Monday, November 5, 2012
गीत जिन्हे मन गाये (ग्यारहवीं किश्त):दिल से निकलने वाले रस्ते का शुक्रिया....दिल तक पहुंचने वाली डगर को सलाम....
ये बेसबरी उमर कब फ़िसल कर सोलवें बरस में पहुंच जाती है... सोलहवे बरस की दस्तक का एहसास ठीक वैसा ही है जैसे कली का चटकना, भौंरो का गुनगुन करना, शाखो पर कपोले फ़ुटना... और सोलवें बरस में पहुंचने पर प्यार का एहसास तो ऐसा कि कब ओंस की बुंद पत्ते से फ़िसलकर दुब में समा जाए और वो गीले पन का एहसासssss- जब दुब पर हाथ घुमाएं तो महसुस होगा कि कोई यहां प्यार में अभी-अभी तरबतर होकर अपनी मदहोशी का जश्न मना रहा है.......और ऐसे नाजुक समय यदि कोई इस दुब को छिल दे तो- उस सोलह बरस के यौवन का डंक लता की आवाज में ऐसा घुलता है कि- ये तपीश भरी आवाज जहां से भी गुजरती है एक स्तब्धता सा माहौल खींच देती है...."जब वो ये कहती है कि- जिसने हमें मिलाया-जिसने जुदा किया उस वक्त, उस घडी,उस गजर को सलाम..." जिस प्यार के महीन धागे खींच दिए गये हो फ़िर भी वो प्यार जीवन,समाज के प्रति कृतग्यता अर्पित कर भौचक कर दे ऐसे कलम कार आनंद बक्क्षी सा.को सलाम। इन सब के बीच लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी ने पुरे गाने में अपने साजो को भावनाओं के ज्वर में लता जी की करुण तान के साथ बहुत बडा संबल बना कर छोड दिया है....साज क्या बजते है मानो वे अपनी थाप और तानो पर झर-झर आंसु बन कर ऊछल रहे हो.....राग अहीर भैरव में लक्ष्मी-प्यारे का बेजोड संगीत- रूआब,मेंडोलिन,सारंगी,बांसुरी,डोलक, का प्रभावी उपयोग इस गाने को अपने चरम तक लेकर जाता है और सुनने वाले को ये कहता है कि वापिस जाओ अपने उस सोलहवें बरस में जहां तुम कुछ टपकती बुंदो को प्यासा छोड आए थे.केवल 6 मिनिट 35 सेकन्ड के लिए सोलहवां बरस फ़िर अपने जिस्म पर चिपका लिजिए तय है बाहर आने का मन नहीं करेगा....."घुंघट को छोड के जो सर से सरक गयी...ऐसी निगोडी धानी चुनर को सलाम....."
टीप: जब लता जी प्रेम,प्यास,दर्द,उल्लास,उमंग को गाती है तो निश्चय ही नव रसो का अमृत घोल उनकी आत्मा से झर कर कंठ पर बैठी मां शारदे हमें सुर का आचमन करा रही होती है.......
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