रुपहला सफ़र:अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यो आता है...
अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है.....
तुम आसमां पर बैठे हो तो सिर्फ़ इसलिए कि हम इस जमीं पर जड़ो तक धंसे है। ये मध्यमवर्गीय परिवार की एक अंदरुनी दास्तान है जो रोजाना जिंदगी के थपेड़ो से अपनी जड़ो में कंपन महसुस करती है।ये उनका आत्मबल ही है जो उन्हे उस मध्यम मार्ग में थामें रखता है।सईद मिर्जा ऐसे ही फ़िल्मकार है जिन्होने मध्यम वर्ग को अपनी फ़िल्मों में मुख्य किरदार की भुमिका दी और ये किरदार उनकी फ़िल्म में अपने आप बोलता है उसे कोई डायलाग कोई स्क्रिप्ट नहीं दी जाती बस जैसे-जैसे उसकी जिंदगी चलती है कैमेरा खुद-ब-खुद चल पड़ता है।
अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यो आता है.. दरअसल ये फ़िल्म ना हो कर सईद मिर्जा की नोट बुक के वे पन्ने है-जिसमें हर पात्र का एक पन्ना है और वो पात्र वैसा ही है जैसा आमतौर पर है।कोई पात्र हीरो नहीं ,किसी भी पात्र को वजनी डॉयलाग नहीं, कोई मेलोड्रामा नहीं बस एक मध्यमवर्गीय परिवार की एक तस्वीर जो देखी भाली सी लगती है। मि.पिंटो(अरविंद देशपांडे) एक मिल वर्कर है और वे अपने हक के लिए युनियन के साथ ह्डताल पर है उनका बेटा अल्बर्ट पिंटो (नासिरउद्दीन शाह) जो मोटर मैकेनिक है, इस हड़ताल को गैर जायज कहता है.अल्बर्ट अपनी धुन में और गलतफ़हमी में जीने वाला इंसान है लेकिन अपने परिवार को भी उसी शिद्दत से चाहता है।मोटर गैराज के कस्टमर उसे अपने दोस्त लगते है उसे लगता है उच्चवर्ग के लोग उसकी बात को महत्व देते है।स्टैला डिकोस्टा (शबाना आजमी) उसकी नजदीकी दोस्त है लेकिन अल्बर्ट ज्यादा पजेसिव होने से दोनो की खटपट चलती है।ये सब एक आम जिंदगी में होने वाले छोटे-छोटे वाकये है जो बडी ही संजीदगी से चलते है ऐसा लगता है जैसे हमारे किसी पड़ोसी के यहां ये सब चल रहा है और हम एक पड़ोसी होने के नाते साथ साथ चल रहे है।जुआन पिंटो (स्मिता पाटिल) अल्बर्ट की बहन जो कि सेल्स गर्ल है तथा एक पांव से असामान्य है लेकिन उसे आए दिन पुरुष ग्राहको से उनके अनुचित व्यवहार का सामना करना पडता है और वो उसका दृढता से सामना करती भी है।इसमे शबाना आजमी और स्मिता पाटिल के किरदार को बहुत ही सशक्त और मजबुत बनाकर पेश किया गया है। किरदारो के लिहाज से इसमें सारे कलाकार थियेटर,एनएसडी,एनएफ़टीटीआई के जानेमाने कलाकार है लेकिन बात वही कि सईद मिर्जा अपने किरदार का उपयोग उन रंगो की तरह करते है जो उनके कैनवास में भले कम मात्रा में उपयोग हो लेकिन उनका एक स्ट्रोक पुरी तस्वीर में जान फ़ुंक देता है।सईद मिर्जा ने मध्यमवर्गीय परिवार पर केन्द्रित और भी कई फ़िल्मे बनाई मसलन मोहनजोशी हाजिर हो,सलीम लंगडे पर मत रो और नसीम साथ ही प्रसिद्ध टीवी सिरियल नुक्कड नाटक और इंतजार का निर्देशन भी किया।
