रुपहला सफ़र:हिरो से जोकर बन जाना पडता है.....
प्यार कोई ऐसी चीज नहीं कि एक ही बार हो जाए बल्कि प्यार तो ऐसा फ़ितुर है कि बार-बार हो जाए, और ये ही प्रश्न राजकपुर की हर फ़िल्म के बाद लोग उनसे करते रहे कि उनकी नायिकाएं उनकी जिंदगी में क्या अहमियत रखती है तो उन्होने एक कलाकार की हैसियत से ईमानदारी से जवाब दिया कि -"पत्नि मेरी नायिका नहीं है और नायिका मेरी पत्नि नहीं है"। जिंदगी को जी लेना और जिंदगी को पी लेना इसमें एक महीन फ़र्क है,जिसने जिंदगी को उसकी अंतिम बुंद तक पिया हो वो ही सही मायने में साहसी कहलाता है वरना खालिस जिंदगी जी लेना कोई खास बात नहीं| राजकपुर एक ऐसे कमर्शियल फ़िल्म कार थे जिन्होने कभी व्यवसाय को जज्बातों से अलग नहीं रखा और ये ही बात एक निर्माता निर्देशक को कुछ अलहदा बानती है| उनकी फ़िल्म "आवारा" विश्व की उन बेहतरीन सौ फ़िल्मो में शुमार हुयी है और होना भी चाहिए लेकिन जो फ़िल्म राजकपुर के दिल के बेहद करीब थी वो है "मेरा नाम जोकर" और "जागते रहो"। भले ही मेरा नाम-जोकर कमर्शियल तौर पर असफ़ल हुयी हो लेकिन जज्बाती तौर पर राजकपुर की ये फ़िल्म बेहद सफ़ल हुयी| मेरा नाम जोकर में राजकपुर ने उन पिछली फ़िल्मों की कुछ बुंदे निचोडी है -जिसमें उनकी तीन नायिकाएं एक के बाद एक जोकर के दिल पर पांव रखकर उड जाती है और ये जोकर बडा दिल लेकर ये ही गाता है "....कल खेल में हम हो ना...हो....पर हम तुम्हारे रहेंगे सदा"| दिल रोए जग हंसे- ये ही एक जोकर की नियति है| 1970 में रिलिज हुयी तीन भागो में सिमटी चार घंटे पच्चीस मिनट की ये फ़िल्म- एक जोकर के जीवन के उस हिस्से को उकेरती है जिसमें उसे अपने सारे दुखॊ को दिल में दफ़न कर सिर्फ़ दुसरो को हंसाना है| एक सोलह बरस के बच्चे की उफ़नते जज्बातो के ज्वार से गुजरती हुयी ये फ़िल्म एक परिपक्व होते दिल के उथले समंदर तक पहुंचती है| पहले भाग में ये उस सोलह बरस के बच्चे राजु(बाल-रिषी-कपुर) पर केद्नित है जिसमें वो अपनी ही टीचर (मैरी-सिम्मीग्रेवाल) के प्रति आसक्ति महसुस करता है- जब वो उसे वस्त्र विहिन देखने की कल्पना करता है चुंकि उम्र के इस पढाव पर चढते यौवन की रस्सा-कशी उस किशोर वय को घबरा देती है और वो एक पाप की ग्लानि में जलने लगता है, जब चर्च में मैरी उससे ये कहती है कि बच्चे पाप नहीं करते तब-राजु तैश में कहता है "मैं बच्चा नहीं हूं....."और ये ही वो सीन है जहां राजकपुर चढ्ते यौवन के मनोविग्यान को समझाना चाहते थे। ये उम्र हमेशा दोहराव वाले रास्ते पर आ खडी होती है जहां फ़िसलन भरा रास्ता उसे खींचता है। यहां किशोर वय में हम थोडी सी भावनात्मक समझ पैदा कर सके तो शायद ये उम्र दुविधा से बाहर निकल सकती है. दुसरे व तीसरे भाग में भी पारिपक्व राजु (राजकपुर) अपनी प्रेमिकओं के प्रेम को अपने बडे होते दिल में दफ़न कर देता है और सर्कस के अपने आखिरी शो में अपनी तीनो