Saturday, March 30, 2013

होली

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प्रतिकात्मक दृष्टीकोण से देखा जाए तो होली उन सब बुराईयों को तिलांजली है जो कि अग्नि में जल कर भस्म हो जाती है लेकिन आज कल इसके बिल्कुल उलट- लकडी तो जल जाती है लेकिन मन की कलुषता,अराजकता, ईर्ष्या-द्वेष,अनैतिकता,वहशीपन,कुटिलता,घोर लालच, बिना जले साफ़ तौर पर बाहर रह जाते है या युं कहे कि भक्त प्रह्लाद तो जल जाते है लेकिन होलीका साफ़ बचकर बाहर आ जाती है। आज इंसान -रंग की जगह खुन से खेल रहा है और खुद का खुन पानी होता जा रहा है।
ये कहानी उस कालेज की है जहां छात्र अपनी उच्छृंखलता को अपना हक समझते है,कालेज के चेयरमेन उसे व्यवसाय का अड्डा, कालेज का प्रिंसीपल चेयरमेन की चाटुकारी में शान समझता है, कुछ शिक्षक टाइम पास का साधन और कालेज के कर्मचारी हडताल को अपना हथियार।ऐसे में शिक्षा की फ़ेक्ट्री में से किस तरह का उत्पाद बाहर आएगा ये आसानी से समझा जा सकता है।
"होली"फ़िल्म मराठी नाटककार महेश एलकुंचवर के नाटक पर आधारित है जिसे कि ख्यात डायरेक्टर केतन मेहता ने ये भारतीय फ़िल्म एण्ड टेलिविजन संस्थान के छात्रो के साथ एक वर्कशाप के रुप में निर्माण किया था।फ़िल्म की खासियत ये है कि कालेज केम्पस और होस्टल के हालात को कैमेरा जस का तस बस घुमाता जाता है और ये याद दिलाता जाता है कि अरे हां ये छात्र तो हम ही है और ये कालेज,ये होस्टल भी तो हमारा है-जिसकी भद्दी दिवारे,भद्दे स्लोगन पटी पडी है,सिगरेट के धुंए में धुंधलाता भविष्य,बियर की बोतलो में लडखडाती जिंदगी।क्लास में शिक्षक है छात्र नहीं,महिला शिक्षिका की क्लास में बेहुदे कमेंट,आते-जाते लडकियों पर छिंटा-कसी,सीधे-सादे जुनियर छात्रो की रेगिंग और भी कई ऐसी हरकते हां शायद कुछ मीठी यादे भी.....।
छात्रो के मन में कडवाहट तब घुल जाती है जब होली के दिन छात्रो को छुट्टी नहीं मिलती और उस दिन कालेज के चेयरमेन (श्रीराम लागु) के आने की सुचना दी जाती है।छात्रो के यदि कोई नजदीक टीचर है तो वो है मि.सिंग(नासिरउद्दीन शाह)जो उन्हे समझता है।इसी बीच कालेज के क्लास टु कर्मचारी हडताल पर चले जाते है और इस वजह से परीक्षा स्थगित हो जाती है।इससे छात्रो का गुस्सा और भडक जाता है।मि.सिंग(नासिर) प्रिंसीपल(ओम पुरी) को आगाह करते है लेकिन वो इसे नजर अंदाज करते है।प्रिंसीपल का भतीजा जो कि इसी कालेज में पढता है उसका एक छात्र से झगडा हो जाता है और इसी वजह से दुसरे छात्र को कालेज से निकाल दिया जाता है और ये घटना आग में घी की तरह काम करती है।छात्रो का असंतोष बढ जाता है।फ़िल्म संस्थान पुणे में एक गिरे हुए पेड को केतन मेहता ने सांकेतिक रुप से "सिस्टम" के धराशायी होने को प्रतिकात्मक रुप से प्रस्तुत किया। कालेज के चेयर मेन आर्ट्स के विषयो को समाप्त कर व्यवसायिक पाठ्यक्रम शुरु करने का आदेश सुनाते है।चेयरमेन के संबोधन में छात्र जमकर हंगामा मचाते है और टमाटर और अंडे फ़ेंक कर चेयरमेन को वहां से भगा देते है।कालेज प्रिंसीपल एक छात्र को फ़ुसला कर उन सभी छात्रो के नाम उगलवा लेते है जिन्होने हंगामा मचाया था।लेकिन वो उन लोगो के नाम भी ले लेता है जो उस समय वहां नहीं थे।उन सभी छात्रो को कालेज से निकालने का फ़रमान जारी होता है।लेकिन जिसने प्रिंसीपल को नाम लिखवाए थे उन्हे उसका पता चल जाता है और होस्टल में सभी छात्र मिलकर उसे बहुत ही बुरी तरह प्रताडित करते है और वो छात्र शर्मिंदगी में आत्म-हत्या कर लेता है।अंतत: पुलिस आती है "होली" के दिन सभी छात्रो की गिरफ़्तारी होती है लोग रंग गुलाल खेलते है और ये छात्र पुलिस गाडी में सुनी आंखो से लोगो को होली खेलते बस देखते है।
आइए आपको बता दे कि ये कालेज से निकाले गए छात्र कौन-कौन है-तो ये है अमीर खान,आशुतोष गवारीकर,नीरज वोरा,राज जुत्शी,अमोल गुप्ते,मनोज पहावा,बेंजामिन गिलानी,यतिन्द्र करयेकर,राहुर रानाडे इत्यादि।लेकिन ये सभी छात्र फ़िल्म में से तो निकाले गए लेकिन आज फ़िल्म जगत में उतने ही सफ़ल कलाकार के तौर पर आपको काम करते दिखाई देंगे।इस फ़िल्म में कोई हीरो नहीं,जहांगीर चौधरी का कैमेरा कभी अमीर खान या अन्य कोई कलाकार पर फ़ोकस नहीं होता बस फ़ोकस में कालेज और स्क्रीप्ट।हालांकि फ़िल्म अपने अंदाज में शिक्षा व्यवस्थाओं पर कई तंज कर जाती है कि "शिक्षा संस्थान वो फ़ेक्ट्रीयां है जहां गुलाम नौकरी करने के लिए बनाए जाते है"फ़िल्म मनोरंजन के लिए देखना होतो ना देखे निराशा हाथ लगेगी इसीलिए इस बार कहानी को विस्तार से कह दिया है।लेकिन ऐसी फ़िल्मो पर भी चर्चा होनी चाहिए जो कभी चर्चाओं में नही रही ।
विशेष:इस फ़िल्म को नेशनल अवार्ड बेस्ट सिनेमेटोग्राफ़ी हेतु जहांगीर चौधरी को दिया गया था
फ़िल्म: होली (1984)
निर्माता: प्रदीप उप्पर
निर्देशक: केतन मेहता
लेखक: महेश एलकुंचवर
संगीत: रजत ढोलकिया
सिनेमेटोग्राफ़ी-जहांगीर चौधरी

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