डोमिनिक पिंटो(दिलीप धवन) अल्बर्ट का भाई जो बिना कुछ किए जिंदगी में पाना चाहता है और चोरी के आरोप में जेल चला जाता है और मध्यमवर्गीय़ परिवार की चिंता ग्रस्त मां मिसेस पिंटॊ(सुलभादेश पांडॆ) अपने बेटे और पति की चिंता में हमेशा चर्च की शरण में रहती है।स्टैला डिकोस्टा के भाई एवं पिता को अपने देश को कोसते दिखाया गया जो कि विदेश में बसने की इच्छा रखते है। मि.पिंटॊ को हड़ताल के दौरान गुंडो से पिटाई का सामना करना पडता है तब वो अपने परिवार में कहता है क्या एक मजदुर का कोई आत्म सम्मान नहीं क्या उसे व उसके परिवार को एक बेहतर जिंदगी जिने का हक नहीं,अल्बर्ट अपनी आत्म मुग्धता से बाहर आता है,दुसरे मजदुरो की दयनीय हालातो से परिचित होता है....ये फ़िल्म आपको कोई मनोरंजन नहीं देती लेकिन बस उस मसकती जिंदगी की तस्वीर दिखाती है,जो इन बिते सालो में और ज्यादा बिगडे रुप में आज हमारे सामने है।
सईद मिर्जा सिर्फ़ सोई हुयी जनता की आत्मा पर दस्तक देते हुए निकल जाते है।आज भी स्थितियां नहीं बदली सामाजिक और आर्थिक असमानता के नए नए रह्स्यो से रोज परदे उठ रहे है लेकिन ना जाने क्यो इन व्यवस्थाओं के खिलाफ़ अल्बर्ट पिंटो,रहमत अली,बलविंदर सिंग और रामनारायण को गुस्सा ही नहीं आता........
विशेष: ये सईद मिर्जा वही है जिनके पिता अख्तर मिर्जा ने फ़िल्म वक्त(1965) में बतौर लेखक के फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड जीता था।
फ़िल्म: अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यो आता है.....
वर्ष: 1980
निर्माता,निर्देशक,लेखक :सईद अख्तर मिर्जा
संगीत:मानस मुखर्जी,भास्कर चंदावरकर
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड(1981):
बेस्ट फ़िल्म क्रिटिक अवार्ड-सईद अख्तर मिर्जा
-योगेन्द्र व्यास
अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है.....
तुम आसमां पर बैठे हो तो सिर्फ़ इसलिए कि हम इस जमीं पर जड़ो तक धंसे है। ये मध्यमवर्गीय परिवार की एक अंदरुनी दास्तान है जो रोजाना जिंदगी के थपेड़ो से अपनी जड़ो में कंपन महसुस करती है।ये उनका आत्मबल ही है जो उन्हे उस मध्यम मार्ग में थामें रखता है।सईद मिर्जा ऐसे ही फ़िल्मकार है जिन्होने मध्यम वर्ग को अपनी फ़िल्मों में मुख्य किरदार की भुमिका दी और ये किरदार उनकी फ़िल्म में अपने आप बोलता है उसे कोई डायलाग कोई स्क्रिप्ट नहीं दी जाती बस जैसे-जैसे उसकी जिंदगी चलती है कैमेरा खुद-ब-खुद चल पड़ता है।
अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यो आता है.. दरअसल ये फ़िल्म ना हो कर सईद मिर्जा की नोट बुक के वे पन्ने है-जिसमें हर पात्र का एक पन्ना है और वो पात्र वैसा ही है जैसा आमतौर पर है।कोई पात्र हीरो नहीं ,किसी भी पात्र को वजनी डॉयलाग नहीं, कोई मेलोड्रामा नहीं बस एक मध्यमवर्गीय परिवार की एक तस्वीर जो देखी भाली सी लगती है। मि.पिंटो(अरविंद देशपांडे) एक मिल वर्कर है और वे अपने हक के लिए युनियन के साथ ह्डताल पर है उनका बेटा अल्बर्ट पिंटो (नासिरउद्दीन शाह) जो मोटर मैकेनिक है, इस हड़ताल को गैर जायज कहता है.अल्बर्ट अपनी धुन में और गलतफ़हमी में जीने वाला इंसान है लेकिन अपने परिवार को भी उसी शिद्दत से चाहता है।मोटर गैराज के कस्टमर उसे अपने दोस्त लगते है उसे लगता है उच्चवर्ग के लोग उसकी बात को महत्व देते है।