प्रेमिकाओं को बुलाता है जहां एक सीन में दुसरे जोकर उसके दिल का आपरेशन करते है और कहते है राजु तुम्हारा आपरेशन करना है क्योकि "तुम्हारा दिल बडा और दुनिया छोटी है ......" वह कहता है -जॊकर की हस्ती को कोई नहीं समझ सकता इस दो टांग के आवारा बादल को कॊई बेडिया नहीं डाल सकता ना सोने की ,ना प्यार की ना मोहब्बत की। दरअसल ये फ़िल्म एक तरह से राजकपुर (जोकर) की आत्मकथात्मक संगीतिय तस्वीर है जिसमें जीवन की फ़िलोसाफ़ी को भावप्रवण ढंग से समाहित किया गया है और एक नये आयाम के साथ यह फ़िल्म दिल के कोने में दस्तक जरुर देती है.कमर्शियल तौर पर ये फ़िल्म बाक्स आफ़िस पर असफ़ल साबित हुयी जिसका सीधा सा कारण कि-ये फ़िल्म समय से काफ़ी पहले आ गयी थी उस समय दर्शक मानसिक रुप से इतने तैयार नहीं थे कि बोल्ड दृश्यो को आत्मसात कर सके और उस काल खंड में एक से एक रोमांटिक नायक राजेश खन्ना,देवआनंद जैसो का दबदबा था और बिना नायक-नायिका आधारित सिनेमा को भी दर्शक स्वीकार नहीं कर सके.... और एक कारण इस फ़िल्म की लंबाई ज्यादा हॊना.लेकिन शंकर-जयकिशन के उम्दा संगीत और मन्ना-डे,आशा और मुकेश की गहराई वाली आवाजों ने शंकर-जयकिशन को बेस्ट फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड का तमगा दिलवाया और यही नही इसे कुल जमा पांच फ़िल्म-फ़ेयर अवार्ड प्राप्त हुए.पार्श्व संगीत पुरी फ़िल्म में एक साये की तरह चलता रहता है वायलिन ,गिटार का कमाल का उपयोग किया गया है जो सुनने वाले के दिल पर सवार होकर एकात्मकता की ओर ले जाता है......इस फ़िल्म को फ़िर से देखिए अपने अंदर कुछ हलचल जरुर महसुस करेंगे आप-
"ये मेरा गीत-जीवन संगीत कल भी कोई दोहराएगा...जग को हंसाने बहरुपिया रुप बदल फ़िर आएगा......"
फ़िल्म : मेरा-नाम जोकर
वर्ष: 1970
निर्देशक: राजकपुर
संगीत: शंकर जयकिशन
सुर-संगीत:
1.तीतर के आगे दो तितर...... (गायकी)आशा भॊसले,मुकेश,सिमी ....(गीत)हसरत जयपुरी
2.कहता है जोकर सारा जमाना......(गायक)मुकेश- ...... (गीत)नीरज
3.अंग लग जा बालमा........... (गायिका)आशा भॊसले....(गीत)शैलेन्द्र
4.जीना यहां मरना यहां......... (गायक)मुकेश........... (गीत)शैलेन्द्र
5.जाने कहां गये वो दिन- ...... (गायक)मुकेश-.......... (गीत)हसरत जयपुरी
6.ऐ भाई जरा देख के चलो...........(गायक)मन्नाडे.............(गीत)नीरज
7.काटे ना कटे रैना..... (गायिका) आशा भॊसले....(गीत)शैलेन्द्र
8.दाग ना लग जाए..... (गायकी)आशा भॊसले,मुकेश......(गीत)हसरत जयपुरी
9.सदके हीर तुझपे.......... (गायक)मो.रफ़ी............(गीत)प्रेम धवन
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड:
1.सर्वश्रेष्ट निर्देशक: राजकपुर
2.सर्वश्रेष्ट संगीत-शंकर-जयकिशन
3.सर्वश्रेष्ट गायक-मन्ना डे(ए भाई देख के चलो)
4.सर्वश्रेष्ट सिनेमेटॊग्राफ़ी-राधु करमाकर
5.सर्वश्रेष्ट साऊंड रिकार्डिस्ट-अलाउद्दीन खान कुरेशी
