बस चुनाव जीतने का जुनुन पैदा हो जाता है। आज भी कई राजनितिक पार्टियां वही दांव पेंच इस्तेमाल कर रही है।गांव में जमींदार लगान माफ़ करने की घोषणा करता है तो डाक्टर मुफ़्त इलाज करना शुरु करता है,वही मंदिर का पुजारी ढोंग ढकोसलों से गांव वालो को फ़ुसलाने का काम करता है,साहुकार अपने दांवपेंच खेलता है और व्यंग्यत्मक लहजे में मन्ना डे की आवाज गुंजती है "क्या हवा चली बाबु ऋत बदली"।इसी बीच पोस्टमास्टर की बेटी (साधना) और स्कुल मास्टर के बीच प्यार की सुगबुगाहट बढ़ने लगती है और सलील दा का राग हंसध्वनि में ये गाना"ओ सजना बरखा बहार आई’ दरअसल ये गाना बांग्ला गीत "ना जेओ ना,राजोनो एखोनी बाकी"कीधुन पर तैयार हुआ लेकिन लता जी को छोड कर कोई भी इस गाने से संतुष्ट नहीं था।लताजी की तबियत खराब थी और सलील दा भी बेमन से रिकार्डिंग पर आए,पंन्द्रह मिनट में अंतरा लिखा और आर्केस्ट्रा को सरगम देकर गीत रिकार्ड किया।वो दिन है और आज का दिन है लता जी की आवाज में आज भी ये गाना रेडियो पर गुंजता है तो लगता है कविता की रुह आवाज में उतर आई हो। लता जी का एक और गाना"मेरे मन के दिये" जो कि साइलेंट रिदम पर है, कम सुना गया लेकिन इसे सुनना आपने आप में एक अदभुत अनुभव है। चुनाव में जमकर जुतम-पैर होती है,तब अंत में इस चेक को भेजने वाले जे.सी.राय गांव आते है सफ़ेद पोश लोगो का असली चेहरा सामने लाते है और गांव में सबके सामने योग्य व्यक्ति पोस्टमास्टर को पांच लाख रु की राशि सौंपतें है।बिमल राय चाहते तो इस फ़िल्म में जे.सी.राय कौन है सस्पेंस में रख सकते थे कि लेकिन उन्होने सोद्देश्य फ़िल्म बनाई और ये बताने का पुरजोर प्रयास किया कि प्रजातंत्र की चोपड़ में पासा मोहरे और खिलाडी कौन-कौन होते है।ये खेल आज भी वैसा ही चल रहा है लेकिन एक विस्तृत रुप में फ़ैल चुका है लेकिन हम यहां नहीं बताएंगे कि जे.सी.राय कौन है।यदि आपको बिमल राय,सलील चौधरी,लतामंगेशकर,शैलेन्द्र जैसे गुणी लोगो को एक जगह महसुस करना हो तो "परख" जरुर देखिए।
विशेष: परख फ़िल्म बिमल राय की उन सात फ़िल्मो में से एक है जिसमें उन्हे बेस्ट डायरेक्टर फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड प्राप्त हुआ।
फ़िल्म: परख
वर्ष: 5 अगस्त 1960
निर्माता: बिमल राय
निर्देशक: बिमल राय
लेखक एवं संगीत: सलील चौधरी
गीतकार एवं संवाद :शैलेन्द्र
अवार्ड:
फ़िल्म फ़ेयर आवार्ड-
बेस्ट डायरेक्टर-बिमल राय
बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर -मोतीलाल
बेस्ट साउंड-ज्योर्ज डिक्रुज
गीत:
1. ओ सजना बरखा बहार आई -लता मंगेशकर
2. मिला है किसी का झुमका-लता मंगेशकर
3. ये बंसी क्यु गाये-लता मंगेशकर
4. मेरे मन के दिये-लता मंगेशकर
5. क्या हवा चली बाबु ऋत बदली-मन्ना डे
-योगेन्द्र व्यास
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