पंच तत्वों में से इंसान सिर्फ़ धरती और आकाश को ही बांट पाया और ये शायद इंसान की सबसे बडी गलतफ़हमी है कि उसने इस ब्रम्हाण्ड के सबसे महीन टुकडे पर अधिकार कर लिया। चुल्हे सरहदों के इस पार भी जलते है उस पार भी,पानी का सैलाब इधर भी है उधर भी,सरहदॊ की हवाओं में दर्द और सिसकियां इधर भी है उधर भी।सियासी और मजहबी ताकतो को बारुद की गंध में इंसानियत की सुगंध महसुस ही नहीं होती और ये ही एक हारे हुए इंसान की सबसे बडी हार है।
रामचंद पाकिस्तानी एक सत्य घटना पर आधारित कहानी है। चम्पा(नंदिता दास) उन अभागी स्त्रियों में से एक है जिसका आठ साल बच्चा रामचंद(सैयद फ़जल हुसैन/नावेद जब्बार) व पति शंकर (राशिद फ़ारुकी) अनजाने में भारतीय सीमा में चले जाते है और भारतीय़ आर्मी उन्हे जासुस समझ कर हिरासत में ले लेती है ये सब उस समय हुआ जब वर्ष 2002 में भारतीय संसद पर हमला हुआ था और उस समय भारत और पाकिस्तान की सरहदों पर काफ़ी तनाव भी उत्पन्न हो गया था। पाकिस्तान की सटी हुयी सरहदों पर कुछ दलित जातियां बसती है।उसी गरीब हिन्दु दलित जाति का बच्चा रामचंद अपनी मां से खफ़ा होकर दौडते हुए अनजाने में भारतीय सीमा में चला आता है और उसे ढुंढते हुए उस का पिता शंकर भारतीय सीमा में प्रवेश कर जाता है। यहां से शुरु होता है पिता पुत्र का जेल का सफ़र और एक हताश मां और पत्नि सरहद पर टकटकी लगाए उनके आवन की बाट जोह रही होती है।जेल किसी भी देश की हो वहां रहना एक भयावह अनुभव से कम नहीं होता जबकि आपको ये मालुम हो कि यहां आपकी पुरी की पुरी उम्र भी गुजर सकती है।आज भी ऐसे कई सौ कैदी होंगे जो दोनो देशो की जेलो में बिना किसी जुर्म के सजा भुगत रहे हो और अपनी ख्वाहिशे और सपने अनजान जेल की चाहर दिवारी में दफ़न होते देखते है।जुर्म सिर्फ़ इतना की सफ़ेद पुते पत्थरों की सीमा को लांघ कर कदम बढा देना।
चम्पा अकेले अपनी गरीबी और साहुकारी से लडती हुयी जीने की आस को थामे रखती है।पाकिस्तानी फ़िल्मकार और डायरेक्टर मेहरीन जब्बार ने एक सकारत्मक नजरिये से व्यक्तिगत स्वतंत्रता,उसके अधिकार और जातिगत असमानता को इस फ़िल्म में उठाया है।एक बच्चा जेल में भी सामाजिक असमानता पर तंज बात अपनी महिला जेलर को कहता है जो छु जाने वाली है।मेहरीन जब्बार ने जेल में सडती गलती जिंदगी को बिना कोई सनसनी पैदा किए जस का तस रखा है बल्कि असल हालातों को थोडा नरम रुप में ही प्रस्तुत किया है। रामचंद और उसके पिता अपनी जिंदगी के चार साल जेल में कडवे अनुभवो के सहारे गुजारते है।इंसान की आस तब और टुट जाती है जब उसे ये पता लगे वो अब रिहा किया जाने वाला है लेकिन फ़िर उसे जेल में डाल दिया जाए।
ये फ़िल्म पाकिस्तान और भारत के कलाकारों की साझा फ़िल्म है।जिसे कई अंर्तराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए है। इस फ़िल्म का संगीत भारतीय संगीतकार देबोजीत मिश्रा ने तैयार किया और स्वर दिए शुभा मुद्दगल और शफ़ाकत अमानत अली ने।एक आभासी संगीत और सोद्देश्य बोलो से गुजरते हुए हम सरहदॊं पर चहल कदमी करते हुए उसकी संवेदनशीलता को महसुस करते है।इस फ़िल्म के को-एडीटर असीम सिन्हा रहे है जिन्होने सत्यजीत रे के साथ काफ़ी काम किया। सरहदो की दिवानगी को खत्म करना हो तो इस फ़िल्म को देखा जाना चाहिए।
विशेष:पाकिस्तानी फ़िल्मों में शायद ये पहली फ़िल्म है जिसमें पाकिस्तानी हिन्दु को केन्द्रिय पात्र रखकर फ़िल्म बनाई गई है। नंदिता दास को छोड कर सारे कलाकार पाकिस्तानी ही है।
फ़िल्म: रामचंद पाकिस्तानी
वर्ष: 2 अक्टुबर, 2008
निर्माता:जावेद जब्बार
निर्देशक:मेहरीन जब्बार
संगीत:देबोजीत मिश्रा
गीतकार: अनवर मकसुद
गीत:
01 तेरी मेरी प्रीत -शुभा मुद्दगल
02 अल्लाह मेघ दे-शुभा मुद्दगल और शफ़ाकत अमानत अली
03 फ़िर वही रास्ते-शफ़ाकत अमानत अली
04 खारी नीम के नीचे -माईभागी
05 तेरीन पौंडा-अलन फ़कीर
-योगेन्द्र व्यास
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