Monday, November 5, 2012

गीत जिन्हे मन गाये 1:जब से तुम्हारे नाम की मिसरी ओंठ लगाई है...........

जब से तुम्हारे नाम की मिसरी ओंठ लगाई है...........

by Yogendra Vyas on Friday, April 22, 2011 at 3:49pm ·

"जब गुलजार,पंचम और आशा जी एक जगह पर जमा हो जाए तो इनकी सुर धारा को पिये बिना आप तृप्त नहीं हो सकते.....ऐसा ही एक कमाल २५ साल पहले इनकी एक कंपोजिशन में हुआ....."रोज-रोज आंखो तले एक ही सपना पले........"तीन अंतरे वाले इस गाने में पंचम के उम्दा संगत कारो ने अपने हुनर से अजब किस्म का तन्हा माहौल पैदा किया है.....गुलजार सा. का शब्दो के साथ रोमांस करना और फ़िर इसे मिठास के साथ आशा जी से सुनना एक अदभुत अनुभव है..........साईड रिदम मार्कस का पुरे समय गाने पर पहरा और बांसुरी का पुरे समय आशा जी आवाज का पीछा करना......पंचम दा की ये खासियत है कि वे अंतरे के खाली पन को सेकण्डस में अपनी धुनॊ का एक पुरा पोर्टेट खिच कर फ़िर से सम पर ले आते है.......पार्श्व में वायलिन का कारवां और बीच-बीच में आपको गिटार के उम्दा नोट भी सुनने को मिलेगें,आशा जी के दो अंतरो के बाद अमित कुमार की आवाज को बडे ही वात्सल्य भाव से आशा जी ने सहारा दिया है चूंकि ये गाना राग पर आधारित है और ये अमित कुमार का सौभाग्य ही है.........उन्होने इसे अच्छा निभाया........इतने सालों बाद भी ये गाना तरोताजा लगता है......वैसे तो आपने कई बार इसे सुना होगा लेकिन संगीत की बारिकियों के साथ सुनने का मजा ही कुछ और है तो आओ सुने.......रोज....रोज.....(रोज..रोज - सिरिज का अगला गाना शीघ्र ही...)http://youtu.be/zuImW55jNJUगीत जिन्हे मन गाये:
गीत जिन्हे मन गाये:

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