मास्टर जी की आ गई चिठ्ठी: किताब
बच्चों का मन बहुत कोमल होता है और हम सब उस कोमल मन पर अपने हिसाब से इबारत लिखने की कोशिश में लगे रहते है। बच्चॊं के मनोविज्ञान को समझना है तो थोडा हमें भी बच्चा हो जाने की जरुरत है जैसे कि गुलजार साहब खुद फ़िल्म "किताब" बनाते वक्त बच्चे के अंर्तमन में जा बैठते है और उनकी छोटी-छोटी इच्छाओं,जिज्ञासा और शैतानियों को हौले से निकाल कर किसी रुई के फ़ोए पर आहिस्ता से रख देते है।
समरेश बसु के उपन्यास "पथिक" पर आधारित फ़िल्म "किताब" एक बिल्कुल अलग नजरिये से बनाई गयी फ़िल्म जिसमें एक बच्चा बाबला(मास्टर राजु) जिंदगी को अपने ढंग से देखना चाहता और उस नजरिये में वो खट्टे-मीठे अनुभवो से गुजरता हुआ जिंदगी की सच्चाईयों से सामना करता है जो उसके मन पर गहरा प्रभाव डालती है।बाबला की मां(दीना पाठक) उसे गांव से शहर उसकी दीदी एवं जिजाजी(विध्या सिन्हा,उत्तम कुमार) के पास पढ़ने भेजती है ताकि पढ़ लिख कर वो बड़ा बन सके।यहां बाल मन जो कहता है वो हंसी पैदा करता है-बाबला अपनी मां से कहता है"तुम भी अजीब हो मां कभी कहती हो बच्चे दुध पीने से बड़े होते है,और कभी कहती हो पड़ने लिखने से"।शुरुआती तौर पर बाबला को स्कुल व दीदी का घर दोनो अच्छे लगते है लेकिन धीरे धीरे उसे बाहरी दुनिया लुभाने लगती है।स्कुल में मास्टर जी की दुनिया उसे उब पैदा करती है।फ़िर शुरु होता है शरारतॊ का दौर स्कुल में मास्टर जी मजाक बनाना,अपने दोस्त पप्पु(मा.टीटो) के साथ सड़को पर घुमना,मदारी का जादु,दुनिया को अपने नजरिये से देखना उसे अच्छा लगने लगता है।इधर घर पर शिकायती चिठ्ठीयाँ स्कुल से आने लगती है।फ़िर स्कुल में धमाचौकड़ी मचाते बच्चे गाना गाते है"आ..आ..इ.ई.मास्टर जी की आ गई चिठ्ठी"।इस गाने में पंचम दा ने क्लास की मेज को ही रिदम के रुप में इस्तेमाल किया था।इसी बीच बाबला बीमार हो जाता है तब डाक्टर कहता है "बच्चो के टेंशन बहुत सख्त होते बच्चों को हम जिंदगी से बहुत डरा कर रखते है,हमेशा ये कहते है कि पड़ोगे नहीं तो क्या भाड़ झोंकोगे।ये नहीं बताते कि जिंदगी कितनी खुबसुरत भी है।"स्कुल और मां बाप इसी उलझन में रहते है कि आखिर बच्चॊ को संस्कारित करने की जिम्मेवारी किस की है।शायद हमारा समाज बच्चों के मामलो में उतना संवेदनशील नहीं है जितना उसे होना चाहिए।
बाबला जहां भी जाता है लोग उसे नसीहते देने लगते है एक मर्तबा वो रास्ते में हलवाई की दुकान पर जाता है उससे कहता है हमें जलेबी बनाना सीखा दो ना..हलवाई बोलता है तुम अच्छे घर के हो तो बाबला कहता है तो क्या हलवाई अच्छे घर के नहीं होते।बाबला को ये समझ नहीं आता कि सितार बजाने के लिए ज्योग्राफ़ी सिखना क्यो जरुरी है,मदारी भी बिना पढ़े लिखे क्या गजब का जादु दिखाता है।इन सब मजे मस्ती के बीच वो स्कुल और घर पर डांट डपट का शिकार होता रहता है और कहता है बड़ो की सबको जरुरत होती है,लेकिन बड़ो को किसी की नहीं। इसी के चलते वो एक रात वापस अपनी मां के पास जाने के लिए घर से अकेला निकल जाता है।ट्रेन में बिना टिकट रास्ते में उतार दिया जाता है फ़िर बालमन जीवन की कड़वी हकीकत का सामना करता है,जिसमें अंधे भिखारी से मुलाकात,इंजिन ड्रायवर से मुलाकात और एक रात ठंड में ठिठुरते हुए एक प्लेटफ़र्म पर एक बुढी भिखारिन के पास उसके कंबल में सो जाता है।सुबह जब उसे पता चलता है कि रात भर वो एक मृत भिखारिन के पास सोया रहा।तब वो दुखी हो जाता है और उसने जो सिक्का उसके डब्बे से निकाला था वो वापस डाल देता है।एक सीख लेकर घर पहुंचता है और फ़िर अच्छे से पढ़ाई लिखाई करने का वादा करता है।
गुलजार सा.ने पुरी फ़िल्म में फ़्लेश बेक को बहुत ही उम्दा तरीके प्रस्तुत किया है साथ ही साथ कुछ डायलाग को दार्शनिक पुट भी दिया, एक प्रसंग जहां भिखारी(श्रीराम लागु)बाबला को कहते है-"गाडी छुटने का गम नहीं स्टेशन नहीं छुटना चाहिए"।
बाल दिवस सिर्फ़ बच्चो के लिए ही नहीं बडो के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है कि- एक दिन तो बच्चो के साथ बच्चा बन कर देखा जाए..।"बाल दिवस" पर "किताब" ही हो जाए......
विशेष: प्रयोगधर्मी पंचम ने "धन्नो की आंखो में रात का सुरमा" गाने में एक बेसुरी सी आवाज वाला फ़्लेंजिंग गजेट को गिटार में जोड कर एक नायब धुन तैयार की और फ़िर बाद इसे कई प्रसिध्द गानो में उपयोग किया।
फ़िल्म: किताब
वर्ष: 31अगस्त 1977
निर्माता:प्राणलाल मेहता,गुलजार
निर्देशक: गुलजार
संगीत:आर.डी. बर्मन
गीतकार:गुलजार
गीत:
1. अआइई मास्टर जी की आ गई चिठ्ठी-शिवांगी कोल्हापुरे
2. धन्नो की आंखो में रात का सुरमा- आर. डी.
3. हरि दिन तो बिता- राजकुमारी
4. मेरे साथ चले ना साया- सपन चक्रवर्ती
-योगेन्द्र व्यास
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
https://www.facebook.com/sunil.joshi.10888/videos/2237571532949932/
-
http://www.epaperdainikdabangdunia.com/Details.aspx?id=8100&boxid=54016562 दामुल: समाज का विकृत रुप भारतीय समाज में शोषण की परम्परा ...
-
http://www.epaperdainikdabangdunia.com/Details.aspx?id=7894&boxid=1844734 संसार में मनुष्य ही एक ऐसा बुध्दिजीवी प्राणी है जो अपने मन औ...
-
बहुत ही विस्मय कारी घटना है कि इंन्दौर के सिक्ख मोहल्ले से निकली नवजात किलकारी आलाप ,तान और मुरकियों में बदल जाएगी और सात सुरो को अप...
No comments:
Post a Comment