-योगेन्द्र व्यास
प्यार कोई ऐसी चीज नहीं कि एक ही बार हो जाए बल्कि प्यार तो ऐसा फ़ितुर है कि बार-बार हो जाए, और ये ही प्रश्न राजकपुर की हर फ़िल्म के बाद लोग उनसे करते रहे कि उनकी नायिकाएं उनकी जिंदगी में क्या अहमियत रखती है तो उन्होने एक कलाकार की हैसियत से ईमानदारी से जवाब दिया कि -"पत्नि मेरी नायिका नहीं है और नायिका मेरी पत्नि नहीं है"। जिंदगी को जी लेना और जिंदगी को पी लेना इसमें एक महीन फ़र्क है,जिसने जिंदगी को उसकी अंतिम बुंद तक पिया हो वो ही सही मायने में साहसी कहलाता है वरना खालिस जिंदगी जी लेना कोई खास बात नहीं| राजकपुर एक ऐसे कमर्शियल फ़िल्म कार थे जिन्होने कभी व्यवसाय को जज्बातों से अलग नहीं रखा और ये ही बात एक निर्माता निर्देशक को कुछ अलहदा बानती है| उनकी फ़िल्म "आवारा" विश्व की उन बेहतरीन सौ फ़िल्मो में शुमार हुयी है और होना भी चाहिए लेकिन जो फ़िल्म राजकपुर के दिल के बेहद करीब थी वो है "मेरा नाम जोकर" और "जागते रहो"। भले ही मेरा नाम-जोकर कमर्शियल तौर पर असफ़ल हुयी हो लेकिन जज्बाती तौर पर राजकपुर की ये फ़िल्म बेहद सफ़ल हुयी| मेरा नाम जोकर में राजकपुर ने उन पिछली फ़िल्मों की कुछ बुंदे निचोडी है -जिसमें उनकी तीन नायिकाएं एक के बाद एक जोकर के दिल पर पांव रखकर उड जाती है और ये जोकर बडा दिल लेकर ये ही गाता है "....कल खेल में हम हो ना...हो....पर हम तुम्हारे रहेंगे सदा"| दिल रोए जग हंसे- ये ही एक जोकर की नियति है| 1970 में रिलिज हुयी तीन भागो में सिमटी चार घंटे पच्चीस मिनट की ये फ़िल्म- एक जोकर के जीवन के उस हिस्से को उकेरती है जिसमें उसे अपने सारे दुखॊ को दिल में दफ़न कर सिर्फ़ दुसरो को हंसाना है| एक सोलह बरस के बच्चे की उफ़नते जज्बातो के ज्वार से गुजरती हुयी ये फ़िल्म एक परिपक्व होते दिल के उथले समंदर तक पहुंचती है| पहले भाग में ये उस सोलह बरस के बच्चे राजु(बाल-रिषी-कपुर) पर केद्नित है जिसमें वो अपनी ही टीचर (मैरी-सिम्मीग्रेवाल) के प्रति आसक्ति महसुस करता है- जब वो उसे वस्त्र विहिन देखने की कल्पना करता है चुंकि उम्र के इस पढाव पर चढते यौवन की रस्सा-कशी उस किशोर वय को घबरा देती है और वो एक पाप की ग्लानि में जलने लगता है, जब चर्च में मैरी उससे ये कहती है कि बच्चे पाप नहीं करते तब-राजु तैश में कहता है "मैं बच्चा नहीं हूं....."और ये ही वो सीन है जहां राजकपुर चढ्ते यौवन के मनोविग्यान को समझाना चाहते थे। ये उम्र हमेशा दोहराव वाले रास्ते पर आ खडी होती है जहां फ़िसलन भरा रास्ता उसे खींचता है। यहां किशोर वय में हम थोडी सी भावनात्मक समझ पैदा कर सके तो शायद ये उम्र दुविधा से बाहर निकल सकती है. दुसरे व तीसरे भाग में भी पारिपक्व राजु (राजकपुर) अपनी प्रेमिकओं के प्रेम को अपने बडे होते दिल में दफ़न कर देता है और सर्कस के अपने आखिरी शो में अपनी तीनो प्रेमिकाओं को बुलाता है जहां एक सीन में