स्टैला डिकोस्टा (शबाना आजमी) उसकी नजदीकी दोस्त है लेकिन अल्बर्ट ज्यादा पजेसिव होने से दोनो की खटपट चलती है।ये सब एक आम जिंदगी में होने वाले छोटे-छोटे वाकये है जो बडी ही संजीदगी से चलते है ऐसा लगता है जैसे हमारे किसी पड़ोसी के यहां ये सब चल रहा है और हम एक पड़ोसी होने के नाते साथ साथ चल रहे है।जुआन पिंटो (स्मिता पाटिल) अल्बर्ट की बहन जो कि सेल्स गर्ल है तथा एक पांव से असामान्य है लेकिन उसे आए दिन पुरुष ग्राहको से उनके अनुचित व्यवहार का सामना करना पडता है और वो उसका दृढता से सामना करती भी है।इसमे शबाना आजमी और स्मिता पाटिल के किरदार को बहुत ही सशक्त और मजबुत बनाकर पेश किया गया है। किरदारो के लिहाज से इसमें सारे कलाकार थियेटर,एनएसडी,एनएफ़टीटीआई के जानेमाने कलाकार है लेकिन बात वही कि सईद मिर्जा अपने किरदार का उपयोग उन रंगो की तरह करते है जो उनके कैनवास में भले कम मात्रा में उपयोग हो लेकिन उनका एक स्ट्रोक पुरी तस्वीर में जान फ़ुंक देता है।सईद मिर्जा ने मध्यमवर्गीय परिवार पर केन्द्रित और भी कई फ़िल्मे बनाई मसलन मोहनजोशी हाजिर हो,सलीम लंगडे पर मत रो और नसीम साथ ही प्रसिद्ध टीवी सिरियल नुक्कड नाटक और इंतजार का निर्देशन भी किया।
डोमिनिक पिंटो(दिलीप धवन) अल्बर्ट का भाई जो बिना कुछ किए जिंदगी में पाना चाहता है और चोरी के आरोप में जेल चला जाता है और मध्यमवर्गीय़ परिवार की चिंता ग्रस्त मां मिसेस पिंटॊ(सुलभादेश पांडॆ) अपने बेटे और पति की चिंता में हमेशा चर्च की शरण में रहती है।स्टैला डिकोस्टा के भाई एवं पिता को अपने देश को कोसते दिखाया गया जो कि विदेश में बसने की इच्छा रखते है। मि.पिंटॊ को हड़ताल के दौरान गुंडो से पिटाई का सामना करना पडता है तब वो अपने परिवार में कहता है क्या एक मजदुर का कोई आत्म सम्मान नहीं क्या उसे व उसके परिवार को एक बेहतर जिंदगी जिने का हक नहीं,अल्बर्ट अपनी आत्म मुग्धता से बाहर आता है,दुसरे मजदुरो की दयनीय हालातो से परिचित होता है....ये फ़िल्म आपको कोई मनोरंजन नहीं देती लेकिन बस उस मसकती जिंदगी की तस्वीर दिखाती है,जो इन बिते सालो में और ज्यादा बिगडे रुप में आज हमारे सामने है।
सईद मिर्जा सिर्फ़ सोई हुयी जनता की आत्मा पर दस्तक देते हुए निकल जाते है।आज भी स्थितियां नहीं बदली सामाजिक और आर्थिक असमानता के नए नए रह्स्यो से रोज परदे उठ रहे है लेकिन ना जाने क्यो इन व्यवस्थाओं के खिलाफ़ अल्बर्ट पिंटो,रहमत अली,बलविंदर सिंग और रामनारायण को गुस्सा ही नहीं आता........
विशेष: ये सईद मिर्जा वही है जिनके पिता अख्तर मिर्जा ने फ़िल्म वक्त(1965) में बतौर लेखक के फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड जीता था।
फ़िल्म: अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यो आता है.....
वर्ष: 1980
निर्माता,निर्देशक,लेखक :सईद अख्तर मिर्जा
संगीत:मानस मुखर्जी,भास्कर चंदावरकर
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड(1981):
बेस्ट फ़िल्म क्रिटिक अवार्ड-सईद अख्तर मिर्जा
-योगेन्द्र व्यास
No comments:
Post a Comment