दुसरे जोकर उसके दिल का आपरेशन करते है और कहते है राजु तुम्हारा आपरेशन करना है क्योकि "तुम्हारा दिल बडा और दुनिया छोटी है ......" वह कहता है -जॊकर की हस्ती को कोई नहीं समझ सकता इस दो टांग के आवारा बादल को कॊई बेडिया नहीं डाल सकता ना सोने की ,ना प्यार की ना मोहब्बत की। दरअसल ये फ़िल्म एक तरह से राजकपुर (जोकर) की आत्मकथात्मक संगीतिय तस्वीर है जिसमें जीवन की फ़िलोसाफ़ी को भावप्रवण ढंग से समाहित किया गया है और एक नये आयाम के साथ यह फ़िल्म दिल के कोने में दस्तक जरुर देती है.कमर्शियल तौर पर ये फ़िल्म बाक्स आफ़िस पर असफ़ल साबित हुयी जिसका सीधा सा कारण कि-ये फ़िल्म समय से काफ़ी पहले आ गयी थी उस समय दर्शक मानसिक रुप से इतने तैयार नहीं थे कि बोल्ड दृश्यो को आत्मसात कर सके और उस काल खंड में एक से एक रोमांटिक नायक राजेश खन्ना,देवआनंद जैसो का दबदबा था और बिना नायक-नायिका आधारित सिनेमा को भी दर्शक स्वीकार नहीं कर सके.... और एक कारण इस फ़िल्म की लंबाई ज्यादा हॊना.लेकिन शंकर-जयकिशन के उम्दा संगीत और मन्ना-डे,आशा और मुकेश की गहराई वाली आवाजों ने शंकर-जयकिशन को बेस्ट फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड का तमगा दिलवाया और यही नही इसे कुल जमा पांच फ़िल्म-फ़ेयर अवार्ड प्राप्त हुए.पार्श्व संगीत पुरी फ़िल्म में एक साये की तरह चलता रहता है वायलिन ,गिटार का कमाल का उपयोग किया गया है जो सुनने वाले के दिल पर सवार होकर एकात्मकता की ओर ले जाता है......इस फ़िल्म को फ़िर से देखिए अपने अंदर कुछ हलचल जरुर महसुस करेंगे आप-
"ये मेरा गीत-जीवन संगीत कल भी कोई दोहराएगा...जग को हंसाने बहरुपिया रुप बदल फ़िर आएगा......"
फ़िल्म : मेरा-नाम जोकर
वर्ष: 1970
निर्देशक: राजकपुर
संगीत: शंकर जयकिशन
सुर-संगीत:
1.तीतर के आगे दो तितर...... (गायकी)आशा भॊसले,मुकेश,सिमी ....(गीत)हसरत जयपुरी
2.कहता है जोकर सारा जमाना......(गायक)मुकेश- ...... (गीत)नीरज
3.अंग लग जा बालमा........... (गायिका)आशा भॊसले....(गीत)शैलेन्द्र
4.जीना यहां मरना यहां......... (गायक)मुकेश........... (गीत)शैलेन्द्र
5.जाने कहां गये वो दिन- ...... (गायक)मुकेश-.......... (गीत)हसरत जयपुरी
6.ऐ भाई जरा देख के चलो...........(गायक)मन्नाडे.............(गीत)नीरज
7.काटे ना कटे रैना..... (गायिका) आशा भॊसले....(गीत)शैलेन्द्र
8.दाग ना लग जाए..... (गायकी)आशा भॊसले,मुकेश......(गीत)हसरत जयपुरी
9.सदके हीर तुझपे.......... (गायक)मो.रफ़ी............(गीत)प्रेम धवन
फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड:
1.सर्वश्रेष्ट निर्देशक: राजकपुर
2.सर्वश्रेष्ट संगीत-शंकर-जयकिशन
3.सर्वश्रेष्ट गायक-मन्ना डे(ए भाई देख के चलो)
4.सर्वश्रेष्ट सिनेमेटॊग्राफ़ी-राधु करमाकर
5.सर्वश्रेष्ट साऊंड रिकार्डिस्ट-अलाउद्दीन खान कुरेशी
-योगेन्द्र व्यास
No comments:
Post a Comment